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Sunday, April 1, 2012

आज हैप्‍पी सिब्‍बल्‍स डे है! राजघाट जाएं, चुटकुले सुनाएं!

आज हैप्‍पी सिब्‍बल्‍स डे है! राजघाट जाएं, चुटकुले सुनाएं!



 आमुखमीडिया मंडीमोहल्ला दिल्लीसंघर्ष

आज हैप्‍पी सिब्‍बल्‍स डे है! राजघाट जाएं, चुटकुले सुनाएं!

1 APRIL 2012 NO COMMENT

♦ आलोक दीक्षित

हाल ही में पत्रकारों की एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स ने 'एनिमी आफ द इंटरनेट' नाम से एक लिस्ट तैयार की थी, जिसमें इंडिया भी शामिल था। लिस्ट में बर्मा, चीन, क्यूबा, ईरान, सउदी अरब, सीरिया, तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान और वियतनाम को इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा दुश्मन बताया गया था। दुख की बात है कि अपनी तानाशाही से सारी दुनिया को मुंह चिढ़ाता चीन और दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी भारत इस बार एक ही कार्नीवाल के पार्टीसिपेंट थे। हमारे लिए जो राहत की बात थी, वह यह कि इस सूची में हमारे देश को केवल ऑब्‍जर्वेशन लिस्ट में रखा गया था। क्या एक डेमोक्रेटिक देश के लिए यह एक शर्म की बात नहीं है। सरकार द्वारा पिछले एक साल में इंटरनेट को सेंसर करने की वकालतों, देश में वेब कंपनियों पर चल रहे तमाम केसेस और आईटी एक्ट में तकनीकी खामियों को इसका जिम्मेदार माना जा रहा है। इस पर आईटी मिनिस्ट्री का कहना है कि सरकार किसी भी तरह की सेंसरशिप नहीं ला रही है, पर फिलहाल सारे बयान लोगों के मन में केवल भ्रम ही पैदा करते हैं क्यूंकि देश में इनफॉर्मेशन टेक्नालाजी एक्ट 2011 अभी भी लोगों को मुंह ही चिढ़ा रहा है।

सबसे पहले न्यूयार्क टाइम्स ने यह खुलासा किया था कि कपिल सिब्बल ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स के रिप्रजेंटेटिव्स के साथ गुपचुप तरीके से एक मीटिंग की थी, जिसमें उन पर सरकार विरोधी कंटेंट को हटाने का दबाव डाला गया था। बाद में अपने बयान में भी सिब्बल ने यह दोहराया था कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नकेल कसे जाने की जरूरत है। हर तरफ से क्रिटिसिज्म मिलने के बाद कपिल सिब्बल सोशल नेटवर्किंग और इंटरनेट माध्यमों पर नियंत्रण के मुद्दे पर भले ही फिर से कोई बयानबाजी न की हो, पर गुपचुप तरीके से सरकार कई सारी वेबसाइटों पर लगाम लगा चुकी है। भारत सरकार ने अकेले गूगल और फेसबुक से लगभग 150 साइटों पर लगाम लगाने की सिफारिश की है। विदेशी साइटों पर सरकार का कोई सीधा नियंत्रण नहीं है, पर जो सर्वर इंडिया से चल रहे हैं, सरकार उन पर दबाव डालकर साइटों को बंद करवा देती है। गूगल ट्रांसपैरेंसी रिपोर्ट 2011 के मुताबिक भारत सरकार ने अपनी 68 शिकायती पत्रों के जरिये 358 आइटम्स को हटाने की रिक्वेस्ट की, जिनमें गूगल ने आधी शिकायतों पर ही कार्यवाही की। सरकार ने 1739 एकाउंट्स की पर्सनल डिटेल्स जानने की रिक्वेस्ट की और 2439 लोगों की यूजर एकाउंट डिटेल्स की जानकारी गूगल से मांगी। इनमें से 70 प्रतिशत की जानकारी दे दी गयी। दुखद बात यह है कि यह पूरी प्रक्रिया ही गैर-कानूनी है और इसके लिए सरकार अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रही है।

संविधान की मूल भावनाओं के खिलाफ है आईटी एक्ट

दुनिया का हर संविधान 'प्रीजम्शन आफ इनोसेंस' के सिद्धांत को मानता है यानि नागरिक तब तक इनोसेंट है, जब तक कि यह सिद्ध न कर दिया जाए कि उसने कोई गुनाह किया है। संविधान कहता है कि 'भले ही हजार मुजरिम बिना सजा के बरी हो जाएं, पर एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए'। यही वजह है कि दुनिया के हर कंस्टीट्यूशन में गुनहगार साबित करने की जिम्मेदारी 'स्टेट' को दी गयी है। हमने अजमल कसाब को भी फेयर ट्रायल का मौका दिया और यह साबित करने के बाद कि वह गुनहगार है, उसे फांसी की सजा सुनायी गयी। इसके उलट इंटरनेट को सेंसर करने और उस पर लगाम लगाने के लिए हमने 'डेमोक्रेसी की आत्मा' कहे जाने वाले इस सिद्धांत को ही झुठला दिया है। इस कानून में कहा गया है कि बिना किसी जुडीशिअल आर्डर के किसी वेबसाइट या डोमेन को बंद किया जा सकता है। यानि अब आपकी वेबसाइट को गलत कंटेट के नाम पर बंद कर दिया जाएगा और यह साबित करना कि आपने अपनी वेबसाइट, कमेंट या आर्टिकल के जरिए कोई गैरकानूनी काम नहीं किया है, आपकी जिम्मेदारी होगी। यह उसी तरह है कि आपको बिना किसी नोटिस के जेल में बंद कर दिया जाए और फिर आप साबित कीजिए कि आप सही हैं और फिर 5-10 साल चले केस के बाद कोर्ट आर्डर में आप खुद को बेगुनाह साबित कर लें।

आईटी मिनिस्टर कपिल सिब्बल के बयान में कहा गया था कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स को अपने कंटेंट पर निगरानी रखनी चाहिए। उनका मानना है कि सोशल साइट्स पर कुछ ऐसी तस्वीरें डाली जा रही हैं, जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाती हैं। मिनिस्टर ने यह भी कहा कि अगर साइट्स कोई ठोस कदम नहीं उठाती हैं, तो सरकार इन पर कार्यवाही करेगी। उन्‍होंने इसके लिए एक कानून की भी वकालत की है। इंडिया में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का एक केस भी चल रहा है, जिसमें मांग की गयी है कि साइट्स अपने कंटेंट के लिए जिम्मेदार हों। अगर ऐसा होता है तो फेसबुक पर भद्दा कमेंट करने पर कमेंट करने वाले के साथ-साथ फेसबुक पर भी मुकदमा चलाया जाएगा। आप ब्‍लॉग लिखकर सरकार की बुराई करेंगे और आपका केस ब्‍लॉगर या वर्डप्रेस लड़ेंगे। यानि अब फेसबुक और गूगल को आपके लिखे हर कंटेंट की निगरानी करनी होगी। इसके लिए इन कंपनियों को बहुत बड़े स्टाफ की जरूरत पड़ेगी और जो सेवाएं एक आम आदमी को फ्री में मिल रही हैं, उनके लिए उसे भुगतान करना पड़ेगा। बात सिर्फ भुगतान तक ही सीमित नहीं रहेगी। आपका लिखा ब्‍लॉग या स्टेटस अपडेट कंपनी का कोई कर्मचारी चेक कर रहा होगा और वह अपने विवेक से आपको सही और गलत साबित कर रहा होगा। आपकी बनायी पेंटिंग को गूगल का एक आईटी एक्सपर्ट सेंसर करेगा। कपिल सिब्बल की कंटेंट सेंसर करने की मांग इतनी बेवकूफाना है कि सारी दुनिया ने इसकी खिल्ली उड़ायी है। यह वैसे ही हुआ कि कागज पर गलत लिखने के लिए जेके पेपर मिल पर मुकदमा चलाया जाए, गलत फोटो खींचने के लिए कोडेक पर केस हो और महिलाओं की लुट रही चेनों के लिए पल्सर गाड़ियों को जिम्मेदार ठहराकर बजाज कंपनी पर मुकदमा चलाया जाए।

खत्म हो जाएगा इंटरनेट

सेंसरशिप को लाने का एक और भी नुकसान है। इंटरनेट हमारे बीच अपनी कुछ खासियतों को लेकर ही इतना लोकप्रिय हुआ है। यह आपको सब कुछ फ्री में देता है और साथ ही आपको इसके लिए किसी लाइसेंस की जरूरत नहीं है। आप अपना खुद का एक ब्‍लॉग बनाकर कम्युनिटी मैगजीन चला सकते हैं, लोकल न्यूज दे सकते हैं। आप चाहें तो अपनी पहचान छुपा कर भी इंटरनेट पर काम कर सकते हैं। आपको ढेरों ऐसे ब्‍लॉगर्स मिल जाएंगे, जो कि सरकारी कर्मचारी हैं और आधिकारिक रूप से नहीं लिख सकते हैं। अपनी पहचान को छिपा कर वे सूचना की दुनिया में ढेरों योगदान दे रहे हैं। आज इंटरनेट पर हिंदी सिर्फ ब्‍लॉगर्स के सहारे ही जिंदा है। वेब वर्ल्ड के बेहद इंटरैक्टिव होने के कारण यहां बुरी चीजों के लिए कोई जगह नहीं है। यह ऐसी दुनिया है, जहां डार्विन का 'सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट' का सिद्धांत सबसे बेहतर ढंग से लागू होता है। अगर हम इंटरनेट से उसके ये फीचर्स छीन लेंगे तो यह आम आदमी की पहुंच से काफी दूर हो जाएगा। देश में इंटरनेट का विरोध करनी वाली एक बड़ी लाबी प्रिंट मीडिया की ही है। इंटरनेट के आने के बाद जिस माध्यम को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, वह है प्रिंट मीडिया। देश में प्रिंट मीडिया का कारोबार लगभग 19,300 करोड़ रुपयों का है जो कि 2015 तक 31,010 करोड़ पहुंच जाएगा। फिलहाल देश में 35 करोड़ से भी ज्यादा रीडर्स हैं, जो कि आने वाले समय में तेजी से बढ़ कर 50-60 करोड़ तक पहुंच जाएंगे। प्रिंटिंग की दुनिया में हमारा देश दूसरा सबसे बड़ा बिजनेस हब है। इस सबके बावजूद यहां बिजनेस का काफी बड़ा हिस्सा उन राइटर्स को नहीं मिलता, जो कि वाकई इस कंटेंट के जन्मदाता हैं। यहां तक कि रीडर्स को भी किताबें सस्ते में नहीं मिल पातीं।

मतलब साफ है कि यह बिजनेस न तो राइटर्स का भला करता है और न ही रीडर्स का। पूंजीपतियों का एक बड़ा वर्ग फ्री इंटरनेट को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। 1956 में हिंद पाकेट बुक्स ने एक रुपये में किताबें निकाल कर सबको चौंका दिया था, पर उसकी किताबें भी अब 100 रुपये से कम की कीमत पर पढ़ने को नहीं मिल पातीं। प्रेमचंद से लेकर उदय प्रकाश और विनोद कुमार शुक्ल तक को भी उनकी लेखनी पर रायल्‍टी के लिए संघर्ष करना पड़ा है। प्रेमचंद के बारे में बताया जाता है कि उनके उपन्यास 'रंगभूमि' के लिए उन्‍हें मात्र 1800 रुपये रायल्टी दी गयी थी। छोटे राइटर्स को तो अपनी रचना छपवाने तक के लिए भी प्रकाशकों और संपादकों के चक्कर काटने पड़ते थे। ऐसे में इंटरनेट अगर ऐसे माध्यम के तौर पर सामने आया है, जो कि पूरी तरह फ्री है और बिना किसी विशेष मेहनत के ज्ञान को फैला रहा है, तो भला सरकार को दिक्कत क्यूं हो रही है। अगर इंटरनेट से उसकी खूबियों ही छीन ली जाएं, तो उसके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगेगा।

इंटरनेट है हमारी सॉफ्ट पावर

रकार शायद इस बात को लेकर बौखलायी हुई है कि इंटरनेट का इस्तेमाल सरकारी नीतियों के खिलाफ किया जा रहा है। इंटरनेट और बाकी दुनिया को अपने फायदे के लिए सेंसर करते समय सरकार शायद यही नहीं समझ रही कि आखिर देश के इंटरनेट यूजर्स उसकी सॉफ्ट पावर को ही बढ़ा रहे हैं। 'टेड' में बोलते हुए शशि थरूर ने कहा था हर देश के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी सॉफ्ट पावर को बढ़ाये। सॉफ्ट पावर की संकल्पना करने वाले 'हार्वर्ड' के एक पंडित जोसेफ न्येयह के मुताबिक सॉफ्ट पावर एक देश की वह क्षमता है, जो दूसरो को अपनी ओर आकर्षित करती है। शशि थरूर के मुताबिक कोई देश अपनी संस्कृति से, अपने राजनीतिक मूल्यों से या अपनी विदेश नीतियों से ऐसा ही करते हैं। हर देश के पास कुछ ऐसी चीजें हैं जो उसकी सॉफ्ट पावर को बढ़ाती हैं। उदाहरण के लिए चीन का 'बीजिंग ओलिंपिक्स'। अमेरिकियों के पास 'वाइस आफ अमेरिका', फुलब्राइट स्कालरशिप', 'हालीवुड', 'एमटीवी' और 'मैकडानल्ड्स'। इन सॉफ्टपावर्स ने वह कुछ किया, जो अमेरिका सारी दुनिया पर हमला कर या बिजनेस फैला कर कभी नहीं कर सकता था।

हम इंडियंस के पास ढेर सारा ज्ञान है, जिसे हम हमारी सॉफ्ट पावर के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं। देश में अभी भी कुल आबादी का 10 प्रतिशत भाग ही इंटरनेट जानता है और 3-5 प्रतिशत लोग ही इसे रेगुलर यूज करते हैं। इसके बावजूद भी हम दुनिया में आईटी की सबसे बड़ी मार्केट बन कर उभरे हैं। हमारा लिखा हुआ कंटेंट ही सारी दुनिया के इंटरनेट पर तैरता है। वह दिन दूर नहीं, जब आईटी और नॉलेज में हम दुनिया के लीडर होंगे। इन परिस्थितियों में क्या हम चीन की राह पर बढ़ सकते हैं। वह चीन जहां इंटरनेट पर निगरानी रखने के लिए 30 हजार एक्सपर्ट्स की एक बड़ी फौज है। चीन के पास अपना खुद का बनाया एक सर्च इंजन बायडू है और इंटरनेट कंटेट को फिल्टर करने के लिए कई तरह के टूल्स का इस्तेमाल किया जाता है। एक देश जहां वह देखा, सुना, लिखा और पढ़ा जाता है जो सरकार तय करती है। ऐसा न हो कि सेंसरशिप की चीनी राह पकड़ते हुए हम अपनी सबसे बड़ी सॉफ्टपावर को ही बर्बाद कर दें। आखिर हम अपनी ही कुल्हाड़ी से अपने पैरों पर चोट कैसे कर सकते हैं?

एक अप्रैल : 'फूल्स-डे' नहीं, (कपिल) 'सिब्बल्स-डे'

इंटरनेट सेंसरशिप के खिलाफ हमारे अभियान के तहत आज, रविवार एक अप्रैल को राजघाट पर हम सिब्बल्स डे मना रहे हैं। पिछले एक साल में मंत्री महोदय के प्री सेंसरशिप पर दिये गये बयान सारी दुनिया में हंसी का विषय बन गये। आईटी एक्ट में 2011 में किये गये संशोधनों के बाद दुनिया के बीच भारत की छवि एक डेमोक्रेटिक देश की न होकर तानाशाह की हो गयी है और इसके जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि माननीय कपिल सिब्बल जी ही हैं। यह हम नहीं जर्नलिस्ट्स के अंतर्राष्ट्रीय संगठन 'रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स' का कहना है।

मूर्खता से भरपूर रहेगा यह कार्यक्रम

देश से आईटी एक्ट को हटाने और इंटरनेट पर सरकार से सकारात्मक रवैये की मांग करते हुए दिल्ली के तमाम ब्‍लॉगर्स, इंटरनेट यूजर्स, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता रविवार को राजघाट परिसर में एकत्र हो रहे हैं। जोकर टोपी (जिसमें 'मैं हूं सिब्बल' लिखा होगा) पहने हुए हाथों में सीटी लेकर हम सभी लोग गांधीवादी तरीके से राजघाट पर मूर्खता के गीत गाएंगे और एक दूसरे को मूर्खतापूर्ण तरीकों से गिफ्ट देकर और केक काटकर फूल्स डे विश करेंगे। इस दौरान भारत में इंटरनेट को मूर्खतापूर्ण तरीकों से सेंसर किये जाने की पुरानी घटनाओं को याद कर ठहाके भी लगाये जाएंगे।

आपके लिए हमारा स्पेशल गिफ्ट हैंपर

पके लिए हमने एक स्पेशल गिफ्ट हैंपर भी तैयार कर रखा है, जिसमें एक सिब्बल कैप (जोकर कैप), सीटी, चुटकुलों की किताब, कुछ गुब्बारे, सांप सीढ़ी और लूडो शामिल है। अपनी आवाज बचाने के लिए राजघाट पर आयोजित इस कार्यक्रम में पहुंचें। और हां, कृपया वहां से अपना गिफ्ट लेना न भूलें।

(आलोक दीक्षित। अपनी आवाज बचाओ (सेव योर वॉयस) अभियान के सक्रिय सदस्‍य। टीवी9 और दैनिक जागरण के साथ टीवी और प्रिंट की पत्रकारिता करने के बाद पिछले कुछ सालों से न्‍यू मीडिया में सक्रिय। मार्च 2011 से Bangalured के संपादक। आलोक से writeralok@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)


कविता में घर

कविता में घर


Sunday, 01 April 2012 14:26

नंदकिशोर आचार्य 
जनसत्ता 1 अप्रैल, 2012: भवानी भाई से यह मेरी पहली मुलाकात थी। उन्नीस सौ तिहत्तर की गर्मियों की बात है। जयप्रकाश नारायण ने 'एवरीमेंस वीकली' का प्रकाशन शुरू किया था। संपादक थे स.ही. वात्स्यायन 'अज्ञेय'। मैं अप्रैल में 'एवरीमेंस' में चला आया था और वात्स्यायन जी के साथ ही रह रहा था। एक शाम वात्स्यायन जी का मन भवानी भाई से मिलने का हुआ और हम लोग उनके घर पहुंच गए। 'चिति' के सिलसिले में उनसे पत्राचार हुआ था और मेरे पत्र के जवाब में उनका उत्साहवर्धक पत्र मिला था और उसी अंतर्देशीय में उन्हीं की हस्तलिपि में दो कविताएं भी मिली थीं, जो 'चिति' के दूसरे अंक में प्रकाशित हुई थीं। मैं तो इसी से मगन था, लेकिन पहली ही मुलाकात में उनके सादा व्यक्तित्व और निश्छल स्नेह ने मुझे अभिभूत कर दिया। यह प्रभाव फिर गहराता ही गया।
'एवरीमेंस वीकली' में प्रमुखत: साहित्य-संस्कृति से संबंधित पृष्ठों का दायित्व मेरा था। अंग्रेजी अखबार सामान्यत: हिंदी की उपेक्षा ही करते हैं, इसलिए वात्स्यायन जी चाहते थे कि 'एवरीमेंस' को इस दिशा में सचेष्ट होना चाहिए। मैंने इसी सिलसिले में भवानी भाई से साक्षात्कार के लिए अनुरोध किया। जुलाई के अंतिम सप्ताह में प्रकाशित यह साक्षात्कार भी मुझे विस्मित करने वाला था। 
भवानी भाई की प्रसिद्धि एक गांधीवादी लेखक के रूप में थी। लेकिन विचारधारा और कविता के संबंधों के सवाल पर उनका स्पष्ट मत था कि 'कविता किसी विचारधारा की अभिव्यक्ति का उपकरण नहीं है- बल्कि वह अभिव्यक्ति का माध्यम तभी तक है जब तक हम उसके माध्यम से किसी पूर्वनिर्धारित सत्य को कहना चाहते हैं। एक कवि के रूप में मेरे पास कुछ भी पूर्वनिर्धारित नहीं है। कविता मेरे तर्इं अभिव्यक्ति नहीं, अनुभव का माध्यम है।' इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि उनकी सर्वोच्च आस्था शब्द में हो। 'सच पूछो तो मैं नहीं कह सकता कि ईश्वर में मेरा पूर्ण विश्वास है' मेरे एक और सवाल के उत्तर में भवानी भाई ने कहा। 'मेरी वास्तविक आस्था मेरे शब्दों में है। शब्द कवि का माध्यम नहीं है, यदि सच्चा कवि है तो वह स्वयं ही शब्द का माध्यम है।' 
भवानी प्रसाद मिश्र की कविता हिंदी की सहज लय की कविता है। खड़ी बोली में बोलचाल के गद्यात्मक-से लगते वाक्य-विन्यास को ही कविता में बदल देने की जो अद्भुत शक्ति है, उसकी अचूक पहचान भवानी भाई की कविता में दिखाई देती है। यह प्रवृत्ति छायावाद-पूर्व की कविता में तो थी ही, पर नई कविता के जिन कवियों में इसका सृजनात्मक विकास हुआ दिखाई देता है उनमें अज्ञेय, रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह आदि के साथ भवानी प्रसाद मिश्र का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह भी ध्यातव्य है कि आधुनिक हिंदी कवियों में उन्हीं को कुछ लोकप्रियता मिली है, जो इस गद्यात्मक विन्यास में अंतर्निहित लयात्मकता को मूर्त्त कर सके हैं। भवानी भाई इसमें अप्रतिम हैं। 
बोलचाल की इस लयात्मक संरचना के ही कारण उनकी कविता का स्वभाव मूलत: बातचीत का या कहें कि वर्णन करने का है और इसी कारण उसमें एक प्रभावी, पर सहज नाटकीयता आ जाती है और ये सब गुण मिल कर उनकी कविता में वह सामर्थ्य विकसित कर देते हैं कि वह सरलतम तरीके से जटिलतर स्थितियों और अनुभवों को संप्रेषित करने में कामयाब होती है। दरअसल, भवानी भाई की सरल कथन-भंगिमा हमें अनवधान में डाल देती है और उसी के चलते हम अनुभव की उस जटिल संरचना को पहचान पाने में चूक जाते हैं। वह एक छलपूर्ण सरलता है। कविता में इस किस्म की सरलता को पारदर्शिता कहा जाना चाहिए, लेकिन इसे सिद्ध कवि ही हासिल कर पाते हैं। परस्पर विरोधी भावों या स्थितियों के जटिल अनुभव के एक साथ संप्रेषित हो पाने के लिए ऐसी कविता को अधिक सावधानी से पढ़ने की जरूरत होती है: 

'खुशी को/ बारहा मना किया था/ मैंने/ कि न जाए वह/ मेरे खून की धारा से/ कहने अपना दुख/ मगर वह गई/ और अब खा रही है वहां/ डुबकियां' ('रक्तकमल')
'अस्तित्व का आंगन/ कृतज्ञता की धूप से भरा है/ और तिस पर भी/ सूना है विस्तार/ देहरी से ठाकुरद्वारे तक का'  ('जैसे याद आ जाता है') 
भवानी भाई की कविता के हवाले से अज्ञेय का नई कविता के इस अनूठे रस को मिश्र रस कहना और गंभीर बात को हल्के ढंग से कहने की इस भंगिमा को उल्लेखनीय मानना सही लगता है। 
बोलचाल की इस लय के ही कारण भवानी प्रसाद मिश्र की कविता में एक विशेष प्रकार की लोक आत्मीयता का स्पर्श महसूस होता है। यह आत्मीयता केवल संप्रेषण के स्तर पर नहीं, बल्कि स्वयं अनुभव के स्तर पर व्यंजित होती है- बल्कि यह कहना शायद अधिक सही होगा कि इसी कारण प्रकृति या अन्य चीजों का अनुभव अधिक आत्मीय या कौटुंबिक स्तर पर होता है और इसलिए भवानी प्रसाद मिश्र की कविता में वह घर बराबर मौजूद रहता है, जिसकी तलाश बाद की कविता बराबर करती रही है। भवानी भाई जिस किसी भी चीज के बारे में बतियाते हैं, उसे घरेलू बना देते हैं- प्रकृति तक को। जब वह कहते हैं:
'बहुद दूर/ दक्षिण की तरफ/ नीली है पहाड़ की चोटी/ और लोटी-लोटी लग रही है/ आंगन के पौधे की आत्मा/ स्तब्ध इस शाम के/ पांवों पर।' ('अंधेरी रात')
तो आंगन का पौधा और शाम ही नहीं, दूर दिखती पहाड़ की नीली चोटी भी जैसे परिवार का एक अंग हो जाती है। वृद्धावस्था और मृत्यु तक के प्रति भवानी भाई एक आत्मीय स्वर में बात करते हैं और यह स्वर विस्मित   करता है- खासतौर पर जब पश्चिम के आधुनिक साहित्य में इनका त्रासदायक अनुभव ही सघन दीखता है।
'आराम से भाई जिंदगी/ जरा आराम से/ तेजी तुम्हारे प्यार की बरदाश्त नहीं होती अब/ इतना कस कर किया गया आलिंगन/ जरा ज्यादा है इस जर्जर शरीर को।' ('आराम से भाई जिंदगी')
भवानी भाई की प्रेम कविताएं भी अलग से ध्यान आकर्षित करती हैं- खासतौर पर प्रौढ़ प्रेम की कविताएं जिनमें उद्दाम शृंगारिकता के बजाय आत्मीय सहजीवन और उसके सुख-दुख ही प्रेम की व्यंजना है। 
'कैसे कहता/ सबसे बड़ा सुख/ सपने में मिला था/ सच यही है/ मगर इस सच को कभी मैंने दुख नहीं बनने दिया/ और ले लिए इसलिए उस दिन/ सवाल के जवाब में सरला के दोनों हाथ/ हाथों में/ और देखा हम दोनों ने चुपचाप/ एक दूसरे को थोड़ी देर।'  ('क्या चाहती हो तुम')
भवानी भाई की कविता में जब भी व्यंग्य या क्षोभ दिखाई देता है- बल्कि उनकी भी उल्लेखनीय उपस्थिति वहां है- तो आत्मीयता के अभाव या उस पर हुए आघातों के विभिन्न रूपों के प्रति विरोध के रूप में ही। इसलिए वहां भी घृणा नहीं एक सात्त्विक क्रोध की ही अभिव्यक्ति है। 
लेकिन तब क्या भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य-संसार साधारण भारतीय जन के ऐतिहासिक और मानसिक द्वंद्वों से प्रसूत अहिंसा-बोध या संवेदन की आधुनिक प्रक्रिया का प्रतिफलन ही नहीं है? हां, निश्चय ही वह काव्यात्मक प्रक्रिया का प्रतिफलन है!

सर्राफा हड़ताल के 15 दिन पूरे, कारोबारी पीछे हटने को तैयार नहीं

सर्राफा हड़ताल के 15 दिन पूरे, कारोबारी पीछे हटने को तैयार नहीं

Saturday, 31 March 2012 17:14

नयी दिल्ली, 31 मार्च (एजेंसी) गैर..ब्रांडेड आभूषणों पर एक फीसद उत्पाद शुल्क  तथा सोने के आयात पर सीमा शुल्क दोगुना किए जाने के प्रस्ताव के खिलाफ सर्राफा व्यापारी आज लगातार 15वें दिन हड़ताल पर रहे। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा 16 मार्च को बजट पेश किए जाने के बाद से ही सर्राफा कारोबारी हड़ताल पर हैं। बजट में जहां गैर ब्रांडेड आभूषणों पर एक फीसद का उत्पाद शुल्क लगाने का प्रस्ताव है, वहीं सोने के आयात पर सीमा शुल्क भी दोगुना कर 4 फीसद किए जाने का प्रस्ताव है। 
अखिल भारतीय सर्राफा संघ के अध्यक्ष शील चंद जैन ने कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों के हड़ताली संगठनों ने फैसला किया है कि बड़े बाजारों के अलावा छोटे कस्बों में भी जौहरी अपना कारोबार बंद रखेंगे। जैन ने साफ किया कि जब तक सरकार अपने निर्णय को वापस नहीं लेती है, सर्राफा व्यापारी हड़ताल वापस नहीं लेंगे। 


ऑल इंडिया ज्वेलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विमल गोयल ने कहा कि हड़ताल की वजह से कारोबारियों के साथ सरकार को भी राजस्व का नुकसान हो रहा है। गोयल ने बताया कि अब तक हड़ताल की वजह से लगभग 11,000 करोड़ रुपये के कारोबार के नुकसान का अनुमान है। इस तरह यदि गणना की जाए तो सरकार को सीमा शुल्क के रूप में 450 करोड़ रुपये का नुकसान हड़ताल से हो चुका है। वहीं देश भर में वैट के रूप में भी करीब 112 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान सरकार को हुआ है। 
व्यापारियों के प्रमुख संगठन कनफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि एक तरफ सरकार वस्तु एवं सेवा कर :जीएसटी: को लागू करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर कराधान प्रणाली को जटिल बना रही है। खंडेलवाल ने कहा कि किसी भी तरह के अन्य कर चाहे वह उत्पाद शुल्क ही हो, से कराधान प्रणाली की जटिलता बढ़ेगी।

उत्तराखंड की बिजली परियोजना पर पर्यावरण मंत्रालय को हरित न्यायाधिकरण का नोटिस

उत्तराखंड की बिजली परियोजना पर पर्यावरण मंत्रालय को हरित न्यायाधिकरण का नोटिस

Sunday, 01 April 2012 12:29

नयी दिल्ली, एक अप्रैल (एजेंसी) राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण :एनजीटी: ने उत्तराखंड के गढ़वाल में अलकनंदा नदी पर 200 मेगावाट की श्रीनगर पनबिजली परियोजना का काम रोकने के बारे में एक याचिका पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को नोटिस जारी कर उसका जवाब मांगा है। याचिका में इस परियोजना को नए सिरे से डिजाइन करने का निर्देश देने की अपील की गई है। न्यायाधिकरण ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, उत्तराखंड सरकार और अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी लि. :एएचपीसीएल: को नोटिस भेजकर 19 अप्रैल तक जवाब देने को कहा है। 
कार्यवाहक अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए सूर्यनारायण नायडू की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि नोटिस जारी किया। 
यह आदेश पर्यावरण कार्यकर्ता विमल भाई और अर्थशास्त्री तथा आईआईएम बेंगलूर के पूर्व प्रोफेसर भरत झुनझुनवाला की याचिका पर दिया गया। 
याचिका में परियोजना 

का काम रोकने और उसे नए सिरे से डिजाइन करने का निर्देश देने की अपील की गई है, जिससे नदी के प्रवाह में बाधा न आए और तथा क्षेत्र के वन एवं पारिस्थितिकी तंत्र पर पर्यावरण के नकारात्मक असर को कम किया जा सके।
पीठ के सामने खुद मामले की दलीलें देते हुए झुनझुनवाला ने एएचपीसीएल का यूपी बिजली कारपोरेशन के साथ किया गया बिजली खरीद समझौता खत्म करने का निर्देश देने की मांग की। 
साथ ही उन्होंने एएचपीसीएल को उत्तराखंड बिजली कारपोरेशन के साथ नया समझौता करके स्थानीय इलाकों को यहां से पैदा बिजली की आपूर्ति करने का निर्देश देने के लिए भी कहा।
पर्यायवरण मंत्रालय ने तीन मई 1985 को 200 मेगावाट परियोजना स्थापित करने के लिए उत्तर प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड को पर्यायवरण संबंधी मंजूरी दी थी।

 

भाषा और सामाजिक भेदभाव

भाषा और सामाजिक भेदभाव

Sunday, 01 April 2012 14:27

तुलसी राम 
जनसत्ता 1 अप्रैल, 2012: चार मार्च को एम्स के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली। मीडिया में खबर आने लगी कि अंग्रेजी भाषा के चलते उस छात्र का अकादमिक प्रदर्शन ठीक नहीं था, इसलिए उसने अपनी जान दे दी। भारत में भाषाई भेदभाव बहुत पुराना है। सदियों तक अशिक्षा के दौर में संस्कृत माध्यम वाले 'गुरुकुल' में या तो ब्राह्मण पढ़ते थे या राजघराने के लोग। इसमें स्त्रियों की शिक्षा वर्जित थी, भले ही वे उच्च कुल की क्यों न हों। प्राचीन काल की गार्गी, लोपामुद्रा जैसी कुछ महिलाओं का इतिहासकार बहुत उदाहरण देते हैं कि वे वेद-पारंगत थीं और संस्कृत में शास्त्रार्थ करती थीं। इस सच्चाई के पीछे भ्रम ज्यादा फैलाया जाता है। हकीकत यह थी कि उस समय उन्हीं महिलाओं को शिक्षित होने का अधिकार था, जो अपने पिता या भाई से शिक्षा प्राप्त कर सकती थीं। गार्गी या लोपामुद्रा इसी श्रेणी में आती थीं। दूसरी तरफ संस्कृत को देववाणी कह कर इसे पवित्र घोषित कर दिया गया। ऐसी स्थिति में दलित या अन्य शूद्र जातियां न सिर्फ अशिक्षित रह गर्इं, बल्कि संस्कृत जानने वालों द्वारा सामाजिक भेदभाव की शिकार भी हो गर्इं। 
संस्कृत ग्रंथों को छिपा कर रखा जाता है। यहां तक कि शूद्रों के उन्हें देखने, सुनने या छूने पर कठिन दंड का प्रावधान था। यह बात और है कि संस्कृत की पवित्रता ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई। नतीजतन, यह मात्र कर्मकांड की भाषा बन कर रह गई। इस कड़ी में सुल्तानों और मुगलों के समय शिक्षा गुरुकुल से बाहर आई, पर मस्जिदों में सिमट कर रह गई। यानी मदरसा प्रणाली का विकास हुआ, जिसमें सिर्फ मुसलमान शिक्षित हो सके। दलितों या शूद्रों को यहां भी कोई अवसर नहीं प्राप्त हुआ। 
एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि गुरुकुल में जहां संस्कृत थी, मदरसों में उसका स्थान अरबी, फारसी और उर्दू ने ले लिया। ऐसे ही जब ब्रिटिश उपनिवेशवादियों का शासन आया, आधुनिक शिक्षा की नींव तो अवश्य पड़ी, पर इन शिक्षण संस्थाओं में भी उच्च जातियों का ही वर्चस्व स्थापित हो गया। यहां अंग्रेजी का वर्चस्व हो गया। परिणामस्वरूप यह देखा गया कि शिक्षा की प्रणाली चाहे जो भी रही, दलित सदियों तक उससे वंचित रहे। आजादी के पहले डॉ आंबेडकर को बड़ी मुश्किल से सिर्फ पांच दलित स्नातक यानी ग्रेजुएट मिले थे। इसलिए दलितों के बीच जो भी शिक्षा आई वह 1932 में पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर होने के बाद आई। विशेष रूप से 1950 में जब भारत का नया संविधान लागू हुआ, तो आरक्षण व्यवथा के चलते शिक्षा के क्षेत्र में धीरे-धीरे दलित आने लगे। 
कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि शिक्षा का भाषाई माध्यम चाहे जो भी रहा, वह दलितों के लिए पराया सिद्ध हुआ। इसलिए भेदभाव एक आवश्यक प्रक्रिया का अंग बन गया। भारतीय समाज जाति-व्यवस्था पर आधारित है और जाति-व्यवस्था धर्म की देन है। इसलिए जातीय भेदभाव भी धर्म पर ही आधारित है। यहां तक कि भाषा को भी धर्म से जोड़ दिया गया। इस संदर्भ में भाषाओं का सांप्रदायीकरण भी हुआ। इसमें भी दलित कहीं फिट होते नहीं दिखे। ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली आधुनिक तो थी, पर अंग्रेजी माध्यम ने इसे औपनिवेशिक बना दिया। कुल मिलाकर यह देखा गया कि भारत में शिक्षा प्रणाली चाहे जो भी रही हो, उसमें उच्च जाति या उच्च वर्गों का ही वर्चस्व रहा। 
चूंकि शिक्षा का संबंध सीधे-सीधे रोजगार से है, इसलिए शिक्षण संस्थानों में दलितों के साथ भेदभाव अंतर्निहित-सा हो गया है। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से पता चलता है कि भाषाई कमजोरी सामाजिक भेदभाव को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होती है। इस यथार्थ को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने वर्षों पहले एक अनोखी नीति अपनाई थी, जिसके तहत सभी विश्वविद्यालयों से कहा गया था कि वे अपने यहां 'ईक्वल अपार्चुनिटी आॅफिस' (ईओओ) यानी समान अवसर कार्यालय खोलें और दलित तथा आदिवासी छात्रों को रेमेडियल कोचिंग प्रदान करें। रेमेडियल कोचिंग का सुझाव दो तरह का था- एक, भाषाई कोचिंग यानी अंग्रेजी की कोचिंग, और दूसरा, विषय संबंधी कोचिंग।


इस मद में आने वाले सारे खर्चों की जिम्मेदारी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपने ऊपर ली थी। 
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय देश का पहला संस्थान था, जिसने लगभग पंद्रह वर्ष पहले रेमेडिअल कोचिंग शुरू की थी। मैं खुद 'ईओओ' का तीन टर्म इंचार्ज था। इस संदर्भ में मेरा अनुभव अत्यंत निराशाजनक था। तमाम कोशिशों के बावजूद छात्र रिमेडियल कोचिंग में अनुपस्थित रहते थे। धीरे-धीरे यह व्यवस्था धराशायी हो गई। यहां मेरा एक अनुभव यह रहा है कि लगभग सारे छात्र दाखिला पाने के साथ ही संघ लोकसेवा आयोग और प्रदेश लोकसेवा आयोग (पीसीएस) की परीक्षाओं में शामिल होने की तैयारी में व्यस्त हो जाते हैं। नतीजतन, कक्षा में उनकी प्रगति संतोषजनक नहीं हो पाती। अधिकतर छात्र न इधर के होते हैं न उधर के। इस कारण अनेक छात्र-छात्राएं सामाजिक भेदभाव की शिकायत दर्ज करा चुके हैं। 
जांच के दौरान मैंने पाया कि कई मामलों में जातीय भेदभाव न होकर व्यक्तिगत स्तर पर आपसी समझ की कमी थी। ईओओ के अनुभव से यह भी पता चला कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने के कारण छात्र रेमेडियल कोचिंग में रुचि नहीं लेते थे। इससे यह सिद्ध होता है कि शिक्षा प्रणाली ही दोषपूर्ण और भेदभाव वाली है। अगर शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो, तो बहुत हद तक भाषाई भेदभाव कम किया जा सकता है। जब तक मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम नहीं बनाया जाएगा, छात्रों के समक्ष अनेक समस्याएं खड़ी होती रहेंगी। विश्व समुदाय का उदाहरण है कि अपनी मातृभाषा   अपनाने वाले देश ही ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में आगे निकले। रूस, चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, इंग्लैंड, अमेरिका आदि इसके ज्वलंत उदहारण हैं। इन सारे देशों में शिक्षा का माध्यम आज भी मातृभाषा है। 
डॉ आंबेडकर ने कभी कहा था कि अंग्रेजी शेरनी का दूध है, इसे जो पीएगा, वह दहाड़ेगा। ब्रिटिश राज में यह बात एकदम सही थी और भारतीय राज में भी तब तक सही जान पड़ेगी, जब तक शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रहेगी। असली ज्ञान अपनी भाषा में उत्पन्न होता है, विशेष रूप से  साहित्य विदेशी भाषा में कभी पनप नहीं सकता। 
आजादी के बाद अगर आंकड़े इकट््ठा किए जाएं तो पता चलेगा कि अधिकतर छात्र अंग्रेजी में विफल होकर अपना भविष्य नष्ट कर चुके हंै। कुछ अच्छी अंग्रेजी जानने वाले छात्र आगे अवश्य निकल जाते हैं, जिसके कारण अंग्रेजी के महत्त्व को लोग स्वीकार करने लगते हैं। वास्तविकता यह है कि मातृभाषा की उपेक्षा के कारण अंग्रेजी का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। एक वैकल्पिक भाषा के रूप में अंग्रेजी का अध्ययन ठीक है, पर शिक्षा का माध्यम हमेशा मातृभाषा ही होनी चाहिए। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं लगाना चाहिए कि मातृभाषा में शिक्षा का माध्यम होने से ही सामाजिक भेदभाव समाप्त हो जाएगा। 
इधर कुछ वर्षों से शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की घटनाएं बड़ी तेजी से सामने आ रही हैं। कई आत्महत्याएं भी हुई हैं। इसका मूल कारण है कि पिछले दो दशकों के दौरान भारत की राजनीति में बड़े स्तर पर जातीय ध्रुवीकरण हुआ है, जिसके कारण सांप्रदायिक और क्षेत्रीयतावादी ध्रुवीकरण भी तेजी से बढ़ा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि हर जाति का जातीय गौरव चरम सीमा पार कर गया है। जाति-विरोधी जागरूकता एकदम समाप्त हो गई है। इसलिए राजनीति में जातीय सोच धीरे-धीरे सामाजिक सोच बनता जा रहा है। परिणामस्वरूप जातीय भेदभाव बड़ी तेजी से उभरने लगा है। अब पार्टियां नहीं, बल्कि जातियां सत्ता में आ रही हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय जनतंत्र जातीय जनतंत्र में बदलता जा रहा है। 
इसलिए जरूरत इस बात की है कि शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन करके जाति-विरोधी मानसिकता तैयार की जाए। साथ ही जरूरत है फिर से जाति-विरोधी सामाजिक आंदोलनों को जीवित करके सामाजिक जागरूकता पैदा करने की। जब तक राजनीतिक सत्ता जाति पर आधारित रहेगी, जातीय भेदभाव भी जारी रहेगा। जातीय भेदभाव दूर करने में छात्रों की भूमिका सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। इसलिए स्कूली शिक्षा को पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष बनाना पड़ेगा, अन्यथा सामाजिक भेदभाव जैसे अब तक रहा है, आगे भी जारी रहेगा।

निष्ठा पर नाहक सवाल

निष्ठा पर नाहक सवाल


Sunday, 01 April 2012 14:28

तरुण विजय 
जनसत्ता 1 अप्रैल, 2012: सियाचिन में शून्य से नीचे तीस से लेकर चालीस डिग्री सेल्सियस तक के भयानक बर्फानी माहौल में तैनात सैनिक अकेलेपन, ऊब और तनाव के चलते सर्वाधिक मानसिक रोगों के शिकार होते हैं। बर्फ से हाथ-पांव की उंगलियां गलने और फिर काटे जाने के अनेक मामले सैनिक अस्पतालों में मार्मिक दृश्य पैदा करते हैं। साल में महीने भर की छुट््टी मिलेगी तो आठ दिन प्राय: जाने-आने में ही खर्च हो जाते हैं। अगर कभी बर्फानी दरारों और अतल गहरे पतले बर्फ से ढके गड्ढों में गिर जाएं तो शरीर जम जाता है, चमड़ी बर्फ से चिपक जाती है, रस्सी के सहारे भी ऊपर खींचा जाना असंभव होता है, और फिर दर्दनाक अंत : पल-पल ठहरी हुई आंखें निस्तेज होती जाती हैं। 
फिर भी सैनिक सियाचिन में तैनाती चाहता है। वहां का रोमांच और मातृभूमि के प्रति प्रेम उसे खींच लाता है- मौत का सामना करने के लिए। उसे परास्त करने के लिए। वह मौत पर विजय पाता है। पर दिल्ली के बाबू और नेता उसे हरा देते हैं।
वह फौज में इसलिए भरती हो ताकि देश की सुरक्षा के नाम पर दिल्ली के गद्दार फौजी सौदों में हजारों करोड़ रुपए की दलाली खा सकें? 
फिर उस सेनाध्यक्ष का गला पकड़ें, जिसने भ्रष्ट सौदों को बेनकाब किया?
और फिर सत्ता के तंबुओं में पनाह लेने वाले दिग्गज 'विशेषज्ञ-पत्रकार' कहें- जनरल वीके सिंह ने नया क्या कहा? जो बातें वे बता रहे हैं, वह सब तो सीएजी की रपटों में, रक्षा मंत्रालय की स्थायी समिति के विवरणों में बरसों से छपती आई हैं, पर उसे ये सांसद पढ़ते थोड़े ही हैं। 
अच्छी बात है, साहब। पेड-न्यूज पर सन्नाटा ओढ़ कर संसद को अनपढ़ कहना काफी सुहाता है। पर आप खुद फिर उन तथ्यों को क्यों नहीं उठा पाए? और अगर जनरल वीके सिंह नहीं बोलते तो क्या देश उस तीव्रता से सेना के साथ मंत्रालय के बाबुओं और नेताओं के छल पर चर्चा करता? 
भारत दुनिया का सबसे बड़ा शस्त्र खरीदार है। नौ खरब रुपए के रक्षा बजट का चालीस प्रतिशत हथियार, विमान, पनडुब्बियां खरीदने में व्यय होता है। भारत की बयासी प्रतिशत शस्त्रास्त्र आवश्यकताएं विदेशों से की जाने वाली खरीद से पूरी की जाती हैं। उसमें भी पचहत्तर प्रतिशत केवल रूस से खरीद होती है। अब धीरे-धीरे अकेले रूस पर निर्भरता न रख कर पैंतीस अन्य देशों से भी शस्त्र खरीदे जा रहे हैं। मगर लगभग हर शस्त्र खरीद पर सवाल खड़े हुए। हजार-हजार करोड़ के सौदों में सैकड़ों करोड़ के कमीशन का इंतजाम होता है। 
भारत सबसे ज्यादा शस्त्र खरीदने के बावजूद सत्तानबे प्रतिशत 'अपेक्षा से कम रक्षा-सिद्ध' क्यों है? 
2009 में कर्नाटक के अनुसूचित जाति संगठन के नेता हनुमंतप्पा ने प्रधानमंत्री, यूपीए अध्यक्ष और रक्षामंत्री को पत्र लिख कर टेट्रा ट्रकों की खरीद के बारे में जांच का आग्रह किया था। 
जांच नहीं की गई। पत्र दबा दिया गया। अब जब पत्र फिर से उजागर हुआ तो एक स्वनामधन्य विश्लेषक ने चैनल चर्चा में हनुमंतप्पा की योग्यता पर ही सवाल जड़ दिया- आपने किस हैसियत से, किस पात्रता से टेट्रा ट्रकों की जांच का पत्र लिखा?
मैंने जवाब में पूछा- क्या भारत के किसी भी नागरिक को, चाहे उसकी योग्यता का स्तर कुछ भी हो, देश के प्रधानमंत्री के पास ऐसा हर विषय उठाने का अधिकार नहीं है, जिसे वह जरूरी मानता है और देशहित में उसकी जांच की मांग करना उचित समझता है? अगर पात्रता और योग्यता की ही बात करनी है तो एके एंटनी क्या इंडियन मिलिट्री एकेडमी से ग्रेजुएट हैं कि उन्हें रक्षामंत्री बनाया जाना उपयुक्त माना गया? संदेशवाहक को मारो। जो गलत काम के खिलाफ लोगों को जगाए, चेतावनी दे, उसे कठघरे में खड़ा कर बेइज्जत करो कि नामाकूल, बदनीयत, तुमने इतने बड़े-बड़े लोगों की कलई खोलने का दुहस्साहस कैसे किया? जरूर तुम्हारे मन में कोई पूर्वग्रह, कोई बेईमानी होगी। अब क्यों बोल रहे हो, पहले क्यों नहीं बोले? तुमने सीधे प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर शासकीय रीति-रिवाज का उल्लंघन किया है। तुमने अनुशासन तोड़ा है। जन्मतिथि पर तुम्हारी बात नहीं मानी गई, इसलिए खुंदक निकाल रहे हो, बदला ले रहे हो। इस्तीफा दो। वरना तुम्हें बर्खास्त कर देंगे। हिम्मत होती और अपने किए-अनकिए की ईमानदारी पर भरोसा होता, तो कबके बर्खास्त कर चुके होते।

जनरल वीके सिंह ने फौज की तैयारियों में भयानक दुर्बलताओं की ओर ध्यान दिलाने वाला पत्र प्रधानमंत्री को लिखा तो उसे 'लीक' कर दिया गया। किसने किया?
वे कौन हो सकते हैं, जिन्हें इस प्रकार के अत्यंत गोपनीय पत्र के लीक होने से फायदा पहुंच सकता है? 
शुरू के तीन दिनों तक चैनलों पर जो बहस चली, उसमें जनरल वीके सिंह पर ही पत्र 'लीक' करने के आरोप लगाए गए। 
जब जनरल वीके सिंह ने कहा कि यह अत्यंत गोपनीय पत्र 'लीक' करने का कुकृत्य देशद्रोह है और जिसने भी यह अपराध किया है उसके विरुद्ध निर्मम कार्रवाई होनी चाहिए, तो सिंह-विरोधी आक्रमण ढीले हुए। 
न केवल शानदार कीर्ति और बेदाग छवि वाले पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके मलिक, जनरल शंकर रायचौधरी और पूर्व नौसेनाध्यक्ष विष्णु भागवत जनरल वीके सिंह के समर्थन में खुल कर सामने आए हैं, बल्कि उत्तरी क्षेत्र के जीओसी लेफ्टीनेंट जनरल केटी परनायक ने जम्मू में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि जनरल वीके सिंह ने फौज के पास अच्छे शस्त्रों, कारतूसों और सैन्य उपकरणों की कमी का जो पत्र लिखा है, वह तथ्यों पर आधारित है। 
अब क्या जवाब रहता है इस सरकार के पास? देशभक्त सैनिक को क्या इसी छल   के साए में जलते रहना होगा? बाहरी शत्रु की अपेक्षा भीतर का शत्रु ज्यादा घातक होता है। चाहे गढ़चिरौली हो, मलकानगिरि या उत्तर पूर्वांचल के क्षेत्र; सब जगह भीतरी शत्रुओं से सामना करते हुए सीमा सुरक्षाबल, सीआरपीएफ, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और सेना के जवान अपना बलिदान भी देते हैं और अपने परिवारों में देशभक्ति की अलख जगाए रखते हैं। सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी विनोद शर्मा आतंकवादियों से लड़ते हुए मारे गए। अब उनकी बेटी उर्मिला आठ साल की है। उसने कहा, पापा हमें राष्ट्रगीत का सम्मान करना सिखा गए। अगर टीवी पर भी राष्ट्रगीत बज रहा हो और हम न खड़े हों, तो पापा को इतना गुस्सा आता था कि हमें सजा मिलती थी। लेकिन फौजी वर्दी और उसकी निष्ठा पर पत्थर फेंकने वाले आज संसद से मीडिया तक आवाज उठाते दिख जाते हैं, तो भारत सिकुड़ता प्रतीत होता है। हथियारों की खरीद में घोटाला करने वाले सीधे-सीधे बिना शक देशद्रोही हैं। उन्हें कतार में खड़ा कर उन्हीं के लायक सजा मिले तो सैनिक का जलना बंद हो।

अग्नि परीक्षा में खरे उतरकर बहुगुणा ने कायम की अपनी धाक

अग्नि परीक्षा में खरे उतरकर बहुगुणा ने कायम की अपनी धाक

Sunday, 01 April 2012 13:16

देहरादून, एक अप्रैल (एजेंसी) उत्तराखंड के हालिया विधानसभा चुनावों के बाद सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री पद तक के अपने सफर के हर पड़ाव पर अग्नि परीक्षाओं में खरे उतरकर राज्य में अपना वर्चस्व कायम करने में कामयाब रहे ।  
राज्य के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के पहले नेतृत्व के सवाल पर बहुगुणा के नाम को कोई खास तवज्जो नहीं दी जाती थी । केंद्रीय मंत्री हरीश रावत सहित कुछ और नेता मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल दिखाई दे रहे थे । लेकिन बहुगुणा अपने कुशल नेतृत्व और पार्टी आलाकमान के प्रति अपनी निष्ठा के बूते मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए ।  
विश्लेषकों की मानें तो बहुगुणा ने जब मुख्यमंत्री पद संभाला तो ऐसा लग रहा था कि वह इस सरकार को कुशल नेतृत्व नहीं दे पाएंगे पर उन्होंने बड़ी ही सूझबूझ से न सिर्फ अपनी पार्टी के नेताओं को नतमस्तक होने पर मजबूर कर दिया बल्कि एक के बाद एक अग्नि परीक्षाओं में भी खरे उतरकर विपक्षी भाजपा के सारे सपनों को चकनाचूर कर दिया । 
भाजपा के विधायक तथा नेता जहां कुछ दिन पहले तक यह कहते हुये अघा नहीं रहे थे कि बहुगुणा के पास विधानसभा में अपेक्षित बहुमत नहीं है और जिस दिन गुप्त मतदान हो जाए उन्हें अपनी स्थिति समझ में आ जाएगी । लेकिन अब राज्य सभा के लिये कांग्रेस के उम्मीदवार महेन्द्र सिंह माहरा के विजयी होने के बाद उन नेताओं की जुबान पर ताला लग गया है । 
कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता राजीव महर्षि ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा कि बहुगुणा अपने सरल और सौम्य स्वभाव के कारण इतने लोकप्रिय हो गये कि कांग्रेसजनों ने बिना किसी भेदभाव के उनका समर्थन किया और इसी वजह से वह एक के बाद एक कड़े इम्तिहानों में कामयाब भी हुए ।  
उन्होंने कहा कि बहुगुणा के सरल स्वभाव की वजह से विपक्षी भाजपा के भी कई नेता उनकी तारीफ करते हैं । 
बहुगुणा रिश्ते में भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी के भाई हैं । 
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद बहुगुणा पहली अग्नि परीक्षा से उस वक्त गुजरे जब राज्य विधान सभा अध्यक्ष का चुनाव होना था । भाजपा को इसमें पूरी उम्मीद थी कि बहुगुणा के विरोधी खेमे के विधायक या तो 'क्रॉस वोटिंग' कर सकते हैं या गैरहाजिर रहकर उन्हें झटका दे सकते हैं । इसी उम्मीद से भाजपा ने विधान सभा अध्यक्ष पद के लिए अपने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष हरबंस कपूर को मैदान मे उतार दिया था । हालांकि, कपूर को जबर्दस्त मात मिली और कांग्रेस के गोविंद सिंह कुंजवाल ने बहुमत हासिल कर जीत दर्ज करने में कामयाबी हासिल की ।   

विधानसभा में कांग्रेस के 32, भाजपा के 31, बसपा के तीन, उत्तराखंड क्रांति दल के एक तथा तीन निर्दलीय विधायक हैं । राज्यपाल ने एक विधायक को मनोनीत भी किया है । 
राज्य की सत्ता गंवाने वाली भाजपा ने जब मुख्यमंत्री पर विधान सभा में विश्वासमत हासिल करने का दबाव बढ़ाया तो बहुगुणा ने बिना किसी हिचकिचाहट के पिछले दिनों विधान सभा में एक वाक्य का प्रस्ताव पेश कर विपक्षियों को भी चौंका दिया तथा उस प्रस्ताव पर प्रत्यक्ष रूप से वोटिंग करा अपना बहुमत साबित कर दिया जिसके विरोध में भाजपा के सदस्यों ने सदन से वाकआउट कर दिया था । 
सदन में विपक्षी सदस्य गुप्त मतदान की मांग कर रहे थे । उन्हें यह उम्मीद थी कि यदि गुप्त मतदान हो जाएगा तो बहुगुणा के कथित विरोधी खेमे के विधायक मुख्यमंत्री को झटका दे सकते हैं लेकिन इस परीक्षा में भी बहुगुणा पूरे खरे उतरे तथा उनके पक्ष में 39 विधायकों ने हाथ उठाकर अपना समर्थन दिया तथा उनकी सरकार द्वारा पेश किये गये लेखानुदान को भी पारित कर दिया । 
बहुगुणा ने सबसे महत्वपूर्ण अग्निपरीक्षा उस समय पास की जब राज्यसभा के लिये हुये चुनाव में गुप्त मतदान के जरिये 39 विधायकों ने कांग्रेस उम्मीदवार महेन्द्र सिंह माहरा को अपना मत दिया जबकि भाजपा
उम्मीदवार अनिल गोयल को मात्र 31 मत ही मिले तथा उनकों आठ वोटों से पराजय का मुंह देखना पडा । 
भाजपा ने इस चुनाव में गुप्त मतदान के चलते क्रास वोटिंग के साथ बसपा और निर्दलीयों के वोट की भी उम्मीद की थी लेकिन उनकी आस धरी की धरी रह गयी । मुख्यमंत्री के तौर पर बहुगुणा ने विपक्ष 
की उम्मीदों को धराशायी कर अपना वर्चस्व स्थापित कर दिया ।