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Monday, August 17, 2015

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।

हमने नैनीताल क्लब को 28 नवंबर, 1978 को कुछ ही मिनटों मे जलकर राख होते देखा है।हुकूमत को खाक होते भी देखा है।हुड़के की मीठी थाप में बादलों को गरजते बरसते देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।

तेरी तो ऐसी की तैसी,गिराबल्लभ
बनारस के गंगाघाट पर राजीव की फिल्म बनते देखी है।

पिंजड़े में बंद तोते के उड़ान से इंकार के बाबत अपने प्यारे गिराबल्लभ को लहूलुहान होते देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।

हमने सर्द पहाड़ों को हिमपात दौरान जलते हुए देखा है।

बरतानिया हुकूमत में जहां गोलियां नहीं चली,वनों की नीलामी के खिलाफ हुड़के की थाप के खिलाफ उस नैनीताल में गोलियां बरसते देखा है।

हमने पहाड़ों में दावानल भी देखा है।

फिर वही दावानल छत्तीसगढ़, झारखंड.दंडकारण्य और मणिपुर में भी बहकते महकते देखा है।

 और हमने डल झील,चिनारवन और गुलमर्ग,झेलम से लेकर गंगा यमुना और ब्रह्मपुत्र की धार तलक में गिरदा को बनारस बनते देखा है।


हमने शौचालय की पीठ पर शमशेर दाज्यू के भाषण के दौरान पहाड़ को जागते देखा है।

हमने हुड़के की थाप पर हिमालय के उत्तुंग शिखरों को पिघलते देखा है।

हिमपात के मौसम में बहारों को घाटियों में फूल बरसाते देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।

शून्य डिग्री तापमान पर छुट्टी के बाद सीआरएसटी के नन्हे बच्चों पर जल तोप चलाती पुलिस के खिलाफ नैनी झील की गहराइयों से उबलते ज्वालामुखी को देखा है।

हमने हुड़के की थाप पर पहाड़ पहाड़ इजाओं,भूलियों,बैणियों का जाग जाग देखा है।

हमने गिरदा के कमरे के साझे लिहाफ में सविता के साथ सर्द पहाड़ों में अपना हानीमून भी देखा है।
हमने सविता बाबू के बोल में हुड़के की थाप महकते देखा है।

हमने अमलेंदु,अभिषेक और रंजीत वर्मा की हरकतों में भी गिरदा का चेहरा चस्पां होते देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।

उसी लिहाफ में हमने गिरदा के बेटे अपने पिरमा का बचपन पकते हुए हमने देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।

शेखर,गिर्दा और हमारी बहस में उलझती सुलझती उमा भाभी की आंखों में प्यार और उसमें फिर वहीं हुड़के की गूंज दूर आसमान की गहराइयों तलक बजते हुए हमने देखा है।

हमने उमा भाभी के हाथों में भर भरकर गिलास चा के साथ गुड़ की डलियों में हुड़के की थाप देखी है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।

जबभी राजीव नयन बहुगुणा की टीप आती है कहीं गहराइयों से तो हमने चिरकुट पर लिखी गिर्दा की कविताओं और गीतों में फिर हुड़के को गरजते देखा है।

हमने राजा बहुगुणा की गिरदा बनने की जुगत भी देखी है और डीएसबी में उसे पिटते हुए देखन के बाद गिरदा की संगत में भी देखा है।

हमने उत्तरा और पहाड़ के हर पन्ने पर गिरदा का चेहरा देखा है।

हमने रामचंद्र गुहा के लिखे में गिरदा के हुड़के को बोलते देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है

हमने हरुआ दाढ़ी और पवन राकेश को गिरदा के साथ हमें लपेटकर गरियाते देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।

हमने अपने ब्रह्मराक्षस गुरुजी के साथ हुड़के की थाप में एकाकार गिरदा को गडड्मड्ड गड्डमड्ड और अपने प्यारे मोहन की खामोशी में पहाड़ को समाधिस्थ देखा है।

हमने विपिनचचा की जेल डायरी में गिरदा की हुड़के को बोलते देखा है।

हमने धार पर गिरते हर पेड़ की पुकार में हुड़के की थाप अनंत चीख में तब्दील होते भी देखा है।

हमने तमाम ताल बेताल होते देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।

हमने आखरों से अलख जगाते गिराबल्लभ,अपने प्यारे गिराबल्लभ को देखा है।

हमने हुड़के की थाप में चंद्रेश शास्त्री के अर्थशास्त्र को देखा है।
हमने गिराबल्लभ की मेहरबानी से नैनीताल समाचार की ट्रेडिलमशीन को आफसेट में बदलकर रंग बरसाते देखा है।

हमने हुड़के की थाप की संगत करते बाबा कारंथ का संगीत देखा है और हमने युगमंच पर गिर्दा के साथ जहूर का जलवा देखा है।डीके को डीके होते देखा है।हमने बचपन से इदरीश को देखा है।पहाड़ के सारे रंगकर्मियों के चेहरे पर गिर्दा का चेहरा चस्पां होते भी हमने देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।

हमने कमलाराम नौटियाल ,पहाड़ी और बचीराम कौसंवाल की आवाज में हुड़के की थाप को महकते हुए देखा है।

हमने कमल जोशी की हर क्लिक पर गिरदा के हुड़के को फिर जिंदा होते देखा है।

हमने नैनीताल समाचार की पर पाती में गिरदा के हुड़के की थाप को महकते देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।

हमने देखा है प्यार भी बेइंतहा गिराबल्लभ का।उबले अंडे और अशोक जलपानगृह के बन मक्खन से गुजारा उनका देखा है।

हमने देखा है गिरदा का इंतजार भी।उनकी बेचैनी देखी है और हमने देखी है उनकी मस्ती भी।बस्तियों को जगाते देखा है हमने उस हुड़के को।

एक कप चाय या एक कप चा में साझा चूल्हा को आग और धुआं उगले देखा है हमने

गिरदा के हुड़के की थाप पर हमने मंगलेश और वीरेनदा की कविताओं को बहकते देखा है और मुक्तिबोध और गौर्दा को एकमुश्त जिंदा होते देखा है

हमने आनंद स्वरुप वर्मा को मालरोड पर गिरदा के साथ टहलते देखा है।हमने विकल्प मीडिया का लेआउट बनते बिगड़ते देखा है।

हम हरेला उगा ही रहे थे जनसुनवाई का अखबार बनाने के लिए।हमने हुड़के की थाप पर मुक्त बाजार को ढहते हुए भी देखा है।

हमने हुड़के की थाप पर समकालीन तीसरी दुनिया,समयांतर,मजदूर बिगुल,संघर्षसंवाद और हस्तक्षेप को छपते देखा है।

हमने डीएम के मुंह पर थूकते हुए गिरदा को तब भी देखा, जब भागीरथी बंध गयी थी गोमुख में भूस्खलन से और उत्तरकाशी बगने लगा था,सारा भारत डूब में शामिल होने लगा था।

हमने होलियार गिरदा की हुड़के से जी रौ सौ बरीस बरसते देखा है
हमने नैनीझील और मालरोड को एकमुश्त हुलसते देखा है।

हमने अपने हिमालय को तपिश और दहन में झुलसते देखा है।

हमेने हीरा भाभी की आंखों में उमड़ते प्यार में गिरदा की हुड़के की थाप बरसते देखा है।

प्यारे गिराबल्लभ को घेरकर दोस्तों,तमाम नैनीतालियों को एकजुट होते देखा है हमने।

हमने फ्लैटस के शरदोत्सव में गिराबल्लभ को मानसूनकी तरह बरसते देखा है।हुड़के की थाप को मानसून में तब्दील होते देखा है।

हमने हुड़के की थाप पर खामोश नगाड़ों को फिर झूम झूमकर बोलते देखा है।

हमने माल रोड पर अंधेर नगरी,भारत दुर्दशा देखी है और हमने देखा है जुलूस अंतहीन और त्रिशंकु के साथ एवं इंद्रजीत के दरम्यान युगमंच के रंगकर्मियों को आग के गोलों में तब्दील होते हुए देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।

हिमपात के दर्मयान,भूस्खलन के दर्मयान,बाढ़ के दर्मयान,भूकंप के दर्मयान,हर आपदा के दर्मान हमने गिरदा के हुड़के की थाप को घाटी घाटी पहाड़ में और मैदानों में भी,पहाड़ में और तराई में भी मानव बंधन में तब्दील होते देखा है।

हमने पीसी तिवारी, जल्योटी, काशी,रौतेला से लेकर पाहाड़ के हर कालेज के छात्र नेता को गिर्दा की हुड़के की थाप में संगत करते देखा है।

हमने लेनिन पंत,मोहन उप्रेती और ब्रजमोहन साह को गिरदा के हुड़के के साथ देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है

हमने हुड़के की थाप पर मालरोड को बीच हिमपात पिघलते देखा है
हमने अपने शेरदाज्यू और राजीवदाज्यू के शांत चेहरे में गुस्से की आग में गिरदा के हुड़के को बोलते देखा है।

हमने निर्मल जोशी के थैंक्यू मिस्टर ग्लाड और उसपर हाफ पैंटियों की लाठी की वार पर हुड़के की थाप में पहाड़ को बोलते देखा है।

हमने हुड़के की थाप पर अल्मोड़ा के लाला  बाजार को महकते देखा है
हमने हुड़के की थाप पर डूब में शामिल टिहरी को जागते देखा है।

हमने सुंदर लाल बहुगुणा की आंखों से पहाड़ को रेगिस्तान में बदलते देखा है तो हुड़के की थाप फिर जिंदा होते देखा है।

हमारे प्यारे गिराबल्लभज्यू,तेरे हुड़के की थाप बेहद सताती है।
Rajiv Lochan Sah's photo.
अब गिरदा को याद करने की तैयारी.....
वैसे तो गिरदा हम से अलग ही कब हुआ था ? उसका "यार बब्बा, जब तक प्राण बचे हैं, एक टोक्याल तो छोड़नी ही हुई," कहना ही तो हमें अब भी आगे धकेल रहा है।
मगर 22 अगस्त को उसकी पांचवीं पुण्यतिथि पर उसे याद करने के लिये नैनीताल के रंगकर्मी उत्साह से जुटे हैं। कार्यक्रम दो दिनों का है, मगर ब्रजमोहन जोशी और अनिल कार्की की टीम कल से ही अपना स्लाइड शो लेकर स्कूलों का चक्कर लगाना शुरू कर देंगे।
पता नहीं अन्यत्र क्या तैयारी है।

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