Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg

Unique Identity No2

Please send the LINK to your Addresslist and send me every update, event, development,documents and FEEDBACK . just mail to palashbiswaskl@gmail.com

Website templates

Zia clarifies his timing of declaration of independence

What Mujib Said

Jyoti basu is DEAD

Jyoti Basu: The pragmatist

Dr.B.R. Ambedkar

Memories of Another Day

Memories of Another Day
While my Parents Pulin Babu and basanti Devi were living

"The Day India Burned"--A Documentary On Partition Part-1/9

Partition

Partition of India - refugees displaced by the partition

Wednesday, March 30, 2016

कांग्रेस वाम गठबंधन की बढ़त जारी,जंगल महल की मुस्कान दीदी के लिए जहरीली होने लगी। संघ ने संभाला दीदी के खिलाफ मोर्चा और मजबूर दीदी चूं तक नहीं कर रही,उल्टे वामनेताओं को धमकाने लगी हैं! बंगाल में नूरा कुश्ती लाजवाब! एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास



कांग्रेस वाम गठबंधन की बढ़त जारी,जंगल महल की मुस्कान दीदी के लिए जहरीली होने लगी।

संघ ने संभाला दीदी के खिलाफ मोर्चा और मजबूर दीदी चूं तक नहीं कर रही,उल्टे वामनेताओं को धमकाने लगी हैं!

बंगाल में नूरा कुश्ती लाजवाब!

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

हस्तक्षेप संवाददाता

बंगाल में हर जिले तहसील में वाम कांग्रेस गठबंधन की बढ़त जारी है।पिछले चुनावों में दीदी की भारी जीत में कांग्रेस का समर्थन निर्णायक रहा है,कमसकम दीदी से बेहतर इसे कोई और समझ नहीं सकता।


अब हालात यह है कि पहले दौर के चुनाव के लिए जंगल महल में केंद्रीयवाहिनी की लामबंदी के बीच वहां अब भी सक्रिय माओवादी दीदी को हर कीमत पर हराने की कोशिश में लगे हैं।


गौरतलब है कि  कल तक दीदी की जीत में माओवादी खास मददगार थे,जैसा तृणमूल के पूर्व सांसद कबीर सुमन ने भी खुलासा किया है और नंदीग्राम सिंगुर की जंग जितने में माओवादी हाथ अब साफ साफ है।


किशनजी की पुलिसिया मुठभेड़ में मार गिराने की कार्रवाई को माओवादी दीदी की तरफ से विश्वासघात मानते हैं तो पिलिसियाअत्याचार विरोधी समिति के नेताओं को माओवादी ब्राडिंग के साथ जेल के सींखचों में डालकर जंगलमहल की मुस्कान के बावजूद वहां सैन्यशासन जैसी परिस्थितियों से भी माओवादी ज्यादा खुश नहीं हैं।


जंगल महल को जानने वाले समझते ही होंगे कि माओवादी समर्थन का मतलब क्या होता है।


जंगल महल जीतने के लिए दीदी को फिर उसी माओवादी समर्थन की सबसे ज्यादा जरुरत है जो मिलने के आसार नहीं है।


झारखंड से जुड़े पुरुलिया और बांकुड़ा के अलावा मेदिनीपुर में भी कांग्रेस का आधार बहुत मजबूत रहा है।


इसे ऐसे समझिये कि एकेले मेदिनीपुर जिले में आजादी की लड़ाई में करीब साढ़े तीन सौ महिला कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागेदारी रही है।अब चाचा ज्ञानसिंह सोहनपाल वहा काग्रेस के निर्विवाद आदरणीय नेता हैं।


दूसरी तरफ इसी जंगल महल में माओवादी वर्चस्व कायम होने से पहले तक वाम दलों का एकाधिकार रहा है।


अब जो समीकरण बना है ,उसके मुताबिक दीदी को जिताने वाले माओवादी उनके साथ नहीं है तो दूसरी तरफ कांग्रेस और वाम गठबंधन का साझा प्रचार अभियान जंगल महल में फिर तिरंगे और लेल झंडे की वसंत बहार है।


इस पर तुर्रा यह कि शंग परिवार का वरदहस्त हट जाने से जैसे तैसे चुनाव जीत लेने के मौके भी बन नहीं रहे हैं।


यही वजह है कि वाम और कांग्रेस के खिलाफ दिनोदिन आक्रामक शेरनी की तरह दहाड़ती दीदी नरेंद्र मोदी और अमित साह से लेकर राहुल सिन्हा तक के सीधे हमले के खिलाफ मंतव्य करने से बच रही हैं।


भाजपा के पास ममता पर हमला करने के सिवाय कोई विकल्प अब बचा नहीं है वरना बंगाल तो क्या पूर्वी भारत में कहीं भी पांव ऱकने की कोई जगह बची नहीं रहेगी संघ परिवार के लिए।


दीदी लेकिन इन मुश्किल हालात में केंद्र सरकार या संघ परिवार का दामन छोड़ने का जोखिम उठा नहीं सकती।


बहरहाल बंगाल के चुनाव नतीजे पीछे के रास्ते राज्यों की सत्ता दखल कर लेने के संघी मंसूबे और यूपी जीत लेने की तैयारी पर बेहद खराब असर डाल सकता है।


इससे वाकिफ बजरंगी ब्रिगेड ने अब देर सवेर ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया है।


शारदा चिटफंड मामले में सुदीप्तो और देवयानी को हिरासत में लेने के बाद विधाननगर कमिश्नरेट के तत्कालीन कमिश्नर राजीव कुमार ने पहले ही झटके में इस मामले में फंसे आदरणीय बिरादरी के खिलाफ सबूत मिटाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी।


अब नये सिरे से जनादेश हासिल करने के अभियान में वे राजीव कुमार ही दीदी के पिलिसिया सिपाहसालार है,जिससे नत्थी है तृणमूल की सबकुछसफाया कर देने की वोट मशीन।


राजीव कुमार इस वक्त कोलकाता पुलिस कमिश्नर हैं और भाजपा नेता राहुल सिन्हा को स्टिंग आपरेशन में खुफिया पुलिस के जरिये फंसाने के आपरेशन उन्हीं का बताया जा रहा है।


अब दिल्ली और कोलकाता में सक्रिय भाजपा नेताओं ने इन्ही राजीव कुमार पर निशाना साधा,जिनपर सबकुछ जानते हुए शारदा मामला रफा दफा करने के सिलसिले में भाजपाइयों ने चूं तक नहीं की।जिस वजह से बहुत हिलाने डुलाने का दिखावा के बावजूद कटघरे में खड़े तमाम चेहरे उसी तरह रिहा है जैसे नारद स्टिंग मामले में कोई कार्वाई नही हुी है जबकि इसके उलट स्टिंग के बहाने उत्तराखंड में हरीश रावत का तख्ता पलट हो गया रातोंरात।


दीदी की हालत कितनी नाजुक है ,इसीसे समझ लीजिये कि अपने कस सिपाहसालार को बचाने की बजायउनकी कोशिश यह है कि राजीव कुमार जायें तो जायें,केंद्र सरकार और चुनाव आयोग उनकी वोट मशीनरी के किसी और खास आदमी को वहां बैठाने की इजाजत दे दें।ऐसा ही होने जा रहा है।


इसमें कुल निष्कर्ष यह है कि सत्ता में भागेदारी के लिहाज से भले ही पूरे देश में वामदल हाशिये पर हों,लेकिन जमीन पर आंदोलन और प्रतिरोध के मामले में संघ परिवार के मुकाबले में सिर्फ वामदल ही मैदान में है।इसलिए संघ परिवार का असली दुश्मन वाम है।


जाहिर है अपना घर बचाने की कवायद में लगी भाजपा को यह भी देखना होगा कि जनता को समझा लेने के बाद कहीं ऐसी गुंजाइसश न बन जाये कि दीदी सचमुच हार न जायें और बंगाल में कांग्रेस वाम गठबंधन का फार्मूला बाकी देश में संघ परिवार को कचरापेटी में डाल न दें।


जाहिर है कि इस नूरा कुश्ती का अंजाम भी मधुरेन समापन बनाने की पूरी कोशिश संघ परिवार की होगी।दीदी पर हमले के बावजूद उसका अंतिम लक्ष्य लेकिन कांग्रेस वाम गठजोड़ को फेल करके फिर दीदी की ताजपोशी करना है।


इस खेल को समझने में भूल हुई तो इसका असर भी चुनाव नतीजे पर होना है।


भाजपा के औचक बंगाल में सत्रह फीसद वोट पाने के पीछे मोदी दीदी का गठबंधन काम कर रहा था।


कमसकम इस चुनाव में चाहे कांग्रेस वाम गठबंधन जीते या न जीते,दीदी के साथ मधुर संबंध गुपचुप तालमेल से संघ परिवार को कोई फायदा नहीं है,यह समझने में शंग परिवार ने देर नहीं लगायी है और दीदी के खास सिपाहसालार को ही शुली पर चढ़ाने की तैयारी है।जाहिर है कि सिपाहसालार की बलि चढ़कर दीदी को बचा लेने की यह कवायद है।दीदी भी इसे बेहतर समझ रही होंगी और चुप हैं।


--
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

सिपाही भाइयों के नाम खुला पत्र हिमांशु कुमार

सिपाही भाइयों के नाम खुला पत्र

हिमांशु कुमार
बी०एस०एफ० के पूर्व प्रमुख ई० एस० राम मोहन एक दिन हमारे घर आये| उन्होंने एक किस्सा सुनाया| एक बार वो आँध्रप्रदेश में सी०आर०पी०एफ० के किसी कार्यक्रम में बोल रहे थे| वहाँ उन्होंने कहा कि हमें हिंसा कम करने के लिए नक्सलियों से वार्ता करनी चाहिए| इस पर सी०आर०पी०एफ० के लोग बिफर गये और बोले वो हमें मारने के लिए हमारे नीचे बारूदी सुरंग बिछाते हैं, हम उनसे बात कैसे कर सकते हैं? राम मोहन जी ने कहा कि आप यहाँ किसकी रक्षा करने आये हो? और किसकी रक्षा कर रहे हो? आंध्रप्रदेश में क़ानूनी तौर पर कोई भी तीस एकड़ से ज्यादा जमीन नहीं रख सकता| लेकिन जमींदारों ने कई - कई हजार एकड़ जमीन अपने पास रखी हुई है| आप कानून तोड़ने वाले जमींदारों की रक्षा करते हो| जिस दिन आप जमींदारों को कहोगे कि हम आपको ये गैर क़ानूनी जमीन नहीं रखने देंगे| और आप वो जमीन गांव के गरीबों में बंटवा दोगे, उस दिन से आपके नीचे बारूदी सुरंगे लगनी बन्द हो जायेंगी| गरीब के खिलाफ काम करोगे, कानून के खिलाफ काम करोगे संविधान के खिलाफ काम करोगे तो लोग आप पर हमला करेंगे ही? देश के हर सिपाही को, हर सैनिक को अपने आप से पूछना चाहिये कि वो किसका सैनिक है? उसे किसकी तरफ से लड़ना है और किसके खिलाफ लड़ना है| 
ये वही राम मोहन जी हैं जिन्हें दंतेवाडा में छिहत्तर सी आर पी एफ के सिपाहियों के मरने पर भारत सरकार ने जांच करने के लिए भेजा था ! और आज तक सरकार की हिम्मत नहीं हुई कि उनकी दी हुई रिपोर्ट प्रकाशित करने कर सके !

आज हमारे सिपाही किससे लड़ रहे हैं? क्या बेईमान अमीरों से ? भ्रष्ट नेताओं से ? नहीं, आज हमारे सिपाही लड़ रहे हैं गरीबों से, आदिवासियों से, दलितों से, अपना हक़ मांगने वाली महिलाओं से | यानि सिपाही लड़ रहे हैं देश के विरुद्ध, क्योंकि ये करोड़ों गरीब, दलित, आदिवासी महिलाएं ही देश हैं| और रक्षा कर रहे हैं अमीरों और नेताओं की| यानि हमारे सिपाही मुट्ठी भर गलत लोगों की तरफ से करोड़ों देशवासियों के खिलाफ लगातार युद्ध में लगे हुए हैं | क्या एक गरीब व्यक्ति पुलिस को अपना रक्षक मानता है? क्या एक गांव की आदिवासी लडकी अपनी इज्जत बचाने के लिये पुलिस थाने की शरण ले सकती है? सब जानते हैं कि आप रेहड़ी वालों से ,खोमचे वालों से , रिक्शे वालों से , रेल की पटरी पर फेंकी हुई पुरानी पानी की बोतलें बीनने वाले बच्चों से भी पैसे वसूलते हैं ! क्या यही क़ानून की रक्षा है ? क्या यही देश भक्ति है ? खुद से पूछिये इनके जवाब?

अगर आप में से किसी में भी साहस है सत्य और कानून का साथ देने का तो मैं आपको कुछ वारंट देता हूँ कुछ बलात्कारी पुलिसवालों के खिलाफ | इन्होने उसी इलाके में बलात्कार किये हैं जिस इलाके में छियत्तर जवानों की जान गयी ! ये बलात्कारी पुलिस वाले आज भी खुलेआम छत्तीसगढ़ के दोरनापाल थाने में रहते हैं| हर महीने तनख्वाह लेते हैं| लेकिन सरकार कोर्ट में कहती है कि ये फरार हैं| आइये, कानून को लागु कीजिये, पकड़िये इन्हें और कोर्ट को सौंप दीजिये| मान लेंगे हम कि आप बहुत वीर सैनिक हैं| लेकिन आपकी बहादुरी तो नियमगिरी की पहाड़ी पर रहने वाले आदिवासियों के पूरे के पूरे गांव पर धारा ३०२ लगाने में दिखाई देती है| आपकी बहादुरी उड़ीसा के जगतसिंहपुर की तीन गांव की हर महिला पर फर्जी मुकदमे लगा देने में दिखाई देती है जो पोस्को नामक विदेशी कम्पनी को अपनी जमीन देने का विरोध करने के लिये जमीन पर लेट कर सत्याग्रह कर रही हैं|

आपकी नियुक्ति भारत के संविधान की रक्षा के लिये हुई है| लेकिन आप रोज संविधान तोड़ने वालों का साथ देते हैं और आप रोज संविधान लागू करने वालों पर हमला करते हैं| भारत का संविधान कहता है आदिवासियों की जमीने आदिवासियों की ग्राम सभा की अनुमति के बिना सरकार नहीं ले सकती| लेकिन पूरे आदिवासी क्षेत्रों में पुलिस की बंदूक के बल पर ये भ्रष्ट नेता, उद्योगपतियों से पैसा खाकर आदिवासियों की जमीने छीन रहे हैं| आप इन नेताओं के लिये संविधान तोड़ते हैं | जबकि आपको इन नेताओं की छाती पर बंदूक टिकाकर बोलना चाहिये कि मिस्टर चीफ मिनिस्टर मैं आपको भारत का संविधान नहीं तोड़ने दूँगा| और जिस दिन आपकी बंदूक भ्रष्ट नेता के खिलाफ उठेगी उसी दिन नक्सलवाद समाप्त हो जायेगा|
विदेशी कम्पनियाँ इस देश की जमीने हथिया रही हैं,! ये विदेशी सौदागर इस देश के खनिज की दौलत को लूट रहे हैं किसके दम पर ? आपके दम पर | आप इस देश को लूटने वाली कम्पनियों का साथ दे रहे हैं ! यही काम तो आजादी से पहले अंग्रेजों की पुलिस ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिये करती थी| तो आप आजादी के बाद फिर से गुलामी ला रहे हैं ? और जो जनता इस देश की दौलत को इन कम्पनियों की लूट से बचाने के लिये लड़ रही है, आप उस जनता पर गोली चला रहे हो ? ये देश भक्ति है ?
आप सोचते हैं आप लालची नेताओं, भ्रष्ट अमीरों के आदेश पर गरीबों को मारने जाओगे और अगर गरीब खुद को बचाने के लिये पलट कर आपको मार देगा तो हम आपके लिये आँसू बहायेंगे | बिलकुल नहीं | हम गरीबों के साथ हैं | हम अत्याचारी के खिलाफ हैं | और आप अत्याचारी के साथ खड़े हैं ! तो एक गाँधीवादी के नाते मैं आपको सलाह देता हूँ कि आप तुरंत अत्याचारी को छोड़कर गरीब जनता की तरफ आ जाइये| संविधान की तरफ आइये ! देश की तरफ आइये ! हम आपके मानवाधिकारों के लिए तो लड़ सकते हैं लेकिन आपके बन्दूकाधिकार के लिए बिलकुल नहीं !



--
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

मुसलमानों को भले ही आप भारत माता की संतान न मानते हों,लेकिन दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों और गरीब सवर्णों को क्या आप भारत माता की संतान मानते हैं? पलाश विश्वास

 मुसलमानों को भले ही आप भारत माता की संतान न मानते हों,लेकिन दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों और गरीब सवर्णों को  क्या आप भारत माता की संतान मानते हैं?
पलाश विश्वास
मन बेहद कच्चा कच्चा हो रहा है।सत्तर साल पहले आजादी मिलने के बावजूद हमारी राष्ट्रीयता इतनी कमजोर है कि कुछ प्रतीकों और कुछ मिथकों में ही राष्ट्र,लोकतंत्र और मनुष्यता,धर्म और संस्कृति ,इतिहास और विरासत,मनुष्यता और सभ्यता कैद हो गयी।हम दीवारों को तोड़ने के बजाये रोज नये नये कैदगाह बना रहे हैं।गैस चैंबर में तब्दील कर रहे हैं पूरे मुल्क को और मुल्क सिर्फ राजनीतिक नक्शे और सत्ता की राजनीति के दायरे में दम तोड़ रहा है।जिस भारतवर्ष की अवधारणा विविध संस्कृतियों,नस्लों और संप्रदायों और भाषाओं के बावजूद मनुष्यता और सभ्यता के मूल्यों से बनी थी,जिसे हमारे पुरखों ने अग्रेजी हुकूमत से आजादी मिलने के बाद भारतीय संविधान के तहत समता और न्याय,नागरिक और मानवाधिकार,मनुष्य और प्रकृति के तादात्म्य.प्राकृतिक संसाधनों के न्यायपूरण बंटवारे के आर्थिक लक्ष्य के साथ हकीकत की जमीन पर वंचितों और उत्पीड़ितों,बहिस्कृतों,अछूतों और अल्पसंख्यकों के संवैधानिक रक्षाकवच और लोकतंत्र के संघीय ढांचे में विविध लोकतांत्रिक संस्थानों,स्थानीय स्वायत्तता और नैसर्गिक कृषि व्यवस्था के साथ औदोगीकरण और सतत विकास की परिक्लपना के तहत तामील करने की सुनिश्चित दिशा तय की थी,वह सबकुछ बिखरकर किरचों में टूटकर हमें ही लहूलुहान कर रहा है और हम खून की नदियों में मुक्तबाजार का उत्सव मना रहे हैं अस्मिताओं, पहचानों, मिथकों के आधार पर रंगभेदी जातिवादी वर्चस्व के एकाधिकारवादी निरंकुश सत्ता का अंध प्रजाजन बनकर जिसमें नागरिकता का कोई विवेक या साहस है ही नहीं,मनुष्यता और सभ्यता के मूल्यभी बचे नहीं है।जिन आस्थाओं के नाम यह सारा कारोबार गोरखधंधा है,उनके शाश्वत मूल्यों के विरुद्ध है पशुवत हिंसक यह घृणासर्वस्व राष्ट्रवाद।

किसी व्यक्ति या संगठन को दोष देकर शायद ही इस आत्मघाती तिलिस्म को तोड़ पाना असंभव है।आज अपने भीतर झांकने की जरुरत है कि क्या हमारा अंध राष्ट्रवाद का यह हिंसक धर्मोन्माद और आधिपात्यवादी ब्राह्मणवाद का मनुस्मृति आधिपात्य हमारी मनुष्यता,हमारी आस्था .हमारी लोक विरासत,हमारी भाषा और संस्कृति के मुताबिक है या नहीं।जो पढे़ लिखे समृद्ध और नवधनाढ्य मध्यम वर्ग का महत्वाकांक्षी तबका आजादी के बाद बना है,हमें इसकी पड़ताल करनी चाहिए आजादी के पहले जो स्वतंत्रता संग्राम में सबकुछ न्योच्छावर कर देने को तैयार हमारे पुरखे रहे हैं,उनकी विरासत का हम क्या बना बिगाड़ रहे हैं।
भारत माता का प्रतीक बहुत पुराना भी नहीं है।सन्यासी विद्रोह के दौरान भारत माता का यह प्रतीक बना,जिसे इस देश के अल्पसंख्यकों ने कभी स्वीकारा नहीं है।क्योंकि यह मिथक हिंदुत्व का प्रतीक भी है,जिसमें देश को हिंदू देवी के रुप में देखा जाता है।इसे लेकर बहुत विवाद भी हुआ हो,ऐसा भी नहीं है।जैसे जो लोग सरस्वती वंदना को अनिवार्य मानते हैं,उन्हें सरस्वती वंदना की स्वतंत्रता है और जो नहीं मानते उनके लिए सरस्वती वंदना अनिवार्य नहीं है।
भारतमाता की जय का उद्घोष अब तक अनिवार्य नहीं है।लोग अपनी अपनी आस्था के मुताबिक इन प्रतीकोे के साथ जुड़े हैं या नहीं भी जुड़े हैं।भारतीय संविधान ने किसी धार्मिक प्रतीक किसी समुदाय पर थोंपा भी नहीं है।
आज ही भारत देश की राजधानी में इक्कीसवीं सदी के बुलेट जमाने में भारत माता की जय कहला ना पाने के गुस्से में तीन बेगुनाह मुसलमान जिनकी आस्था हिंदुत्व के प्रतीकों के मफिक नहीं है,उनकी खुलेआम पिटाई कर दी गयी है और वे इसी देश के किसी राज्य के पिछड़े क्षेत्र के नागरिक हैं।इसे उन्माद कहा जाये या मूर्खता,समझ में नहीं आता।
28 मार्च को हम चंडीगढ़ से जालंधर पहुंचे कि हमें पठानकोट से टिकट बन जाने की वजह से वहीं से कोलकाता के लिए हिमगिरि एक्सप्रेस आधीरात के बाद 2 बजकर बीस मिनट पर पकड़नी थी।बगल में फगवाड़ा है औरयह पूरा इलाका सूखी हुई पंजाब की पांच बड़ी नदियों में से दो सतलज और व्यास का दोआब है,जिसे हरित क्रांति की कोख बी हम कह सकते हैं।फगवाड़ा से हमारे मित्र ज्ञानशील आ गये तो हम लोग देश के बाकी हिस्सों के मित्रों के साथ संवाद भी करते रहे और लगातार इस विषय पर बातचीत करते रहे कि देश दुनिया को कैसे जोड़ा जाये।हिमाचल में पालमपुर से लेकर शिमला तक यही कवायद जारी रहा।
पलामपुर में जम्मू से पधारे अशोक बसोतरा और उनके साथियों,पूंछ से आरटीआई कार्यकर्ता अयाज मुगल और कश्मीर घाटी से महेश्वर से और बाकी देश के लोगों जिनमें यूपी,बिहार,मध्यप्रदेश ,झारखंड,छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र,असम,दिल्ली से लेकर गुजरात तक के युवा छात्र और सामाजिक कार्यक्र्ता शामिल थे,हम लगभग हफ्तेभर इसी माथापच्ची में फंसे रहे कि जाति और धर्म,नस्ल के तंग दायरे में पंसी इंसानियत को कैसे आजाद किया जाये।हम 17 मई को रिटायर करने वाले हैं 36 साल की पत्रकारिता से,जहां हमने हर मुद्दे पर लगातार विचार विमर्श जारी रखा ,उन लोगों के साथ भी जो हमसे असहमत हैं और हमारे दुर विरोधी हैं।अभी रिटायर होने के बाद हमें पेंशन मासिक दो हजार से ज्यादा मिलने वाली नहीं है और सर छुपाने लायक कोई छत हमारी है नहीं है और नघर वापसी का रास्ता हमारे लिए कोई खुली है।लेकिन हमारे लिए यह फिक्र का मसला उतना नहीं है,जितना  कि इस दुनिया को बेहतर बनाने का,कायनात की रहमतों बरकतों और नियामतों को बहाल रखने और नागिरकों के मानवबंधन के लिए साझा मंच बनाने का मुद्दा।
इसी दौरान आम आदमी पार्टी के निर्माम में खास भूमिका रखने वाले प्रशांत बूषण जी से बी लंबी बातें हुई तो हिमांशु जी के मार्फत हम मध्यबारत के ग्राउंड जीरो से भी टकराते रहे।इस वर्कशाप में स्वराज के कार्यकर्ता भी बहुत थे लेकिन उनकी सामाजिक पृष्ष्ठभूमि वही बहुजन  बिरादरी है जो अलग अलग विचारधाराओं और आस्थाओं में बेतरह बंटे हैं।
प्रशांत जी से और उन सबसे हमारा विनम्र निवेदन यही था कि इस अभूतपूर्वसंकट की घड़ी में निरंकुश फासिस्ट सत्ता के मुकाबले के लिए सभी विचारदाराओं और सभी समुदायों वर्गों का साझा मंच जरुरी है और इस मंच का फौरी कार्यभार टुकड़ा टुकड़ा बंटे हुए देश को एकताबद्ध करने का है।
हमने प्रशांत जी से कहा कि आपने राजनीतिक विकल्प की तलाश में भस्मासुर तैयार कर दिया है तो कृपया इस अनुभव से सबक लें क्योंकि अब राजनीतिक विकल्प राष्ट्र चरित्र को सिरे से बदले बिना असंभव है।मौजूदा तंत्र में हम बार बार नेतृत्व पर फोकस हैं और एक के बाद एक मसीहा गढ़े जा रहे हैं और उनका विश्वासघात का सिलसिला जारी है।सिर्प जनादेश के समीकरण से हालात बदलने वाले नहीं है।राष्ट्र की चर्चा हम जरुरत से ज्यादा करते हैं लेकिन नागरिकों की चर्चा हम करते नहीं है।बेहतर हो कि हम सब लोग अपने अपने आग्रह और अहंकार को छोड़कर इस देश के नागरिकों के हक में गोलबंद हो जाये और इसके लिए एक बहुत बड़े सामाजिक आंदोलन की जरुरत है,जिसे हमने सिरे से नजरअंदाज किया हुआ है।
प्रशांत जी की प्रतिक्रिया हमें मिली नहीं है लेकिन बाकी लोग कमोबेश सहमत है।
ज्ञानशील को सविता जी ने रात ग्यारह बजते न बजते घर के लिए रवाना कर दिया औरहम ट्रेन में सवार हो गये ।रात गहरा गयी थी और लंबे सफर की वजह से हम सो गये।
सुबह एक कश्मीरी मुसलमान साफ्टवेयर इंजीनियर की शिकायती उद्गार से हमारी नींद खुली।वह साफ्टवेयर इंजीनियर है और उसकी नागरिकता का प्रमाणपत्र बी उसके पास है।वह कोलकाता के किसी फर्म में नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जा रहा था।उसने सारे सबूत दिखाये लेकिन पंजाब पुलिस ने जब सारे लोग सो रहे थे,उसे नंगा करके उसकी तलाशी ली।
हम उसका नाम पता नहीं दे रहे हैं ताकि वह फिर उत्पीड़न का शिकार न हो।लेकिन उसकी यह बात आज फिर नासूर बनकर दर्द का सबब है कि उसने कहा कि मारो गोली कश्मीर को,मुसलमानों का बी कत्लेआम कर दो,लेकिन आदिवासियों,दलितों,पिछड़ों के साथ हिंदू राष्ट्र में क्या हो रहा है।पूर्वोत्तर और कश्मीर की बात छोड़ बी दीजिये,हिमालयक्षेत्र से दिल्ली पहुंचने वाले नागरिकों से,बंगाली हिंदू शरणार्थियों से,जल जमीन जंगल से बेदखल लोगों से,बिहार यूपी झारखंड छत्तीसगढ़ से दिल्ली और दूसरे शहरो मे जाने वाले भारतीय नागरिकों के साथ आप क्या करते हो।
उसने कहा कि मुसलमानों को भले ही आप भारत माता की संतान न मानते हों,लेकिन दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों और गरीब सवर्णों को  क्या आप भारत माता की संतान मानते हैं?

Anand Patwardhan All who can come are welcome at Ambedkar University, Delhi at 3 PM, 1st April

All who can come are welcome at Ambedkar University, Delhi at 3 PM, 1st April



--
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

आर्कटिक नहीं, पाकिस्तान - मोहन भागवत

दिलीप मंडल के वाल से साभार

आर्कटिक नहीं, पाकिस्तान - मोहन भागवत

मोहन भागवत ने कल कोलकाता में कहा कि संस्कृत और वेदों का जन्म जहां हुआ, वहां अब पाकिस्तान है. उन्होंने कहा कि उनके पूर्वज वहीं से सारी दुनिया में गए.

RSS के ऑफिशियल फेसबुक पेज पर जाकर पढ़िए.

एडिट कर दिया जाए, उससे पहले.

कल की क्यूट सी तस्वीर, RSS के पेज से.


--
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

प्रो. आफ़ाक़ अहमद नहीं रहे

प्रो. आफ़ाक़ अहमद नहीं रहे 
-----------------------------------
बयान
(30-03-2016)

उर्दू के जाने-माने अफ़सानानिग़ार, नक्काद, शायर और जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रो. आफ़ाक़ अहमद का भोपाल में कल देर रात इंतकाल हो गया. आज, 30 मार्च को, दोपहर बाद उन्हें भोपाल के जहांगीराबाद कब्रिस्तान में सुपुर्दे-खाक़ किया गया.

प्रो. आफ़ाक़ अहमद मध्यप्रदेश के शिक्षा विभाग से उर्दू प्रोफ़ेसर के पद से सेवानिवृत्त थे. शिक्षक के अलावा वे आल इंडिया अल्लामा इक़बाल अदबी मर्क़ज़ के सचिव और चेयरमैन रहे. मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के भी वे सचिव रहे, जहां से वे वेतन नहीं लेते थे. 'पुरज़ोर ख़ामोशी' (कहानी संग्रह) और 'अमानते क़ल्बोनज़र' (आलोचना पुस्तक) उनकी चर्चित किताबें हैं. 'गज़लीसे इक़बाल' का वे सम्पादन करते थे जो मर्क़ज़ के सेमिनारों के लेखों/भाषणों का सालाना संचयन है.

जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होने के साथ ही हाल-हाल तक वे जलेस की मध्यप्रदेश इकाई के अध्यक्ष भी रहे थे. जलेस के साथ उनका अटूट नाता संगठन की स्थापना के समय से ही था. अदब में ही नहीं, अपने जीवन में भी वे तरक्क़ीपसंद-जम्हूरियतपसंद उसूलों के बड़े पक्के थे. इसी वजह से भोपाल के सार्वजनिक जीवन में उनकी बहुत इज़्ज़त थी. शहर के हिन्दू और मुस्लिम, दोनों समुदायों में उनकी व्यापक स्वीकार्यता थी और साम्प्रदायिक तनावों के बीच शांति स्थापना में उनकी उल्लेखनीय भूमिका रहती थी. भोपाल शहर में उनके लेखन के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व और वक्तृता के प्रशंसक बड़ी संख्या में हैं. इसी साल 14 फरवरी को जनवादी लेखक संघ के मध्यप्रदेश राज्य-सम्मलेन के दोनों सत्रों को अपने पुरजोश अंदाज़ में संबोधित कर उन्होंने आश्वस्त कर दिया था कि अस्सी की उम्र में भी उनमें युवाओं जैसा जज़्बा और सजगता है. 'आज के हालात और लेखकों का प्रतिरोध' जैसे विषय पर उन्हें सुनते हुए उनकी प्रखरता से सभी प्रभावित हुए थे और इस बात की आशंका का कोई कारण नहीं था कि वे कुछ ही दिनों में हमें छोड़ जायेंगे.

जनवादी लेखक संघ अपने इस साथी के निधन पर शोक-संतप्त है. आफ़ाक़ साहब का न रहना हमारे लिए एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती. हम गहरी वेदना के साथ उन्हें नमन करते हैं.


मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)

संजीव कुमार (उप-महासचिव)


--
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

नारद दंश के बाद बगावत की हलचल,हवा बदलने लगी है बंगाल में बंगाल के चुनाव नतीजे चाहे कुछ हो,बंगाल आखिरकार संघ परिवार के लिए वाटरलू साबित होने जा रहा है। दिल्ली में तो सिर्फ एक जेएनयू है लेकिन बंगाल में जादवपुर, कोलकाता से लेकर विश्वभारती विश्वविद्याल.जिसके कुलाधिपति खुद प्रधानमंत्री हैं,खड़गपुर आईआईटी से लेकर कोलकाता आीआईएम तक फासिज्म विरोधी मोर्चे के अजेय किलों में तब्दील है और वहां किसी को राष्ट्रद्रोही करार देने की औकात न केंद्र सरकार में है और न राज्य सरकार में। बंगाल में बगावत सनसनी की तरह उबाल नहीं खाती।जमीन के भीतर ही भीतर भूमिगत आग की तरह सुलगती है क्रांति जिसकी आंच पहले पहलमालूम ही नहीं होती लेकिन एक बार खिल जाने के बाद वह आंच जंगल की आग की तरह दहकने लगती है। एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास संवाददाता हस्तक्षेप


नारद दंश के बाद बगावत की हलचल,हवा बदलने लगी है बंगाल में


बंगाल के चुनाव नतीजे चाहे कुछ हो,बंगाल आखिरकार संघ परिवार के लिए वाटरलू साबित होने जा रहा है।


दिल्ली में तो सिर्फ एक जेएनयू है लेकिन बंगाल में जादवपुर, कोलकाता से लेकर विश्वभारती विश्वविद्याल.जिसके कुलाधिपति खुद प्रधानमंत्री हैं,खड़गपुर आईआईटी से लेकर कोलकाता आीआईएम तक फासिज्म विरोधी मोर्चे के अजेय किलों में तब्दील है और वहां किसी को राष्ट्रद्रोही करार देने की औकात न केंद्र सरकार में है और न राज्य सरकार में।


बंगाल में बगावत सनसनी की तरह उबाल नहीं खाती।जमीन के भीतर ही भीतर भूमिगत आग की तरह सुलगती है क्रांति जिसकी आंच पहले पहलमालूम ही नहीं होती लेकिन एक बार खिल जाने के बाद वह आंच जंगल की आग की तरह दहकने लगती है।



एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

संवाददाता हस्तक्षेप

ममता बनर्जी के लिए शायद सबसे बुरी खबर यह है कि शारदा कांड और नारद दंश से भले ही केसरिया छाते के सहारे उनकी सरकार और उनकी पार्टी का कुछ बिगड़ा न हो,लेकिन उनकी पार्टी और सरकार में भूमिगत आग सुलगने लगी है।


जो बेदाग लोग हैं और दागी बिरादरी से अलग अपनी साख बचाने की फिराक में है,कांग्रेस वाम धर्मनिरपेक्ष गठबंधन की हवा की रुख समझकर वे तमाम लोग बगावत का झंडा कभी भी बुलंद कर सकते हैं और इससे भी बुरी खबर है कि जिन्हें दीदी ने वाम खेमे से तोड़कर अपने किलेबंदी की ईंटों में तब्दील करना चाहा,वे राख में तब्दील है।


मसलन,वाम किसान नेता रेज्जाक अली मोल्ला अभी से नेस्तानाबूत है। उम्मीदों के विपरीत वाम कांग्रेस गठबंधन जमीनी स्तर पर बहुत मजबूत किलेबंदी करने लगा है और दीदी का जो हो सो हो,बंगाल में भाजपा का और संघ परिवार का सूपड़ा साफ होने जा रहा है।


बिहार से हार का जो सिलसिला बना है,वह गोमूत्र से जीत में बदलने के आसार कम ही है।अंध राष्ट्रवाद की आंधी से बंगाल का प्रगतिशील बौद्धमय माहौल को धर्मांध बनाने में फेल हैं बजरंगी।


दिल्ली में तो सिर्फ एक जेएनयू है लेकिन बंगाल में जादवपुर, कोलकाता से लेकर विश्वभारती विश्वविद्याल,जिसके कुलाधिपति खुद प्रधानमंत्री हैं,खड़गपुर आईआईटी से लेकर कोलकाता आीआईएम तक फासिज्म विरोधी मोर्चे के अजेय किलों में तब्दील हैं और वहां किसी को राष्ट्रद्रोही करार देने की औकात न केंद्र सरकार में है और न राज्य सरकार में।


बंगाल में बगावत सनसनी की तरह उबाल नहीं खाती।


जमीन के भीतर ही भीतर भूमिगत आग की तरह सुलगती है क्रांति जिसकी आंच पहले पहलमालूम ही नहीं होती लेकिन एक बार खिल जाने के बाद वह आंच जंगल की आग की तरह दहकने लगती है।


बंगाल के चुनाव नतीजे चाहे कुछ हो,बंगाल आकिरकार संघ परिवार के लिए वाटरलू साबित होने जा रहा है।


बंगाल फासिज्म के राजकाज के लिए वाटरलू साबित होने लगा है।


बंगाल एकमात्र देश का वह हिस्सा है कि राज्यसरकार के साथ गुपचुप समझौते के बावजूद संघपरिवार का केसरिया अश्वमेधी रथों के पहिये कीचड़ में धंस गये हैं और कमल कहीं खिल नहीं रहे हैं।


मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शारदा चिटफंड घोटाले को रफा दफा कराने में कामयाब तो रही लेकिन नारद दंश से बचने के फिराक में संघ परिवार के हमलों के जवाब में खामोशी से मोदी दीदी गठबंधन का इस कदर पर्दाफाश हो गया है कि निर्णायक अल्पसंख्यक वोट बैंक अब साबुत बचा नहीं है।


और दिनोंदिन एक के खिलाफ एक प्रत्याशी के सीधे मुकाबला में धर्मनिरपेक्ष वाम लोकतांत्रिक गठबंधन की जमीन मजबूत होता जा रहा है।लोकसभा और राज्यसभा समितियों का फैसला जब आयेगा तब आयेगा, दीदी की ईमानदारी का चादर बेहद मटमैला हो गया है और शारदा के धब्बे कमल फूल बने खिल रहे हैं।


खुल्ला हो गया है सरेआम खेल फर्रूखाबादी।

बेनकाब हो गये हैं टाट के परदे।

अब कोई दुआ भी शायद काम आये।

वैसे भी बंगाल में अब फतवे का कोई काम नहीं है।


नारददंश के पहले हुए सर्वेक्षण और पिछले परिवर्तनकारी चुनावों के मतों के विश्लेषण से साफ था कि एक के खिलाफ एक प्रत्याशी की हालत में दीदी की सत्ता में वापसी बेहद मुश्किल हो सकती है।


कुछ शंका इसे लेकर थी कि साझा चुनाव प्रचार और साझा कार्यक्रम के बिना वाम वोटच कांग्रेस को और कांग्रेस के वोट वाम दलों के हस्तांतरित होने की संभावना कितनी है।जनता के प्रचंड समर्थन से वह शंका भी लगभग खत्म है,समझिये।


किन्हीं किन्हीं अखबारों में ऐन चुनाव से पहले विकास के विज्ञापनों का जो जलजला आया था और सड़क पुल अस्पताल केंद्रित विकास के उद्घाटन शिलान्यास मार्का बाजार समर्थित हवा जो बनायी जा रही थी,वह सबकुछ इसवक्त ध्वस्त है।

मजा इसमें यह है कि नारददंश के मुकाबले कोलकाता खुफिया पुलिस ने संघ परिवार को गाय तस्करी के मामले में घुसखोरी का जो स्टिंग कराना चाहा,उसका ऐसा खुलासा हो गया है कि संघ परिवार की मजबूरी यह हो गयी है कि बंगाल में धार्मिक ध्रूवीकरण के मनसूबे पूरीतरह फेल हो जाने और हर चुनाव क्षेत्र में जमानत जब्त होने के हालात में यूपी उत्तराखंड और पंजाब में भी करारी शिकस्त तय जानकर दीदी के खिलाफ मोर्चा बांधने की मजबूरी है।


दूसरी तरफ, गले गले तक भ्रष्टाचार के गोरखधंधे में फंसी दीदी की ईमानदारी का कच्चा चिट्ठा बीच बाजार खुल जाने के बाद मोदी और अमित साह तो क्या राहुल सिन्हा तक के मुकाबले जबाव देने की कोई सूरत नहीं है।


बेहद मुखर दीदी का यह मौन असल किस्सा बताने लगा है इसतरह कि अब साबित करने को कुछ नहीं बचा है।


भाजपा और संघ परिवार के वैसे भी बड़े दुर्दिन आ गये हैं।


बाजार के मुनाफे के लिए विकास के बहाने जनविरोधी उसकी तमाम हरकतों से हिंदुत्व का ख्याली पुलाव गुड़गोबर है तो आस्था की पूंजी वाले देश के मेहनतकश तबकों को मालूम हो गया है कि इनका सारा खेल सुखीलाला की कारस्तानी है और मीठे जहर के कयामती कारवां लेकर ये जनता और देश का जनाजा निकालने पर आमादा हैं।देशभक्ति के ये इजारेदार देश बचने लगे हैं।


गुजरात के प्रयोग असम में दोहराने का कार्यक्रम भी फेल है और दिल्ली और यूपी  में दंगा करवाकर उत्तर भारत जीतने का मंसूबा भी बेकार है।तो उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार गिराने का दांव भी उलटा पड़ गया है।


हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन के आदेश के खिलाफ हरीश रावत को बहुमत साबित करने का मौका दे दिया है।अब रावत चाहे सरकार बचा ले या बागी कांग्रेसी सीधे संघ घराने में दाखिल हो जाये,चुनाव देर सवेर होंगे ही और तब बिहार से लेकर बंगाल यूपी असम तक फैले वाटरलू में खड़े संघपरिवार का क्या होगा,राम ही जाने।


--
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!