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Thursday, June 6, 2013

एक पैगाम लेखक कँवल भारती के नाम

क्या है मानवजाति की सबसे बड़ी समस्या और उसकी उत्पत्ति का कारण!

एचएल दुसाध

बंधुवर कँवल भारती जी जब भी मौका मिलता है आप उस डाइवर्सिटी को खारिज करने में कालबिलम्ब नहीं करते ,जिसे तमाम दलित भूमंडलीकरण का मुक्कमल जवाब मान रहे हैं तथा जिसके प्रति वामपंथी दलों को छोड़कर गाँधीवादी,राष्ट्रवादी ,अम्बेकरवादी इत्यादि तमाम दल ही सकारात्मक  भाव दिखा रहे हैं.आज एक बार फिर मौका पाकर आपने मेरे लेख पर कमेन्ट करते हुए बड़ी बेरहमी से लिख डाला-'मुझे डाइवर्सिटी पसंद नहीं है'.वैसे सिर्फ मुझे मालूम है कभी डाइवर्सिटी आपको बहुत पसंद थी,पर अब नहीं तो इसके लिए आप पूरी तरह स्वाधीन हैं.वैसे डाइवर्सिटी की नापसंदगी का मेरे ख्याल से कारण यही  दिखता है कि बेसिकली आप अम्बेडकरवादी नहीं मार्क्सवादी हैं.आप मर्क्सवादी हैं इसका प्रमाण यह है कि हिन्दू साम्राज्यवादियों द्वारा शक्ति के स्रोतों-आर्थिक ,राजनीतिक और धार्मिक-पर जमाये गए 80-85 प्रतिशत कब्जे की पूरी तरह अनदेखी कर आप दलितों को अपनी उर्जा साम्राज्यवाद विरोध में लगाने के लिए  सर्वशक्ति लगाते रहते हैं.,तो बंधुवर संभवतः आप मार्क्सवादी हैं इसलिए ही डाइवर्सिटी से आपको नफरत है.कारण पूरी दुनिया में अमीर और गरीब ,दो वर्ग बनाने के चक्कर में मार्क्सवादी विविधता (diversity)की निर्ममता से अनदेखी करते रहे हैं.यही नहीं चूँकि मार्क्सवादियों का अमेरका से जन्मजात बैर है(बैर सिर्फ दिखावे के लिए,असल में तो  मार्क्सवादी ही सबसे ज्यादा अपने बाल-बच्चो को अमेरिका में बसाने की जुगत भिड़ाते रहते हैं) इसलिए मुझ जैसे लोग जब लोग डाइवर्सिटी के समर्थन में कुछ् लिखते  हैं,आपको उन्हें पूंजीवाद और अमेरिकी समर्थक  घोषित करने में कोई द्विद्धा नहीं होती.

बहरहाल मुझे यह स्वीकार करने में कोई कुंठा नहीं है की जिस तरह अमेरिका में नस्लीय –विविधताracial-diversity  के प्रतिबिम्बनreflection के जरिये तमाम क्षेत्रों each n every sectors  में अमरीकी दलितों (कालों-रेड- इंडियन्स-हिस्पैनिक्स-एशियन पैसेफिक मूल के लोगों )को हिस्सेदारी मिली उससे मैं अमेरिका का और मुरीद बन गया.और का तात्पर्य यह है कि मैं अमेरिकन स्वाधीनता संग्राम,गृह-युद्ध के साथ वहां के साहित्य और फिल्मों बहुत पहले से दीवाना रहा.अन्यथा न लें खुद बाबासाहेब अमेरिकियों के विराट प्रशंसक रहे  खासकर उनके सामजिक –विवेक का ,जो डाइवर्सिटी सिद्धांत को सफल होने में बड़ा  रोल अदा की.कहना न होगा वहां डाइवर्सिटी (सभी सामाजिक समूहों के लिए सभी खेत्र में संख्यानुपात में भागीदारी)के सफल प्रयोग ने मुझे अमेरिका का और प्रशंसक बना दिया.किन्तु परवर्तीकाल में जब डाइवर्सिटी पर लगातार चिंतन किया,अमेरिका से बढ़कर ,दक्षिण अफ्रीका मेरे लिए डाइवर्सिटी का आदर्श देश बन गया.क्योंकि जो 9-10 प्रतिशत गोरे  वहा शताधिक वर्षों से शक्ति के स्रोतों पर भारत के साम्राज्यवादियों की भांति 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा जमाये हुए थे ,वहा मंडेला और बाद में  जैकब जुमा द्वारा कठोरता से डाइवर्सिटी के लागू करने के कारण अफ्रीका छोड़कर दुसरे देशो में पलायन करने के लिए मजबूर हुए.किन्तु भारतीजी आजकल सिर्फ अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के कारण नहीं बल्कि इस कारण डाइवर्सिटी की दिन-रात हिमायत करते हुए 40 के करीब कित्ताबें लिख डाला हूँ कि मानवजाति प्राय सभी समस्याए ही विविधता की अनदेखी के  कारण उत्पन्न हुई हैं.

हा भारतीजी मैं डाइवर्सिटी की इस उग्रता से हिमायत इसलिए करता हूँ कि भारत के दलित-आदिवासी-पिछड़े-अल्पसंख्यक और महिलाएं ही नहीं,सभ्यता के शुरुवात से लेकर आज तक मानवजाति human-race  की सबसे बड़ी biggest  problemसमस्या-आर्थिक और सामजिक गैरबराबरी- की उत्पत्ति originशक्ति के स्रोतोंsources of power में सामाजिक socialऔर  लैंगिक genderविविधता diversity के असमान unequel प्रतिबिम्बन reflection के कारण होती रही है.अतः जब समस्या की सृष्टि का कारण यह है तो उसका शतप्रतिशत समाधान शक्ति के स्रोतों  में सामाजिक और लैंगिक विविधता सम्यक प्रतिबिम्बन ही है.अब अगर डाइवर्सिटी आपको नापसंद है तो फ़तवा जारी करने के बजाय दुसाध चाहेगा आप जैसा असाधारण लेखक  सैद्धांतिक आधार पर डाइवर्सिटी को काटे.क्या मेरी प्रत्याशा अनुचित है?इसके लिए आपको मानवजाति की  सबसे बड़ी समस्या को चिन्हित करते तथा उसकी सृष्टि के कारणों की खोज करते हुए दो-चार लाइन में समाधान देना होगा.आप ही नहीं दुसरे मार्क्सवादियों को भी ललकारता हूँ कि डाइवर्सिटी प्रिंसिपल को युक्तिसंगत तरीके से खारिज करके दिखा दें.मैं जनता हूँ  वे सही विकल्प नहीं दे पाएंगे क्योंकि मार्क्सवादी अपने गुरु मार्क्स के विचार को अंतिम सत्य मानकर ,चिंतन करने के बजाय सिर्फ और सिर्फ मार्क्स के विचारों को चिल्ला-चिल्ला प्रचारित करते रहते हैं,जैसे किसी कंपनी का एजेंट उसके प्रोडक्ट का करते हैं.

आखरी में भारतीजी आपको मेरी मुफ्त सलाह है अगर आप डाइवर्सिटी का समर्थन नहीं कर सकते इग्नोअर करने की पालिसी अख्तियार करें.मुझे लगता है आप उन बुद्धिजीवियों से अलग नहीं हैं जो बिना सोचे समझे 150 वर्ष पूर्व विन्सेंट स्मिथ की कही गई इस बात को दोहराते रहते हैं कि भारत की विविधता में एकता है.कारण उन्होंने डाइवर्सिटी को समझने का कोई प्रयास ही नहीं किया.इस अभागे राष्ट्र की सुख-समृद्धि सिर्फ डाइवर्सिटी को सम्मान देकर ही हासिल हो सकती है,ऐसा मेरा 200% विश्वास  है..हमारे जैसे ढेरों लोग डाइवर्सिटी मुहीम से जुड़ चुके हैं.हम सब विविधता का समर्थन कर अमेरिकीपरस्ती नहीं ,बल्कि विविधता के दुश्मन देश के शासक जमात को डाइवर्सिटी को सम्मान देने के लिए मजबूर करने का अभियान चला रहे हैं.आपको पता नहीं शासकों द्वारा डाइवर्सिटी की अनदेखी के कारण ही हम महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर बांग्लादेश जैसे पिछड़े राष्ट्र से भी पीछे तथा सच्चर रिपोर्ट में मुस्लिम समुदाय की बदहाली की तस्वीर देखकर सकते में हैं.इस कारण ही दलित –आदिवासी –पिछड़े उद्योग-व्यापर से दूर हैं  तथा विश्व में सर्वाधिक विषमता  की व्याप्ति भारत में है.  शेष में बंधुवर चुनौती नहीं, मात्र अनुरोध है कि डाइवर्सिटी को सैद्धांतिक तौर आप खारिज करके दिखा दें.इसमे आपको अपने मार्क्सवादियों बंधुओं से सहयोग लेने की भी पूरी छुट दे रहा हूँ.अगर सफल हो गए तो मैं डाइवर्सिटी केन्द्रित अपनी  सारी किताबें नाले में बहा देने की प्रतिश्रुति देता हूँ .कोशिश कीजिये शायद आप सफल हो ही जांय.क्योंकि और कोई माने या नहीं दुसाध आपको देश के बलिष्ठतम लेखको में से एक मानता है.

           डाइवर्सिटी सिद्धांत की काट ढूंढ सके,इसकी शुभेच्छा के साथ  

दिनक - 6.6.2013                                आपका विराटतम कद्रदान  

                                                       दुसाध,एच.एल


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