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Thursday, May 17, 2018

अब बंगाल में या अन्यत्र वर्चस्ववादी,पाखंडी वामपंथी अपना वजूद बनाने के लिए संघियों के साथ सरकार भी बना ले तो मुझे कम से कम ताज्जुब नहीं होगा।

अब बंगाल में या अन्यत्र वर्चस्ववादी,पाखंडी वामपंथी अपना वजूद बनाने के लिए संघियों के साथ सरकार भी बना ले तो मुझे कम से कम ताज्जुब नहीं होगा।
पलाश विश्वास
बंगाल में पंचायत चुनावों में वामपंथियों ने सीटों के तालमेल के बहाने ममता बनर्जी को हराने के नाम पर कांग्रेस के साथ साथ भाजपा के साथ भी गठबंधन कर लिया है और वैचारिक लीपापोती करके इस सच को छुपाने का काम भी वे कर रहे हैं।इससे नाराज हतास वामपंथी कार्यकर्ता सत्ता के साथ होने की लालच में भाजपा के सात ही नत्थी होंगे और संपूर्ण भगवाकरण की हालत में बंगाल में लाल रंग ही सिरे से गायब हो जायेगा।

इसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।वामपंथी सत्ता के लिए हमेशा समझौते करते रहे हैं। असम,मेघालय और त्रिपुरा के भगवेकरण का कोई प्रतिरोध वाम नेतृत्व ने नहीं किया और उन्हें जड़े जमाने का मोका भरपूर दिया।इसलिए नतीजे आने से पहले ही मैं कह रहा था कि त्रिपुरा में वामपंथी ही वामपंथ को हराने वाला है।हमारे मित्रों ने इस पर यकीन नहीं किया।

सच यही है कि भारत में समता और न्याय पर आधारित समाज का निर्माण रोकने के लिए ही अपने व्रग जाति हितों के मुताबिक वामपंथियों ने ही वामपंथ को हरा दिया है।

बंगाल से पहले उत्तरभारत में वामपंथ का बहुत असर रहा है और वाम नेतृ्त्व ने यूपी,बिहार,पंजाब जैसे राज्यों में अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं को हाशिये पर डालकर वामपंथ का सफाया कर दिया।

ईमानदारी से इस सच का सामना किये बिना आप हिंदुत्व सुनामी को रोक नहीं सकते।


पार्टी और जनसंगठनों में करोडो़ं कैडर होने के बावजूद,तीन राज्यों की सरकारे ंबचाने के लिए लिए लगातार कांग्रेस की जनविरोधी सरकार को समर्थन देना क्या भूल गये? 

जनहित और जनसरोकारों से खुल्लमखुल्ला दगा करने के भोगे हुए यथार्थ और केंद्र सरकार की जनसंहारी नीतियो के वास्तव अनुभवों से आम जनता दस साल के करीब करीब अंत के दौरान विचारधारा के पाखंड के तहत भारत अमेरिकी परमाणु समझौते के फर्जी विरोध के नाटक पर यकीन नहीं कर सकी।

नागरिकता कानून संशोधन हो या श्रम कानूनों का खात्मा या फिर आधार योजना,वामपंथियों ने आम जनता के हितों के मुताबिक कोई आंदोलन खड़ा नहीं किया।
  इसीलिए 1991 के बाद से लेकर अब तक आर्थिक सुधारों का कोई कारगर विरोध नहीं हो पाया।ट्रेड यूनियनों पर दशकों के एकाधिकार होने के बावजूद श्रम कानूनों केसाथ साथ कामगारों के हकहकूक ,रोजगार खत्म होने के किलाफ इसीलिे कोई विरोध नहीं हुआ।

मलयाली और बंगाली नेतृत्व के वर्चस्ववादी रवैये की वजह से बाकी देश में वामपंथ का पूरा सफाया हो गया है।इस वर्चस्व को बनाये रखने के लिए 1977 में संघियों के साथ गठजोड़ हुआ तो बंगाल में अजय मुखर्जी सरकार और ज्योति बसु की सरकार के दौरान नक्सल उन्मूलन के नाम पर मेहनतकश तबके के दमन,सफाये का आप क्या कहेंगे?

विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार का समर्थन तो भाजपा के साथ ही वामपंथी कर रहे थे।1977 में सत्ता में आये संघियों ने हर क्षेत्र में घुसपैठ कर ली तो वीपी शासनकाल के दौरान हिंदुत्व की लहर पैदा करके आखिरकार बाबरी विध्वंस की नींव पर भारत को हिंदू राष्ट्र बना ही लिया।दरअसल वाम नेतृत्व विचारधारा के पाखंड के तहत धर्मनिरपेक्षता की रट तो लगाता रहा लेकिन अपने वर्ग,जाति हित के तहत वे हिंदू राष्ट्र के कभी विरोधी नहीं थे।

यह भूलना नहीं चाहिए कि भारत में सांप्रदायिक ध्रूवीकरण की शुरुआत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बंगाल में ही हुआ और उन्ही सांप्रदायिक त्वों के वारिसान ने पूरे वामपंथ पर कब्जा करके मनुस्मृति के एजंडे को ही लागू करने में जन प्रतिरोध की हालत बनने न देकर सबसे ज्यादा मदद की है।

जमीनी,प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं और नेताओं को इन लोगों ने  दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर किया।

फिर बाजार की ताकतों के भरोसे नंदीग्राम सिंगुर प्रकरण का क्या?

बहुजन तबकों को स्थानीय नेतृ्त्व में भी प्रतिनिधित्व न देने वाले वामपंथी संघियों से भी ज्यादा ब्राह्मणवादी है और वर्गीयध्रूवीकरण के बजाय वर्ग जाति अस्मिता वर्चस्व के तहत मरण पर्यंत अपना नेतृत्व बनाये रखना ही इनका मकसद है।

आपको ताज्जुब हो रहा है लेकिन दशकों के अनुभव के तहत मुझे कोई अचरज नहीं हो रहा है।त्रिपुरा में भी हार तय थी।दिनेशपुर में प्रेरणा अंशु के 32 वें वार्षिकोत्सव पर देशभर के सामाजिक कार्यकर्ताओं से मैने यही कहा था।

वामपंथियों के अवसरवाद की वजह से ही उत्तर भारत में संघियों के खिलाफ कोई मोर्चा नहीं बन सका और इसी वजह से बंगाल के बाद केरल औरत्रिपुरा में भगवा झंडा लहरा रहा है।असम और पूर्वोत्तर के भगवेकरण से पहले वामपंथियों का भगवाकरण हो गया  है।

बहुजनों के सफाये में वामपंथी भी पीछे नहीं हैं।मरीचझांपी से लेकर नंदीग्राम सिंगुर तक इसके गवाह हैं।नक्सलियों के सफाये में भी ज्यादातर आदिवासी ,दलित और पिछड़े मारे गये।

बदले हुए हालात में सत्तालोलुप वाम नेतृत्व अगर भाजपा के साथ बंगाल में भी सरकार बनायें तो मुझे ताज्जुब नहीं होगा।लेकिन आशंका हैकि यह मौका भी उनके हाथ ऩहीं लगेगा।अगर ममता बनर्जी नहीं सुधरीं तो जिस तेजी से बंगाल का उग्र हिंदुत्वकरण हो रहा है,भाजपा देर सवेर अकेले ही सत्ता दखल कर लेगी।

जिस सच को वामपंथी नजर्ंदाज कर रहे हैं,वह यह है कि  वामपंथी भाजपा से कितना ही मधुर रिश्ता बना लें लेकिन वामपंथी नेतृत्व न  सही वामपंथी विचारधारा और आंदोलन से संघियों को सबसे ज्यादा नफरत है,जिनकी वजह से उनका हिंदुत्व एजंडा छात्रों,युवाओं,किसानों,कामगारों के प्रतिरोध के कारण लागू करना अब भी असंभव है।

प्रेरणा अंशु किसान,गांव,प्रकृति और पर्यावरण पर विमर्श की पत्रिका है ताकि किसानों,कामगारों और बहुसंख्य वंचितो के हित में विकास के जनमुखी माडल के साथ समता और न्याय के आधार पर समाज का निर्माण हो।


 प्रेरणा अंशु के संस्थापक संपादक और मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता दिवंगत मास्टर प्रताप सिहं के सपनों और आदर्सों के मुताबिक प्रेरणा अंशु  किसान,गांव,प्रकृति और पर्यावरण पर विमर्श की पत्रिका  है ताकि किसानों,कामगारों और बहुसंख्य वंचितो के हित में विकास के जनमुखी माडल के साथ समता और न्याय के आधार पर समाज का निर्माण हो।
प्रेरणा अंशु उत्तराखंड की तराई से 32 साल से निकलने वाली सामाजिक व सांस्कृतिक आंदोलन की वाहक है।
छात्रों,युवाओं और नवोदितों को इसमें वरीयता दी जाती है लेकिन सामाजिक सरोकार और तेवर के साथ प्रतिष्ठितों का भी स्वागत है।
आलेख दो सौ शब्दों के,कहानी ज्यादा से ज्यादा तीन पेजों की,लघुकथा,व्यंग्य,रपट,आलोचना,कविता,गजल,गीत समेत सभी विधाओं और ज्ञान विज्ञान के सभी विषयों पर मौलिक रचनाओं का स्वागत है।ज्यादा से ज्यादा लोगों को स्पेस देने के लोकतंत्र का ख्याल रखते हुए छोटी,सारगर्भित रचनाएं ही भेजें।
रचनाएं मेल से भेज सकते हैंः
Email:perrnaanshu @gmail.com
संसाधनों की सीमाबद्धता के बावजूद सामाजिक नेटवर्किंग के माध्यम से मास्साब यह पत्रिका 32 वर्षों से चला रहे थे।हम इसी परंपरा का निर्अवाह कर रहे हैं। अब हमें आपका सहयोग चाहिए।
पत्रिका के सदस्य,प्रतिनिधि बनकर आप हमारे इस सांस्कृतिक सामाजिक आंदोलन के नेटवर्क में शामिल हो सकते हैं।
ब्यौरे के लिए मेल करें या पत्र लिखें।
पताः संपादक,प्रेरणा अंशु,
समाजोत्थान संस्थान,
वार्ड नंबर3,
दिनेशपुर,
ऊधमसिंहनगर (उत्तराखंड)
पिन-263160
 कार्यकारी संपादक
पलाश विश्वास


Tuesday, May 8, 2018

महाश्वेता देवी के धनबाद के दो घनिष्ठ लोगः कामरेड एके राय और मैं

महाश्वेता देवी के धनबाद के दो घनिष्ठ लोगः कामरेड एके राय और मैं

पलाश विश्वास

सत्ताइस साल कोलकाता और बंगाल में बिताने के बाद मैं उत्तराखंड की तराई के दिनेशपुर रूद्रपुर इलाके में अपने गांव वापस जा रहा हूं।ऐसे में हमेशा के लिए बंगाल छोड़ जाने का दुःख के साथ आखिरकार अपने गांव अपने लोगों के बीच जा पाने की खुशी दोनों एकाकार है।अब मैं यहां का डेरा समेटने में लगा हूं तो ऐसे में धनबाद से कामरेड एके राय के गंभीर रुप से बीमार पड़ने की खबर मिली है।


दैनिक हिंदुस्तान के संपादकीय पेज पर मेरे चर्चित उपन्यास अमेरिका से सावधान पर लिखते हुए अपने लेख में महाश्वेता दी ने धनबाद में कामरेड एके राय और मेरे साथ घनिष्ठ संपर्क होने की बात लिखी थी।महाश्वेता दी कई बरस हुए,नहीं हैं।अभी अभी कामरेड अशोक मित्र का भी अवसान हो गया।नवारुणदा महाश्वेता देवी से पहले कैंसर से हार कर चल दिये।कोलकाता का बंधन इस तरह लगातार टूटता जा रहा था। 1984 में मैंने धनबाद छोड़ और तबसे लेकर अबतक धनबाद से कोई रिश्ता बचा हुआ था तो वह कामरेड एके राय के कारण ही।


यूं तो 1970 में ही आठवीं पास करने से पहले तराई से जगन्नाथ मिश्र के बाद शायद पहले पत्रकार गोपाल विश्वास संपादित अखबार तराई टाइम्स में मैं छपने लगा था।हालांकि चूंकि मेरे पिता सामाजिक कार्यकर्ता और किसानों और शरणार्थियों के नेता पुलिनबाबू की मदद के लिए देश भर के शरणार्थियों और किसानों की समस्याओं पर कक्षा दो से ही मुझे नियमित लिखना पढ़ता था क्योंकि पिताजी हिंदी में बेहतर लिख नहीं पाते थे।1973 में जीआईसी नैनीताल पहुंचने के बाद गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी की प्रेरणा से मेरा हिंदी पत्र पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं में नियमित लेखन शुरु हो गया। लेकिन जनसरोकार और वैज्ञानिक सोच के साथ लेखन का सिलसिला नैनीताल समाचार से शुरु हुआ।


राजीव लोचन शाह,गिरदा और शेखर पाठक,नैनीताल समाचार,पहाड़ और उत्तराखंड संघर्षवाहिनी के तमाम साथी मेरे  थोक भाव से लगातार अब तक लिखते रहने की बुरी आदत के लिए जिम्मेदार हैं।इनमें भी गिरदा,विपिन त्रिपाठी,निर्मल जोशी,भगतदाज्यू जैसे आधे से ज्यादा लोग अब नहीं है। एक तो बांग्लाभाषी,फिर अंग्रेजी माध्यम और अंग्रेजी साहित्य के विद्यार्थी के इस तरह आजीवन हिंदी साहित्य न सही,हिंदी पत्रकारिता में खप जाने के पीछे इन सभी लोगों का अवदान है।


एमए पास करने के बाद कालेजों में नौकरी करने का विकल्प मेरे पास खुला था लेकिन मैं डीएसबी नैनीताल में पढ़ाना चाहता था और इसके लिए पीएचडी जरुरी थी।इसी जिद की वजह से मैं नैनीताल छोड़ने को मजबूर हुआ और इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंच गया।इलाहाबाद में शैलेश मटियानी और शेखर जोशी के मार्फत पूरी साहित्यिक बिरादरी से आत्मीयता हो गयी,लेकिन वीरेनदा और मंगलेश दा के सुझाव मानकर मैं उर्मिलेश के साथ जेएनयू पहुंच गया।वहीं मैंने महाश्वेता दी का उपन्यास जंगल के दावेदार हिंदी में पढ़ा।


इसी दरम्यान उर्मिलेश कामरेेड एके राय से मिलने धनबाद चले गये,जहां दैनिक आवाज में मदन कश्यप थे।मैं बसंतीपुर गया तो एक आयोजन में झगड़े की वजह से सार्वजनिक तौर पर पिताजी ने मेरा तिरस्कार किया।अगले ही दिन उर्मिलेश का पत्र आया कि धनबाद में आवाज में मेरी जरुरत है। वे दरअसल उर्मिलेश को चाहते थे लेकिन तब उर्मिलेश जेएनयू में शोध कर रहे थे और पत्रकारिता करना नहीं चाहते थे।उन्होंने मुझे पत्रकारिता में झोंक दिया,हांलाकि बाद में वे भी आखिरकार पत्रकार बन गये। शायद दिलोदिमाग में बीरसा मुंडा के विद्रोह और कामरेड एके राय के आंदोलन का गहरा असर रहा होगा कि पिताजी के खिलाफ गुस्से के बहाने शोध,  विश्वविद्यालय, वगैरह अकादमिक मेरी महत्वाकांक्षाएं एक झटके के साथ खत्म हो गयी और मैं धनबाद पहुंच गया।


अप्रैल,1980 में दैनिक आवाज में काम के साथ आदिवासियों और मजदूरों के आंदोलनों के साथ मेरा नाम जुड़ गया और बहुत जल्दी एकेराय,शिबू सोरेन और विनोद बिहारी महतो से घनिष्ठता हो गयी। वहीं मनमोहन पाठक, मदन कश्यप,बीबी शर्मा,वीरभारत तलवार और कुल्टी में संजीव थे,तो एक टीम बन गयी और हम झारखंड आंदोलन के साथ हो गये,जिसके नेता कामरेड एके राय थे जो धनबाद के सांसद भी थे।


एके राय झारखंड को लालखंड बनाना चाहते थे और उनकी सबसे बड़ी ताकत कोलियरी कामगार यूनियन थी।वे अविवाहित थे और सांसद होने के बावजूद एक होल टाइमर की तरह पुराना बाजार में यूनियन के दफ्तर में रहते थे।अब भी शायद वहीं हों।


कोलियरी कामगार  यूनियन ने धनबाद में प्रेमचंद जयंती पर महाश्वेता देवी को मुख्य अतिथि बनाकर बुलाया।वक्ताओं में मैं भी था।महाश्वेता दी के साथ कामरेड एके राय और मेरी घनिष्ठता की वह शुरुआत थी।


यहीं से मेरे लेखन में किसानों और शरणार्थियों के साथ साथ आदिवासी और मजदूरों की समस्याएं प्रमुखता से छा गयीं तो नैनीताल समाचार और पहाड़ की वजह से पिछले करीब चालीस साल तक पहाड़ से बाहर होने के बावजूद  हिमालय और उत्तराखंड से मैं कभी दूर नहीं रह सका।

महाश्वेता दी मुझे कुमायूंनी बंगाली लिखा कहा करती थी।


कामरेड एके राय एकदम अलग किस्म के मार्क्सवादी थे।जो हमेशा जमीन से जुड़े थे और विचारधारा से उनका कभी विचलन नहीं हुआ।बल्कि शिबू सोरेन और सूरजमंडल की जोड़ी ने कामरेड एके राय को झारखंड आंदोलन से उन्हें दीकू बताते हुए अलग थलग कर दिया तो झारखंड आंदोलन का ही विचलन और विघटन हो गया।कामरेड राय लगातार अंग्रेजी दैनिकों में लिखते रहे हैं और उनका लेखन भी अद्भुत है।


भारतीय वामपंथी नेतृत्व ने कामरेड एकेराय और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के नेता,आर्थिक सुधारों के पहले शहीद शंकर गुहा नियोगी का नोटिस नहीं लिया,जो सीधे जमीन से जुड़े हुए थे और भारतीय सामाजिक यथार्थ के समझदार थे।


वामपंथ से महाश्वेता दी के अलगाव की कथा भी हैरतअंगेज है।यह कथा फिर कभी।


अशोक मित्र, ऋत्विक घटक,सोमनाथ होड़,देवव्रत विश्वास जैससे भारतीय यथार्थ के प्रति प्रतिबद्ध लोगों को भी वामपंथ का वर्चस्ववादी कुलीन नेतृत्व बर्दाश्त नहीं कर सका।आज भारतीय राजनीति में हाशिये पर चले गये वामपंथियों को इस सच का सामना करना ही चाहिए।



Wednesday, May 2, 2018

बाजार के चमकते दमकते चेहरों के मुकाबले किसी अशोक मित्र का क्या भाव? पलाश विश्वास

बाजार के चमकते दमकते चेहरों के मुकाबले किसी अशोक मित्र का क्या भाव?

पलाश विश्वास

मई दिवस को जनता के अर्थशास्त्री डा.अशोक मित्र का 9.15 पर निधन हुआ। प्राध्यापक इमानुल हक की फेसबुक पोस्ट से दस बजे के करीब खबर मिली।


पुष्टि के लिए टीवी चैनलों को ब्राउज किया तो 10.30 बजे तक कहीं कोई सूचना तक नहीं मिली।गुगल बाबा से लेकर अति वाचाल सोशल मीडिया के पेज खंगाले तो कुछ पता नहीं चला।फिर हारकर एबीपी आनंद पर पंचायत चुनाव को लेकर  पैनली चीख पुकार के मध्य स्क्रालिंग पर निधन की एक पंक्ति की सूचना मिली तो लिखने बैठा।


आज कोलकाता में कोई अखबार प्रकाशित नहीं हुआ और टीवी पर कहीं भी अशोक मित्र की कोई चर्चा नहीं है।रविवार से लेकर बुधवार तक दीदी की कृपा से दफ्तरों में अवकाश है तो कोलकाता में भी छुट्टी का माहौल है।कहीं पर अशोक मित्र पर कोई चर्चा नहीं है।


सुबह समयांतर के संपादक आदरणीय पंकज बिष्ट का फोन आया तो पता चला कि दिल्ली में आज अखबारों में खबर तो आयी है लेकिन टीवी चैनलों पर अशोक मित्र नहीं है।देश को मालूम ही नहीं पड़ा कि किसी अशोक मित्र का निधन हो गया है।


इसके विपरीत,आज के बांग्लादेश के अखबारों और टीवी चैनलों को देखा तो वहीं सर्वत्र इस उपमहाद्वीप के महान अर्थशास्त्री और साहित्यकार अशोक मित्र की चर्चा हर कहीं देखकर हैरत हुई कि उनके मुकाबले हमारी सांस्कृतिक हैसियत कहां है,यह सोचकर।


अभी हाल में एक बालीवूड अभिनेत्री के शराब पीकर विदेश में बथटब में दम घुटने से हुई मौत पर हफ्तेभर का राष्ट्रीय शोक का नजारा याद आता है तो अहसास होता है कि जो बिकाऊ है,वही मुक्त बाजार का सांस्कृतिक सामाजिक और राष्ट्रीय आइकन है।


वैसे भी हिंदी समाज को अपनी संस्थाओं,विरासत और इतिहास की कोई परवाह नहीं होती।बाकी भारतीय भाषाओं में भी पढ़ने लिखने का मतलब या तो साहित्य है या फिर धर्म या अपराध या सत्ता की राजनीति,राजनीति विज्ञान नहीं।


इतिहास के नाम पर हम मिथकों की च्रर्चा करते हैं।इतिहास लेखन हमारी विरासत नहीं है।इतिहास की चर्चा करने पर हम सीधे वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण ,महाभारत, मनुस्मृति, इत्यादि की बात करते हैं,जिसे साहित्य तो कहा जा सकता है,इतिहास कतई नहीं।


एशिया के मुकाबले यूरोप में मध्ययुग में गहन अंधकार कहीं ज्यादा था।अमेरिका का इतिहास ही कुश सौ साल का है।लेकिन यूरोप और अमेरिका में नवजागरण के बाद ज्ञान विज्ञान के सभी विषयों और विधाओं की अकादमिक चर्चा होती रही है।वस्तुगत विधि से समय का इतिहास सिलसिलेवार दर्ज किया जाता रहा है तो हम मध्ययुग से पीछे हटते चले जा रहे हैं और आदिम बर्बर प्राचीन असभ्यता के काल में,जहां हमारी संस्कृति में हिंसा और घृणा के सिवाय कुछ बचता ही नहीं है।


हम मिथकों और धर्मग्रंथ को इतिहास मानते हुए अत्याधुनिक तकनीक से ज्ञान विज्ञान की लगातार हत्या कर रहे हैं।यही हमारा राष्ट्रवादी उन्माद है,जिसका इलाज नहीं है।


एक छोटे से द्वीप इंग्लैंड की भाषा अंग्रेजी सिर्फ नस्ली और साम्राज्यवादी वर्चस्व से पूरी दुनिया पर राज कर रही है,इस धारणा के चलते हम अंग्रेजी से घृणा करते हैं।लेकिन अंग्रेजी भाषा और साहित्य में विश्वभर की तमाम संस्कृतियों,साहित्य और ज्ञान विज्ञान पर जो सिलसिलेवार विमर्श जारी है,उसके मुकाबले हमने भारतीय भाषाओं में साहित्य और धर्म के अलावा ज्ञान विज्ञान पर आम जनता को संबोधित किसी संवाद का उपक्रम शुरु ही नहीं किया है।ज्ञान हमारी शिक्षा का उद्देश्य नहीं रही है और न रोजगार का मकसद शिक्षा का है।यह हमारी क्रयशक्ति का अश्लील प्रदर्शन है।


आज जो लूट का तंत्र देश को खुले बाजार बेच रहा है,उसकी वजह यही है कि शिक्षा के अभूतपूर्व विकास के बावजूद ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में पाठ्यक्रम की परिधि से बाहर हम अब भी अपढ़ हैं और हम चौबीसों घंटे राजनीति पर चर्चा करते रहने के बावजूद राजनीति नहीं समझते।


हमारी कोई वैज्ञानिक दृष्टि नहीं है और न हमारा कोई इतिहास बोध है।


हमने देश को मुक्तबाजार बना दिया है  और धार्मिक कर्मकांड को ही सांस्कृतिक विरासत मानते हुए सांस्कृतिक बहुलता और विविधता के साथ साथ इतिहास और भूगोल की हत्या कर दी।


बाजार का व्याकरण ही हमारे लिए अर्थशास्त्र है और उत्पादन प्रणाली और श्रम से,उत्पादकों से हमारा कोई रिश्ता नहीं है।


गांव,खेत और किसानों के साथ साथ देशी उद्योग,धंधों के कत्लेआम के दृश्य देखने के लिए हमारी कोई आंख नहीं बची है।


छात्रों,युवाजनों,बच्चों,महिलाओं और वयस्कों की असहाय असुरक्षित स्थिति से हमें कोई फर्क तब तक नहीं पड़ता जबकि हम अपने गांव या नगर महानगर में बाजार में उपलब्ध भोग सामग्री के उपभोग से वंचित न हो जायें।


ऐसे परिदृश्य में में न परिवार बचा है और न समाज।

अब हम कह नहीं सकते कि मनुष्य सामाजिक प्राणी हैं।

हम पूरी तरह असामाजिक हो गये हैं।

हमारा कोई सामुदायिक जीवन नहीं है।

इसीलिए इतिहास,सांस्कृतिक विरासत, विविधता, बहुलता, लोकतंत्र, संप्रभुता,स्वतंत्रता,समानता,न्याय,प्रेम जैसी अवधारणाएं हमारे लिए बेमायने हैं।


टीवी पर जो नजर आये,जो जैसे भी हो करोड़पति अरबपति हो जाये, वे ही हमारे आदर्श है।हमारा न कोई पूर्वज है, न हमारा कोई मनीषी है, न हमारी कोई संस्कृति है, न हमारा कोई इतिहास है।


न हमारा कोई अतीत है और न वर्तमान, और न भविष्य।

न हमारा कोई राष्ट्र है और न कोई राष्ट्रीयता।

सिर्फ अंध राष्ट्रवाद है।

हमारे दिलोदिमाग में बाजार है बाकी हम डिजिटल इंडिया है,जिसका न कोई संविधान है और न कोई कानून।


बाजार के चमकते दमकते चेहरों के मुकाबले किसी अशोक मित्र का क्या भाव?



Friday, November 24, 2017

मंदिर मस्जिद विवाद से देश में कारपोरेट राज बहाल तो जाति युद्ध से जनसंख्या सफाये का मास्टर प्लान! पद्मावती विवाद का तो न कोई संदर्भ है और न प्रसंग। यह मुकम्मल मनुस्मृति राज का कारपोरेट महाभारत है।

मंदिर मस्जिद विवाद से देश में कारपोरेट राज बहाल तो जाति युद्ध से जनसंख्या सफाये का मास्टर प्लान!

पद्मावती विवाद का तो न कोई संदर्भ है और न प्रसंग।

यह मुकम्मल मनुस्मृति राज का कारपोरेट महाभारत है।

राजनीति,कारपोरेट वर्चस्व और मीडिया का त्रिशुल परमाणु बम से भी खतरनाक।

सामाजिक तानाबाने को मजबूत किये बिना हम इस कारपोरेट राज का मुकाबला नहीं कर सकते।

पलाश विश्वास

मंदिर मस्जिद विवाद से देश में कारपोरेट राज बहाल तो जाति युद्ध से जनसंख्या सफाये का मास्टर प्लान है।


पद्मावती विवाद का तो न कोई संदर्भ है और न प्रसंग।


मंदिर मस्जिद विवाद के धारमिक ध्रूवीकरण से इस देश की अर्थव्यवस्था सिरे से बेदखल हो गयी और मुकम्मल कारपोरेट राज कायम हो गया।


तो यह समझने की बात है कि पद्मावती विवाद से नये सिरे से जातियुद्ध छेड़ने के कारपोरेट हित क्या हो सकते हैं।


यह देश व्यापी महाभारत भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को  सिरे से खत्म करने वाला है।


यह मुकम्मल मनुस्मृति राज का कारपोरेट महाभारत है।


यह जनसंख्या सफाये का मास्टर प्लान है।


पद्मावती विवाद को लेकर जिस तरह जाति धर्म के नाम भारतीय जनमानस का ध्रूवीकरण हुआ है,वह भारत विभाजन की त्रासदी की निरंतरता है।


जाति केंद्रित वैमनस्य और घृणा धर्मोन्माद से कहीं ज्यादा भयानक है,जो भारतीय समाज में मनुस्मृति विधान के संविधान और कानून के राज पर वर्चस्व का प्रमाण है।


अफसोस यह है कि इस आत्मघाती जातियुद्ध का बौद्धिक नेतृत्व पढ़े लिखे प्रबुद्ध लोग कर रहे हैं तो दूसरी ओर बाबा साहेब भीमाराव अंबेडकर के स्वयंभू अनुयायी भी इस भयंकर जातियुद्ध की पैदल सेना के सिपाहसालर बनते दीख रहे हैं।


मिथकों को समाज,राष्ट्र और सामाजिक यथार्थ,अर्थव्यवस्था और भारतीय नागरिकों की रोजमर्रे की जिंदगी और उससे जुड़े तमाम मसलों को सिरे से नजरअंदाज करके कारपोरेट राज की निरंकुश सत्ता मजबूत करने में सत्ता विमर्श का यह सारा खेल सिरे से जनविरोधी है।


राजनीति,कारपोरेट वर्चस्व और मीडिया का त्रिशुल परमाणु बम से भी खतरनाक है तो इसे मिसाइलों की तरह जनमानस में निरंतर दागने में कोई कोर कसर समझदार, प्रतिबद्ध,वैचारिक लोग नहीं छोड़ रहे हैं और वे भूल रहे हैं कि धर्मोन्माद से भी बड़ी समस्या भारत की जाति व्यवस्था और उसमें निहित अन्याय और असमता की समस्या है तो अंबेकरी आंदोलन के लोगों को भी इस बात की कोई परवाह नहीं है।


करनी सेना और ब्राह्मणसमाज के फतवे के पक्ष विपक्ष में जो महाभारत का पर्यावरण देश के मौसम और जलवायु को लहूलुहान कर रहा है,उससे क्रोनि कैपिटलिज्म का कंपनी राज और निरंकुश होता जा रहा है।


ऐसे विवाद दुनियाभर में किसी न किसी छद्म मुद्दे को लेकर खड़ा करना कारपोरेट वर्चस्व के लिए अनिवार्य शर्त है।


मोनिका लिवनेस्की,सलमान रश्दी,पामेला बोर्डेस जैसे प्रकरण और उनकी आड़ में विश्वव्यापी विध्वंस का हालिया इतिहास को हम भूल रहे हैं।


तेल युद्ध और शीत युद्ध की पृष्ठभूमि में इन्ही विवादों की आड़ में दुनिया का भूगोल सिरे से बदल दिया गया है और इऩ्ही विवादों की वजह से आज दुनिया की आधी आबादी शरणार्थी है और दुनियाभर में सरहदो के आर पार युद्ध और गृहयुद्ध जारी है।


ईव्हीएम के करिश्मे पर नानाविध खबरें आ रही हैं।चुनाव नतीजे पर इसका असर भी जाहिर है, होता होगा।लेकिन मेरे लिए यह कोई निर्णायक मुद्दा नहीं है।क्योंकि भारत में चुनावी समीकरण और सत्ता परिवर्तन से कारपोरेट राज बदलने की कोई सूरत नहीं है।सत्तापक्ष विपक्ष में कोई बुनियादी फर्क नहीं है।कारपोरेट फंडिग से चलनेवाली राजनीति का कोई जन सरोकार नहीं है और वह कारपोरेट हित में काम करेगी। राजनीति और कारपोरेट के इसी गठबंधन को हम क्रोनी कैपिटैलिज्म कहते हैं।


गुजरात में अव्वल तो सत्ता परिवर्तन के कोई आसार जाति समीकरण के बदल जाने से नहीं है और न ऐसे किसी परिवर्तन का भारतीय कारपोरेट राज में कोई असर होना है।


सीधे तौर पर साफ साफ कहे तो राष्ट्रीय और प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट की  छूट दस साल के मनमोहनी राजकाज में मिली हुई थी,कांग्रेस के सत्ता से बेदखल होने के बाद उनकी सेहत पर कोई असर नहीं हुआ है।बल्कि कंपनियों का पाल बदलने से ही कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गयी।अब जबतक उन्ही कंपनियों का समर्थन मोदी महाराज को जारी है,कोई सत्ता समीकरण उन्हें बेदखल नहीं कर सकता।


मान भी लें कि वे बेदखल हो गये तो फिर मनमोहनी राजकाज की पुनरावृत्ति से कारपोरेट राज का अंत होगा,ऐसी कोई संभावना नहीं है।कांग्रेस और भाजपा के अलावा राज्यों में जो दल सत्ता पर काबिज हैं या विपक्ष में हैं,उनमें को कोई मुक्तबाजार के कारपोरेट राज के खिलाफ नहीं है और न कोई जनता का पक्षधर है।


1991 से भारत की आर्थिक नीतियों की निरंतराता में कोई व्यवधान नहीं आाया है।डिजिटल इंडिया की मौलिक योजना कांग्रेस की रही है जैसे आधार परियोजना,कर सुधार और जीएसटी कांग्रेस की परियोजनाएं है जिन्हें भाजपा की सरकार ने अमल में लाने का काम किया है।अब भी राज्यसभा में भाजपा को बहुमत नहीं है।अब भी केंद्र में गठबंधन सरकार है।


1989 से हमेशा केंद्र में अल्पमत या गठबंधन की सरकारे रही हैं।इसी दरम्यान तमाम आर्थिक सुधार हो गये।कुछ भी सार्वजनिक नहीं बचा है।


किसानों का सत्यानाश तो पहले हो ही चुका है अब कारोबारियों का भी सफाया होने लगा है और रोजगार, नौकरियां,आजीविका सिरे से खत्म करने की सारी संसदीय प्रक्रिया निर्विरोध सर्वदलीय सहमति से संपन्न होती रही है।


इस निरंकुश कारपोरेट राज ने भारत का सामाजिक तानाबाना और उत्पादन प्रणाली को तहस नहस कर दिया है।नतीजतन भोजन, पानी,रोजगार, शिक्षा,चिकित्सा और बुनियादी जरुरतों और सेवाओं से आम जनता सिरे से बेदखल हैं।किसान जमीन से बेदखल हो रहे हैं तो व्यवसायी कारोबार से।बच्चे अपने भविष्य से बेदखल हो रहे हैं तो युवा पीढ़ियां रोजगार और आजीविका से।


सामाजिक तानाबाने को मजबूत किये बिना हम इस कारपोरेट राज का मुकाबला नहीं कर सकते।इसलिए हम किसी भी राजनीतिक पक्ष विपक्ष में नहीं हैं।


हम हालात बदलने के लिए नये सिरे से संत फकीर, नवजागरण,मतुआ,लिंगायत  जैसे सामाजिक आंदोलन की जरुरत महसूस करते हैं, इन आंदोलनों के जैसे शिक्षा और चेतना आंदोलन की जरुरत महसूस करते हैं और महावनगर राजधानी से सांस्कृति आंदोलन को जनपदों की जड़ों में वापस ले जाने की जरुरत महसूस करते हैं। बाकी बचे खुचे जीवन में इसी काम में लगना है।



बहरहाल हमारे लिए सीधे जनता के मुखातिब होने का कोई माध्यम बचा नहीं है।प्रबुद्धजनों का पढ़ा लिखा तबका चूंकि सत्ता वर्ग के नाभिनाल से जुड़कर अपनी हैसियत और राजनीति के मुताबिक अपने ही हित में जनहित और राष्ट्रहित की व्याख्या करता है,तो उनपर भी हमारे कहे लिखे का असर होना नहीं हैे।

बहरहाल प्रिंट से बाहर हो जाने के बाद नब्वे के दशक से ब्लागिंग और सोशल मीडिया के मार्फत बोलते लिखते रहने का मेरा विकल्प भी अब सिरे से खत्म होने को है।


फिलहाल दो तीन महीने के लिए उत्तराखंड की तराई के सिडकुल साम्राज्य में मरुद्यान की तरह अभी तक साबुत अपने गांव में डेरा रहेगा।इसलिए कंप्यूटर,नेट के बिना मेरा लिखना बोलना स्थगित ही रहना है क्योंकि मैं स्मार्ट फोन का अभ्यस्त नहीं हूं।


पत्र व्यवाहर के लिए अब मेरा पता इस प्रकार रहेगाः

पलाश विश्वास

द्वारा पद्मलोचन विश्वास

गांव बसंतीपुर

पोस्टःदिनेशपुर

जिलाः उधमसिंह नगर,उत्तराखंड

पिनकोडः263160


Tuesday, November 21, 2017

सबकुछ निजी हैं तो धर्म और धर्मस्थल क्यों सार्वजनिक हैं?वहां राष्ट्र और राजनीति की भूमिका क्यों होनी चाहिए? किताबों,फिल्मों पर रोक लगाने के बजाये प्रतिबंधित हो सार्वजनिक धर्मस्थलों का निर्माण!जनहित में जब्त हो धर्मस्थलों का कालाधन! पलाश विश्वास

सबकुछ निजी हैं तो धर्म और धर्मस्थल क्यों सार्वजनिक हैं?वहां राष्ट्र और राजनीति की भूमिका क्यों होनी चाहिए?

किताबों,फिल्मों पर रोक लगाने के बजाये प्रतिबंधित हो सार्वजनिक धर्मस्थलों का निर्माण!जनहित में जब्त हो धर्मस्थलों का कालाधन!

पलाश विश्वास

https://www.youtube.com/watch?v=hdtbE2WerLI

निजीकरण का दौर है।आम जनता की बुनियादी जरुरतों और सेवाओं का सिरे से निजीकरण हो गया है।

राष्ट्र और सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है।तो धर्म अब भी सार्वजनिक क्यों है?


गांव गांव धर्मस्थल के निर्माण के लिए विधायक सांसद कोटे से अनुदान देने की यह परंपरा सामंती पुनरूत्थान है।


सत्ता हित के लिए धर्म का बेशर्म इस्तेमाल और बुनियादी जरुरतों और सेवाओं से नागरिकों को उनकी आस्था और धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ करते हुए वंचित करने की सत्ता संस्कृति पर तुरंत रोक लगनी चाहिए।


अर्थव्यवस्था जब निजी है तो धर्म का भी निजीकरण कर दिया जाये।निजी धर्मस्थल के अलावा सारे सार्वजनिक धर्मस्थल निषिद्ध कर दिये जायें और सार्वजनिक धर्मस्थलों की अकूत संपदा नागरिकों की बुनियादी जरुरतों के लिए खर्च किया जाये या कालाधन बतौर जब्त कर लिया जाये।


नोटबंदी और जीएसटी से अर्थव्यवस्था जो पटरी पर नहीं आयी,धर्म कारोबारियों के कालाधन जब्त करने से वह सरपट दौड़ेगी।

निजी दायरे से बाहर धर्म कर्म और सार्वजनिक धर्म स्थलों के निर्माण पर उसी तरह प्रतिबंध लगे जैसे हर सार्वजनिक चीज पर रोक लगी है।

यकीन मानिये सारे वाद विवाद खत्म हो जायेंगे।


व्यक्ति और उसकी आस्था,उसके धर्म के बीच राष्ट्र,राजनीति और सरकार का हस्तक्षेप बंद हो जाये तो दंगे फसाद की कोई गुंजाइस नहीं रहती।वैदिकी सभ्यता में भी तपस्या,साधना व्यक्ति की ही उपक्रम था,सामूहिक और सार्वजनिक धर्म कर्म का प्रदर्शन नहीं।


मन चंगा तो कठौती में गंगा,संत रैदास कह गये हैं।

भारत का भक्ति आंदोलन राजसत्ता संरक्षित धर्मस्थलों के माध्यम से आम जनता के नागरिक अधिकारों के हनन के विरुद्ध दक्षिण भारत से शुरु हुआ था,जो कर्नाटक के लिंगायत आंदोलन होकर उत्तर भारत के संत फकीर आंदोलन बजरिये पूरे भारत में राजसत्ता के खिलाफ नागरिकों के हक हकूक और आस्था और धर्म की नागरिक स्वतंत्रता का आंदोलन रही है।


समूचे संत साहित्य का निष्कर्ष यही है।

मूर्ति पूजा और धर्मस्थलों के पुरोहित तंत्र के खिलाफ सीधे आत्मा और परमात्मा के मिलन का दर्शन।

यही मनुष्यता का धर्म है।भारतीय आध्यात्म है और अनेकता में एकता की साझा विरासत भी यही है।


ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय जनता के एकताबद्ध स्वतंत्रता के महासंंग्राम के खिलाफ अंग्रेजों की धर्म राष्ट्रीयता की राजनीति से भारत का विभाजन हुआ तो आज भी हम उसी अंग्रेजी विरासत को ढोते हुए इस महादेश का कितना और विभाजन करेंगे?


सत्तर साल पहले मेरे परिवार ने पूर्वी बंगाल छोड़ा था भारत विभाजन की वजह से।सत्तर साल बाद पश्चिम बंगाल में सत्ताइस साल रह लेने के बावजूद मुझे फिर विस्थापित होकर उत्तराखंड के शरणार्थी उपनिवेश में अपने विस्थापित परिवार की तरह शरण लेना पड़ रहा है।


तब विस्थापन का कारण धर्म आधारित राष्ट्रीयता थी और अब मेरे विस्थापन का कारण आर्थिक होकर भी फिर वही धर्म आधारित मुक्तबाजारी राष्ट्रीयता है,जिसके कारण अचानक मेरे पांव तले जमीन उसीतरह खिसक गयी है,जैसे सत्तर साल पहले इस महादेश के करोड़ों लोगों की अपनी जमीन से बेदखली हो गयी थी।


जिस तरह आज भी इस पृथ्वी की आधी आबादी सरहदों के भीतर,आरपार शरणार्थी हैं।


गंगोत्री से गंगासागर तक,कश्मीर से कन्याकुमारी तक,मणिपुर नगालैंड से कच्छ तक मुझे कहीं ईश्वर के दर्शन नहीं हुए।

मैंने हमेशा इस महादेश के हर नागरिक में ईश्वर का दर्शन किया है। इसलिए शहीदे आजम भगतसिंह की तरह नास्तिक हूं,कहने की मुझे जरुरत महसूस नहीं हुई।


मेरे गांव के लोग,मेरे तमाम अपने लोग जिस तरह सामाजिक हैं,उसीतरह धार्मिक हैं वे सारे के सारे।

इस महादेश के चप्पे चप्पे में तमाम नस्लों के लोग उसी तरह धार्मिक और सामाजिक हैं,जैसे मेरे गांव के लोग,मेरे अपने लोग।

हजारों साल से भारत के लोग सभ्य और सामाजिक रहे हैं तो धार्मिक भी रहे हैं वे।


सत्ता वर्ग के धार्मिक पाखंड और आडंबर के विपरीत निजी जीवन में धर्म के मुताबिक निष्ठापूर्वक अपने जीवन यापन और सामाजिकता में नैतिक आचरण और कर्तव्य का निर्वाह ही आम लोगों का धर्म रहा है।


मैंने पूजा पाठ का आडंबर कभी नहीं किया।लेकिन मेरे गांव के लोग,मेरे अपने लोग अपनी आस्था के मुताबिक अपना धर्म निभाते हैं,तो आस्था और धर्म की उनकी स्वतंत्रता में मैं हस्तक्षेप नहीं करता।

गांव की साझा विरासत के मुताबिक जो रीति रिवाज मेरे गांव के लोग मानते हैं,गांव में रहकर मुझे भी उनमें शामिल होना पड़ता है।


यह मेरी सामाजिकता है।

सामूहिक जीवनयापन की शर्त है यह।

लेकिन न मैं धार्मिक हूं और न आस्तिक।


15 अगस्त,1947...दो राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर इस महादेश अखंड भारतवर्ष का विभाजन हो गया।राष्ट्रीयता का मानदंड था धर्म।उसी क्षण इतिहास भूगोल बेमायने हो गये।बेमायने हो गया इस महादेश के मनुष्यों,मानुषियों का जीवन मरण।


धर्म के नाम राजनीति और धर्म राष्ट्रीयता,धर्म राष्ट्र इस माहदेश का सामाजिक यथार्थ है और मुक्त बाजार का कोरपोरेट सच भी यही है।इतिहास और भूगोल की विकृतियों का प्रस्थानबिंदू है इस महादेश का विभाजन।


भूमंडलीकरण के दौर में भी इस महादेश के नागरिक उसी दंगाई मानसिकता के शिकंजे में हैं,जिससे उन्हें रिहा करने की कोई सूरत नहीं बची।तभी से विस्थापन का एक अटूट सिलसिला जारी है।


धर्म के नाम विस्थापन,विकास के नाम विस्थापन,रोजगार के लिए विस्थापन।धर्मसत्ता,राजसत्ता और कारपोरेट सत्ता के एकीकरण से महाबलि सत्ता वर्ग का कारपोरेट धर्म कर्म आडंबर और पाखंड से भारत विभाजन की निरंतरता और विस्थापन का सिलसिला जारी है।


बांग्लादेश और पाकिस्तान की फिल्मों,उनके साहित्य,उनके जीवन यापन को गौर से देखें तो धार्मिक पहचान के अलावा उनमें और हममें कोई फर्क करना बेहद मुश्किल है।


बांग्लादेश में सारे रीति रिवाज,लोकसंस्कृति,बोलियां पश्चिम बंगाल की तरह हैं तो पाकिस्तान के लोगों को हिंदुस्तान से अलग करना मुश्किल है।उनके खेत,खलिहान,उनके गांव,उनके शहर,उनके महानगर हूबहू हमारे जैसे हैं।


सरहदों ने बूगोल का बंटवारा कर दिया है लेकिन मोहनजोदोड़ो और हड़प्पा की विरासत अब भी साझा है।


युद्ध,महायुद्ध,प्राकृतिक,राजनीतिक,आर्थिक आपदाएं भूगोल बदलने के लिए काफी हैं,लेकिन इतिहास और विरासत में गंथी हुई इंसानियत जैसे हजारों साल पहले थी,आज भी वैसी ही हैं और हजारों साल बाद भी वहीं रहेंगी।


भारत के इतिहास में तमाम नस्लों के हुक्मरान सैकड़ों,हजारों साल से राज करते रहे हैं,लेकिन गंगा अब भी गंगोत्री से गंगासागर तक बहती हैं और हिमालय से बहती नदियां भारत,बांग्लादेश और पाकिस्तान की धरती को सींचती हैं बिना किसी भेदभाव के।


बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठते मानसून के बादल हिमालय के उत्तुंग शिखरों से टकराकर सरहदों के आर पार बरसकर फिजां में बहार लाती है।


धर्म और धर्मस्थल केंद्रित वाणिज्य और राजनीति पर रोक लगे तो बची रहेगी गंगा और बचा रहेगा हिमालय भी।


Monday, November 20, 2017

खोज रहा हूं खोया हुआ गांव,मैदान,पहाड़,अपना खेत।अपनी माटी। पलाश विश्वास

खोज रहा हूं खोया हुआ गांव,मैदान,पहाड़,अपना खेत।अपनी माटी।

पलाश विश्वास

https://www.facebook.com/palashbiswaskl/videos/vb.100000552551326/1919932074701859/?type=2&theater


खोज रहा हूं खोया हुआ गांव,मैदान,पहाड़,अपना खेत।अपनी माटी।

बाजार का कोई सिरा नजर नहीं आाता,न नजर आता कोई घर।

किसी और आकाशगंगा के किसी और ग्रह में जैसे कोई परग्रही।


सारे चेहरे कारपोरेट हैं।गांव,देहात,खेत खलिहान,पेड़ पहाड़ सबकुछ

इस वक्त कारपोरेट।भाषा भी कारपोरेट।बोलियां भी कारपोरेट।

सिर्फ बची है पहचान।धर्म,नस्ल,भाषा,जाति की दीवारें कारपोरेट।

कारपोरेट हित से बढ़कर न मनुष्य है और न देश,न यह पृथ्वी।


गायें भैंसें और बैल न घरों में हैं और न खेतों में- न कहीं गोबर है

और न माटी कहीं है।कड़कती हुई सर्दी है,अलाव नहीं है कहीं

और न कहीं आग है और न कोई चिनगारी।संवाद नहीं है,राजनीति है बहुत।

उससे कहीं ज्यादा है धर्मस्थल,उनसे भी ज्यादा रंग बिरंगे जिहादी।


महानगर का रेसकोर्स बन गया गांव इस कुहासे में,पर घोड़े कहीं

दीख नहीं रहे।टापों की गूंज दिशा दिशा में,अंधेरा घनघोर और

लापता सारे घुड़सवार।नीलामी की बोली घोड़े की टाप।

पसीने की महक कहीं नहीं है और सारे शब्द निःशब्द।

फतवे गूंजते अनवरत।वैदिकी मंत्रोच्चार की तरह।


न किसी का सर सलामत है और नाक सुरक्षित किसी की।हवाओं में

तलवारें चमक रहीं है।सारे के सारे लोग जख्मी,लहुलुहान।लावारिश।


घृणा का घना समुंदर कुहासे से भी घना है और है

चूंती हुई नकदी का अहंकार। सबकुछ निजी है और

सार्वजनिक कुछ भी नहीं।सिर्फ रोज रोज बनते

युद्ध के नये मोर्चे जैसे अनंत धर्मस्थल।

सारे महामहिम, आदरणीय विद्वतजन बेहद धार्मिक है इन दिनों।


धर्म बचा है और क्या है वह धर्म भी,जिसका ईश्वर है अपना ब्रांडेड और जिसमें मनुष्यता की को कोई सुगंध नहीं।कास्मेटिक धर्म की कास्मेटिक

सुगंध में मनुष्यता निष्णात।बचा है पुरोहिततंत्र।


सारा इतिहास सिरे से गायब।मनुष्यता,सभ्यता की सारी विरासतें

बाजार में नीलाम। न संस्कृति बची है और न बचा है समाज।

असामाजिक समाजविरोधी प्रकृतिविरोधी सारे मनुष्य।


घना कुहासा। सूरज सिरे से लापता और खेतों पर दबे पांव

कंक्रीट महानगर का विस्तार,गांव में अलग अलग किलों में कैद

अपने सारे लोग,सारे रिश्ते नाते,बचपन।सन्नाटा संवाद।


सरहदों की कंटीली बाड़ घर घर कुहासा में छन छनकर चुभती,

लहूतुहान करती दिलोदिमाग।मेट्रो की चुंधियाती रोशनी चुंचुंआते

विकास की तरह पिज्जा,मोमो,बर्गर पेश करती जब तब-

सारे किसान आहिस्ते आहिस्ते लामबंद एक दूसरे के खिलाफ।


अघोषित युद्ध में हथियार डिजिटल गैजेट और वजूद आधार नंबर।

अपने ही गांव के महानगरीय जलवायु में कुहासा घनघोर।


मैदान पहाड़ इस कुहासे में एकाकार,जैसे पहाड़ कहीं नहीं हैं

और न मैदान कहीं है कोई हकीकत में और न नदी कोई।


पगडंडियां और मेड़ें एकाकार।बल खाती सर्पीली सड़के डंसतीं

पोर पोर।खेतों में जहरीली फसल से उठता धुआं और आसमान

से बरसता तेजाब।घाटियां बिकाउ बाजार में और सारे पेड़ ठूंठ।


चारों तरफ तेल की धधक।तेज दौड़ते अंधाधुंध बाइक कुहासे में।

कारों के काफिले में मशीनों का काफिला शामिल और इंसान सिरे से

लापता हैं जैसे लापता हैं सूरज और आग।धमनियों में जहर।


सरहदों के भीतर सहरहद कितने।सेनाएं कितनी लामबंद सेनाओं के खिलाफ।

मिसाइलों का रिंगटोन कभी नहीं थम रहा।सारे लोकगीत

खामोश हैं और बच्चों की किलकारियां गायब है।गायब चीखें।


परमाणु बमों का जखीरा हर सीने में छटफटाता और रिमोट से

खेल रहा कोई कहीं और सरहद के भीतर ही भीतर।आगे पीछे के

सारे पुल तोड़ दिये।महानगर सा जनपद,क्या मैदान,क्या पहाड़-

अनंत युद्धस्थल है और सारे लोग एक दूसरे के खिलाफ लामबंद।