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Wednesday, August 1, 2012

Fwd: [New post] शब्द कोश : डिजिटल विभाजन के खिलाफ



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From: Samyantar <donotreply@wordpress.com>
Date: 2012/8/1
Subject: [New post] शब्द कोश : डिजिटल विभाजन के खिलाफ
To: palashbiswaskl@gmail.com


New post on Samyantar

शब्द कोश : डिजिटल विभाजन के खिलाफ

by समयांतर डैस्क

वेदप्रकाश

कंप्यूटर व सूचना प्रौद्योगिकी शब्दकोश: विनोद कुमार मिश्र; राधाकृष्ण प्रकाशन; मूल्य: रु. 500

ISBN : 978-81-8361-507-5

computer-dictionaryभारत में अब कंप्यूटर और इंटरनेट का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। इसके लिए किसी महंगे कंप्यूटर की जरूरत नहीं है, अपने मोबाइल या टैब (टेबलेट पीसी) द्वारा भी इंटरनेट तक पहुंचा जा सकता है। शुरुआती हिचक के बाद अब इंटरनेट को अपना लिया गया है। इंटरनेट और कंप्यूटर के जन-जन तक पहुंचने में सबसे बड़ी बाधा इसका अंग्रेजी में होना है। इस मिथक को कि 'यदि आप अंग्रेजी नहीं जानते तो कुछ नहीं जानते', कंप्यूटर ने और बढ़ाया है। नतीजतन समाज में डिजिटल विभाजन बढ़ता ही जा रहा है। इससे यह गलतफहमी बढ़ती है कि यदि आप अंग्रेजी नहीं जानते तो कंप्यूटर पर काम नहीं कर सकते।

लेकिन क्या वास्तव में कंप्यूटर केवल अंग्रेजी में ही काम करता है?

नहीं। आज यह साबित करना मुश्किल नहीं है कि कंप्यूटर पर हिंदी में भी काम किया जा सकता है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि न केवल आम कंप्यूटर प्रयोक्ता बल्कि कंप्यूटर इंजीनियर भी इस बात से अनजान हैं कि कंप्यूटर पर हिंदी में काम किया जा सकता है। अगर आप उन्हें ज्यादा मजबूर करेंगे तो किसी 10 साल पुराने हिंदी फोंट को वे आपके कंप्यूटर में डाल देंगे, पर यह भी बता देंगे कि इन्हें चलाना हम नहीं जानते। साथ ही आगाह भी कर जाएंगे कि अगर आपके कंप्यूटर में इनके कारण कोई वायरस आ गया तो हम जिम्मेवार नहीं होंगे।

फलस्वरूप उन कुछ लोगों को छोड़कर जो हिंदी पुस्तकों की टाइपिंग के रोजगार से जुड़े हैं, बाकी लोग हिंदी फोंट लोड करवाने से तौबा कर लेते हैं। आम हिंदी भाषी समझता है कि कंप्यूटर पर हिंदी में काम तो हो सकता है, पर यह है बहुत मुश्किल। नतीजतन वह उससे दूर रहने में ही अपनी भलाई समझता है। पर वास्तव में स्थिति ऐसी है नहीं। जब से कंप्यूटर में एस्की कोड के स्थान पर यूनिकोड आया है, तब से कंप्यूटर पर हिंदी में टाइप करना उतना ही आसान और सहज हो गया है जितना कि अंग्रेजी में। यह सही है कि आज ब्लॉग, फेसबुक और ई-मेल पर खूब हिंदी लिखी जा रही है। बहुत सी साइटें हिंदी में जानकारियां भी उपलब्ध कराती हैं। काफी संख्या में ऐसी वेबसाइटें हैं जो आपको यूनिकोड में काम करना सिखाती हैं। विभिन्न तरह की तकनीकी सहायताएं नि:शुल्क उपलब्ध कराती हैं। फिर भी कितने फीसदी लोग जानते हैं कि हिंदी में काम करने के लिए किसी भी प्रकार का सॉफ्टवेयर खरीदने की जरूरत नहीं है? कि हिंदी में टाइप करने के लिए किसी तरह के प्रशिक्षण के बिना भी काम चल सकता है।

लेकिन इस तरह की सहायता आपको अपने कंप्यूटर वाले से नहीं मिलेगी। इंटरनेट पर हिंदी का प्रसार कुछ एक उत्साही लोगों के मिशनरी काम ने किया है। अधिकांश लोग इससे अनजान हैं। हिंदी से संबंधित समस्याएं न तो हमारी स्कूली शिक्षा का हिस्सा हैं और न ही कंप्यूटर शिक्षा का।

बेशक आज यह बात सभी जानते हैं कि कंप्यूटर पर हिंदी में काम किया जा सकता है, पर क्या कंप्यूटर के आइकॉन, मेन्यू आदि भी हिंदी में हो सकते हैं, क्या ऑपरेटिंग सिस्टम भी हिंदी में काम कर सकता है। यानी क्या यह संभव है कि मैं अंग्रेजी से अनजान रह कर भी कंप्यूटर में महारत हासिल कर लूं।

हां, यह बात भी अब यानी पिछले 10 सालों से संभव है। तो फिर आखिरी सवाल? क्या कोई व्यक्ति बिना अंग्रेजी जाने कंप्यूटर विज्ञान की शिक्षा हासिल कर सकता है? जहां तक कंप्यूटर तकनीक का सवाल है, बेशक यह संभव है। न केवल संभव है, बल्कि काफी सहज भी है।

फिर क्या कारण है कि जब पिछले दिनों मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने स्कूली छात्रों को कम कीमत पर 'आकाश' टैब उपलब्ध करवाने की महत्त्वपूर्ण घोषणा की, जिसकी ठीक ही मुक्त कंठ से प्रशंसा भी हुई, उस आकाश में हिंदी या भारतीय भाषाओं में काम करने की सुविधा नहीं थी। और वह भी तब जब इसके लिए कोई अतिरिक्त खर्च करने की आवश्यकता नहीं थी।

जाहिर है कि इसका कारण हमारे शासक वर्ग की इस अहमन्यता के अलावा और कुछ नहीं है कि सब कुछ हमारी ही शर्तों पर होना चाहिए। यानी अगर आपको तकनीक चाहिए तो पहले अंग्रेजी सीखिए। यह एक बड़ी समस्या है जिसके गहरे आर्थिक-राजनीतिक कारण हैं। जैसाकि होता है कि प्रभुत्वशाली वर्ग के विचार समाज के विचार बन जाते हैं। इसी तरह यह विचार कि अंग्रेजी के बिना हम विकास और तकनीक में पिछड़ जाएंगे, आज मोटे तौर पर सभी का विचार बन चुका है।

कंप्यूटर में हिंदी के प्रयोग के तकनीकी सवाल को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है। एक, कंप्यूटर पर हिंदी में केवल टाइप करने की सुविधा होना जबकि बाकी दूसरी सभी चीजें, जैसे किसी सॉफ्टवेयर के मेनू, कमांड आदि अंग्रेजी में हों और दूसरा, जब हिंदी में टाइप करने की सुविधा के साथ-साथ सॉफ्टवेयर के मेनू, कमांड आदि भी हिंदी में हों। यानी अंग्रेजी का एक भी शब्द जाने बिना कंप्यूटर पर हिंदी में काम किया जा सकता हो। और तीसरा, इसी से जुड़ा सवाल है कि क्या हिंदी में कंप्यूटर विज्ञान और अनुप्रयोगों की शिक्षा दी जा सकती है?

जहां तक पहले सवाल, यानी हिंदी में टाइप करने की सुविधा की बात है, तो यह अब हर सॉफ्टवेयर में उपलब्ध है, और वह भी बिना किसी अतिरिक्त कीमत के। बल्कि कई बार तो हिंदी संस्करण जैसे माइक्रोसॉफ्ट विंडोज या माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस अपने अंग्रेजी संस्करणों से कहीं ज्यादा सस्ते आते हैं। दूसरा सवाल, यानी हिंदी में मेन्यू आदि होना। जैसाकि हमने पहले ही बताया है कि आज तकनीकी रूप से यह संभव है। इसके लिए मात्र कंप्यूटर सॉफ्टवेयरों के स्ट्रिंगों का, यानी स्क्रीन पर दिखाई देने वाले टैक्स्ट का, हिंदी रूपांतरण करने की जरूरत है। अगर हमें मौजूदा स्ट्रिंग्स का यानी अंग्रेजी की स्ट्रिंग्स का हिंदी में रूपांतरण करना है, तो तकनीकी शब्दावली की समस्या सामने आती है।

विनोद कुमार मिश्र की प्रस्तुत पुस्तक 'कंप्यूटर व सूचना प्रौद्योगिकी शब्दकोश' इस अर्थ में एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है कि यह कंप्यूटर संबंधी तकनीकी शब्दावली की समस्या को हल करने की दिशा में एक अहम कदम है। और इस तरह यह कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी के हिंदीकरण की दिशा में एक जरूरी और अपरिहार्य प्रयास है। इस शब्दकोश में न केवल कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाई देने वाले टैक्स्ट के लिए हिंदी शब्द सुझाए गए हैं, बल्कि कंप्यूटर विज्ञान की जटिल अवधारणाओं के लिए भी हिंदी रूपांतरण उपलब्ध कराए गए हैं।

इस किताब पर विचार करते हुए भारत में तकनीकी शब्दावली की समस्या पर बात करना लाजिमी है। किसी ऐसे विषय में, जिसका विकास अमरीका या योरोप में हुआ है और इस कारण उसकी शब्दावली अंग्रेजी शब्दों और मिजाज से भरपूर है, हिंदी में शब्दावली तैयार करते हुए एक तनी हुई रस्सी पर चलना पड़ता है। एक तरफ इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि अवधारणा का सटीक अनुवाद हो, और दूसरी तरफ इस बात का कि वह सुबोध हो ताकि उसे समझने के लिए शब्दकोश खोलने की जरूरत न पड़े।

खेद की बात है कि अधिकांश शब्दावलियां बनाते समय संबंधित विषय के विद्वानों ने उसके अर्थ की सटीकता पर तो जोर दिया, पर उसकी सुबोधता को महत्त्व नहीं दिया। तकनीकी शब्दावली की कठिनता के कारण उसे हिंदी भाषी समाज ने अपनाया ही नहीं। पर यह इस शब्दावली के प्रचलित न होने का मात्र एक कारण है, एकमात्र कारण नहीं। पर है यह बहुत महत्त्वपूर्ण कारण।

कोई भी समाज भाषा के बारे में परंपरागत होता है। परंपरागत इस अर्थ में कि वह पुराने शब्दों की नजर से ही नए शब्दों और अवधारणाओं को देखता है। उन्हीं में जोड़-घटा कर उन्हें समझना चाहता है। इसलिए शब्दावली बनाने का सही तरीका तो यह है कि पहले तो हिंदी भाषा और उसकी सह-भाषाओं के शब्दों का संग्रह किया जाए। फिर उनके निकटतम अंग्रेजी समानार्थी शब्द ढूंढे जाएं, और फिर इन्हें उलट दिया जाए। इससे अधिकतर शब्द वे होंगे जो पहले से ही प्रचलित होंगे। दूसरी बात, नई अवधारणाओं के लिए उन्हीं शब्दों को अर्थ-विस्तार द्वारा या अर्थ-परिसीमन द्वारा नए अर्थ दिए जाएं। यह भी किसी भी समाज का नई अवधारणाओं को समझने का तरीका होता है। तीसरी बात, तब भी काम न चले तो मौजूदा शब्दों में कुछ जोड़-घटाकर उन्हें नई अवधारणाओं के लिए ढाला जाए। और चौथी बात, यदि फिर भी शब्द न मिलें तो उनका अनुवाद करने के स्थान पर मूल शब्दों को ही स्वीकार कर लिया जाए।

यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो चाहे हम कितने ही विद्वत्ता पूर्ण शब्द बना लें, वे प्रचलित नहीं होंगे। लोग उनके स्थान पर मूल शब्द यानी अंग्रेजी या अन्य भाषाओं के शब्दों को ही इस्तेमाल करेंगे। हम वैज्ञानिक व तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा बनाई गई विज्ञान की तकनीकी शब्दावली उठा कर देखें तो पाएंगे कि इनमें बहुत से ऐसे शब्द बना दिए गए हैं, जो मूल अंग्रेजी शब्दों से भी ज्यादा दुर्बोध हैं।

भारत सरकार के वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग ने जब कंप्यूटर शब्दावली अपनाई तो उन्होंने वही प्रचलित तरीका अपनाया कि एक, संस्कृत के शब्दों से कृत्रिम शब्दों का निर्माण करना और दो, अंग्रेजी के शब्दों को यथावत उठा लेना। दोनों ही तरीकों से यह शब्दावली खासी दुरूह हो गई। विनोद कुमार मिश्र के कोश ने इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया है, इन्होंने मोटे तौर पर तकनीकी शब्दावली आयोग की शब्दावली को स्वीकार किया है, पर कहीं-कहीं सरल शब्द रखने की कोशिश की है। आश्चर्य की बात यह है कि उन्होंने इस बात का कहीं जिक्र नहीं किया है कि उन्होंने सरकारी शब्दावली का उपयोग किया है।

एक अच्छी शब्दावली के लिए जरूरी है कि परिभाषा कोश बनाए जाएं। नए शब्द गढऩे के साथ-साथ उन अवधारणाओं की व्याख्या भी की जाए। और यही विनोद कुमार मिश्र ने अपनी पुस्तक में किया है। उन्होंने इस पुस्तक में अंग्रेजी शब्दों के विकल्प बताने के साथ-साथ अवधारणाओं की सरल शब्दों में व्याख्या भी की है ताकि विषय से अनभिज्ञ लोग भी अवधारणाओं को समझ सकें। इससे इस पुस्तक का महत्त्व काफी बढ़ जाता है। इसीलिए हमें लगता है कि यह पुस्तक छात्रों और हिंदी के पत्रकारों आदि के लिए काफी उपयोगी साबित होगी।

यहां यह कहे बिना नहीं रहा जा सकता है कि कोई भी शब्दावली तब तक अर्थहीन है, जब तक कि वह उपयोग में न लाई जाए। किसी शब्दावली की स्वीकृति बढ़ाने का सबसे सही तरीका उसे पब्लिक डोमेन में डाल देना है। पब्लिक डोमेन में यानी उसे इंटरनेट पर इस रूप में डाल देना कि कोई भी उसका उपयोग कर सके तथा उसमें अपने सुझाव दे सके। मुक्त स्रोत सॉफ्टवेयर समूह ने जब अपने अनुप्रयोगों का हिंदीकरण करना शुरू किया तो उन्होंने यही किया। उन्होंने एक शब्दकोश तैयार किया और उसे इंटरनेट पर डाल दिया। जहां बहुत से उपयोक्ताओं ने उसमें अपने सुझाव दिए। इन सुझावों पर चर्चा करने के लिए गोष्ठी आयोजित की गई। इसके पश्चात जो शब्दावली तैयार हुई उसे स्वीकार कर लिया गया। आज माइक्रोसॉप्ट विंडोज के विंडोज 2000 और उसके बाद के सभी संस्करण, माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस 2000 और उसके बाद के सभी संस्करण, ओपनऑफिस, लिब्रेऑफिस और लिनक्स के विभिन्न अवतार अपने सारे मैन्यू के साथ हिंदी में भी उपलब्ध हैं। यानी कि आपको यदि अंग्रेजी का एक शब्द भी नहीं आता तो भी आप हिंदी में कंप्यूटर पर काम कर सकते हैं। कंप्यूटर को खोलना, बंद करना, किसी फाइल को खोलना, बंद करना, किसी टैक्स्ट या चित्र का काटना, नकल करना, चिपकाना आदि सब काम भी हिंदी में किए जा सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि हिंदी भाषी समाज को यह जानकारी होना कि ये काम हिंदी में कैसे किए जा सकते हैं, तथा इसके बारे में स्कूल, कॉलेज के स्तर पर जानकारी होना।

इसके बाद सिर्फ एक ही काम रह जाता है हिंदी माध्यम से कंप्यूटर अनुप्रयोगों की शिक्षा देना। इस बारे में प्रस्तुत पुस्तक काफी सहायता प्रदान करती है। क्योंकि इस पुस्तक में विभिन्न अवधारणाओं की व्याख्या भी दी गई है। निश्चय ही यह पुस्तक भारत में डिजिटल विभाजन को पाटने की दिशा में एक अहम कदम है।

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Fwd: (हस्तक्षेप.कॉम) पस्त घोड़ों को मस्त मंत्रालय



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From: Amalendu Upadhyaya <amalendu.upadhyay@gmail.com>
Date: 2012/8/1
Subject: (हस्तक्षेप.कॉम) पस्त घोड़ों को मस्त मंत्रालय
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Fwd: ब्रैंडेड अर अन- ब्रैंडेड चीजुं मा महाभारत --गढवाली हास्य व्यंग्य साहित्य



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From: Bhishma Kukreti <bckukreti@gmail.com>
Date: 2012/8/1
Subject: ब्रैंडेड अर अन- ब्रैंडेड चीजुं मा महाभारत --गढवाली हास्य व्यंग्य साहित्य



गढवाली हास्य व्यंग्य साहित्य
                             नामी अर बेनामी ( ब्रैंडेड अर अन- ब्रैंडेड )चीजुं मा महाभारत
                                     चबोड्या - भीष्म कुकरेती
ब्रैंडेड अर अनब्रैंडेड चीजुं अपण आपस मा बैरमण्वास, तून लगाण , तिराण , झगड़ा मीन बचपन मा इ देखी आल छौ. हमर इख गाँ मा चंदौसी को नामी गिरामी .के.बी. ऑयल (कड़ो तेल) आन्द छौ. एक दै हमर घ्वाड़ा वळ ददा जी दुगड़ बिटेन थ्वड़ा सस्तु मा बेनामी जे.बी ऑयल क्या लाइ कि के.बी. ऑयल न सरा घौरम घ्याळ मचै दे . के.बी. ऑयल न मेरो बडा जी मा ब्वाल बल बम्बई का सेठ ह्वेक बेनामी तेल से खाणक बणैल्या ? के.बी. ऑयल न जे. बी. ऑयल कि इन तौहीन कार कि म्यार दूदी क भुला तै बि घौरम बास आण मिसे गे. परिवार मा सब तै लग कि जे.बी ऑयल मा साग भुटे जाल या स्वाळ पक्वड़ बणोला त हमारि मुन्डीत की गाँ मा बेज्जती ह्व़े जाली. बस बडा जीन जे.बी. तेल बामणु , ल्वारूं , टमटो खुणि ड़ड्वारो बान रिजर्व्ड कौरी दे. ड़ड्वारो चीजक ब्रैंड नि दिखे जांद बल्कण मा मात्रा दिखे जांद.
इख मुंबई मा त मी अपण घौरम ब्रैंडेड अर अन -ब्रैंडेड चीजुं मा रोज घिमसाण, घपरोळ, घपक-घपकौण, घमाचूर मच्युं रौंद. ब्रैंडेड चीज घमंड मा बेनामी चीज मा हीण भावना भोरि दीन्दी.
अब सि पर्स्या क छ्वीं च .म्यार एक कमरा मा अकाई कु टी.वी च जु खराब मिक्सी क तरां घर्र घर्र करण मिस्याई. त दुसर कमरा बिटेन एल..जी. क एल.सी.डी. रोष म बुलण लगी बल अन-ब्रैंडेड या लो लेवल कु ब्रैंड लाण मी यी आफत हूंद. जाओ अर ये अकाई टी.वी तै बेचीं द्याओ अर हैंको एल .जी..खरीदिक लाओ.
मी कुछ बुल्दो कि वां से पैल इ एल..जी. क एल.सी.डी न बोलि," पण बिचली कख ? अन- ब्रैंडेड चीजुं रीसेल वैल्यू बि त नि होंदी! "
उख डीप फ्रीजर मा रोज मौल बिटेन लयां माछ, हैम (सूंगरो मांस ) मछी बजार बिटेन लयां माछुं अर शिकार तै हड़काणा रौंदन बल तुम अन -ब्रैंडेड माछ अर शिकार की हम मौल का ब्रैंडेड शिकार क दगड उठण-बैठणौ क्या औकात ? अर हीन भवना से ग्रसित मछी बजार का माछ बिचारा सौडि जान्दन. जनि अन-ब्रैंडेड माछ या बखरो रान सड़दन त ब्रैंडेड शिकार रौक एंड रोल करण बिसे जान्दन अर तून दीन्दन बल देखी याल तुमन अन-ब्रैंडेड चीजुं हाल. फिर यि सौब ब्रैंडेड माछ, शिकार बुल्दन बल "कुज्याण नीतेश कुमार, मुलायम अर ममता किलै ब्रैंडेड चीजुं अर ओर्गेनाईज्ड अर ब्रैंडेड रिटल से नफरत करदन धौं ?" एक ब्रैंडेड अंडा न त एक दिन इन बि ब्वाल," मी जाणदो नि छौं कि इ नेता अफु त अपण अंडर वियर पेरिस बिटेन मंगादन पण य़ी नेता नि चान्दन बल आम भारतीय ब्रैंडेड डम्फू अर ब्रैंडेड काफुळ खावन"
अब एक दिन मी एक अन ब्रैंडेड स्त्री ( आयरन ) लौं त ब्रैंडेड स्विच न बिजली दीण से इनकार कौरी दे बल मी इन अन-ब्रैंडेड चीजुं दगड रिश्ता इ नि रखण चांदु जां से मेरो मान समान घटी जाओ .
मेरी ब्वारी तै ब्यौ मा द्विएक प्रेशर कुकर भेंट मिली होलू अर यूँ दुई प्रेसर कुकरों देखिक जनम जाति बैरी हॉकिन्स अर प्रेस्टीज कुकर एक ह्व़े गेन अर यूँ अनब्रैंडेड प्रेसर कुकरों तै म्यार रूस्वड़ मा नि आणि दे त फिर हमन बि झक मारिक यूँ द्वी प्रेसर कुकरों तै कै तैं गिफ्ट मा दे देन.
म्यार दगड्यो न ब्वाल बल यार अब ब्रैंडेड दूद लीण चएंद त हमन बि ब्रैंडेड दूद खरीदण शुरू करी दे. पण जनि हम ब्रैंडेड दूद तै अपण चाइनीज मिल्क बौयलर मा गर्म कार त दूद फ़टी गे. दूद मेखुण बुलणु बल ," जब ब्रैंडेड मिल्क बौयलर लीणो औकात नी च आप ब्रैंडेड दूद नि खरीदो." मरदो क्या नि करदो. दुसर दिन मी ब्रैंडेड मिल्क बौयलर लै ग्यों अर अचर्ज कि उखम दूद नि फट. मीन ब्रैंडेड मिल्क बौयलर कु पैथर द्याख त म्यार चंख चलि गेन ब्रैंडेड मिल्क बौयलर अर म्यरो चाइनीज मिल्क बौयलर एकी फैक्ट्री मा बणदन. बस ब्रैंडेड दूद कि धौंस च कि वै तै ब्रैंडेड मिल्क बौयलर इ चयेणु च.
इनी ब्रैंडेड चटाई सपना त हमारि बेजती मेमानु समणि इ करी दीन्दी , जनि क्वी मेमान हमर घौर आन्द त या सपना ऊं मा अन- ब्रैंडेड चटाइयों इथगा काट करदि कि हमर ख़ास नामी गिरामी मेमान रूठी क दुसर दिन बिटेन हमर ड़्यार नि आन्दन.
हमारो गद्दा त ब्रैंडेड मैट्रिक्स को च पन जनि हम वै मा क्वी अन- ब्रैंडेड चादरु डाळदवां त वु ब्रैंडेड गद्दा अळग उन्द करण बिसे जांद , ब्रैंडेड गद्दा अन ब्रैंडेड चदरो क इथगा कमी बथान्द कि हम तै इन लगद जन बुल्या यू चदरु बिनाणु ह्वाऊ अर याँ से वीं रात हम तै निंद नी आँदी. बस दुसर दिन हम अन - ब्रैंडेड चदरु बेचीं दीन्दा अर ब्रैंडेड चदरु लेक ऐ जांदा.
ब्रैंडेड जुत अर अन- ब्रैंडेड मोजों मा त रोज घिमसाण मचीं रौंद अर दुयुंक झगड़ा मा खुट म्यार कट्यान्द.बल्दुं झगड़ा मा पुंगड़ी को नुकसान.
हमारो मेज बि पसंद नि करदो कि हम वैमा गढवळि पत्रिका धौराँ . यू मेज हमेशा हम तै अड़ाणु रौंद कि पत्रिका सिरफ अंग्रेजी की हूण चएंदन. मिसल च ना कि भितर खांदु मि फाणु अर बाड़ी अर भैर कुत्ता कुण लान्दो भात चाहे ह्वाऊ बासी भात.
अब द्याखो ना म्यार ख़ास दगड्या न 'भारत की स्थानीय भाषाओं को कैसे जीवित रखा जाय' पर एक सम्मलेन बुलाई अर मै तै नि बुलाई. जब कुछ दिन पिछनै यू ख़ास दगड्या मील त सीदा बुलण बिस्याई, " भीष्म जी असल मा सम्मेलन सिर्फ ब्रैंडेड भाषाओं तलक सीमित छौ त आप तै मीन नि बुलाई. जब कबि अन-ब्रैंडेड भाषाओं क क्वी सम्मेलन होलू त तुम तै बि जरूर बुलौलु."
मेरी समज मा नि आई कि कन जुग ऐ ग्याई बल भाषा बि ब्रैंडेड अर अन-ब्रैंडेड को तराजू मा तुल्याण बिसे गेन.!
Copyright@ Bhishma Kukreti , 1/8/2012
गढवाली हास्य व्यंग्य साहित्य जारी ...

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Regards
B. C. Kukreti


Fwd: [PVCHR] Manual for making model village: a chapter of the...



---------- Forwarded message ----------
From: Shirin Shabana Khan <notification+kr4marbae4mn@facebookmail.com>
Date: Wed, Aug 1, 2012 at 4:21 PM
Subject: [PVCHR] Manual for making model village: a chapter of the...
To: PVCHR <116700440532@groups.facebook.com>



Fwd: [initiative-india] [pmarc] NAPM welcomes the decision to cancel 4 SEZs. No Land Acquisitions for Private and PPP Projects



---------- Forwarded message ----------
From: napmindia@napm-india.org <napmindia@napm-india.org>
Date: Wed, Aug 1, 2012 at 5:09 PM
Subject: [initiative-india] [pmarc] NAPM welcomes the decision to cancel 4 SEZs. No Land Acquisitions for Private and PPP Projects
To: Dalits Media Watch <PMARC@dgroups.org>


NAPM welcomes the decision to cancel 4 SEZs

No land should be forcibly acquired for Private and PPP Projects

Mumbai, August 1: The decision of the Maharashtra Government to cancel 4 SEZ projects which were proved to be illegal & unjust, on one ground or other, brings a hope to the people's struggles for justice & against land grabbing. These projects were stalled by the common people, farmers to fishworkers, and women as well as youngsters who were at the forefront of the struggle.

The issues were clear & justifiable. Land to be acquired for private corporates is an illegitimate and unconstitutional act. When the profit-motives are clear in these projects, earning crores of rupees, out of land & other sources of livelihood, these resources are received with the State facilitating them. It's this role of the State which is bullying & ousting our rural folk that was objected by the natural resource based communities, asserting their right to approve or disapprove the project which the State government has ultimately admitted.

The non-violent struggles are raising basic questions of inequity which is a clear outcome of SEZ Act & similar moves promoting corporatisation. We question and oppose industries which are land & water-intensive, capital intensive but not labour intensive and their impacts on ecologies, neither mitigated nor compensated. It is unfortunate the more sustainable & employment generating, local resource-based industries proposed by the movements as alternative options are negated by the governments. People are certainly not for the industrialisation at the cost of agricultural, since food security and livelihood is certainly our first priority. The whole model of SEZ with subsidised land, water, electricity, outside the jurisdiction of the gram sabhas and panchayats, tax holidays and exemptions is a blot on democracy and sovereignty of both, people & the State.

It's obvious that all tactics & manoeuvring efforts by the Corporates failed in this regard & the State level ministers couldn't carry out their initial agenda of joining hands with Corporates earning out of these projects. It's, however, an ultimate victory of the firm view, clear perspective & perseverent strategy, along with an all pervasive analysis of the fraud that SEZ Act & projects are. Maharashtra cabinet too deserves a pat for this pro-people decision. Even though this is later, but better late than never. They should, without any delay must remove restrictions & reservations put up, on the titles of the landholders. If this cancellation is to bring in another project like Delhi Mumbai Industrial Corridor at the cost of farms & farmers, that will also face the same fate, we warn. We continue to fight the battle for cancellation of the undemocratic & unconstitutional SEZ Act, 2005.

We would also like to mention that the proposed amendments being brought out by the UPA government to the SEZ Act is not going to alter our opposition to the Act since, they are only aimed at facilitating land grab. Land Acquisition, Resettlement and Rehabilitation Act is also going to facilitate the land grab for private corporations and we oppose this. People's Movements will thwart every attempt at subverting the laws of the country and handing over the precious natural resources to the predatory corporations. It's time the governments across the country listened to the voices of dissent and worked in favour of the majority of the population.

Suhas Kolhekar, Prasad Bagwe, Suniti S. R., Medha Patkar

For details contact : 9423571784 / 9818905316



National Alliance of People's Movements

National Office : 29-30, A Wing, First Floor, Haji Habib Building, Naigaon Cross Road Dadar (E), Mumbai – 400 014. Phone – 022 2415 0529 | 9969363065;

 

Delhi Office : 6/6 Jangpura B, New Delhi – 110 014 . Phone : 011 2437 4535 | 9818905316

email : napmindia@gmail.com | Web : www.napm-india.org

 

Twitter Latest tweet: Just another failed attempt to protect the rights of tribals in land acquisition quibbles? #LandAcquisition #LandBill http://t.co/jO9vWiBD Follow @napmindia Reply Retweet   11:58 Aug-01

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Fwd: Today's Exclusives - Is power 'less' planning responsible for grid failures?



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From: Moneylife <noreply@moneylife.in>
Date: Wed, Aug 1, 2012 at 7:03 PM
Subject: Today's Exclusives - Is power 'less' planning responsible for grid failures?
To: palashbiswaskl@gmail.com


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1 August 2012
 
Moneylife Exclusive
AK Ramdas
 
 
ADVT
Other ML Exclusives
 
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At a Glance
 
- Exports dip 5.5% in June to $25 billion; imports down 13.5%
- Indian boxers set for last-16 battle in Olympics
- No negotiation if fasting activists forcefully removed: Hazare
- About 10% of rural India lives on less than Rs17 a day: NSSO survey
- India's 1st US-made C-17 aircraft to arrive in 2013
- CAG says Goa getting meagre returns on investment in state-run units
 
 
Corporate Wrap-up
 
- Uninor plans to auction telecom business; Unitech opposes
- Retail real estate market looks promising: CBRE
- Tata Motors July sales up 15% to 74,159
- M&M auto sales up 18.7% in July
- Toyota Kirloskar July sales up 7% at 14,574 units
- Shoppers Stop Q1 net profit plunges 96% on steep cost escalation
- GMDC Q1 net profit up 11.4% to Rs170.5 crore
 
 
Personal Finance
 
- No move to ban banks from selling gold coins: RBI
- Raise minimum EPF pension to Rs5,000: Tharoor
- Get discounts on branded goods by slashing carbon footprint
- Pleas to banking ombudsman in Kerala rises 22%
 
 
FROM the ARCHIVES
 
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