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Wednesday, August 19, 2015

देश विभाजन के 68 साल बाद विभाजन की मर्मस्पर्शी यादें। 85 वर्षीय रमेश वर्मा जालन्धर में रहते हैं।



देश विभाजन के 68 साल बाद विभाजन की मर्मस्पर्शी यादें। 85 वर्षीय रमेश वर्मा जालन्धर में रहते हैं।
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जालंधर शहर के कलां बाज़ार चौक से मेरी दुकान हिन्दुओं के बाज़ार का अंतिम छोर थी। इसके बाद शेखाँ बाज़ार, फिर रौनक बाज़ार (जो अब रैनक बाज़ार है) शुरू होता था। यहाँ मुजरे करने वाली तवायफ़ों के कोठे थे। वहाँ दो बहने थीं - ईदां और फ़ुंदां। जालीदार सफ़ेद रंग के सूट पहने वे यूँ लगतीं, मानो जन्नत की हूरें धरती पर उतर आई हों। ईदां-फुंदां रैनक बाज़ार में रहती थीं। अब वहाँ पण्डितों की एक इमारत है जिसकी वे मालकिन हुआ करती थीं। शहर के चन्द रईसों के पास जब कारें थी तब इन दोनों बहनों के पास भी कार थी। पेशे से दोनों बहनें तवायफ़ थीं। 'तनाव के बावजूद जालंधर के मुसलमान आश्वस्त थे कि सब सामान्य रहेगा। 'वो आचार-व्यवहार की बहुत अच्छी थीं। ख़र्च भी दिल खोल कर करती थीं। इसीलिए आसपास रहने वाले लोगों के साथ उनके रिश्ते बहुत अच्छे थे। 'तानसेन की ख़ुर्शीद' दोनों बहनें जुमे की नमाज़ के लिए हमारे बाज़ार से होकर गुज़रती थीं। अक्सर चुन्नी लाल जौहरी से नग, बुन्दे और चूड़ियाँ ख़रीद कर ले जातीं। मुझसे खिलखिला कर हँसते हुए कहतीं, "मास्टर जी, ऐसी फ़ोटो खींचना कि 'तानसेन' की ख़ुर्शीद जैसी दिखूँ। "ख़ुर्शीद उस ज़माने की मशहूर फ़िल्म अभिनेत्री थीं जिन्होंने 'तानसेन' फ़िल्म में काम किया था। मैंने दोनों बहनों की बहुत सी तस्वीरें ख़ींची। आज़ादी से कुछ ही दिन पहले जब उग्र हिन्दू भीड़ ने शेखाँ बाज़ार में लूटपाट और आगज़नी की तो मेरी दुकान भी जल गई। सब यादें भी राख हो गई। उसी में.चौक सूदां में हलवाई नज़ीर की दुकान थी। शाम को वहाँ महफ़िल लगती थी। नज़ीर के अधिकतर ग्राहक हिन्दू थे। वह बहुत बड़े दिल वाला था। दूध-मलाई के शौकीन मनचलों के मन में नज़ीर का मुसलमान होना कोई मुश्किल पैदा करने वाली बात नहीं थी और न ही नज़ीर के मन में हिन्दुओं के प्रति कोई खोट थी। वहाँ पर तारीफ़ होती थी या तो नज़ीर के मलाई भरे दूध की या फिर ईदां-फुंदां के हुस्न और अदाओं की। दोनों बहनों तक पहुँच न हो पाने के बावजूद भी सभी उनके दीवाने थे। देश के बँटवारे की घोषणा के बावजूद अधिकतर मुसलमान अपने-अपने घरों में थे और काम-धन्धे में लगे हुए थे। हाँ, कुछ पैसे वाले लोग और अधिकतर तवायफ़ें लाहौर चली गई थीं। लेकिन इदां और फ़ुंदां तो शोखी भरे अंदाज़ में कहती थीं, "कुछ नहीं होने वाला मास्टर जी। फिरंगियों के अपने मुल्क लौटने की देर है सब ठीक हो जाएगा। नज़ीर की दुकान पर भी पहले जैसे ही महफ़िल जमा करती थी। जब बाज़ार जलकर राख हुए, वह शायद 16 या 17 अगस्त 1947 की बात है। ख़बर आई कि पाकिस्तान से एक रेलगाड़ी में हिन्दू-सिखों की लाशें भर कर आई हैं। बस, उसी रात बदल गया सब कुछ। हिन्दू उपद्रवी भी सक्रिय हो गए। शेखाँ बाज़ार और रौनक बाज़ार में मुसलमानों के घर भी जला दिए गए। नज़ीर की दुकान को भी आग लगा दी गई। मेरी और कुछ अन्य दोस्तों की दुकानें भी इसी आग की चपेट में आ गईं। जालन्धर से बड़ी संख्या में मुसलमानों का पलायन शुरू हो गया और इदां और फ़ुंदा समेत अनेक लोग लाहौर जाकर बस गए। कहीं ख़ुशी, कहीं ग़म। किस बर्तन में तुझे पिलाऊँ कुछ। अब तो ग़रीबी ही हमारी किस्मत है। अच्छा था हमारा वो जालन्धर। वहाँ अपनों के हाथों मर भी जाते तो अच्छा था। लाहौर में जाकर बसीं फ़ुंदां। कुछ वर्ष बीत गए। वर्ष 1954 या 1956 का समय था। क्रिकेट मैच देखने के लिए बिना वीज़ा के सीमा पार जाने की इज़ाजत थी। मैं, चुन्नी और एक डॉक्टर वर्मा भी लाहौर गए। मैच से अधिक उत्सुकता हमें नज़ीर और ईदां-फ़ुंदां को ढूँढने की थी। आधी-अधूरी जानकारी के बावजूद ग्रैण्ड होटल के नीचे हमने नज़ीर को ढूँढ लिया। यहाँ भी उसकी दुकान का नाम था 'जालन्धर मोतीचूर हाऊस'। यहाँ उसका धन्धा हिंदुस्तान में उसकी दुकानदारी से कई गुना बढ़ चुका था। उसने हम तीनों को देखते ही पहचान लिया और ख़ुशी से गद्दी से उठ कर गले लगा लिया। लस्सी पिलाई और मोतीचूर के लड्डू पेश किए। पुराने भूले-बिसरों का हाल पूछने लगा। फिर चुन्नी ने ईदां-फ़ुंदां की चर्चा छेड़ी तो नज़ीर ने बताया कि अनारकली बाज़ार में रहती हैं दोनों। नज़ीर कहने लगा -- वह इलाक़ा मुझ जैसे इज़्ज़तदारों के जाने वाला नहीं है। आप जानते ही हो कि बँटवारे के पहले की तरह ही है अनारकली बाज़ार। लेकिन मन के आगे हम हथियार डाल चुके थे। नज़ीर के बताए पते पर पहुँचे तो अत्यन्त गन्दा-सा दिखता छज्जे वाला मकान था। दरवाज़ा खटखटाया तो ईदां और फ़ुंदां ने हम तीनों को एक झलक में ही पहचान लिया। सकुचाते हुए उन्होंने अन्दर आने को कहा। अन्दर की हालत और भी दयनीय थी। दोनों की आँखें भर आईं। रुँधे गले से ईदां बोली -- कहाँ बैठाऊँ रे चुन्नी तुझे। फुंदां बोली-- किस बर्तन में तुझे पिलाऊँ कुछ। अब तो ग़रीबी ही हमारी किस्मत है। अच्छा था हमारा वो जालन्धर। वहाँ अपनों के हाथों मर भी जाते तो अच्छा था। मुझे भारत-पाकिस्तान विभाजन ने सीधे तौर पर भले ही कोई दर्द न दिया हो लेकिन बँटवारे की टीस मेरे मन में रह-रहकर उठने लगती है।

(रमेश वर्मा जालंधर में रहते हैं।)

85 वर्षीय फ़ोटोग्राफ़र रमेश वर्मा की भारत विभाजन को लेकर दर्दभरी यादें 
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जालंधर शहर के कलां बाज़ार चौक से मेरी दुकान हिंदुओं के बाज़ार का अंतिम छोर थी. इसके बाद शेखाँ बाज़ार, फिर रौनक बाज़ार (जो अब रैनक बाज़ार है) शुरू होता था. यहाँ मुजरे करने वाली तवायफ़ों के कोठे थे.वहाँ दो बहने थीं - ईदां और फ़ुंदां. जालीदार सफ़ेद रंग के सूट पहने वे यूँ लगतीं, मानो जन्नत की हूरें धरती पर उतर आई हों. ईदां-फुंदां रैनक बाज़ार में रहती थीं. अब वहाँ पंडितों की एक इमारत है जिसकी वे मालकिन हुआ करती थीं. शहर के चंद रईसों के पास जब कारें थी तब इन दोनों बहनों के पास भी कार थी. पेशे से दोनों बहनें तवायफ़ थीं.'तनाव के बावजूद जालंधर के मुसलमान आश्वस्त थे कि सब सामान्य रहेगा'वो आचार-व्यवहार की बहुत अच्छी थीं. ख़र्च भी दिल खोल कर करती थीं. इसीलिए आसपास रहने वाले लोगों के साथ उनके रिश्ते बहुत अच्छे थे.'तानसेन की ख़ुर्शीद'दोनों बहनें जुमे की नमाज़ के लिए हमारे बाज़ार से होकर गुज़रती थीं. अक्सर चुन्नी लाल जौहरी सेनग, बुंदे और चूड़ियाँ ख़रीद कर ले जातीं. मुझसे खिलखिला कर हँसते हुए कहतीं, "मास्टर जी, ऐसी फ़ोटो खींचना कि 'तानसेन' की ख़ुर्शीद जैसी दिखूँ."ख़ुर्शीद उस ज़माने की मशहूर फ़िल्म अभिनेत्री थीं जिन्होंने फ़िल्म 'तानसेन' फ़िल्म में काम किया था. मैंने दोनों बहनों की बहुत सी तस्वीरेंख़ींची. आज़ादी से कुछ ही दिन पहले जब उग्र हिंदू भीड़ ने शेखाँ बाज़ार में लूटपाट और आगज़नी की तो मेरी दुकान भी जल गई.सब यादें भी राख हो गई उसी में.चौक सूदां में हलवाई नज़ीर की दुकान थी. शाम को वहाँ महफ़िल लगती थी. नज़ीर के अधिकतर ग्राहक हिंदू थे. वह बहुत बड़े दिल वाला था. दूध-मलाई के शौकीन मनचलों के मन में नज़ीर का मुसलमान होना कोई मुश्किल पैदा करने वाली बात नहीं थी और न ही नज़ीर के मन में हिंदुओं के प्रति कोई खोट थी.वहाँ पर तारीफ़ होती थी या तो नज़ीर के मलाई भरे दूध की या फिर ईदां-फुंदां के हुस्न और अदाओं की.दोनों बहनों तक पहुँच न हो पाने के बावजूद भी सभी उनके दीवाने थे.देश के बँटवारे की घोषणा के बावजूद अधिकतर मुसलमान अपने-अपने घरों में थे और काम-धंधे में लगे हुए थे. हाँ, कुछ पैसे वाले लोग और अधिकतर तवायफ़ें लाहौर चली गई थीं.लेकिन इदां और फ़ुंदां तो शोखी भरे अंदाज़ में कहती थीं, "कुछ नहीं होने वाला मास्टर जी. फिरंगियों के अपने मुल्क लौटने की देर है सब ठीकहो जाएगा."नज़ीर की दुकान पर भी पहले जैसे ही महफ़िल जमा करती थी.बाज़ार जलकर राख हुएवह शायद 16 या 17 अगस्त 1947 की बात है. ख़बर आईकि पाकिस्तान से एक रेलगाड़ी में हिंदू-सिखों की लाशें भर कर आई हैं. बस उसी रात बदल गया सब कुछ. हिंदू उपद्रवी भी सक्रिय हो गए.शेखाँ बाज़ार और रौनक बाज़ार में मुसलमानों के घर भी जला दिए गए. नज़ीर की दुकान को भी आग लगा दीगई. मेरी और कुछ अन्य दोस्तों की दुकानें भी इसी आग की चपेट में आ गईं.जालंधर से बड़ी संख्या में मुसलमानों का पलायन शुरु हो गया और इदां और फ़ुंदा समेत अनेक लोग लाहौर जाकर बस गए.कहीं ख़ुशी, कहीं ग़मकिस बर्तन में तुझे पिलाऊँ कुछ. अब तो ग़रीबी ही हमारी किस्मत है. अच्छा था हमारा वो जालंधर. वहाँअपनों के हाथों मर भी जाते तो अच्छा थालाहौर में जाकर बसीं फ़ुंदांकुछ वर्ष बीत गए. वर्ष 1954 या 1956 का समय था. क्रिकेट मैच देखने के लिए बिना वीज़ा के सीमा पार जाने की इज़ाजत थी.मैं, चुन्नी और एक डॉक्टर वर्मा भी लाहौर गए. मैचसे अधिक उत्सुकता हमें नज़ीर और ईदां-फ़ुंदां को ढूँढने की थी आधी-अधूरी जानकारी के बावजूद ग्रैंड होटल के नीचे हमने नज़ीर को ढूँढ लिया. यहाँ भी उसकी दुकान का नाम था 'जालंधर मोतीचूर हाऊस'.यहाँ उसका धंधा हिंदुस्तान में उसकी दुकानदारी से कई गुना बढ़ चुका था. उसने हम तीनों को देखते ही पहचान लिया और ख़ुशी से गद्दी से उठ कर गले लगा लिया. लस्सी पिलाई और मोतीचूर के लड्डू पेश किए. पुराने भूले-बिसरों का हाल पूछने लगा.फिर चुन्नी ने ईदां-फ़ुंदां की चर्चा छेड़ी तो नज़ीर ने बताया कि अनारकली बाज़ार में रहती हैं दोनों.नज़ीर कहने लगा, "इलाक़ा मुझ जैसे इज़्ज़तदारों के जाने वाला नहीं है. आप जानते ही हो कि बँटवारेके पहले की तरह ही है अनारकली बाज़ार."लेकिन मन के आगे हम हथियार डाल चुके थे. नज़ीर केबताए पते पर पहुँचे तो अत्यंत गंदा सा दिखता छज्जे वाला मकान था. दरवाज़ा खटखटाया तो ईदां औरफ़ुंदां ने हम तीनों को एक झलक में ही पहचान लिया.सकुचाते हुए उन्होंने अंदर आने को कहा. अंदर की हालत और भी दयनीय थी. दोनों की आँखें भर आईं. रूँधे गले से ईदां बोली, "कहाँ बैठाऊँ रे चुन्नी तुझे." फुंदां बोली, "किस बर्तन में तुझे पिलाऊँ कुछ. अब तो ग़रीबी ही हमारी किस्मत है. अच्छा था हमारा वो जालंधर. वहाँ अपनों के हाथों मर भी जाते तो अच्छा था."मुझे भारत-पाकिस्तान विभाजन ने सीधे तौर पर भले ही कोई दर्द न दिया हो लेकिन बँटवारे की टीस मेरे मन में रह-रहकर उठने लगती है

.(फ़ोटोग्राफ़र रमेश वर्मा जालंधर में रहते हैं.)

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