Monday, July 30, 2012
बत्ती गुल है, पर उम्मीदों के सहारे है अर्थ व्यवस्था!कर चोरों की पनाहगाह बने बैंकों में 21,000 अरब डॉलर जमा!
एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
बत्ती गुल है, पर उम्मीदों के सहारे है अर्थ व्यवस्था!बिजली के निजीकरण से आम उपभोक्ताओं की जेबें काटने के बावजूद यह सरकार बिजली प्रबंधन में किस तरह फेल है, इसका नजारा आज राजधानी नई दिल्ली समेत उतर भारत को आज खूब देखने को मिला।भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने मौद्रिक नीति समीक्षा जारी होने के एक दिन पहले सोमवार को देश की आर्थिक विकास दर के पूर्वानुमान को घटाकर 6.5 फीसदी कर दिया और महंगाई तथा वित्तीय घाटा बढ़ने की आशंका जाहिर कर दी। बिजली मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने दोपहर में बताया कि 60 फीसद बिजली आपूर्ति बहाल कर दी गई है। उन्होंने बताया कि उत्तरी ग्रिड के खराब होने के बाद भूटान एवं पूर्वी एवं पश्चिमी ग्रिड से बिजली आपूर्ति किया जाना तय किया गया था।यही हाल भारतीय अर्थव्यवस्था का है।बुनियादी समस्याओं को संबोधित करने की कोई कोशिश तक नहीं हो रही। वितीय नीति के बजाय मौद्रिक कवायद पर बाजार की सेहत के मद्देनजर कारपोरेट सरकार फैसला कर रही है। कृषि विकास दर और औद्योगिक विकास दर में सुदार हो नहीं रहा है। मंहगाई और मुद्रास्पीति दोनों बेकाबू। राजस्व वसूली के निनाब्वे फीसद बहिष्कृत आबादी पर करारोपण का बोझ। संसाधनों की खुली लूटखसोट और भ्रष्टाचार , घोटालों की हरिकथा अनंत। देश के समावेशी विकास विकास दर के हवाले और इसके लिए खुले बाजार की अर्थ व्यवस्था में विदेशी पूंजी के बहाने सत्तावर्ग के काले धन को घूमाने का केल। फिर भी रिजर्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा,मंदी की चपेट में छटफटाते अंतरराष्ट्रीय बाजार के संकेत , आर्थिक सुधार यानी एक के बाद एक जनविरोधी फैसले निजीकरण, विनिवेश बिल्डर प्रोमोटर राज के साये में उद्योग जगत को राहत का इंतजार।कर चोरों की पनाहगाह बने बैंकों में 21,000 अरब डॉलर जमा हैं।कर चोरों के खिलाफ अभियान छेड़ने वाले कार्यकर्ताओं के मुताबिक कुछ बैंकों में छुपाए गये काले धन में सबसे ज्यादा, करीब 70 फीसदी पैसा भारतीयों का है। उसके बाद रूसियों का नंबर आता है, जिनका 14 फीसदी पैसा स्विट्जरलैंड, लीश्टेनश्टाइन, लक्जमबर्ग और केमैन आइलैंड्स में छुपा है।
बयानों से हालात सुधरते तो प्रणव मुखर्जी क्या बुरे थे कि उन्हें राष्ट्रपति भवन सिधार दिया गया और मनमोहन सिंह की वित्त मंत्रालय में वापसी हो गयी? नवुदारवादी नीतियां लागू होने से पहले ऱाजीव गांधी के जमाने से ही कारपोरेट तत्व ही नीति निर्धारण कर रहे हैं। जिसक नतीजतन इंदिरा के वक्त कपड़ा बेचने वाले अब युद्धक विमान और अत्यधुनिक सुरक्षा प्रणाली के कारोबार में बाकी दुनिया को टक्कर देने की हालत में है। गरीबी हटाओ का नारा जो समाजवाद के साथ लगा था, आज खुले बाजार में गरीबों के सफाये में तब्दील है। प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर राष्ट्रपति भवन तक औद्योगिक घराने काबिज हैं। एक फीसद लोगों के लिए तो चकाचौंध रोशनी है और बाकी देश के लिए बत्ती गुल हमेशा के लिए , यह हालत किसी मनमोहन या शिंदे की बयानबाजी से बदलनेवाली नहीं है।अमेरिका और जापान की अर्थव्यवस्था को मिला दिया जाए तो जितना पैसा जमा होगा, उतना धन कुछ लोगों के पास है। यह अकूत पैसा उनके गोपनीय बैंक खातों में जमा है। अनुमान है कि यह रकम 21,000 अरब डॉलर से ज्यादा है। मुद्रास्फीति की उंची दर के साथ साथ अब मानसून की कमी को देखते हुये रिजर्व बैंक के लिये ब्याज दरों में कटौती का कदम उठाना मुश्किल हो सकता है। अर्थव्यवस्था में गतिविधियां बढ़ाने के लिये नीतिगत दरों में कटौती को जरुरी माना जा रहा है। उद्योग जगत रिजर्व बैंक से ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद लगाये बैठा है।मुद्रास्फीति को देखते हुये केंद्रीय बैंक के लिए उद्योग की मांग पर ध्यान देना संभव नहीं लगता।इसके अलावा बारिश की अनिश्चितता से आवश्यक जिंसों की कीमत पर दबाव पड़ सकता है। देश में औसतन बारिश अब तक 21 फीसद कम हुई है।
बाजार में जोश का सबब कराधान में राहत की उम्मीद से है दरअसल। कराधान मामले में और पारदर्शिता लाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सोमवार को एक समिति गठित की। यह समिति सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) और अनुसंधान एवं विकास से जुड़ी गतिविधियों से संबद्ध मामलों को देखेगी।प्रधानमंत्री कार्यालय ने जीएएआर के प्रावधानों की समीक्षा करने के लिए बनी पैनल का दायरा बढ़ाया है। पोर्टफोलियो मैनेजमेंट पर टैक्स और एनआरआई के प्रॉपर्टी सौदों पर टैक्स के मामले को जीएएआर पैनल को सौंपे गए हैं।जबकि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के पूर्व अध्यक्ष एन रंगाचारी की अध्यक्षता वाली समिति सामान्य कर-वंचन रोधी नियम (गार) के प्रावधानों की समीक्षा के लिए गठित समिति से अलग होगी। गार समिति विदेशी निवेशकों की समस्या का समाधान करेगी।चार सदस्यों वाली नई समिति विकास केंद्रों के कराधान के तरीके को अंतिम स्वरूप देने और उचित पहल सुझाने के लिए संबद्ध पक्षों और संबंधित विभागों से परामर्श करेगी।प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी बयान के मुताबिक, सूचना प्रौद्योगिकी के काराधान से जुड़े कुछ अन्य मामलों के समाधान मसलन विकास केंद्र के कराधान के तरीके, घरेलू साफ्टवेयर कंपनियों की आनसाइट सेवाओं की कर व्यवस्था और बजट 2010 में घोषित सुरक्षित ठिकाने (सेफ हार्बर) के प्रावधान को अंतिम स्वरूप देने के लिए और ध्यान देने की जरूरत महसूस की गई ।सेफ हार्बर अंतरराष्ट्रीय खुलासे की प्रक्रिया है ताकि ट्रांसफर प्राइसिंग से जुड़े कानूनी मामलों में कमी की जा सके। ट्रांसफर प्राइसिंग लेखा प्रक्रिया है जो बहुराष्ट्रीय कंपनियां कर देनदारी कम करने के लिए अख्तियार करती हैं।प्रधानमंत्री कार्यालय का कहना है कि बजट 2012 के बाद टैक्स देनदारी पर सफाई आना जरूरी है। पोर्टफोलियो मैनेजमेंट से जुड़े सभी टैक्स के मामलों को जीएएआर गाइडलाइंस के अनुरूप सुलझाया जाए।प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक जीएएआर के अलावा टैक्स मुद्दों पर जीएएआर पैनल विचार करने वाला है। पार्थासारथी शोम की अध्यक्षता वाला पैनल जीएएआर को लेकर नई गाइडलाइंस सरकार के सामने पेश करने वाला है।
तो दूसरी ओर, मंद पड़ती आर्थिक वृद्धि से चिंतित रिजर्व बैंक ने सरकार से कहा है कि उसे निवेश बढ़ाने के लिये प्रोत्साहन देने और सब्सिडी में कटौती के लिये पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाने जैसे त्वरित कदम उठाने चाहिए।इस रपट से आर्थिक सुधारों की उम्मीदों ने जोर पकड़ा है।रिजर्व बैंक की आज जारी वृहत आर्थिक और मौद्रिक विकास रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनियों की बिक्री और मुनाफा कम हुआ है। आने वाले दिनों में इसका निवेश पर असर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में सार्वजनिक निवेश खर्च को प्रोत्साहन देकर निजी निवेश मांग बढ़ाई जा सकती है और दूसरी तरफ सब्सिडी खर्च में तेजी से कटौती कर आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा दिया जा सकता है। रिजर्व बैंक ने कहा है कि निवेश में कमी के पीछे केवल उंची ब्याज दरें ही एकमात्र वजह नहीं हो सकती, क्योंकि संकट से पहले की अवधि में ब्याज दरें उच्चस्तर पर रहने के बावाजूद निवेश अधिक हुआ था। रिपोर्ट में कहा गया है कि ढांचागत क्षेत्र की कमियों को दूर कर निवेश माहौल में तेजी से सुधार लाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अड़चनों को भी दूर किया जाना चाहिए।रिजर्व बैंक ने यह भी कहा है कि सरकार ने वर्ष 2008 में संकट के समय उद्योगों को जिस तरह का प्रोत्साहन पैकेज दिया था वर्तमान में ऐसे प्रोत्साहन देना सरकार के लिये संभव नहीं है। बैंक ने दीर्घकालिक वित्तीय मजबूती के रास्ते पर लौटने पर जोर देते हुये कहा है कि वित्तीय घाटा ज्यादा रहने से निजी निवेश मांग पर और बुरा असर पड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सब्सिडी कम करने की आवश्यकता है। सरकार को अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल मूल्यों के अनुरूप घरेलू बाजार में इनके मूल्य तय करने चाहिये, इसके बिना वित्तीय घाटे को तय अनुमान के भीतर रखना मुश्किल होगा।
बहरहाल मौद्रिक नीति की तिमाही समीक्षा से एक दिन पहले भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि आर्थिक विकास दर में सुस्ती का अंदेशा है और महंगाई अब भी बड़ी चिंता है, जिस पर ध्यान देना जरूरी है। आरबीआई ने कहा कि गैर मौद्रिक नीति के जरिये निवेश गतिविधियों पर ध्यान देने की जरूरत है। वृहद आर्थिक और मौद्रिक विकास रिपोर्ट में आरबीआई ने कहा, 'चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर कम रहने की आशंका है। आरबीआई ने आर्थिक और मौद्रिक विकास पर तिमाही रिपोर्ट में मौजूदा कारोबारी साल के लिए विकास के पूर्वानुमान को घटाकर 6.5 फीसदी कर दिया। इससे पहले, उसने अप्रैल में विकास दर के 7.2 फीसदी रहने की सम्भावना जाहिर की थी।आरबीआई मौद्रिक नीति की पहली तिमाही समीक्षा मंगलवार को जारी करने वाली है। आरबीआई ने कहा कि देश का आर्थिक परिदृश्य कमजोर है। अनिश्चित वैश्विक आर्थिक स्थिति के बीच सुस्त विकास, ऊंची महंगाई दर, चालू खाता घाटा और वित्तीय घाटा तथा निवेश घटने से अर्थव्यवस्था कमजोर हुई है। आरबीआई ने कहा कि रियायत बढ़ने और आय कम रहने के कारण वित्तीय घाटा सीमा से अधिक रहने की आशंका है। सरकार ने सकल घरेलू उत्पादन के 5.1 फीसदी की सीमा में वित्तीय घाटा को सीमित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। पिछले वर्ष वित्तीय घाटा 5.76 फीसदी रहा था।
यूरोप आर्थिक संकट से छटपटा रहा है। अमेरिका उठने की कोशिश में बार बार गिर रहा है। भारत और चीन भी धीमे पड़ रहे हैं. स्पेन और ग्रीस जैसे देशों को कड़ी शर्तों के बीच कर्ज मिल रहा है। मंदी का शिकार झेल रहे देशों की मदद के लिए भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और जर्मनी जैसे देश बड़ा पैसा झोंक रहे हैं। लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक कर चोरों की पनाहगाह बने बैंकों में 21,000 अरब डॉलर जमा हैं।
ब्रिटिश संस्था द टैक्स जस्टिस नेटवर्क के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय लेन देनों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की आंकड़ों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। रिपोर्ट के लेखक और अर्थशास्त्री जेम्स हेनरी कहते हैं कि केमैन आइलैंड्स और स्विट्जरलैंड के बैंकों में 32,000 अरब डॉलर तक की रकम छुपाई गई हो सकती है।हेनरी के मुताबिक यह संपत्ति रखने के लिए बहुत ज्यादा पैसा चुकाया जाता है।वैश्विक अर्थव्यवस्था की, कानून की और बैंकिंग तंत्र की कमजोरियों का फायदा उठा कर यह पैसा जमा किया गया है।रिपोर्ट के मुताबिक शीर्ष के दस निजी बैंकों के पास 2005 में 2,300 अरब डॉलर थे. 2010 में यह रकम बढ़कर 6,000 अरब डॉलर हो गई।टैक्स विशेषज्ञ और ब्रिटेन सरकार के सलाहकार जॉन व्हाइटिंग रिपोर्ट पर कुछ संदेह जता रहे हैं. वह कहते हैं, "इस बात के सबूत तो हैं कि बड़ी मात्रा में पैसा छुपाया गया है लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि यह रकम इतनी ही है जितनी कि इस रिपोर्ट में बताई गई है।"
द टैक्स जस्टिस नेटवर्क के कार्यकर्ता टैक्स में पारदर्शिता की मांग करते हैं। वे कर चोरी के गढ़ बने देशों और बैंकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हैं।2008 में दुनिया भर में आर्थिक मंदी छानी शुरू हुई। 2010 में एक रिपोर्ट आई, उसमें कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्र से 7,000 अरब डॉलर गायब हैं।हालांकि मंदी के दौरान अमेरिका और यूरोपीय देशों ने स्विट्जरलैंड पर दबाव बनाया। दबाव के तहत स्विट्जरलैंड ने बैंक गोपनीयता कानून में बदलाव भी किये। लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था से गायब हुआ पैसा अब भी बाजार में नहीं आया है।
अर्थव्यवस्था पर मानसून में कमी के प्रभाव को लेकर चिंतित उद्योग जगत ने सरकार से कदम उठाने का आग्रह किया है।
अर्थव्यवस्था पर मानसून में कमी के प्रभाव को लेकर चिंतित उद्योग जगत ने सरकार से किसानों को सब्सिडीयुक्त डीजल उपलब्ध कराने और अधिक उत्पादकता वाले बीज वितरित करने जैसे आपात उपाय करने को कहा है।उद्योग मंडल एसोचैम और सीआईआई दोनों का कहना है कि मानसून की कम बारिश से रोजगार, आय व खाद्य कीमतें प्रभावित होंगी।
सप्ताह के पहले दिन भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा दरें घटाए जाने की उम्मीद से बाजार 2 फीसदी उछले। सेंसेक्स 304 अंक चढ़कर 17144 और निफ्टी 100 अंक चढ़कर 5200 पर बंद हुए।अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूती की वजह से घरेलू बाजारों ने जोरदार तेजी के साथ शुरुआत की। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स ने 17000 का स्तर पार कर लिया। ईसीबी के राहत देने के भरोसा दिलाए जाने के बाद वैश्विक बाजारों में तेजी आई है।दोपहर के कारोबार तक बाजारों ने अपनी मजबूती बनाए रखी और निफ्टी 5150 के स्तर पर बना रहा। यूरोपीय बाजारों के बढ़त पर खुलने से घरेलू बाजारों का जोश बढ़ा। सेंसेक्स में 250 अंक का उछाल आया।सरकारी बैंकों के उम्मीद से बेहतर नतीजों ने बाजार की तेजी और बढ़ाया। साथ ही, मंगलवार की आरबीआई की क्रेडिट पॉलिसी बैठक के पहले बैंक शेयरों में जोरदार खरीदारी नजर आई।कारोबार के आखिरी आधे घंटे में बाजारों ने रफ्तार पकड़ी। सेंसेक्स 325 अंक उछला और निफ्टी ने 5200 का अहम स्तर पार कर लिया।आरबीआई गवर्नर डी. सुब्बाराव मौद्रिक नीति की पहली तिमाही समीक्षा पेश करेंगे और यदि उनके मुद्रास्फीति, राजकोषीय व चालू खाता के घाटे के बारे में दिए गए हाल के बयानों को संकेत माना जाए तो इस बार कुछ ज्यादा फेर-बदल की गुंजाइश नहीं है। सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर नौ साल के न्यूनतम स्तर 6.5 फीसद रही है जबकि थोकमूल्य आधारित मुद्रास्फीति जून में 7.25 फीसद रही। खुदरा मुद्रास्फीति 10.02 फीसद के आस-पास है।आरबीआई ने 16 जून को हुई बैठक में मुख्य दरें और सीआरआर अपरिवर्तित रखी। इस बीच सुब्बाराव ने हाल ही में कहा था कि केंद्रीय बैंक उच्च ब्याज दरों और वृद्धि में नरमी के बीच संबंध का अध्ययन करेगा।
उत्तरी ग्रिड में सोमवार को खराबी आने से देश के उत्तरी क्षेत्र के करीब आठ राज्यों में बिजली आपूर्ति बाधित हो गई, जिससे सामान्य जन-जीवन प्रभावित हुआ। इस अचनाक गहराए बिजली संकट के चलते करोड़ों लोग प्रभावित हुए। उत्तरी ग्रिड में आज तड़के करीब ढाई बजे खराबी आने से रेलवे, दिल्ली मेट्रो और पानी आपूर्ति समेत विभिन्न सेवाएं ढप पड़ गईं। राजधानी में आज मेट्रो ट्रेनों का परिचालन रुक जाने से कर्मचारियों एवं छात्रों को कई घंटे तक समस्या से जूझना पड़ा।उत्तरी ग्रिड के रविवार देर रात 2.32 बजे ठप्प हो जाने के बाद उत्तर भारत के सात राज्यों में बिजली आपूर्ति बाधित हो गई। खराबी को सोमवार दोपहर तक भी पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सका। इससे रेल, मेट्रो और सड़क यातायात ही नहीं अस्पताल भी प्रभावित रहे। अधिकारियों ने बताया कि आगरा के नजदीक कहीं ग्रिड में गड़बड़ी हुई, जिससे पूरा बिजली आपूर्ति तंत्र बैठ गया। उत्तरी ग्रिड में आई खराबी के चलते उत्तर रेलवे के आठ डिवीजनों में सोमवार को 300 यात्री रेलगाड़ियां देरी की शिकार हुईं, जबकि 200 मालगाड़ियों को रद्द करना पड़ा। पॉवर सिस्टम ऑपरेशन कार्पोरेशन लिमिटेड के महाप्रबंधक वीवी शर्मा ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अलावा पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और जम्मू एवं कश्मीर में बिजली आपूर्ति प्रभावित रही।
एसोचैम ने सूखे की चुनौतियों से निपटने के लिए 15 सूत्री रणनीति का प्रस्ताव करते हुए सुझाव दिया कि सरकार को उत्पादन लागत में कमी लाने और उत्पादकता बढ़ाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके अलावा, जमाखोरी और सटोरिया गतिविधियों पर लगाम लगाने के प्रभावी कदम उठाने चाहिए। उद्योग मंडल ने कहा, '' चीनी, दाल और प्याज जैसे उत्पादों पर भंडारण की सीमा तय करने से जमाखोरी रोकने में मदद मिलेगी. वायदा बाजार आयोग को सटोरिया गतिविधियां रोकने के लिए इन जिंसों पर पैनी नजर रखनी होगी।''इसके अलावा, सूखा प्रभावित क्षेत्रों में मनरेगा योजना के दायरे में बदलाव किए जाने की जरूरत है। उद्योग मंडल ने सरकार से वैकल्पिक फसल योजना तैयार करने और किसानों को वित्तीय व तकनीकी मदद उपलब्ध कराने का आह्वान किया।
इसी तरह के विचार व्यक्त करते हुए सीआईआई ने कहा कि मानसून में कमी से भारतीय अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार पड़ेगी. भारतीय अर्थव्यवस्था पहले ही वैश्विक नरमी से जूझ रही है।सीआईआई ने कहा कि ग्रामीणों की रोजी-रोटी बचाने के लिए सरकार को 'तत्काल उपाय' करना होगा।
Fwd: a report/article Communal politics begins under Samajwadi rule in Uttar Pradesh
From: rajiv yadav <rajeev.pucl@gmail.com>
Date: 2012/7/30
Subject: a report/article Communal politics begins under Samajwadi rule in Uttar Pradesh
To: rajeev journalist <rajeevjournalistup@gmail.com>
सपा राज में शुरु हुई दंगों की राजनीति
यूपी के सपा राज में महीने दर महीने साम्प्रदायिक दंगों की रोज नई घटनाएं सामने आ रही हैं। अभी मथुरा के कोसी कला और प्रतापगढ़ के अस्थान के दंगों की आग बुझी भी नहीं थी कि बरेली फिर दंगों की आग में झुलस गया।
दंगे की मुख्य वजह यह थी कि नमाजियों का कहना था कि नमाज के वक्त कावरिए तेज आवाज में लाउडर न बजाएं, पर वे माने नहीं। एक बार फिर पूर्व नियोजित फिरकापरस्त ताकतों ने पूरे शहर को दंगे में झोक दिया।
गौर किया जाए तो इस इलाके में कावरियों को लेकर पिछले कई सालों से तनाव होते आ रहे हैं। दरअसल इसके पीछे हिन्दुत्वादी ताकतों का हाथ है। जिस तरह से शाहबाद इलाके में नमाज के वक्त तेज साउंड सिस्टम को बजाने व बंद करने को लेकर यह तनाव शुरु हुआ, ऐसा प्रयोग हिन्दुत्वादी शक्तियां आजादी के बाद ही नहीं उससे पहले भी करती रही हैं। तीस-चालीस के दशक में तो एक पूरा अभियान ही चलाया गया था कि जुमे की नमाज के वक्त मस्जिदों के सामने जाकर भजन-कीर्तन और नगाड़े बजाने का। उस दौर में इलाहाबाद के कर्नलगंज इलाके में हुए दंगे के गर्भ में भी यही साजिश थी। जिसमें मुख्य अभियुक्त के रुप में हिंदुत्ववादी मदन मोहन मालवीय थे।
बरेली में दूसरे दिन यानी 23 जुलाई को भी दंगा अपनी गति में रहा पर दिन के उजाले में जो मंजर देखने को आया उसने साफ कर दिया कि समाजवादी पार्टी की सरकार दंगे पर काबू नहीं पाना चाहती। जहां एक ओर दंगे में मारे गए इमरान के जनाजे को रोका गया तो वहीं कावरियों के जत्थे को तेज आवाज के साउंड सिस्टम बजाते हुए कफर््यू क्षेत्र से पुलिस के प्रोत्साहन में निकाला गया।
इस मंजर पर बरेली कालेज के शिक्षक और पीयूसीएल नेता जावेद साहब की बातें चुभ जाती हैं कि यह 'मुस्लिम कफर््यू' है। बंद घरों में लोग अपने आंगन में आसमान में धुंआ उठता देखते हैं, और जलती दुकानों-घरों की आंच को महसूस करते हैं और अंदाजा लगाते हैं कि किसका आसियाना जला। एक लंबे समय अन्तराल के बाद पुलिस के सायरन की आवाजों के बीच फायर ब्रिगेड की घंटी की आवाज की टन-टनाहट उन्हें पागल कर देती है। यह सब उस सपा सरकार में हो रहा है, जिसके मुखिया मुलायम सिंह कहते हैं कि उन्हें मुसलमानों ने सौ फीसदी वोट देकर सत्ता में लाया है।
23 जुलाई को ही प्रतापगढ़ के अस्थान गांव में भी प्रवीण तोगडि़या जाते हैं और खुलेआम मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगलते हैं। पिछले महीने अस्थान में हुए दंगे में दर्जनों मुस्लिमों के घरों को दंगाइयों ने खाक कर दिया था। इस दंगे में प्रदेश के कारागार मंत्री रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया के लोगों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है।
सपा के राज में एक बार फिर से हिन्दुत्ववादी ताकतें प्रायोजित तरीके से दंगें भड़कानें का काम कर रही हैं। फैजाबाद जो पिछले तीन दशक से सांप्रदायिक राजनीति की राजधानी बन गया है वहां भी 23 जुलाई की शाम दंगा भड़काने की कोशिश हुई। अयोध्या शहर से सटे हुए शहादतगंज के पास के गांव मिर्जापुर में नवाज के ऐन वक्त पुलिस मस्जिद में ताला जड़ देती है। भारी तनाव के बाद ईशा की नवाज तो अदा हो गई पर शहर एक बार फिर सांप्रदायिक हिंसा के अंदेशे से सहम गया। स्थानीय लोगों के मुताबिक इस मस्जिद की उम्र सौ साल से ज्यादा है। 22 जुलाई को अयोध्या में गोरखपुर के सांसद और हिंदू युवा वाहिनी के संचालक योगी आदित्यनाथ शहर में आए थे। शहर में हुए इस तनाव के पीछे भी हिन्दुत्वादी ताकतों का हाथ सामने आ रहा है।
सपा राज में हो रहे दंगों में प्रशासन की उदासीनता यह बताती है कि एक बार फिर से आम-आवाम के बीच सांप्रदायिकता का जहर घोल करके मूलभूत मुद्दों से भटकाने की राजनीति शुरु हो गई है।
राजीव यादव
प्रदेश संगठन सचिव पीयूसीएल
द्वारा- मो0 शोएब, एडवोकेट
एसी मेडिसिन मार्केट
प्रथम तल, दुकान नं 2
लाटूश रोड, नया गांव, ईस्ट
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मो0- 09452800752, 09415254919
Fwd: [All India Secular Forum] This is a memorandum being circulated by Hafizur...
From: Irfan AEngineer <notification+kr4marbae4mn@facebookmail.com>
Date: Mon, Jul 30, 2012 at 11:54 AM
Subject: [All India Secular Forum] This is a memorandum being circulated by Hafizur...
To: All India Secular Forum <secularforum@groups.facebook.com>
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Fwd: Ismail Salami: Israel, US Warmongers Bent on Brewing Iran Crisis
From: Global Research E-Newsletter <crgeditor@yahoo.com>
Date: Mon, Jul 30, 2012 at 4:33 PM
Subject: Ismail Salami: Israel, US Warmongers Bent on Brewing Iran Crisis
To: palashbiswaskl@gmail.com
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Israel, US Warmongers Bent on Brewing Iran Crisis
By Dr. Ismail Salami
Global Research, July 29, 2012
URL of this article: www.globalresearch.ca/index.php?context=va&aid=32112
A report published on Sunday in Ha'aretz reveals that US National Security Adviser Tom Donilon has presented Washington's contingency plans for a possible attack on Iran to Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu once the nuclear negotiations reach an impasse.
However, the report was immediately denied by a top Israeli official who spoke on condition of anonymity. He said, "Nothing in the article is correct. Donilon did not meet the prime minister for dinner, he did not meet him one-on-one, nor did he present operational plans to attack Iran."
A quick justification for this denial could be that such a contingency plan was not supposed to be publicized and should have remained confidential for as long as necessary.
Still, there is no denial that Washington and Israel are the two sides of a coin and it is manifest that they have in their political wheeling and dealing formed a united front against Iran.
US GOP presidential candidate Mitt Romney has recently paid a visit to Israel to marshal up support of the Israelis on the one hand and express his unswervingly servile commitment to Israel (including his anti-Iran stance) on the other. Dan Senor, a top foreign policy adviser for the GOP presidential candidate, says that Romney would support "Israel's decision to launch a military strike against Iran to keep that country from achieving nuclear capabilities, but hopes diplomatic and military measures will dissuade Tehran from pursuing its path toward nuclear acquisition."
Furthermore, he told reporters ahead of the speech, planned for late Sunday near Jerusalem's Old City, "If Israel has to take action on its own, in order to stop Iran from developing the capability, the governor would respect that decision."
With a more somber tone, however, Romney himself has repeatedly said that he has a "zero tolerance" policy toward Iran obtaining the capability to build a nuclear weapon.
In recent past, Washington has frequently threatened Iran with a military strike. The threats, which evidently run counter to all international laws, are generally uttered by a massive number of officials influenced by the powerful Zionist lobby in Washington. A brazen instance of these threats is that Washington may use the 14-ton bunker buster (20ft long, 1ft wide weapon) known as Massive Ordnance Penetrator (MOP), the world's largest conventional bomb against Iran nuclear sites. Michael Donley, the US Air Force Secretary, said the bomb would be available if necessary.
"We continue to do testing on the bomb to refine its capabilities, and that is ongoing," he said "We also have the capability to go with existing configuration today."
In order to justify their illegal threats and sanctions, the US has apparently embarked on a systematic program of fomenting Iranophobia in the US and the rest of the world. In this pernicious Iranophobic campaign, a number of groups and parties including Tea Party, neocons and AIPAC are actively involved.
By this program, the US is hell bent on distorting the realities of the Islamic Republic as well as brainwashing public opinion in the world into believing that Iran is seeking to build nuclear weapons, and that Iran poses a grave danger to the security of the world. In this smear campaign, Washington also makes use of its allies including Saudi Arabia, Qatar and Israel in the region.
A politically bankrupt politician who does have but little respect in his own country, Romney follows the selfsame Iranophobic campaign, takes an aggressive stand on Iran in Israel where he is falsely emboldened and says Tehran's leaders are giving the world "no reason to trust them with nuclear material." He even voiced support for an Israeli decision for military action "to prevent Iran from gaining nuclear capability".
"Make no mistake: The ayatollahs in Tehran are testing our moral defenses. They want to know who will object, and who will look the other way. My message to the people of Israel and the leaders of Iran is one and the same: I will not look away; and neither will my country."
These facts aside, the duo have recently started a string of false flag terrorist attacks taking place in different parts of the world. With Washington pointing the finger of blame at Iran, Israel feels more fallaciously entitled to tone up its war rhetoric against the Islamic Republic and make the best of the fabricated ops. In the same line, former UN Ambassador John Bolton has called on the Zionist entity to attack Iran in retaliation for the alleged killing of Israeli tourists in Bulgaria, saying "the time has come for the Jewish state to quit threatening and take action".
"This is obviously a very dangerous period for Israel with the civil war in Syria, refugees reported going across the border into Lebanon, and Hezbollah well armed with rockets on Israel's northern border," Bolton told Fox News' Greta Van Susteren Thursday night. "So I think if there were ever a time to retaliate, and directly against Iran this time, this is it."
In the final analysis, one can see that the real threat in the world is being posed and imposed by those warmongers in Washington who will turn the situation to the best of their own interests in the region as well as by the Zionist entity who will in the wake of a war against Iran reap the benefits of such aggression if of course they ever outlive such an act of belligerence.
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Fwd: [All India Secular Forum] आसाम क़ी स्थिती को लेकर बैठक की सूचना
From: Irfan AEngineer <notification+kr4marbae4mn@facebookmail.com>
Date: 2012/7/30
Subject: [All India Secular Forum] आसाम क़ी स्थिती को लेकर बैठक की सूचना
To: All India Secular Forum <secularforum@groups.facebook.com>
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Fwd: Today's Exclusives - United India CPIO defies CIC order, gives irrelevant data to RTI petitioner
From: Moneylife <noreply@moneylife.in>
Date: Mon, Jul 30, 2012 at 7:32 PM
Subject: Today's Exclusives - United India CPIO defies CIC order, gives irrelevant data to RTI petitioner
To: palashbiswaskl@gmail.com
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भारतीय स्टेट बैंक के लिए खतरे की घंटी
भारतीय स्टेट बैंक के लिए खतरे की घंटी
- Created on Monday, 30 July 2012 11:23
- Written by एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए खतरे की घंटी बजने लगी है। निजी कंपनियों को बैंकिंग लाइसेंस अभी मिला नहीं है लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और खास तौर पर एसबीआई के विनिवेश की तैयारी पूरी होने लगी है। विनिवेश लक्ष्य में सबसे लाभदायक सार्वजनिक प्रतिष्ठानों का पहले विनिवेश करने की नीति रही है।
एसबीआई और एलआईसी साख और नेटवर्क की मजबूती के साथ सबसे लाभदायक सरकारी संस्थाएं हैं। मंदी की मार से भारतीय अर्थ व्यवस्था को संभालने में भी इन दोनों संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
पर शेयर बाजार के खेल में खुल्लमखुल्ला इन दोनों संस्थाओं को दांव पर लगाया गया है,
जैसा कि ओएनजीसी की हिस्सेदारी बेचते वक्त उजागर हो गया।जिस तरह लाभदायक सरकारी संस्था एअर इंडिया को जबरन बीमार बनाकर उसके विनिवेश का खेल चल रहा है, एसबीआई और एलआईसी के मामाले में भी वही किस्सा दोहराया जा रहा है।
एसबीआई लगता है, सबसे पहले इस खेल का शिकार बनने वाला है और देश भर में सक्रिय बैंककर्मियों की रंग बिरंगी ट्रेड यूनियनों को इस साजिश से कोई खास तकलीफ नहीं है।राष्ट्रीयकृत बैंक लाभ कमा रहे हैं और बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं जबकि पश्चिमी देशों में अनेक बैंक बंद हो चुके हैं या दिवालिया घोषित हो चुके हैं।
यूनियने अब भी वेतन और बोनस की लड़ाई तक सीमाबद्ध है। निजी कंपनियों को बैंकिंग लाइसेंस देने से पहले एसबीआई की सफाये की ऱणनीति को अंजाम दिया जा रहा है।बैंकों के राष्ट्रीयकरण से पहले बैंकों में जमा राशि के 87 प्रतिशत का उपयोग सिर्फ पूंजीपति करते थे, अब फिर वही स्थिति होने वाली है।
पूंजी पर सत्तावर्ग के एक फीसद लोगों का वर्चस्व कायम करने के लिए यह खतरनाक खेल खेला जा रहा है। इस मुद्दे पर जनता को आगाह करने और इसके विरुद्ध जनांदोलन खड़ा करने की दिशा में सारी ट्रे़ यूनियने निष्क्रिय ही नहीं है , बल्कि सरकारी साजिश को गुपचुप अंजाम देने में सहयोग कर रही हैं।एसबीआई और एलआईसी की विनिवेश की योजना देश के निनानब्वे फीसद जनता के आर्थिक भविष्य को असुरक्षित बना देने का खेल है।
निजी क्षेत्र का एचडीएफसी बैंक बाजार पूंजीकरण के लिहाज से आज सार्वजनिक क्षेत्र के भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को पछाड़कर देश का सबसे मूल्यवान बैंक बन गया।स्टेट बैंक आफ इंडिया (State bank of India / SBI) भारत का सबसे बड़ी एवं सबसे पुरानी बैंक एवं वित्तीय संस्था है।
इसका ... भारतीय स्टेट बैंक का प्रादुर्भाव उन्नीसवीं शताब्दी के पहले दशक में 2 जून 1806 को बैंक ऑफ कलकत्ता की स्थापना के साथ हुआ।
इसे अनुसूचित बैंक भी कहते हैं।भारत सरकार ने वर्ष 1955 में इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का अधिग्रहण कर इसका नामकरण भारतीय स्टेट बैंक के तौर पर किया। दस हज़ार शाखाओं और 8500 एटीएम के नेटवर्क वाला भारतीय स्टेट बैंक सार्वजानिक क्षेत्र के बैंकों में सबसे बड़ा बैंक है।
बाजार पूंजीकरण के मामले में टीसीएस ने एक बार फिर ओएनजीसी को पछाड़ दिया और शीर्ष पर पहुंच गई। आज बाजार में एचडीएफसी बैंक का शेयर तीन प्रतिशत से अधिक मजबूत हुआ जबकि एसबीआई का शेयर दबाव के चलते 3.77 प्रतिशत टूटकर बंद हुआ।
बीएसई आंकड़ों के अनुसार, एचडीएफसी बैंक का बाजार पूंजीकरण 1,37,554 करोड़ रुपये हो गया और यह छठी सबसे मूल्यवान कंपनी बन गई। एसबीआई का बाजार पूंजीकरण 1,30,263 करोड़ रुपये रहा और यह सातवें नंबर पर है। बाजार पूंजीकरण के लिहाज से आज 2,39,906 करोड़ रुपये के बाजार पूंजीकरण के साथ टीसीएस पहले नंबर पर रही।
ओएनजीसी का बाजार पूंजीकरण 2,37,329 करोड़ रुपए रहा। इस महीने बाजार पूंजीकरण के लिहाज से शीर्ष स्थान पर पहुंचने वाली कंपनी में तीन बार बदलाव हुआ। पहले ओएनजीसी शीर्ष पर रही, फिर टीसीएस ने उसे पीछे छोड़ दिया और एक बार फिर टाटा समूह की कंपनी टीसीएस ने शीर्ष स्थान को प्राप्त किया।
निजी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड बाजार पूंजीकरण के लिहाज से आज तीसरे स्थान पर रही। इसके बाद कोल इंडिया और फिर आईटीसी का स्थान रहा। सेंसेक्स में शामिल दस शीर्ष कंपनियों में एनटीपीसी आठवें स्थान और साफ्टवेयर क्षेत्र की इनफोसिस नौवें स्थान पर रही। भारती एयरटेल 1,16,584 करोड़ रुपये के बाजार पूंजीकरण के साथ दसवें स्थान पर रही।
देश के शेयर बाजारों में लगातार तीसरे सप्ताह गिरावट दर्ज की गई। बम्बई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का 30 शेयरों वाला संवेदी सूचकांक सेंसेक्स आलोच्य अवधि में 1.86 फीसदी या 319.25 अंकों की गिरावट के साथ 16839.19 पर बंद हुआ। सेंसेक्स पिछले शुक्रवार को भी गिरावट के साथ 17158.44 पर बंद हुआ था। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का 50 शेयरों वाला संवेदी सूचकांक निफ्टी आलोच्य अवधि में 2.02 फीसदी या 105.25 अंकों की गिरावट के साथ 5099.85 पर बंद हुआ।
1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के फलस्वरूप देश में आर्थिक आजादी का नया दौर शुरू हुआ। पूर्व में जहाँ बैंकों की पूँजी का पूरा लाभ पूँजीपति व इजारेदार उठाते थे, अब समाज के प्रत्येक वर्ग को अपना काम-धंधा शुरू करने के लिए बैंकों से ऋण मिलना सुगम हो गया। परिणामस्वरूप पानवाले, रिक्शे, ताँगेवाले, रेढ़ी चलाकर धंधा करने वाले, हस्तशिल्प कारीगर तथा विभिन्ना प्रकार के निम्न वर्गों को राष्ट्रीयकृत बैंकों से अपना रोजगार शुरू करने के लिए रियायती दरों पर ऋण मिलना प्रारंभ हो गया।
इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का अहम फ़ैसला किया था।उन्होंने 19 जुलाई, 1969 को 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. इन बैंकों पर अधिकतर बड़े औद्योगिक घरानों का कब्ज़ा था। इसके बाद राष्ट्रीयकरण का दूसरा दौर 1980 में हुआ जिसके तहत सात और बैंकों को राष्ट्रीयकृत किया गया. अब भारत में 27 बैंक राष्ट्रीयकृत हैं।
इसके पहले तक केवल एक बैंक- भारतीय स्टेट बैंक राष्ट्रीयकृत था। इसका राष्ट्रीयकरण 1955 में कर दिया गया था और 1958 में इसके सहयोगी बैंकों को भी राष्ट्रीयकृत कर दिया गया।चूंकि मोरारजी भाई बैंकों के राष्ट्रीयकरण के विरोधी थे इसलिए उनके वित्तमंत्री रहते राष्ट्रीयकरण का निर्णय लिया जाना कठिन था इसलिए एक सोची-समझी रणनीति के अनुसार श्रीमती गांधी ने मोरारजी भाई से वित्त मंत्रालय वापिस ले लिया। जैसी की अपेक्षा थी मोरारजी भाई ने इसे अपना अपमान समझा और आवेश में आकर स्वयं त्यागपत्र दे दिया।
इस बीच राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर कांग्रेस के भीतर काफी गहमागहमी प्रारंभ हो गई। कांग्रेस कार्यकारिणी में मात्र एक के बहुमत से संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला लिया गया। इस निर्णय को श्रीमती गांधी को पद से हटाने की दिशा में उठाया गया पहला कदम माना गया।
पार्टी में अपना बहुमत सिध्द करने के लिए उन्होंने व्ही.व्ही. गिरि को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित किया वहीं दूसरी ओर उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने का निर्णय लिया। अपने इस निर्णय को अमली जामा पहनाने के लिए उन्होंने अधिकारियों को चौबीस घंटे में राष्ट्रीयकरण की पूरी योजना तैयार करने का आदेश दिया कि किसी भी स्थिति में यह बात लीक नहीं होनी चाहिए कि शीघ्र ही बैंकों का राष्ट्रीयकरण होना वाला है। जब तैयारी पूरी हो गई तो 19 जुलाई 1969 को अध्यादेश जारी कर देश के 14 प्राइवेट बैंकों को सीधे सरकार के नियंत्रण में ले लिया गया।
अध्यादेश 19 जुलाई 1969 को जारी किया गया, उसके ठीक दो दिन बाद संसद का सत्र चालू होने वाला था। नियमानुसार अध्यादेश को तुरंत ही विधेयक के रूप में दिया जाना चाहिए। इस तरह सत्र प्रारंभ होते ही अध्यादेश का स्थान लेने वाले विधेयक संसद में पेश किया गया। विधेयक पेश होते ही लोकसभा दो भागों में विभाजित हो गई।
एक ओर विधेयक के समर्थक थे और दूसरी ओर उसके विरोधी। इंदिरा समर्थक कांग्रेस सदस्यों के अतिरिक्त कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट सदस्यों ने राष्ट्रीयकरण का गर्मजोशी से स्वागत किया। विरोध प्रमुख रूप से जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी के सदस्यों ने किया। बाद में जनसंघ भारतीय जनता पार्टी में परिवर्तित हो गई और स्वतंत्र पार्टी का तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया। राष्ट्रीयकरण का औचित्य ठहराते हुए श्रीमती गांधी ने एक जोरदार भाषण दिया।
उन्होंने इसे देश के गरीबों के हित में आवश्यक बताया। इंदिरा जी का कहना था कि बैंकों में आम आदमी अपनी गाढ़ी कमाई जमा करता है, परंतु उसका उपयोग चंद लोग ही करते हैं। इस कानून के द्वारा सरकार इस असंतुलन को दूर करना चाहती है। लोकसभा में यह बताया गया कि बैंकों में जमा राशि के 87 प्रतिशत का उपयोग सिर्फ पूंजीपति करते हैं।
किसान को, जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, 1953 में सिर्फ 19 करोड़ रुपए की सहायता दी गई जो 1965 को आते-आते लगभग शून्य हो गई। यह भी बताया गया कि विभिन्न बैंकों के जो 77 डायरेक्टर्स हैं वे ही विभिन्न कंपनियों में 188 पद हथियाए हुए हैं। बैंकों के राष्ट्रीयकरण से इंदिरा गांधी की लोकप्रियता में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई थी। राष्ट्रपति के चुनाव में उनके विरोधियों ने संजीव रेड्डी को खड़ा किया था वहीं इंदिरा जी ने व्ही. व्ही. गिरि को अपना उम्मीदवार बनाया था। चुनाव में गिरि विजयी रहे।
विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीयकरण के बाद भारत के बैंकिंग क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है।हालांकि भारत में अब विदेशी और निजी क्षेत्र के बैंक सक्रिय हैं। लेकिन एक अनुमान के अनुसार बैंकों की सेवाएँ लेनेवाले लगभग 90 फ़ीसदी लोग अब भी सरकारी क्षेत्र के बैंकों की ही सेवाएँ लेते हैं। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद सेवा क्षेत्र में काफी प्रगति आयी है।
कर्मियों को भी बेहतर सुविधाएं मिली हैं। बैंक में ग्राहक सेवा क्षेत्र में भी काफी विकास हुआ है। बैंक निजी हाथों में था तब कर्मियों को सुविधा नहीं मिल रही थी। राष्ट्रीयकरण के बाद ट्रेड यूनियन एग्रीमेंट के तहत बैंक में दस से पांच बजे तक काम हो रहा है जबकि निजी बैंकों में सुबह 8 से रात 8 तक काम लिया जा रहा है।
इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल के दौरान एक अन्य अहम आर्थिक फ़ैसले में प्रिवी पर्स या राजे रजवाड़ों को दी जाने वाली 'पेंशन' समाप्त कर दी थी।इसके पहले तक लगभग 400 राजघरानों को 1947 के बाद से ही प्रिवी पर्स के रूप में सरकार की ओर से एक धनराशि दी जाती थी।
पूरे देश में आर्थिक विकास या आर्थिक आजादी का दौर वास्तव में 1969 से प्रारंभ हुआ, जब संसद ने राजाओं-नवाबों के प्रिवीयर्स एवं विशेषाधिकार की समाप्ति और बैंकों के राष्ट्रीयकरण का विधेयक पारित किया।
गौरतलब है कि वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने बुधवार को 11 भारतीय वित्तीय संस्थानों की 'बीबीबी-' लांग टर्म (एलटी) फॉरेन करेंसी (एफसी) इशुअर डिफॉल्ट रेटिंग (आईडीआर) के भावी परिदृश्य में संशोधन कर इसे स्थिर से नकारात्मक कर दिया।
इन वित्तीय संस्थानों में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई), आईसीआईसीआई बैंक और पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान शामिल हैं।फिच द्वारा रेटिंग के भावी परिदृश्य में की गई इस कटौती का निवेशकों की संवेदना पर और नकारात्मक असर होगा।
एजेंसी ने हालांकि रेटिंग को बरकरार रखा। एजेंसी के इस कदम से इन संस्थानों के लिए विदेशों से ऋण हासिल करना पहले से अधिक महंगा हो जाएगा।रेटिंग एजेंसी द्वारा जारी बयान के मुताबिक संशोधन से प्रभावित होने वाले संस्थानों में हैं: भारतीय स्टेट बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, बैंक ऑफ बड़ौदा (न्यूजीलैंड) लिमिटेड, कैनरा बैंक, आईडीबीआई बैंक लिमिटेड, आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड, एक्सिस बैंक, एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ऑफ इंडिया, हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड और इंफ्रास्ट्रर डेवलपमेंट फाइनेंस कंपनी लिमिटेड।रेटिंग एजेंसी ने 18 जून को भारत के एलटी फॉरेन एंड लोकल करेंसी आईडीआर के भावी परिदृश्य में संशोधन कर इसे स्थिर से घटाकर नकारात्मक कर दिया था।
प्रमुख वैश्विक रेटिंग एजेंसियों ने पिछले कुछ महीनों में आर्थिक विकास दर घटने और सुधार की कमी के कारण भारत के परिदृश्य में कटौती की है।इस साल अप्रैल में स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने भारत के परिदृश्य को स्थिर से घटाकर नकारात्मक कर दिया था। मूडीज ने पिछले महीने भारत और देश के प्रमुख वित्तीय संस्थानों की रेटिंग को 'सी-' से घटाकर 'डी+' कर दिया।फिच के मुताबिक हालांकि देश के बिगड़ते आर्थिक और वित्तीय परिदृश्य, सुस्त आर्थिक सुधार और महंगाई के दबाव के कारण इन संस्थानों पर और भी दबाव पड़ रहा है, लेकिन एजेंसी ने बैंकों के पास ग्राहकों की समुचित जमा राशि को लेकर राहत जताई।
दूसरी ओर देश के नंबर वन बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) द्वारा लांच किए गए ओवरसीज बांड इश्यू को निवेशकों का शानदार रेस्पांस हासिल हुआ है। डॉलर की अधिकता वाले इस बांड इश्यू के जरिए एसबीआई ने 1.25 अरब डॉलर यानी तकरीबन 7,000 करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई है। एसबीआई के इस बांड इश्यू को मिले शानदार रेस्पांस से अन्य बैंकों व वित्तीय संस्थानों के लिए इस तरह के बांड इश्यू लाने की राह और आसान हो गई है।
एसबीआई के मैनेजिंग डायरेक्टर एवं ग्रुप एक्जीक्यूटिव (इंटरनेशनल बैंकिंग) हेमंत कांट्रेक्टर ने बताया कि हमने बांड बिक्री का काम सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। इसके तहत ट्रेजरी से ऊपर 3.75 फीसदी की दर पर 1.25 अरब डॉलर की राशि जुटाई गई है।उन्होंने बताया कि इस बांड इश्यू को निवेशकों का बहुत अच्छा रेस्पांस मिला। बांड इश्यू में 350 से ज्यादा निवेशकों ने भाग लिया। इन बांड को बैंक जल्द ही सिंगापुर एक्सचेंज में सूचीबद्ध कराएगा।
इश्यू का प्रबंधन संभाल रहे एक अग्रणी बैंक के प्रवक्ता ने बताया कि चुनौतीपूर्ण आर्थिक माहौल के बावजूद एसबीआई के इश्यू को निवेशकों का बहुत अच्छा रेस्पांस हासिल हुआ। उन्होंने बताया कि यह इश्यू 5.2 गुना सब्सक्राइब हुआ और कुल मिलाकर 6.8 अरब डॉलर के निवेश के लिए आवेदन हासिल हुए।
एसबीआई ने इस इश्यू के लिए ड्यूश बैंक, बैंक ऑफ अमेरिका-मैरिल लिंच, बार्कलेज कैपिटल, जेपी मॉर्गन, यूबीएस और सिटीग्रुप को मुख्य बैंकर नियुक्त किया था। ट्रेजरीज से ऊपर 3.75 फीसदी के रेट के हिसाब से देखें तो यह पांच साल की अवधि वाले बांड के सबसे कम रेट में से रहा है। हालांकि, एसबीआई ने इसके लिए ट्रेजरीज से ऊपर चार फीसदी तक का सांकेतिक कूपन रेट दिया था।
एसबीआई का यह सफल ओवरसीज बांड इश्यू अन्य बैंकों व वित्तीय संस्थानों को इस तरह के बांड इश्यू लाने के लिए उत्प्रेरक का काम करेगा। आईसीआईसीआई बैंक व इंडियन ओवरसीज बैंक इसी तरह के बांड इश्यू जारी करने की तैयारी करने के लिए एसबीआई के इश्यू को मिलने वाले रेस्पांस का ही इंतजार कर रहे थे। बांबे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) पर एसबीआई के शेयर का भाव 2.58 फीसदी की गिरावट के साथ2,017 रुपये पर बंद हुआ।
भारत में बैंकिंग का इतिहास काफी प्राचीन है। भारतीयों द्वारा स्थापित प्रथम बैंकिंग कंपनी अवध कॉमर्शियल बैंक (1881) थी। 1940 के दशक में 588 बैंकों की असफलता के कारण कड़े नियमों की जरूरत महसूस की गई। फलस्वरूप बैंकिंग कंपनी अधिनियम फरवरी 1949 में पारित हुआ, जो बाद में बैंकिंग नियमन अधिनियम के नाम से संशोधित हुआ।
19 जुलाई, 1969 को 14 प्रमुख बैंकों (जिनमें जमा राशि 50 करोड़ रु. से अधिक थी) का राष्ट्रीयकरण किया गया। बाद में अप्रैल 1980 में 6 और बैंकों का भी राष्टरीयकरण किया गया। राष्टरीयकरण के बाद के तीन दशकों में देश में बैंकिंग प्रणाली का असाधारण गति से विस्तार हुआ- भौगोलिक लिहाज से भी और वित्तीय विस्तार की दृष्टिï से भी। 14 अगस्त, 1991 को एक उच्च-स्तरीय समिति वित्तीय प्रणाली के ढांचे, संगठन, कामकाज और प्रक्रियाओं के सभी पहलुओं की जाँच करने के लिए नियुक्त की गई। एम. नरसिंहम की अध्यक्षता में बनी इस समिति की सिफारिशों के आधार पर 1992-93 में बैंकिंग प्रणाली में व्यापक सुधार किए गए।
हाल में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा किये गये एक स्ट्रेस टेस्ट के अनुसार भारतीय बैंकिंग प्रणाली किसी भी तरह के आर्थिक संकट और ऊँची नॉन-परफॉर्र्मिंग परिसंपत्तियों के झटकों को सहन करने में पूरी तरह से सक्षम है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास सोने का दुनिया में 10वां सबसे बड़ा भंडार है। नवंबर 2009 में रिजर्व बैंक ने 6.7 अरब अमेरिकी डॉलर की लागत से अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से 200 मीट्रिक टन सोने की खरीद की थी। इस खरीद से उसके विदेशी मुद्रा कोष में गोल्ड होल्डिंग्स की हिस्सेदारी बढ़ गई है। पहले गोल्ड होल्डिंग्स की हिस्सेदारी इसमें 4 प्रतिशत थी जो अब बढ़कर 6 प्रतिशत हो गई है।
यूनाईटेड किंगडम स्थित ब्रांड फाइनेंस द्वारा किये गये वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग अध्ययन के अनुसार 20 भारतीय बैंकों को ब्रांड फाइनेंस ग्लोबल बैंकिंग 500 की सूची में शामिल किया गया है। वस्तुत: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया भारत की ऐसी पहली बैंक बन गई है जिसे दुनिया की पचास बैंकों की सूची में स्थान मिला है। इसे पचास बैंकों के मध्य 36वां स्थान मिला है। 2009 में जहां स्टेट बैंक की ब्रांड वैल्यू 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर थी वहीं यह 2010 में 4.6 अरब डॉलर हो गई है। आईसीआईसीआई बैंक को दुनिया की 100 श्रेष्ठ बैंकों की सूची में स्थान मिला है। इसकी ब्रांड वैल्यू 1.3 अरब अमेरिकी डॉलर है।
बैंकों का वित्तीय प्रदर्शन
भारत की अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की 2008-09 की बैलेंस शीट यह दर्शाती हैं कि इनकी वित्तीय स्थित काफी संतोषजनक है। लेकिन ये बैंकें भी ग्लोबल आर्थिक संकट से पूरी तरह से अछूती नहीं रही थीं।
मार्च 2009 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की कांसॉलीडेटेट बैलेंस शीट यह दर्शाती हैं कि इनकी वृद्धि दर 21.2 प्रतिशत रही। जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में वृद्धि दर 25.0 प्रतिशत रही थी। सार्वजनिक क्षेत्रों की बैंकों में जहां वृद्धि दर सकारात्मक रही वहीं निजी व विदेशी बैंकों ने नकारात्मक वृद्धि दर दर्ज की। ग्लोबल आर्थिक संकट के दौरान अधिकांश लोगों ने अपने पैसे को सार्वजनिक क्षेत्रों की बैंकों में जमा करना मुनासिब समझा। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की डिपॉजिट और क्रेडिट के विषय में रिजर्व बैंक की तिमाही आंकड़ों के संबंध में जारी रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल आर्थिक संकट के दौरान राष्ट्रीयकृत बैंकों, विदेशी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के डिपॉजिट क्रमश: 17.8 प्रतिशत, 5.6 प्रतिशत और 3.0 प्रतिशत रहे।
जहां तक सकल बैंक क्रेडिट का सवाल है, राष्ट्रीयकृत बैंकों ने देश में बैंकों द्वारा बांटे गये ऋण का 50.5 प्रतिशत बांटा। इसमें भी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने 23.7 प्रतिशत ऋण बांटा। विदेशी बैंकों व क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने क्रमश: 5.5 प्रतिशत और 2.5 प्रतिशत ऋण ही बांटे।
रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की देश में कुल 34,709 शाखाएं हैं।
पूंजी पर्याप्तता अनुपात (Capital Adequate Ratio)
भारतीय बैंकिंग प्रणाली ने ग्लोबल आर्थिक संकट का डटकर मुकाबला किया है। यह उसके सुधरे हुए पूंजी पर्याप्तता अनुपात से जाहिर होता है। मार्च 2009 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के पूंजी पर्याप्तता अनुपात में 13.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई। जबकि भारतीय रिजर्व बैंक के आदेशों के अनुसार इसे कम-से-कम 9.0 प्रतिशत होना अनिवार्य है।
भारत में अनुसूचित बैंकों की सूची
इलाहाबाद बैंक- देश की सबसे पुरानी सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक
आंध्र बैंक
बैंक ऑफ बड़ौदा
बैंक ऑफ इंडिया
बैंक ऑफ मदुरा
बैंक ऑफ महाराष्ट्र
बैंक ऑफ पंजाब
बैंक्यू नेशनाले डि पेरिस-इंडिया- अग्रणी ग्लोबल बैंक जो कार्पोरेट व विदेशी संस्थागत निवेशकों को सेवा प्रदान करती है
केनरा बैंक
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया- यह एक वाणिज्यिक बैंक है जो क्रेडिट, डिपॉजिट और इंटरनेशनल बैंकिंग सुविधा उपलब्ध कराती है
सेंचुरियन बैंक लिमिटेड
सेंचुरियन बैंक
सिफर सिक्योरिटीज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड- यह एक इन्वेस्टमेंट बैंक है जो प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपीटल के द्वारा फंड इकठ्ठा करती है
सिटी बैंक- यह एक ग्लोबल कन्ज्यूमर बैंक है
कार्पोरेशन बैंक
कॉस्मोस बैंक- मल्टीस्टेट सिड्यूल्ड कोऑपरेटिव की सेवाएं प्रदान करती है
देना बैंक
डेवलपमेंट क्रेडिट बैंक
एक्जिम बैंक अथवा एक्पोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ऑफ इंडिया
फेडरेल बैंक लिमिटेड
गार्जियन सहकार बैंक नियामिता- समाज के कमजोर वर्र्गों को वित्तीय सेवा व लोन प्रदान करने वाली कोऑपरेटिव बैंक
ग्लोबल ट्रस्ट बैंक- प्राइवेट बैंकिंग फर्म
एचडीएफसी बैंक लिमिटेड- अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक जो नेट बैंकिंग और कंज्यूमर लोन के क्षेत्र में विशेष रूप से सक्रिय है
हरियाणा स्टेट कोऑपरेटिव एपेक्स बैंक लिमिटेड
आईसीआईसीआई बैंक (द इंडस्ट्रियल क्रेडिट एंड इन्वेस्टमेंट कार्पोरेशन लिमिटेड ऑफ इंडिया
आईडीबीआई बैंक- आईडीबीआई और सिडबी द्वारा प्रोमोट की जाने वाली प्राइवेट सेक्टर बैंक
इंडियन बैंक
इंडियन ओवरसीज बैंक
इंडसइंड बैंक लिमिटेड- प्रमुख प्राइवेट सेक्टर बैंकिंग कंपनी
इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया- औ ोगिक और वित्तीय वृद्धि को प्रोमोट करने वाली बैंक
इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड (आईआईबीआई)
जम्मू-कश्मीर बैंक
जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड- निजी क्षेत्र की बैंक
कल्याण बैंक
कपोल कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड
लक्ष्मी विलास बैंक
मांडवी कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड- कोऑपरेटिव सेक्टर का बैंकिंग संगठन
नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलरमेंट- कृषि क्षेत्र को ऋण उपलब्ध कराने वाली बैंक
नेशनल हाउसिंग बैंक- गृह वित्त संस्थानों को प्रोमोट करने वाली बैंक
ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स- मर्र्चेंट बैंकिंग, अनिवासी भारतीयों को सेवा देने वाली और रूरल बैंकिंग के क्षेत्र में सक्रिय राष्ट्रीयकृत बैंक
पंजाब नेशनल बैंक
पंजाब एंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक प्राइवेट लिमिटेड
पंजाब एंड सिंध बैंक
रत्नाकर बैंक लिमिटेड- नेट बैंकिंग और लॉकर सुविधा देने वाली बैंक
सारस्वत कोऑपेरटिव बैंक लिमिटेड- कार लोन देने वाली अनुसूचित बैंक
एसबीआई कैपीटल मार्केट्स लिमिटेड
स्माल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया- लघु उ ोगों को ऋण देने वाला बैंक
स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
स्टेट बैंक ऑफ इंदौर
स्टेट बैंक ऑफ मैसूर
स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र
स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर
सिंडीकेट बैंक
यूनाईटेड कॉमर्शियल बैंक
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया
यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया
यूनाईटेड बैंक ऑफ इंडिया
विजया बैंक
निजी बैंक
वर्ष 1993 में बैंकिंग प्रणाली में अधिक उत्पादकता और कुशलता लाने के लिए भारतीय बैंकिंग प्रणाली में निजी क्षेत्र को नए बैंक खोलने की अनुमति दी गई। इन बैंकों को अन्य बातों के साथ निम्नलिखित न्यूनतम शर्तों को पूरा करना था-
(i) यह बैंक एक पब्लिक लि. कंपनी के रूप में पंजीकृत हो; (ii) न्यूनतम प्रदत्त पूँजी 100 करोड़ रु. हो, बाद में इसे बढ़ाकर 200 करोड़ कर दिया गया; (iii) इसके शेयर स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हों; (iv) बैंक का कामकाज, हिसाब-किताब या लेखा तथा अन्य नीतियाँ भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा निर्धारित विवेकपूर्ण मानकों के अनुरूप हों।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक
प्रथम राष्ट्रीयकरण- 19 जुलाई, 1969 को 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया-
बैंक ऑफ इंडिया
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया
बैंक ऑफ बड़ौदा
बैंक ऑफ महाराष्ट्र
पँजाब नेशनल बैंक
इंडियन बैंक
इंडियन ओवरसीज़ बैंक
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया
केनरा बैंक
सिंडीकेट बैंक
यूनाइटेड कॉमर्शियल बैंक
इलाहाबाद बैंक
यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया
देना बैंक
द्वितीय राष्टरीयकरण- 15 अप्रैल, 1980 को 6 अन्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया-
आंध्र बैंक
कॉर्पोरेशन बैंक
न्यू बैंक ऑफ इंडिया
ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स
पँजाब एंड सिंध बैंक
विजया बैंक
अक्टूबर 1993 में न्यू बैंक ऑफ इंडिया का विलय पँजाब नेशनल बैंक में कर दिया गया। वर्तमान में देश में 19 राष्ट्रीयकृत बैंक हैं।
स्टॉक मार्केट
भारतीय स्टॉक मार्केट में कुल 22 स्टॉक एक्सचेंज हैं। इनमें से बांबे स्टॉक एक्सचेंज, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज और ओवर द काउंटर स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया प्रमुख स्टॉक एक्सचेंज हैं। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के अनुसार देश में 13 अगस्त 2009 तक कुल 1680 पंजीकृत विदेशी संस्थागत निवेशक थे। इस अवधि तक इन निवेशकों ने कुल 65.5 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था।
ब्लूमरैंग द्वारा जारी किये गये आंकड़ों के अनुसार 31 दिसंबर 2009 तक भारतीय स्टॉक मार्केट का कुल बाजार पूंजीकरण विश्व के कुल बाजार पूंजीकरण का 2.8 प्रतिशत था। वर्ष 2009 के दौरान कुल 4.18 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के 21 आईपीओ बाजार में उतारे गये जबकि इसकी तुलना में 2008 में कुल 3.62 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के 36 आईपीओ जारी किये गये।
बांबे स्टॉक एक्सचेंज
बांबे स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना 1875 में की गई थी। यह एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज है। अधिसूचित कंपनियों के लिहाज से बीएसई विश्व का पहले नंबर का स्टॉक एक्सचेंज है। इसमें कुल 5,500 कंपनियां अधिसूचित हैं। 31 दिसंबर 2007 तक इसका कुल बाजार पूंजीकरण 1.79 खरब अमेरिकी डॉलर था।
बीएसई का सूचकांक सेंसेक्स 30 कंपनियों के शेयरों से निर्धारित होता है। इसमें सीमेंट, दूरसंचार, रियल इस्टेट, बैंकिंग, आईटी, निर्माण, आटोमोबाइल, ऑयल, फार्मास्युटिकल्स, ऊर्जा और स्टील क्षेत्र की प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। सेंसेक्स में शामिल प्रमुख कंपनियां हैं- इंफोसिस टेक्नोलॉजीस, रिलायंस, टाटा स्टील, टाटा पावर, टाटा मोटर्स। एक्सचेंज में कुल 22 सूचकांक हैं जिसमें 12 सेक्टर शामिल हैं।
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज
प्रतिदिन के टर्नओवर के लिहाज से नेशनल स्टॉक एक्सचेंज देश का सबसे बड़ा सिक्योरिटी एक्सचेंज है। 19 मई, 2009 को एनएसई का कुल टर्नओवर 8.33 अरब रु. था। 1992 से ही एनएसई में एक एडवांस्ड आटोमेटेड इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग सिस्टम है जिसे देश के 1486 जगहों से एक्सेस किया जा सकता है। जून 1994 से एनएसई ने थोक ऋण बाजार सेगमेंट में अपना ऑपरेशन शुरू कर दिया था। नवंबर 1994 से इक्विटी सेगमेंट की शुरूआत हो गई जबकि डेरीवेटिव्स सेगमेंट की शुरूआत जून 2000 से हो गई। निफ्टी एक्सचेंज में 20 बैंक और बीमा कंपनियां शामिल हैं।
निफ्टी सूचकांक का निर्धारण 21 उ ोगों की 50 कंपनियों द्वारा होता है। इसमें सीमेंट, दूरसंचार, फार्मास्युटिकल्स, बैंकिंग, आटोमोबाइल, निर्माण, अल्युमिनियम, तेल खोज, गैस व वित्त क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं। प्रमुख कंपनियों में भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स, भारती एयरटेल, केर्न इंडिया, गेल, हीरो होंडा मोटर्स, हिंदुस्तान यूनीलीवर, हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनेंस कार्पोरेशन और इंफोसिस टेक्नोलॉजीस शामिल हैं।
ओवर द काउंटर एक्सचेंज
1990 में स्थापित ओवर द काउंटर एक्सचेंज ऑफ इंडिया देश का एकमात्र ऐसा एक्सचेंज है जो पिछले तीन साल से कार्यरत लघु व मध्यम श्रेणी की कंपनियों को कैपीटल मार्केट से पैसे उठाने में मदद देता है।
भारतीय प्रतिभूति व विनिमय बोर्ड
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की स्थापना 12 अप्रैल 1992 को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के प्रावधानों के तहत की गई। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड देश का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज है। एनएसई प्रतिभूति बाजार में परिवर्तन के लिए एजेंडा तय करने में लगा हुआ है।
पिछले पांच वर्र्षों में सेबी के प्रयासों की वजह से देश के 363 शहरों के निवेशक बाजार से ऑनलाइन जुड़े हैं। साथ ही बाजार में पूर्ण पारदर्शिता, वित्तीय लेन-देन के निपटारे की गारंटी, वैज्ञानिक तरीके से डिजाइन और व्यावसायिक तौर से प्रबंधित संकेतकों का प्रचलन और देश भर में डिमैट का प्रचलन संभव हो सका है।
- खेती पर संकट गहराया,औद्योगिक उत्पादन ढीला!
- अर्थ व्यवस्था-शेयर बाजार बदहाल, राजनीतिक दल मालामाल!
- अब तो सारा देश ही गिरवी!
- पोर्न स्टार को नागरिकता,जन्मजात को देश निकाला
- पेट्रोल बम से झुलसे देश को राहत का छलावा
- तो क्या सो रहे थे मुखर्जी?
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- सूखा और सामाजिक सरोकार के बीच महाराष्ट्र
- कार्टून से दुरुस्त होती कांग्रेसी समीकरण!
- रुपए की गिरावट जारी, RBI का सहारा
- मरे लोगो की बुलंद होती आवाज गवारा नहीं
- आतंकवाद युद्ध के शिकार खान!
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- छलावों के बावजूद वित्तीय वर्ष भारी होगा
- फिर चमकने लगी छंटनी की तलवार
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- तेल कंपनियों पर भी प्रणव होंगें क्रूर!