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Sunday, January 27, 2013

भ्रष्टाचार में जाति के आधार पर गिनती जरुर हो,बशर्ते कि जाति के आधार पर जनगणना की सर्वदलीय संसदीय सर्वसम्मति के मुताबिक जाति आधारित जनगणना भी हो जाये

भ्रष्टाचार में जाति के आधार पर गिनती जरुर हो,बशर्ते कि जाति के आधार पर जनगणना की सर्वदलीय संसदीय सर्वसम्मति के मुताबिक जाति आधारित जनगणना भी हो जाये​!!!
​​
पलाश विश्वास

कोरपोरेट आयोजित वैश्विक अर्थव्यवस्था का आयोजन जयपुर साहित्य उत्सव आखिर अपने एजंडे पर खुल्लाआम अमल करने लगा है कि इस ​​वर्चस्ववादी मंच को आरक्षणविरोधी आंदोलन के सिविल सोसाइटी के भष्टाचार विरोधी मुखड़े के साथ नत्थी कर दिया। बंगाली वर्चस्ववाद जो अब​​ राष्ट्रीय धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के राष्ट्रीय सर्वोच्च धर्माधिकारी प्रणव मुखर्जी की अगुवाई में सर्वव्यापी है, आशीष नंदी ने महज उसका प्रतिनिधित्व​​ किया है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री आशीष नंदी ने कहा है कि एससी, एसटी और ओबीसी समाज के सबसे भ्रष्ट तबके हैं। इन तबको से सबसे ज्यादा भ्रष्ट लोग आते हैं।दलितों, पिछड़ों और जनजातियों को भ्रष्ट बतानेवाले समाजशास्त्री आशीष नंदी रविवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में नहीं आए। दूसरी ओर जयपुर में उन्हें गिरफ्तार किए जाने की मांग करते हुए धरना प्रदर्शन भी शुरू हो गए हैं।आशीष नंदी ने कल जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के एक सत्र में कहा था कि ज्यादातर भ्रष्ट लोग पिछड़ी और दलित जातियों से आते हैं, और अब जनजातियों से भी आने लगे हैं। उनके इस बयान को लेकर कल से राजनीतिक हलकों में बवाल मचा हुआ है।  उनके इस बयान पर इतना बवाल हुआ कि नंदी ने बाद में भ्रष्टाचार का ही महिमा मंडन शुरू कर दिया। दैनिक भास्कर ने जब उनसे उनके विवादित भाषण पर लंबी बात की तो उन्होंने कहा कि अगर समाज में भ्रष्टाचार नहीं होता तो अगले 30 साल तक कोई भी आदिवासी अरबपति क्या करोड़पति भी नहीं बन पाता। भ्रष्टाचार के ही कारण मधु कौड़ा जैसा आदिवासी अरबपति बनकर उभरा।

बाकी देश भारत विभाजन के कारण गांधी, जिन्ना और नेहरु को गरियाता रहता है क्योंकि उसे बंगाली वर्चस्ववाद की भारत विभाजन में निर्णायक भूमिका के बारे में पता ही नहीं है। बंगाली सवर्ण वर्चस्ववाद ने अस्पृश्यताविरोधी क्रांति के जनक बंगाल के अनुसूचितों को बंगाल के बाहर ​​खदेड़ने के लिए ही भारत का विभाजन हो या नहीं, बंगाल का विभाजन होकर रहेगा, नीति अपनाकर बंगाल में सत्ता पर कब्जा कर लिया।अब बंगाल में जीवन के हर क्षेत्र में न केवल ब्राह्मण वर्चस्व है, बल्कि ब्राह्मणमोर्चा के वाम शासन के ३५ साल के राजकाज के बाद फिर ममता बनर्जी के नेतृत्व​​ में ब्राह्मणतंत्र सत्ता में काबिज है। बंगाल में बाकी देश की तुलना में नुसूचित जातियों और जनजातियों की संख्या कम है। १७ प्रतिशत और सात ​​प्रतिशत। तीन फीसद ब्राह्मणों,२७ फीसद मुसलमानों और पांच प्रतिशत बैद्य कायस्थ के अलावा बाकी ओबीसी है, जिनकी न गिनती हुई है और न ​​जिन्हें हाल में घोषित आरक्षण के तहत नौकरियां मिलती है और न सत्ता वर्ग के साथ नत्थी हो जाने के बावजूद सत्ता में भागेदारी। गौरतलब है कि २७ फीसद मुसलमान आबादी में भी नब्वे फीसद मुसलमान है। वामशासन में उनके साथ क्या सलूक हुआ, यह तो सच्चर कमिटी की रपट से उजागर हो गया, पर परिवर्तन राज में उनको मौखिक विकास का मोहताज बना दिया गया है। मजे कि बात यह है कि इन्हीं ओबीसी मुसलमानों के दम पर बंगाल में ३५ साल तक वामराज रहा और दीदी के परिवर्तन राज भी उन्हीं के कन्धे पर!भारत विभाजन​​ के शिकार दूसरे राज्यों महज असम,पंजाब और क्समीर में जनसंख्या में अब भी भारी तादाद में अनुसूचित हैं। ममता बनर्जी जिन एक करोड़ बेरोजरार युवाओं की बात करती हैं, उनमें से अस्सी फीसद इन्हीं ओबीसी  और अनुसूचितों में हैं। जिनमें से ज्यादातर ने समय समय पर नौकरियों के लिए आयोजित ​​होने वाली परीक्षाएं पास कर ली है, किंतु इंटरव्यू में बैठे ब्राह्मण चयनकर्ताओं ने उन्हें अयोग्य घोषित करके आरक्षित पदों को सामान्य वर्ग में तब्दील करके उन्हें नौकरियों से वंचित कर रखा है। बंगाल में आरक्षित पदों पर नियुक्तियां कभी बीस फीसद का आंकड़ा पार नहीं कर पायी। इसलिए बंगाल में आरक्षण विरोधी आंदोलन का कोई इतिहास नहीं है। यहां जनसंख्या का वैज्ञानिक समावेश हुआ ङै। बहुजनसमाज के प्रति अर्थशास्त्रियों के सुतीव्र घृणा अभियान तो कारपोरेट नीति निर्दारण से जगजाहिर है, समाजशास्त्रियों के घृणा अभियान पर अभी तक कोई खास चर्चा नहीं हो सकी है। कम से कम इस मायने में यह बहस शुरु करने में आशीष नंदी का शुक्रगुजार होना चाहिए हमें।नन्दी ने अनुसूचित जनजातियों को लपेटकर अच्छा ही किया। संविधान के पांचवीं और छठीं अनुसूचियों के खुला उल्लंघन के साथ जल जंगल ​बहुल समूचे पूर्वोत्तर और कश्मीर में सशस्त्रबल विशेषाधिकार कानून और मध्यभारत में सलवाजुड़ुम व दूसरे रंगबिरंगे अभियानों के बहाने आदिवासियों का​​ दमन जारी है । सोनी सोरी पर उत्पीड़न करने वाले अधिकारी वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक पाते हैं तो निश्चित ही इस देश का हर आदिवासी ​​भ्रष्ट होगा।इसी सिलसिले में  आसन्न बजटसत्र की चर्चा करना भी जरुरी है, जिसमें शीतकालीन सत्र में पास न हुए पदोन्नति में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के निषेध को खत्म करने के लिए प्रस्तावित विधायक को पिर पेश किये जाने की संबावना है। इसलिए आरक्षण विरोधी आंदोलन की नजरिये से आशीष नंदी ने बेहतरीन काम कर दिया है। अब कारपोरेट मीडिया और सोशल मीडिया दोनों का फोकस आरक्षणविरोध पर ही होगा, जाहिर है। संसदीय सत्र शुरु होते न होते शुरु होनेवाले सिविल सोसाइटी के आंदोलन के लिए तो यह सुर्खाव के पर हैं!इसी सिलसिले में पुणयप्रसून वाजपेयी की रपट और उदितराज का लेख पढ़ लिया जाये तो नंदी के बयान के घनघोर रणकौशल को समझने में ​​मदद मिलेगी। हालांकि बायोमेट्रिक डिजिटल नागरिकता के जरिये बहुजनसमाज के नागरिक और मानवअधिकार हनन से अविचलित लोगों के लिए इसे समझने की जरुरत भी खास नहीं है।

उत्तरी बंगाल में आज भी असुरों के उत्तराधिकारी हैं। जो दुर्गोत्सवके दौरान अशौच पालन करते हैं। उनकी मौजूदगी साबित करती है कि महिषमर्दिनी दुर्गा का मिथक बहुत पुरातन नहीं है। राम कथा में दुर्गा के अकाल बोधन की चर्चा जरूर है, पर वहां वे महिषासुर का वध करती नजर नहीं ​​आतीं। जिस तरह सम्राट बृहद्रथ की हत्या के बाद पुष्यमित्र के राज काल में तमाम महाकाव्य और स्मृतियों की रचनी हुई प्रतिक्रांति की जमीन तैयार करने के लिए। और जिस तरह इसे हजारों साल पुराने इतिहास की मान्यता दी गयी, कोई शक नहीं कि अनार्य प्रभाव वाले आर्यावर्त की सीमाओं से बाहर के तमाम शासकों के हिंदूकरण की प्रक्रिया को ही महिषासुरमर्दिनी का मिथक छीक उसी तरह बनाया गया , जैसे शक्तिपीठों के जरिये सभी लोकदेवियों को सती के अंश और सभी लोक देवताओं को भैरव बना दिया गया। वैसे भी बंगाल का नामकरण बंगासुर के नाम पर हुआ। ​​बंगाल में दुर्गापूजा का प्रचलन सेन वंश के दौरान भी नहीं था। भारत माता के प्रतीक की तरह अनार्य भारत के आर्यकरण का यह मिथक ​​निःसंदेह तेरहवीं सदी के बाद ही रचा गया होगा। जिसे बंगाल के सत्तावर्ग के लोगों ने बांगाली ब्राहमण राष्ट्रीयता का प्रतीक बना दिया।​​विडंबना है कि बंगाल की गैरब्राह्मण अनार्य मूल के या फिर बौद्ध मूल के बहुसंख्यक लोगों ने अपने पूर्वजों के नरसंहार को अपना धर्म मान ​​लिया। बुद्धमत में कोई ईश्वर नहीं है, बाकी धर्ममतों की तरह। बौद्ध विरासत वाले बंगाल में ईश्वर और अवतारों की पांत अंग्रेजी हुकूमत के ​​दौरान बनी, जो विभाजन के बाद जनसंख्या स्थानांतरण के बहाने अछूतों के बंगाल से निर्वासन के जरिये हुए ब्राह्मण वर्चस्व को सुनिश्चित​ ​ करने वाले जनसंख्या समायोजन के जरिये सत्तावर्ग के द्वारा लगातार मजबूत की जाती रहीं। माननीय दीदी इस मामले में वामपंथियों के चरण चिन्ह पर ही चल रही हैं।

प्रख्यात समाजशास्त्री आशीष नंदी ने देश में भ्रष्टाचार के लिए ओबीसी,अनुसूचित जनजातियों  और  अनुसूचित जातियों यानि पूरे बहुजन समाज ​​को जिम्मेवार ठहराकर बवंडर खड़ा कर दिया। विवादों से अक्सर घिरे रहनेवाले जयपुर कारपोरेट साहित्य उत्सव का एक और विवाद का गुबार अब थमता नजर नहीं आता। हालांकि मौके की नजाकत समझकर वैकल्पिक मीडिया और खोजी पत्रकारित के लिए विख्यात तहलका संपादक तरुण तेजपाल का सहारा लेकर नंदी ने सफाई भी दे दी। राजनीतिक जंग वोट बैंक के गणित के मुताबिक तेज हो गयी। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों राजनीतिक खेमा बयानबाजी के जरिये इस मामले को रफा दफा करने में बिजी है।बहुजनसमाज पार्टी के सुप्रीमो और खुद आय से ज्यादा संपत्ति अर्जित करने के आरोप में सीबीआई जांच के शिकंजे में फंसी मायावती ने तो नंदी की गिरफ्तारी की मांग तक कर दी।नंदी उत्सव से गायब हो गये हैं। इसी बीच नंदी के बचाव में सोशल ​​मीडिया में सवर्ण हरकतें शुरु हो गयीं। हमेशा मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र को खारिज करते रहे उत्तर आधुनिकताबाद के महाप्रवक्ता और स्वंयभू​ ​ मीडिया विशेषज्ञ भूतपूर्व माकपाई कोलकाता के प्राध्यापक जगदीश्वर चतुर्वेदी ने दलील दी है कि जब जनगणना में जाति के आधार  पर गणना​​ होती है, तो भरष्टाचार में गणाना जाति के आधार पर क्यों नहीं होनी चाहिए। मीडिया विशेषज्ञ चारों वेदों के अध्येता य हबता रहे हैं कि जाति के आधार पर जनगणना हो रही है। जबकि हकीकत यह है कि संसद में सर्वदलीय सहमति के बावजूद जाति के आधार पर जनगणना अभी शुरु नहीं हुई है। चतुर्वेदी  जी के वक्तव्य के आधार पर जाति के आधार पर पहले गिनती हो जाये तो फिर भ्रष्टाचार की गिनती भी हो जाये।पूना पैक्ट के मुताबिक अंबेडकर की​ ​ विचारधारा, समता और सामाजिक न्याय के प्रतीक महात्मा गौतम बुद्ध और तमाम महापुरुषों , संतों के नाम सत्ता की भागेदारी में मलाई लूटने वाले चेहरे सचमुच बेनकाब होने चाहिए।इसी मलाईदार तबके के कारण ही भारत में अभी बहुजन समाज का निर्माण स्थगित है। उसके बाद देखा जाये कि उनके अलावा क्या भ्रष्टाचार की काली कोठरी की कमाई खानेवालों में ब्राह्मणों और दूसरी ऊंची जातियों की अनुपस्थिति कितनी प्रबल है। चतुर्वेदी जी के बयान पर अभी बवाल शुरु नहीं हुआ है। मीडिया पर उनके बारह खंडों का ग्रंथ विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम में अभी शामिल किया जाना है और पुस्तक मेलाओं की सीजन शुरु होनेवाला है। यह विवाद तुल पकड़े तो फटीचर हिंदी प्रकाशकों की किस्मत जग जाये!

यह संयोगभर नहीं है कि बंगाल में सत्ता प्रतिष्टान से वर्य़ों जुड़े रहे जगदीश्वर चतुर्वेदी और बंगाली सत्तावर्ग के प्रतिनिधि आशीष नदी एक ही सुर ताल में बहुजन समाज के खिलाफ बोल रहे हैं, जबकि बंगाल में बहुजनसमाज का कोई वजूद ही नहीं है, जो था उसे मटियामेट कर दिया गया है। यह आकस्मिक भी नहीं है।ठीक से कहना मुश्किल है कि जैसे चतुर्वेदी ब्राह्मण हैं तो आशीष नंदी जाति से क्या हैं। वैसे बंगाल में  नंदी या तो कायस्थ होते हैं या फिर​​ बैद्य। भारत में अन्यत्र कहीं ये जातियां सत्ता में नहीं हैं। एकमात्र बंगाल में वर्णव्यवस्था बौद्धमय बंगाल के अवसान के बाद ही सेन वंश के शासन काल में ग्यारहवीं सदी के बाद लागू होने की वजह से राजपूतों की अनुपस्थिति की वजह से कुछ और खास तौर पर अंग्रेजी हुकूमत के दरम्यान स्थाई​​ बंदोबस्त के तहत मिली जमींदारियों के कारण कायस्थ और बैद्य तीन फीसद से कम ब्राह्मणों के साथ सत्तावर्ग में हैं।बाकी देश के उलट बंगाल में ओबीसी अपनी पहचान नहीं बताता और सत्तावर्ग के साथ नत्थी होकर अपने को सवर्ण बताता है, जबकि ओबीसी में माहिष्य और सद्गोप जैसी बड़ी किसान ​​जातियां हैं, नाममात्र के बनिया संप्रदाय के अलावा बंगाल की बाकी ओबीसी जातियां किसान ही हैं ।बंगाली ब्राह्मण नेताजी और विवेकानंद जैसे शीर्षस्थ कायस्थों को शूद्र बताते रहे हैं। जबकि बाकी देश में भी कायस्थ. खासकर उत्तरप्रदेश के कायस्थ मुगल काल से सत्ता में जुड़े होने कारण अपने को सवर्ण ही मानते हैं। इसके उलट असम में कायस्थ को बाकायदा ओबीसी श्रेणी में आरक्षण मिला हुआ है। भारत में छह हजार जातियां हैं। तमाम भारत में ​​किसान बहुजन बहुसंख्य आम जनता को ओबीसी, अनुसूचित जातियों और जनजातियों में विभाजित कर रखा गया है। यहां तक कि कुछ किसान जातियों मसलन भूमिहार और त्यागी तो बाकायदा ब्राहमण हैं। अगर पेशा और श्रम विभाजन ही वर्ण व्यवस्था और जातियों के निर्माण का आधार है तो सभी किसान जातियों को एक ही जाति चाहे ब्राह्मण हो या ओबीसी या अनुसूचित , होना चाहिए था। बैद्य बंगाल में ब्गाह्मणों से भी मजबूत जाति है। ब्राह्मणों​​ में भी पिछड़े, अशिक्षित और गरीब मिल जाएंगे। पर बैद्य शत प्रतिशत शिक्षित है और शत प्रतिशत फारवर्ड। देश के अर्थशास्त्र पर डा. अमर्त्य सेन की अगुवाई में इसी जाति का कब्जा है। बंगाल के सत्ताप्रतिष्ठान में अनुपात के हिसाब से बैद्य को सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व मिला हुआ है। ब्राह्मणों के बाद।

बताया जाता है कि पत्रकार से फिल्मकार बने प्रीतीश नंदी के भाई हैं आशीष नंदी। होंगे या नहीं भी होंगे। इससे फर्क नहीं पड़ता।असल बात यह है कि आशीष नंदी ने जो कुछ कहा है, वह ब्राह्मणेतर सवर्णों और तथाकथित सवर्णों की संस्कारबद्ध श्रेष्टत्व की वर्चस्ववादी मानसिकता की ही अभिव्यक्ति है। मालूम हो कि अनुसूचितों और पिछड़ों पर अत्याचार इन्हीं जातियों के खाते में हैं। ब्राह्मण तो बस मस्तिष्क नियंत्रण करते हैं। मस्तिष्क नियंत्रण का नायाब नमूना पेस कर रहे हैं बंगाल में आधार बनाये हुए जेएनयू पलट ब्राह्मण मीडिया विशेषज्ञ इसीलिए।

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक मायावती ने पत्रकारों से कहा, "उन्हें तुरंत माफी मांगनी चाहिए। हमारी पार्टी उनके बयान की भर्त्सना करती है। हमारी पार्टी राजस्थान सरकार से मांग करती है कि उनके खिलाफ तुरंत मामला दर्ज करके कड़ी कार्रवाई करे और उन्हें जेल भेज दिया जाए।"

लोजपा मुखिया रामविलास पासवान ने जयपुर में चल रहे साहित्य महोत्सव में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अनुसूचित जाति और जनजातियों के खिलाफ समाजशास्त्री एवं लेखक आशीष नंदी की कथित टिप्पणी की आज कड़ी आलोचना की।पासवान ने नंदी की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बारे में जो बयान दिया है, वह विक्षिप्त मानसिकता का परिचायक है। दलित नेता ने कहा कि नंदी को इस बयान के लिए अनुसूचित जाति जनजाति अत्यचार अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

अशोक नगर थाना पलिस के अनुसार जयपुर के मानसरोवर निवासी राजपाल मीणा की ओर से साहित्यकार आशीष नंदी और जयपुर साहित्योत्सव के संयोजक सुजय राय के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया है।

पुलिस ने  आशीष नंदी और सुजाय राय के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 506 और अनूसूचित जाति , जनजाति अत्याचार की धारा 3 ए के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

जांच कर रहे पुलिस अधिकारी सुमित गुप्ता ने कहा कि मामला दर्ज हुआ है मामले की जांच की जा रही है।

इस बीच नंदी ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा, 'मेरी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। मेरा मकसद किसी को ठेस पहुंचाना नही था, अगर किसी को मेरी बातों से दुख पहुंचा है तो मै माफी मांगता हूं।

आशीष नंदी ने सफाई दी, 'मेरा ऐसा मतलब नहीं था न ही मैं यह कहना चाहता था। मैंने यह कहा था, -' तहलका के संपादक तरुण तेजपाल के बयान से सहमत हूं कि भारत में भ्रष्टाचार समाज में समानता लाने का काम करता है। मेरा मानना है कि भ्रष्टाचार मुक्त समाज सिंगापुर की तरह निरंकुश समाज बन जाएगा।'

नंदी ने कहा कि उन्होंने 'विचारों का गणतंत्र' सत्र में दबे कुचले लोगों के समर्थन में बोला था। मैंने कहा था, 'मेरे जैसे लोग भ्रष्ट बनना चाहते हैं। हम अपने बच्चों को हार्वर्ड में पढ़ने के लिए भेज सकते हैं। दूसरों को लगेगा कि हम प्रतिभा को समर्थन दे रहे हैं। यह भ्रष्टाचार नहीं लगेगा।'

'पर जब दलित आदिवासी या ओबीसी भ्रष्ट होते हैं तो वह भ्रष्ट लगते हैं। हालांकि इस दूसरे भ्रष्टाचार से बराबरी आती है।' नंदी ने यह भी कहा कि यदि कुछ लोगों को उनके बयान को गलत समझने से ठेस पहुंची है तो वह माफी मागते हैं। हालांकि उन्होंने अपने बयान के लिये माफी नहीं मांगी और कहा कि वह हमेशा से ऐसे समुदायों का समर्थन करते आये हैं। उन्होंने कहा कि उनका किसी समुदाय या व्यक्ति को आहत करने का इरादा नहीं था।

उधर, नंदी के इस बयान पर दिल्ली में बसपा सुप्रीमो मायावती ने संवाददाताओं से कहा कि राजस्थान सरकार को तुरंत नंदी के खिलाफ अनुसूचित जाति, जनजाति अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेजना चाहिये। साथ ही अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पी एल पूनिया ने कहा कि नंदी एक समाजशास्त्री और बुद्धिजीवी हैं पर बैद्धिक बेइमानी का इससे बड़ा बयान नहीं हो सकता। उन्होंने भी नंदी को जेल भेजे जाने की मांग की।

कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा कि किसी जाति या समुदाय को भ्रष्ट बताना गलत है। साथ ही लोजपा नेता रामविलास पासवान ने धमकी दी कि यदि नंदी के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है तो वह विरोध प्रदर्शन करेंगे।

बीबीसी संवाददाता नारायण बारेठ का कहना है कि आशीष नंदी के इस बयान के बाद दौसा से निर्दलीय सांसद किरोड़ीलाल मीणा ने आयोजन स्थल पर पहुंचकर हंगामा करके अपना विरोध दर्ज कराया है.

इस मामले में एक व्यक्ति की शिकायत के बाद पुलिस ने आशीष नंदी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है.

जयपुर साहित्य उत्सव में परिचर्चा के दौरान आशीष नंदी ने कहा, ''ज्यादातर भ्रष्ट लोग ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के होते हैं.''

उन्होंने कहा, ''जब तक ऐसा होता रहेगा, भारत के लोग भुगतते रहेंगे.''

बयान पर क़ायम

"आप किसी गरीब आदमी को पकड़ लेते हैं जो 20 रूपये के लिए टिकट की कालाबाज़ारी कर रहा होता है और कहते हैं कि भ्रष्टाचार हो रहा है लेकिन अमीर लोग करोड़ों रूपये का भ्रष्टाचार कर जाते हैं और पकड़ में नहीं आते हैं."
आशीष नंदी

आशीष नंदी ने बाद में कहा कि वह अपने बयान पर क़ायम हैं और अपने खिलाफ किसी भी तरह की पुलिस कार्रवाई के लिए तैयार हैं.

आशीष नंदी का कहना है कि उनके बयान को गलत परिप्रेक्ष्य में समझा गया है.

परिचर्चा में मौजूद कुछ पत्रकारों समेत श्रोताओं में से भी ज्यादातर लोगों ने नंदी के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है.

लेकिन नंदी ने बाद में सफाई देते हुए कहा, ''आप किसी गरीब आदमी को पकड़ लेते हैं जो 20 रूपये के लिए टिकट की कालाबाज़ारी कर रहा होता है और कहते हैं कि भ्रष्टाचार हो रहा है लेकिन अमीर लोग करोड़ों रूपये का भ्रष्टाचार कर जाते हैं और पकड़ में नहीं आते हैं.''

वहीं परिचर्चा के पहले हिस्से में 'विचारों का गणतंत्र' विषय के आलोक में भारतीय गणतंत्र पर चर्चा करते हुए लेखक और पत्रकार तरुण तेजपाल ने कहा कि भ्रष्टाचार हर वर्ग, हर तबके में है.

तरुण तेजपाल ने नाराज़गी जाहिर करते हुए मीडिया पर आरोप लगाया है कि आशीष नंदी के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है.

आशीष नंदी के कथित बयान के विरोध में मायावती बहुजन समाजपार्टी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है, ''पार्टी मांग करती है कि इस मामले में राजस्थान सरकार को तुरंत उनके खिलाफ एससी-एसटी एक्ट और अन्य सख्त कानूनी धाराओं में तहत कार्रवाई सुनिश्चित करके जल्द से जेल भेज देना चाहिए.''


जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एससी,एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग के खिलाफ कथित विवादित बयान देने वाले समाजशास्त्री एवं लेखक आशीष नंदी के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया है। यह मामला गैर जमानती मामलों में दर्ज किया गया है। शनिवार देर शाम अशोक नगर थाने में मामला दर्ज होने के बाद नंदी पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। अगर वह दोषी पाए जाते हैं तो 10 साल तक की सजा हो सकती है। पुलिस ने फेस्टिवल के आयोजक संजय रॉय के खिलाफ भी केस दर्ज किया है। उधर नंदी के बयान के विरोध में एससी,एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े लोग फेस्टिवल के आयोजन स्थल डिग्गी पैलेस के बाहर धरने पर बैठ गए हैं। जयपुर में अन्य स्थानों पर भी विरोध प्रदर्शन कर नंदी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई व गिरफ्तारी की मांग की गई। मीणा महासभा के अध्यक्ष रामपाल मीणा ने कहा है कि जब तक पुलिस नंदी को गिरफ्तार नहीं कर लेती तब तक विरोध जारी रहेगा।

जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील ने कहा कि साहित्यकारों को दलितों के खिलाफ अनुचित भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। दलित और ओबीसी देश की जनसंख्या का 80-85 फीसदी हैं। वे सबसे ज्यादा भ्रष्ट नहीं है। नंदी का बयान देश की इतनी बड़ी आबादी को गाली है। काम नहीं आई सफाई विवाद बढ़ता देख फेस्टिवल के आयोजकों ने आनन फानन में नंदी की प्रेस कांफ्रेंस करवाई। इसमें नंदी ने अपने बयान पर सफाई भी दी। सफाई देने के लिए वे अपने साथ मशहूर पत्रकार तरूण तेजपाल को भी लेकर आए। नंदी ने कहा कि उनकी टिप्पणी को गलत अर्थ में लिया गया है। उन्होंने एक लिखी हुई स्क्रिप्ट मीडिया के समक्ष पढ़ी। इसमें कहा गया कि भारत में भ्रष्टाचार इक्वलाइजिंग फोर्स है। मेरे कहने का यह मतलब था कि जब गरीब लोग,एससी और एसटी के लोग भ्रष्टाचार करते हैं तो इसको बढ़ा चढ़ाकर बताया जाता है। अगर लोगों ने इसे गलत समझा। मैं माफी मांगता हूं। मेरे कहने का मतलब था कि अमीर लोगों के भ्रष्टाचार को हमेशा नजरअंदाज कर दिया जाता है।मैं इस मामले को यहीं खत्म करता हूं। नंदी की सफाई के बाद तरूण तेजपाल ने कहा कि नंदी कभी दलितों,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं रहे हैं। उन्होंने हमेशा इस वर्ग के लिए काम किया है। उन्होंने पत्रकारों को भी नसीहत दी कि वे फालतू का विवाद खड़ा न करें। इसके बाद संजय रॉय ने कहा कि दौसा सांसद किरोड़ी लाल मीणा और जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील से नंदी और तरूण तेजपाल की बातचीत हो गई है। वे उनकी सफाई से संतुष्ट हैं। यह कहा था नंदी ने लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन नंदी ने 'रिपब्लिक ऑफ आइडियाज' सेशन में टिप्पणी की थी कि देश को भ्रष्टाचार ने जकड़ रखा है। यह तथ्य है कि ज्यादातर भ्रष्ट लोग एससी,एसटी और ओबीसी वर्ग से हैं।

जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील ने भी नंदी का मुंह काला करने की धमकी दी थी। यहां तक कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी आशीष नंदी के बयान की निंदा करते हुए कहा है कि नंदी को इस प्रकार की भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए था ।

दूसरी ओर नंदी के विरोध को देखते हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों ने आज उन्हें इस सम्मेलन से दूर ही रखा। आज सुबह उन्हें - हिंदी-इंग्लिश भाई भाई - शीर्षक वाले सत्र में अशोक वाजपेयी, भालचंद्र नेमाडे, उदयनारायण सिंह एवं इरा पांडे के साथ भाग लेना था। इस सत्र का संचालन टीवी पत्रकार रवीश कुमार को करना था। लेकिन नंदी इस सत्र में नहीं पहुंच सके। लेकिन सम्मेलन की आयोजन समिति के प्रमुख संजय के.रॉय आयोजन स्थल पर घूमते दिखाई दिए। जबकि राजपाल मीणा द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी में उनका नाम भी शामिल किया गया है। संजय का मानना है कि साहित्यिक सम्मेलनों में होनेवाली बौद्धिक बहसों पर इस प्रकार की राजनीति करना लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है। वह कहते हैं जिस प्रकार की प्रतिक्रिया नंदी के बयान के बाद से देखी जा रही है, वैसी प्रतिक्रियाएं राजनीतिक भाषणों तक ही सीमित रखी जानी चाहिएं। जयपुर साहित्य सम्मेलन बुद्धिजीवियों का मंच है। यहां बुद्धिजीवियों द्वारा प्रस्तुत विचारों को बहस तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आशीष नंदी का यह वक्तव्य तब सामने आया जब डिग्गी पैलेस में शनिवार सुबह 10 बजे रिपब्लिक ऑफ आइडियाज पर संवाद चल रहा था। संवाद में शामिल थे ऑक्सफॉर्ड के वॉल्फसन कॉलेज के प्रोफेसर रिचर्ड सोराबजी, इतिहासकार पैट्रिक फ्रेंच, तहलका के संपादक तरुण तेजपाल, आईबीएन 7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष। बहस भ्रष्टाचार पर केंद्रित हुई और विचारोत्तेजक होती चली गई।

ऐसे बोले आशीष नंदी: जहां तक मेरी जानकारी है, अब तक भारत में अनरिकॉग्नाज्ड बिलेनियर मधु कौड़ा हैं। और मैं आपको भरोसा दिला सकता हूं कि मधु कौड़ा सबसे इनसिक्योर हैं। ऐसे लोग अपने रिश्तेदारों पर भरोसा कर सकते हैं। बेटों, बेटियों और भतीजे-भतीजियों पर। फिर भले पैसा छुपाना हो या पॉलिटिकल सीक्रेट्स को छुपाना हो, सिर्फ इन्हीं पर भरोसा किया जा सकता है। यही इनके लॉयल हो सकते हैं। राजनीतिक अनुभव बताते हैं कि कई बार फैमिली मेंबर्स में इतनी इंटेलीजेंस ही नहीं होती कि वे ऐसे अतिरिक्त कमाए हुए धन को छुपा सकें। लेकिन कुछ मामले ऐसे भी होते हैं जिन्हें भ्रष्टाचार नहीं माना जा सकता। अगर मैं उदाहरण दूं कि रिचर्ड सोराबजी के बेटे का मैं यहां कहीं एडमिशन करवा दूं और वे मेरी बेटी को ऑक्सफॉर्ड में फेलोशिप दिलवा दें तो लोग इसे भ्रष्टाचार नहीं मानेंगे। वे यही कहेंगे कि हम टैलेंट को स्पोर्ट कर रहे हैं। लेकिन अगर मायावती कुछ करेंगी, अपने रिश्तेदारों को 100 पेट्रोल पंप दिलवा देंगी, कुछ रिश्तेदारों को नर्स बनवा देंगी तो क्या होगा? यह होगा कि भ्रष्टाचार तो बहुत ज्यादा दिखेगा और भ्रष्ट का भ्रष्टाचार दिखेगा ही नहीं।...

अब तरुण तेजपाल उन्हें रोकते हैं और बोलते हैं- भ्रष्टाचार समाज में बराबरी लाता है। कुछ मिनट बाद आशीष नंदी कहते हैं, ...इट इज अॅफैक्ट दैट मोस्ट ऑफ दॅ करप्ट कम फ्रॉम दॅ ओबीसीज ऐंड दैन शिड्यूल कास्ट्स। ऐंड नाऊ शिड्यूल ट्राइब्स। यानी यह एक तथ्य है कि सबसे ज्यादा भ्रष्ट पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों से आ रहे हैं। और अब इनमें अनुसूचित जनजातियों से आने वाले भी पीछे नहीं रहे हैं। ..और अगर भारतीय गणतंत्र बचेगा तो इसी (भ्रष्टाचार)से।

(लोग जमकर तालियां बजाते हैं, लेकिन पहली पंक्ति में बैठे एक व्यक्ति विरोध करते हैं। वे कहते हैं, नंदी, आप गलत कह रहे हैं। आप या तो अपनी बात को यहीं साबित करें नहीं तो आपके खिलाफ एससीएसटी एक्ट में मुकदमा दर्ज होना चाहिए।)

नंदी अपनी बात को कुछ पुष्ट करने के लिए तर्क देते हैं, मैं आपको उदाहरण देता हूं कि हमारे राज्यों में सबसे कम भ्रष्टाचार वाला राज्य पश्चिम बंगाल रहा है, जहां सीपीएम की सरकार थी। लेकिन पिछले 100 साल वहां कोई भी ओबीसी, एससी या एसटी से कहीं भी सत्ता में नहीं रहा। यह एक पूरी तरह साफ सुथरा राज्य रहा है। यह एक तथ्य है।

आशुतोष : सॉरी, सॉरी। आप गलत कह रहे हैं। कितने ही उदाहरण सामने हैं। उच्च वर्गों से आने वाले लोगों ने हर स्तर पर भ्रष्टाचार फैलाया है। ओबीसी या एससी या एसटी के भ्रष्टाचार के पीछे भी ऊंची जातियों के लोग रहे हैं।

एससी, एसटी, ओबीसी का भ्रष्टाचार अच्छा
भास्कर ने उनके विवादित भाषण के बाद उनसे तत्काल लंबी बातचीत की। कुछ अंश :
-आपने एससी, एसटी और ओबीसी पर ऐसा क्यों कहा?
मैंने यही बोला कि उनमें भ्रष्टाचार हो तो अच्छा रहेगा।
-भ्रष्टाचार हो तो अच्छा रहेगा?
हां, हां। भ्रष्टाचार हो तो अच्छा रहेगा। ...(वे समझाते हैं) क्या आपको लगता है कि भ्रष्टाचार नहीं होता तो अगले तीस साल में कोई ट्रायबल बिलियनेयर बनने वाला था? भ्रष्टाचार हुआ तो मधु कौड़ा जैसा ट्रायबल बिलियनेयर बना।

जगदीश्वर चतुर्वेदी ने `हस्तक्षेप' में लिखा है:

सोशल साईट 'फेसबुक' के बहिष्कार और घृणा के आधार पर किसी जाति या समुदाय विशेष के लेखकों को आसानी से जुटाया जा सकता है। उन्हें अतार्किक दिशा में लिखने के लिए प्रेरित भी किया जा सकता है। लेकिन ऐसे लेखक अच्छी साहित्यिक रचना को जन्म नहीं दे सकते। हिन्दी में इन दिनों फैशन हो गया है जाति के आधार पर एकजुट होना।

कल मैं टीवी में सुन रहा था एक वंचित विचारक कह रहे थे भ्रष्ट आदमी की जाति नहीं होती। अब इन महोदय से कोई पूछे कि क्या लेखक की जाति होती है ? कहानी, उपन्यास की जाति होती है ? यदि नहीं होती तो फिर जाति का नाम आगे लिखकर दलित उपन्यास, दलित कहानी क्यों पेश किए जा रहे हैं ? विचारक के नाम के आगे जाति क्यों लिख रहे हैं, दलित चिन्तक, दलित लेखक आदि।

आईबीएन-7 से लेकर एनडीटीवी तक सबमें ये लोग आए दिन बैठे रहते हैं। यह जाति का महिमामंडन है। कबीर-दादू ने नाम के साथ, उनकी कविता के साथ कभी दलित पदबंध का इस्तेमाल नहीं किया गया और आज वे भारतीय जनमानस में आदर के साथ याद किए जाते हैं।

महाकुंभ में सभी जातियों के लोग गोते देखे जा सकते हैं। कहां सोए हैं दलितों को जगाने वाले देखें कि किस तरह महाकुंभ में बड़ी तादाद में असवर्ण भी गोते लगा रहे हैं। हर हर गंगे।

मायावती से लेकर दलित चिंतकों तक सबको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी ओबीसी,एससी-एसटी जाति का व्यक्ति अपने दरवाजे पर आने वाले पंडे को दान-दक्षिणा न दे। इस जाति के लोग कभी मंदिरों में ब्राह्मणों के साथ दर्शन करने न जाएं। नदियों में नहाने न जाएं। कुंभ में ब्राह्मणों को दान न करें। संतों -महंतों को प्रणाम न करें। आखिरकार ये सब ब्राह्मण समाज की त्याज्य चीजें हैं।

हम चाहें या न चाहें, मानें या न मानें लेकिन महाकुंभ की शक्ति जनता है और विचारधारा है उदार हिन्दूधर्म का वैविध्य। यह वह धर्म है जिसको अनेक अल्पज्ञानी लोग आए दिन कुत्सित और असामाजिक भाषा में गरियाते रहे हैं। उदार हिन्दू धर्म में कभी किसी लेखक की अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी नहीं लगायी गयी। साहित्य में भक्ति आंदोलन में सिरमौर दलित लेखकों को बनाकर रखा गया। लेकिन उन्मादियों का एक समूह पैदा हुआ है जो भारतीय परंपरा के नाम पर मीडिया में अनर्गल प्रलाप करता रहता है।


डा जगदीश्वर चतुर्वेदी, जाने माने मार्क्सवादी साहित्यकार और विचारक हैं. इस समय कोलकाता विश्व विद्यालय में प्रोफ़ेसर

भ्रष्टाचारियों का सामाजिक प्रोफाइल होता है। याद करें 2जी स्पेक्ट्रम में शामिल तमिलनाडु के नेताओं को, मायावतीशासन में हुए भ्रष्टाचार और उसमें शामिल आधे दर्जन निकाले गए भ्रष्ट मंत्रियों, शशांक शेखर और अन्य बड़े आईएएस अधिकारियों के द्वारा किए भ्रष्टाचार को, उन पर चल रहे केसों को। झारखंण्ड के तमाम नाम-चीन भ्रष्ट नेताओं के सामाजिक प्रोफाइल को भी गौर से देखें।

भाजपा के पूर्व नेता येदुरप्पा के सामाजिक प्रोफाइल पर भी नजर डाल लें और लालू-मुलायम पर चल रहे आय से ज्यादा संपत्ति के मामलों को भी देखें। आखिरकार इन नेताओं की जाति भी है। राजनीति में जाति सबसे बड़ी सच्चाई है। उनकी जीत में जाति समीकरण की भूमिका रहती है। ऐसे में भ्रष्टाचार के प्रसंग में यदि जाति को भ्रष्टाचारी की प्रोफाइल के साथ पेश किया जाता है तो इसमें असत्य क्या है ? भ्रष्टाचारी की दो जाति होती हैं एक सामाजिक जाति और दूसरी आर्थिक जाति। दोनों केटेगरी विश्लेषण के लिए महत्वपूर्ण हैं। जाति आज भी महत्वपूर्ण केटेगरी है और इस पर जनगणना हो रही है। विकास के पैमाने के निर्धारण के लिए जाति खोजो और भ्रष्टाचार में जाति मत खोजो यह दुरंगापन नहीं चलेगा। जाति विश्लेषण की आज भी बड़ी महत्वपूर्ण केटेगरी है।

वंचितों के नाम पर नए किस्म का कुतर्क आए दिन प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है। इस कुतर्कशास्त्र को नियोजित प्रौपेगैण्डा का रूप देने में हिन्दी के स्वनामधन्य लेखकों, पत्रिकाओं की भी सक्रिय भूमिका है। इस तरह का शास्त्र वंचितों के हितों और कला आस्वाद को सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त कर रहा है।

मसलन् दलित विचारकों का एक बड़ा दल आए दिन "सवर्णों" (नागरिक) पर हमले करता रहता है लेकिन मजेदार बात यह है हिन्दी में आज भी अधिकांश दलित लेखकों की कृतियां "सवर्ण" (नागरिक)पाठक ही पढ़ते हैं।

सवाल यह है कि दलित चिन्तकों -लेखकों की रचनाएं मध्यवर्ग के दलितों में क्यों नहीं बिकतीं ? दलित साहित्य अपने को दलितों से क्यों नहीं जोड़ पाया है।

पूंजीवादी व्यवस्था में गरीब या दलित या मेहनतकश या कम आय वाले लोग बहुत बड़े उपभोक्ता हैं। पूंजीवादी व्यवस्था में बाजार के सामने सब उपभोक्ता हैं। उपभोक्ता की जाति नहीं होती। कोई रोक सके तो रोक ले दलित और सवर्ण के उपभोक्ता में रूपान्तरण को ?

वाममोर्चा नहीं, बंगाल में ब्राह्मण मोर्चा का राज

पलाश विश्वास

राजनीतिक आरक्षण बेमतलब। पब्लिक को उल्लू बनाकर वोट बैंक की राजनीति में समानता मृगतृष्णा के सिवाय कुछ भी नहीं। मीना - गुर्जर विवाद हो या फिर महिला आरक्षण विधायक, हिन्दूराष्ड्र हो या गांधीवाद समाजवाद या मार्क्सवाद माओवाद सत्तावर्ग का रंग बदलता है, चेहरा नहीं। विचारधाराएं अब धर्म की तरह अफीम है और सामाजिक संरचना जस का तस।



पिछले वर्षों में बंगाल में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक परीक्षाओं में हिन्दुत्ववादी सवर्ण वर्चस्व वाले वाममोर्चा का वर्चस्व टूटा है। कोलकाता का बोलबाला भी खत्म। जिलों और दूरदराज के गरीब पिछड़े बच्चे आगे आ रहे हैं। इसे वामपंथ की प्रगतिशील विचारधारा की धारावाहिकता बताने से अघा नहीं रहे थे लोग। पर सारा प्रगतिवाद, उदारता और विचारधारा की पोल इसबार खुल गयी ,जबकि उच्चमाध्यमिक परीक्षाओं में सवर्ण वर्टस्व अटूट रहने के बाद माध्यमिक परीक्षाओं में प्रथम तीनों स्थान पर अनुसूचित जातियों के बच्चे काबिज हो गए। पहला स्थान हासिल करने वाली रनिता जाना को कुल आठ सौ अंकों मे ७९८ अंक मिले। तो दूसरे स्थान पर रहने वाले उद्ध्वालक मंडल और नीलांजन दास को ७९७अंक। तीसरे स्थान पर समरजीत चक्रवर्ती को ७९६ अंक मिले। पहले दस स्थानों पर मुसलमान और अनुसूचित छात्रों के वर्चस्व के मद्देनजर सवर्ण सहिष्णुता के परखच्चे उड़ गये। अब इसे पंचायत चुनाव में धक्का खाने वाले वाममोज्ञचा का ुनावी पैंतरा बताया जा रहा है। पिछले तेरह सालों में पहली बार कोई लड़की ने टाप किया है, इस तथ्य को नजर अंदाज करके माध्यमिक परीक्षाओं के स्तर पर सवालिया निशान लगाया जा रहा है। बहसें हो रही हैं। आरोप है कि मूल्यांकन में उदारता बरती गयी है। पिछले छह दशकों में जब चटर्जी, बनर्जी मुखर्जी, दासगुप्त, सेनगुप्त बसु, चक्रवर्ती उपाधियों का बोलबाला था और रामकृष्ण मिशन के ब्राह्ममण बच्चे टाप कर रहे थे, ऐसे सवाल कभी नहीं उछे। आरक्षण के खिलाफ मेधा का का तर्क देने वालो को मुंहतोड़ जवाब मिलने के बाद ही ये मुद्दे उठ रहे हैं प्रगतिशील मार्क्सवादी बंगील में।



ये दावा करते रहे हैं की अस्पृश्यता अब अतीत की बात है। जात पांत और साम्प्रदायिकता , फासीवाद का केंद्र है नवजागरण से वंचित उत्तर भारत। इनका दावा था कि बंगाल में दलित आन्दोलन की कोई गुंजाइश नहीं है क्योंकि यहां समाज तो पहले ही बदल गया है।

दरअसल कुछ भी नहीं बदला है। प्रगतिवाद और उदारता के बहाने मूलनिवासियों को गुलाम बनाकर ब्राह्मण तंत्र जीवन के हर क्षेत्र पर काबिज है। बंगाल और केरल वैज्ञानिक ब्राह्मणवाद की चपेट में हैं।



बंगाल में वाममोर्चा नहीं, ब्राह्मणवाद का राज है।



बंगाल में ब्रह्मणों की कुल जनसंख्या २२.४५लाख है, जो राज्य की जनसंख्या का महज २.८ प्रतिशत है। पर विधानसभा में ६४ ब्राह्मण हैं । राज्य में सोलह केबिनेट मंत्री ब्राह्मण हैं। दो राज्य मंत्री भी ब्राह्मण हैं। राज्य में सवर्ण कायस्थ और वैद्य की जनसंख्या ३०.४६ लाख है, जो कुल जनसंख्या का महज ३.४ प्रतिशत हैं। इनके ६१ विधायक हैं। इनके केबिनेट मंत्री सात और राज्य मंत्री दो हैं। अनुसूचित जातियों की जनसंख्या १८९ लाख है, जो कुल जनसंख्या का २३.६ प्रतिशत है। इन्हें राजनीतिक आरक्षण हासिल है। इनके विधायक ५८ है। २.८ प्रतिशत ब्राह्मणों के ६४ विधायक और २३.६ फीसद सअनुसूचितों के ५८ विधायक। अनुसूचितो को आरक्षण के बावजूद सिर्फ चार केबिनेट मंत्री और दो राज्य मंत्री, कुल जमा छह मंत्री अनुसूचित। इसी तरह आरक्षित ४४.९० लाख अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या , कुल जनसंख्या का ५.६ प्रतिशत, के कुल सत्रह विधायक और दो राज्य मंत्री हैं। राज्य में १८९.२० लाख मुसलमान हैं। जो जनसंख्या का १५.५६ प्रतिशत है। इनकी माली हालत सच्चर कमिटी की रपट से उजागर हो गयी है। वाममोर्चा को तीस साल तक लगातार सत्ता में बनाये रखते हुए मुसलमानों की औकात एक मुश्त वोटबैंक में सिमट गयी है। मुसलमाल इस राज्य में सबसे पिछड़े हैं। इनके कुल चालीस विधायक हैं , तीन केबिनेट मंत्री और दो राज्य मंत्री। मंडल कमीशन की रपट लागू करने के पक्ष में सबसे ज्यादा मुखर वामपंथियों के राज्य में ओबीसी की हालत सबसे खस्ता है। राज्य में अन्य पिछड़ी जातियों की जनसंख्या ३२८.७३ लाख है, जो कुल जनसंख्या का ४१ प्रतिशत है। पर इनके महज ५४ विधायक और एक केबिनेट मंत्री हैं। ४१ प्रतिशत जनसंखाया का प्रतिनिधित्व सिर्फ एक मंत्री करता है। वाह, क्या क्रांति है।



अनुसूचित जातियों, जनजातियों के विधायकों, सांसदों और मंत्रियों की क्या औकात है, इसे नीतिगत मामलों और विधायी कार्यवाहियों में समझा जासकता है। बंगाल में सारे महत्वपूर्ण विभाग या तो ब्राह्मणों के पास हैं या फिर कायस के पास। बाकी सिर्फ कोटा। ज्योति बसु मंत्रिमंडल और पिछली सरकार में शिक्षा मंत्री कान्ति विश्वास अनुसूचित जातियों के बड़े नेता हैं। उन्हें प्राथमिक शिक्षा मंत्रालय मिला हुआ था। जबकि उच्च शिक्षा मंत्रालय सत्य साधन चकत्रवर्ती के पास। नयी सरकार में कांति बाबू का पत्ता साफ हो गया। अनूसूचित चार मंत्रियों के पास गौरतलब कोई मंत्रालय नहीं है। इसीतरह उपेन किस्कू और विलासीबाला सहिस के हटाए जाने के बाद आदिवासी कोटे से बने दो राज्यंत्रियों का होना न होना बराबर है। रेज्जाक अली मोल्ला के पास भूमि राजस्व दफ्तर जैसा महत्वपूर्ण महकमा है। वे अपने इलाके में मुसलमान किसानों को तो बचा ही नहीं पाये, जबकि नन्दीग्राम में मुसलमान बहुल इलाके में माकपाई कहर के बबावजूद खामोश बने रहे। शहरी करण और औद्यौगीकरण के बहाने मुसलमाल किसानों का सर्वनाश रोकने के लिए वे अपनी जुबान तक खोलने की जुर्रत नहीं करते। दरअसल सवर्ण मंत्रियों विधायकों के अलावा बाकी तमाम तथाकथित जनप्रतिनिधियों की भूमिका हाथ उठाने के सिवाय कुछ भी नहीं है।



ऐसे में राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वोट के अलावा और क्या हासिल हो सकता है?



शरद यादव और राम विलास पासवान जैसे लोग उदाहरण हैं कि राजनीतिक आरक्षण का हश्र अंतत क्या होता है। १९७७ के बाद से हर रंग की सरकार में ये दोनों कोई न कोई सिद्धान्त बघारकर चिरकुट की तरह चिपक जाते हैं।



बंगाल के किसी सांसद या विधायक नें पूर्वी बंगाल के मूलनिवासी पुनवार्सित शरणार्थियों के देश निकाले के लिए तैयार नये नागरिकता कानून का विरोध नहीं किया है। हजारों लोग जेलों में सड़ रहे हैं। किसी ने खबर नहीं ली।



अब क्या फर्क पड़ता है कि है कि मुख्यमंत्री बुद्धबाबू रहे या फिर ममता बनर्जी? बंगाल के सत्ता समीकरण या सामाजिक संरचना में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं होने जा रहा है। जो नागरिक समाज और बुद्धिजीवी आज वामपंथ के खिलाफ खड़े हैं और नन्दीग्राम सिंगुर जनविद्रोह के समर्थन में सड़कों पर उतर रहे हैं, वे भी ब्राह्मण हितों के विरुद्ध एक लफ्ज नहीं बोलते। महाश्वेता देवी मूलनिवासी दलित शरणार्थियों के पक्ष में एक शब्द नहीं लिखती। हालांकि वे भी नन्दीग्राम जनविद्रोह को दलित आंदोलन बताती हैं। मीडिया में मुलनिवासी हक हकूक के लिए एक इंच जगह नहीं मिलती।



अस्पृश्यता को ही लीजिए। बंगाल में कोई जात नहीं पूछता। सफल गैरबंगालियों को सर माथे उठा लेने क रिवाज भी है। मां बाप का श्राद्ध न करने की वजह से नासितक धर्म विरोधी माकपाइयों के कहर की चर्चा होती रही है। मंत्री सुभाष चक्रवर्ती के तारापीठ दर्श न पर हुआ बवाल भी याद होगा। दुर्गा पूजा काली पूजा कमिटियों में वामपंथियों की सक्रिय भूमिका से शायद ही कोई अनजान होगा। मंदिर प्रवेश के लिए मेदिनीपुर में अछूत महिला की सजा की कथा भी पुरानी है। स्कूलों में मिड डे मिल खाने से सवर्ण बच्चों के इनकार का किस्सा भी मालूम होगा। वाममोर्चा चेयरमैन व माकपा राज्य सचिव के सामाजिक समरसता अभियान के तहत सामूहिक भोज भी बहुप्रचारित है। विमान बसु मतुआ सम्मेलन में प्रमुख अतिथि बनकर माकपाई वोट बैंक को मजबूत करते रहे हैं। पर इसबार नदिया और उत्तर दक्षिण चौबीस परगना के मतुआ बिदक गये। ठाकुरनगर ठाकुर बाड़ी के इशारे पर हरिचांद ठाकुर और गुरू चांद ठाकुर के अनुयायियों ने इसबार पंचायत चुनाव में तृणमुल कांग्रेस को समर्थन दिया। गौरतलब है कि इसी ठाकुर बाड़ी के प्रमथनाथ ठाकुर जो गुरू चांद ठाकुर के पुत्र हैं, को आगे करके बंगाल के सवर्णों ने भारतीय मूलनिवासी आंदोलन के प्रमुख नेता जोगेन्द्र नाथ मंडल को स्वतंत्र भारत में कोई चुनाव जीतने नहीं दिया। वैसे ही जैसे महाराष्ट्र में बाबा साहेब अंबेडकर सवर्ण साजिश से कोई चुनाव जीत नहीं पाये।



हरिचांद ठाकुर का अश्पृश्यता मोचन आन्दोलन की वजह से १९२२ में बाबासाहेब के आन्दोलन से काफी पहले बंगाल में अंग्रेजों ने अस्पृश्यता निषिद्ध कर दी। बंगाल के किसान मूलनिवासी आंदोलन के खिलाफसवर्ण समाज और नवजागरण के तमाम मसीहा लगातार अंग्रेजों का साथ देते रहे। बैरकपुर से १८५७ को महाविद्रोह की शुरुआत पर गर्व जताने वाले बंगाल के सत्तावर्ग ने तब अंग्रेजों का ही साथ दिया था। गुरूचांद ठाकुर ने कांग्रेस के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के महात्मा गांधी की अपील को यह कहकर ठुकरा दिया था कि पहले सवर्ण अछूतों को अपना भाई मानकर गले तो लगा ले। आजादी से पहले बंगाल में बनी तीनों सरकारों के प्रधानमंत्री मुसलमान थे और मंत्रमंडल में श्यामा हक मंत्रीसभा को छोड़कर दलित ही थे। बंगाल अविभाजित होता तो सत्ता में आना तो दूर, ज्योति बसु, बुद्धदेव, विधान राय , सिद्धा्र्थ शंकर राय या ममता बनर्जी का कोई राजनीतिक वजूद ही नहीं होता। इसीलिए सवर्ण सत्ता के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा थी कि भारत का विभाजन हो या न हो, पर बंगाल का विभाजन होकर रहेगा। क्योंकि हम हिंदू समाज के धर्मांतरित तलछंट का वर्चस्व बर्दाश्त नहीं कर सकते। बंगाल से शुरू हुआ थ राष्ट्रीय दलित आन्दोलन , जिसके नेता अंबेडकर और जोगेन्द्र नाथ मंडल थे। बंगाल के अछूत मानते थे कि गोरों से सत्ता का हस्तान्तरण ब्राह्ममों को हुआ तो उनका सर्वनाश। मंडल ने साफ साफ कहा था कि स्वतन्त्र भारत में अछूतों का कोई भविष्य नहींहै। बंगाल का विभाजन हुआ। और पूर्वी बंगाल के दलित देश भर में बिखेर दिये गये। बंगाल से बाहर वे फिर भी बेहतर हालत में हैं। हालिए नागरिकता कानून पास होने के बाद ब्राह्मण प्रणव बुद्ध की अगुवाई में उनके विरुद्ध देश निकाला अभियान से पहले भारत के दूसरे राज्यों में बसे बंगाली शरणार्थियों ने कभी किसी किस्म के भेदभाव की शिकायत नहीं की।



पर बंगाल में मूलनिवासी तमाम लोग अलित, आदिवासी, ओबीसी और मुसलमान दूसरे दर्जे के नागरिक हैं।



अस्पृश्यता बदस्तूर कायम है।



अभी अभी खास कोलकाता के मेडिकल कालेज हास्टल में नीची जातियों के पेयजल लेने से रोक दिया सवर्णर छात्रों ने। ऐसा तब हुआ जबकि वाममोर्चा को जोरदार धक्का देने का जश्न मना रही है आम जनता। पर यह निर्वाचनी परिवर्तन कितना बेमतलब है, कोलकाता मेडिकल कालेज के वाकये ने साफ साफ बता दिया। कुछ अरसा पहले बांकुड़ा में नीची जातियों की महिलाओं का पकाया मिड डे मिल खाने से सवर्ण बच्चों के इनकार के बाद विमान बोस ने हस्तक्षेप किया था। इसबार वे क्या करते हैं. यह देखना बाकी है।



आरोप है कि कोलकाता मेडिकल कालेज में अस्पृश्य और नीची जातियों के छात्रो के साथ न सिर्फ छुआछूत चाल है, बल्कि ऐसे छात्रों को शारीरिक व मानसिक तौ पर उत्पीड़ित भी किया जाता है। जब खास कोलकाते में ऐसा हो रहा है तो अन्यत्र क्या होगा। मालूम हो कि आरक्षण विरोधी आंदोलन भी माकपाई शासन में बाकी देश से कतई कमजोर नहीं रहा। यहां मेडिकल, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट स्कूलों में आरक्षण विवाद की वजह से पहले से नीची जातियों के छात्रों पर सवर्ण छात्रों की नाराजगी चरम पर है। जब नयी नियुक्तिया बंद हैं। निजीकरण और विनिवेश जोरों पर है तो आरक्षण से किसको क्या फायदा या नुकसान हो सकता है। पर चूंकि मूलनिवाियों को कहीं भी किसी भी स्तर पर कोई मौका नहीं देना है, इसलिए आरक्षण विरोध के नाम पर खुल्लमखुल्ला अस्पृश्यता जारी है। मेधा सवर्णों में होती है , यह तथ्य तो माध्यमिक परीक्षा परिणामों से साफ हो ही गया है। मौका मिलने पर मूलनिवासी किसी से कम नही हैं। पर ब्राह्मणराज उन्हें किसी किस्म का मौका देना तो दूर, उनके सफाये के लिए विकास के बहाने नरमेध यज्ञ का आयोजन कर रखा है।



बांग्लादेश गणतन्त्र (बांग्ला: গণপ্রজাতন্ত্রী বাংলাদেশ गॉणोप्रोजातोन्त्री बाङ्लादेश्) दक्षिण जंबूद्वीप का एक राष्ट्र है। देश की उत्तर, पूर्व और पश्चिम सीमाएँ भारत और दक्षिणपूर्व सीमा म्यान्मार देशों से मिलती है; दक्षिण में बंगाल की खाड़ी है। बांग्लादेश और भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल एक बांग्लाभाषी अंचल, बंगाल हैं, जिसका ऐतिहासिक नाम "বঙ্গ" बॉङ्गो या "বাংলা" बांग्ला है। इसकी सीमारेखा उस समय निर्धारित हुई जब 1947 में भारत के विभाजन के समय इसे पूर्वी पाकिस्तान के नाम से पाकिस्तान का पूर्वी भाग घोषित किया गया। पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान के मध्य लगभग 1600 किमी (1000 माइल)। की भौगोलिक दूरी थी। पाकिस्तान के दोनो भागों की जनता का धर्म (इस्लाम) एक था, पर उनके बीच जाति और भाषागत काफ़ी दूरियाँ थीं। पश्चिम पाकिस्तान की तत्कालीन सरकार के अन्याय के विरुद्ध 1971 में भारत के सहयोग से एक रक्तरंजित युद्ध के बाद स्वाधीन राष्ट्र बांग्लादेश का उदभव हुआ। स्वाधीनता के बाद बांग्लादेश के कुछ प्रारंभिक वर्ष राजनैतिक अस्थिरता से परिपूर्ण थे, देश मे 13 राष्ट्रशासक बदले गए और 4 सैन्य बगावतें हुई। विश्व के सबसे जनबहुल देशों में बांग्लादेश का स्थान आठवां है। किन्तु क्षेत्रफल की दृष्टि से बांग्लादेश विश्व में 93वाँ है। फलस्वरूप बांग्लादेश विश्व की सबसे घनी आबादी वाले देशों में से एक है। मुसलमान- सघन जनसंख्या वाले देशों में बांग्लादेश का स्थान 4था है, जबकि बांग्लादेश के मुसलमानों की संख्या भारत के अल्पसंख्यक मुसलमानों की संख्या से कम है। गंगा-ब्रह्मपुत्र के मुहाने पर स्थित यह देश, प्रतिवर्ष मौसमी उत्पात का शिकार होता है, और चक्रवात भी बहुत सामान्य हैं। बांग्लादेश दक्षिण एशियाई आंचलिक सहयोग संस्था, सार्क और बिम्सटेक का प्रतिष्ठित सदस्य है। यहओआइसी और डी-8 का भी सदस्य है।



बांग्लादेश में सभ्यता का इतिहास काफी पुराना रहा है. आज के भारत का अंधिकांश पूर्वी क्षेत्र कभी बंगाल के नाम से जाना जाता था. बौद्ध ग्रंथो के अनुसार इस क्षेत्र में आधुनिक सभ्यता की शुरुआत ७०० इसवी इसा पू. में आरंभ हुआ माना जाता है. यहाँ की प्रारंभिक सभ्यता पर बौद्ध और हिन्दू धर्म का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है. उत्तरी बांग्लादेश में स्थापत्य के ऐसे हजारों अवशेष अभी भी मौज़ूद हैं जिन्हें मंदिर या मठ कहा जा सकता है.

बंगाल का इस्लामीकरण मुगल साम्राज्य के व्यापारियों द्वारा १३ वीं शताब्दी में शुरु हुआ और १६ वीं शताब्दी तक बंगाल एशिया के प्रमुख व्यापारिक क्षेत्र के रुप में उभरा. युरोप के व्यापारियों का आगमन इस क्षेत्र में १५ वीं शताब्दी में हुआ और अंततः १६वीं शताब्दी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा उनका प्रभाव बढना शुरु हुआ. १८ वीं शताब्दी आते आते इस क्षेत्र का नियंत्रण पूरी तरह उनके हाथों में आ गया जो धीरे धीरे पूरे भारत में फैल गया. जब स्वाधीनता आंदोलन के फलस्वरुप १९४७ में भारत स्वतंत्र हुआ तब राजनैतिक कारणों से भारत को हिन्दू बहुल भारत और मुस्लिम बहुल पािकस्तान में विभाजित करना पड़ा.

भारत का विभाजन होने के फलस्वरुप बंगाल भी दो हिस्सों में बँट गया. इसका हिन्दु बहुल इलाका भारत के साथ रहा और पश्चिम बंगाल के नाम से जाना गया तथा मुस्लिम बहुल इलाका पूर्वी बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बना जो पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना गया. जमींदारी प्रथा ने इस क्षेत्र को बुरी तरह झकझोर रखा था जिसके खिलाफ १९५० में एक बड़ा आंदोलन शुरु हुआ और १९५२ के बांग्ला भाषा आंदोलन के साथ जुड़कर यह बांग्लादेशी गणतंत्र की दिशा में एक बड़ा आंदोलन बन गया. इस आंदोलन के फलस्वरुप बांग्ला भाषियों को उनका भाषाई अधिकार मिला. १९५५ में पाकिस्तान सरकार ने पूर्वी बंगाल का नाम बदलकर पूर्वी पाकिस्तान कर दिया. पाकिस्तान द्वारा पूर्वी पाकिस्तान की उपेक्षा और दमन की शुरुआत यहीं से हो गई. और तनाव स्त्तर का दशक आते आते अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया. पाकिस्तानी शासक याहया खाँ द्वारा लोकप्रिय अवामी लीग और उनके नेताओं को प्रताड़ित किया जाने लगा. जिसके फलस्वरुप बंगबंधु शेख मुजीवु्ररहमान की अगुआई में बांग्लादेशा का स्वाधीनता आंदोलन शुरु हुआ. बांग्लादेश में खून की नदियाँ बही. लाखों बंगाली मारे गये तथा १९७१ के खूनी संघर्ष में दस लाख से ज्यादा बांग्लादेशी शरणार्थी को पड़ोसी देश भारत में शरण लेनी पड़ी. भारत इस समस्या से जूझने में उस समय काफी परेशानियों का सामना कर रहा था और भारत को बांग्लादेशियों के अनुरोध पर इस सम्स्या में हस्तक्षेप करना पड़ा जिसके फलस्वरुप १९७१ का भारत पाकिस्तान युद्ध शुरु हुआ. बांग्लादेश में मुक्ति वाहिनी सेना का गठन हुआ जिसके ज्यादातर सदस्य बांग्लादेश का बौद्धिक वर्ग और छात्र समुदाय था, इन्होंने भारतीय सेना की मदद गुप्तचर सूचनायें देकर तथा गुरिल्ला युद्ध पद्ध्ति से की. पाकिस्तानी सेना ने अंतत: १६ दिसंबर १९७१ को भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. लगभग ९३००० युद्ध बंदी बनाये गये जिन्हें भारत में विभिन्न कैम्पों मे रखा गया ताकि वे बांग्लादेशी क्रोध के शिकार न बनें. बांग्लादेश एक आज़ाद मुल्क बना और मुजीबुर्र रहमान इसके प्रथम प्रधानमंत्री बने.



कोलकाता मेडिकल कालेज के मेन हास्टल के पहले और दूसरे वर्ष के सत्रह छात्रों ने डीन प्रवीर कुमार दासगुप्त और सुपर ्नूप राय को अस्पृश्यता की लिखित शिकायत की है।

पदोन्नति में आरक्षण का प्रश्न-उदित राज

जनसत्ता 27 दिसंबर, 2012: पदोन्नति में आरक्षण का विवाद अभी थमा नहीं है और निकट भविष्य में थमने वाला भी नहीं है। पिछले अठारह दिसंबर को राज्यसभा ने पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए एक सौ सत्रहवां संवैधानिक संशोधन विधेयक पारित कर दिया था। दूसरे दिन यानी उन्नीस दिसंबर को इसे लोकसभा को पारित करना था। समाजवादी पार्टी के विरोध के कारण कई बार लोकसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। सरकार की जो इच्छाशक्ति एफडीआइ को लेकर दिखी थी, वह इस मामले में नहीं दिखी। लोकसभा में सपा के बाईस सदस्य ही हैं और उनके रोकने से भी विधेयक पारित किया जा सकता था। जब वह पारित नहीं हुआ तो आरक्षण विरोधियों ने मुहिम और तेज कर दी।


उत्तर प्रदेश से तमाम सूचनाएं आर्इं कि आरक्षण विरोधी कर्मचारी उतने सक्रिय नहीं थे, जितना मीडिया में दिखाया गया, बल्कि सरकार की शह पर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कर्मचारियों की ओर से तमाम कार्यालयों में तालाबंदी की। कांग्रेस और भाजपा को लगा कि उनका सवर्ण जनाधार खासतौर से उत्तर प्रदेश में खिसक जाएगा और इसलिए इस विधेयक को बिना पास किए संसद की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई, जबकि उसे बाईस दिसंबर तक चलना था। बीस दिसंबर को भाजपा के कुछ नेताओं के सुर बदले नजर आए और जिस तरह से उन्होंने राज्यसभा में सहयोग दिया वैसा यहां नहीं किया।
वास्तव में इस मामले में भ्रांति बहुत है कि इससे सामान्य वर्ग की पदोन्नति पर असर पड़ेगा। 1955 से ही पदोन्नति में आरक्षण मिलता चला आ रहा है और जब अब तक प्रतिकूल असर नहीं पड़ा तो आगे क्या पड़ने वाला है? सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में पदोन्नति में आरक्षण नहीं खत्म किया था, बल्कि कुछ शर्तें लगा दी थीं, जिनका पालन करते हुए आरक्षण दिया जा सकता था। उन्हीं शर्तों को खत्म करने के लिए विधेयक संसद में है, न कि नए अधिकार के लिए।


दरअसल, इस समस्या का समाधान सतहत्तरवें, बयासीवें और पचासीवें संवैधानिक संशोधन में किया जा चुका है। इंदिरा साहनी मामले का फैसला 1992 में आया, जिसमें कहा गया कि पदोन्नति में आरक्षण आगे पांच साल तक चालू रहेगा। इस निर्णय से उपजी समस्याओं का समाधान 1995 में सतहत्तरवें संवैधानिक संशोधन के द्वारा किया गया। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के कुछ ऐसे फैसले आए, जिससे भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने 30 जनवरी, 1997 और 22 जुलाई, 1997 को आरक्षण विरोधी आदेश जारी किया। बाईस जुलाई को जारी कार्यालय-विज्ञप्ति के मुताबिक पदोन्नति या विभागीय परीक्षा पास करने की जो छूट मिलती थी वह वापस ले ली गई।


इस अधिकार को पुन: बहाल करने के लिए बयासीवां संवैधानिक संशोधन सन 2000 में राजग सरकार द्वारा लाया गया। विभागीय परीक्षा पास करने की छूट और पात्रता के मापदंड में भी छूट के लिए संविधान की धारा 335 में पचासीवां संशोधन किया गया। धारा 335 के अनुसार, अनुसूचित जाति-जनजाति की नियुक्ति करते समय इस बात का ध्यान दिया जाना चाहिए कि प्रशासनिक दक्षता पर कोई प्रभाव न पड़े। 30 जनवरी 1997 की विज्ञप्ति के अनुसार वरिष्ठता के परिणामी लाभ को छीन लिया गया। इस अधिकार को वापस करने के लिए धारा 16(4-क) को 2001 में संशोधित किया गया। इसी संशोधन को कर्नाटक हाइकोर्ट में चुनौती दी गई और अंत में मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की पीठ ने की। इस प्रकरण को नागराज मामले के नाम से जाना जाता है।


पदोन्नति में आरक्षण और परिणामी लाभ को सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार तो रखा, लेकिन तीन शर्तें लगा दीं, जैसे- प्रतिनिधित्व की कमी, दक्षता और पिछड़ापन। नौ जजों की पीठ (इंदिरा साहनी) ने तय कर दिया था कि अनुसूचित जाति-जनजाति पिछड़े हैं, फिर भी नागराज मामले की सुनवाई करने वाली पीठ इस बड़ी पीठ के फैसले को उलट दिया है, जो कभी होता नहीं है। हुआ इसलिए कि यह मामला अनुसूचित जाति और जनजाति से संबंधित था। पिछले साल चार जनवरी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने पदोन्नति में आरक्षण खत्म कर दिया, यह कहते हुए कि सरकार ने नागराज के मामले में निर्धारित शर्तों को नहीं माना। मामला सुप्रीम कोर्ट में आया और इस साल सत्ताईस अप्रैल को उसने हाईकोर्ट के फैसले को उचित ठहरा दिया।


एक सौ सत्रहवें संवैधानिक संशोधन पर जो मैराथन बहस संसद में चली, वह हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों से संबंधित थी। इस संशोधन में फिर से लगभग वही प्रावधान रखा जा रहा है जो पहले से ही है। संविधान की धारा 341 में अनुसूचित जाति और 342 में अनुसूचित जनजाति को पिछड़ा माना गया है और अब इस संशोधन से फिर से इन्हें पिछड़ा माना जाएगा ताकि नागराज मामले में बताई गई शर्त पूरी की जा सके। क्या कोई शक है कि ये जातियां पिछड़ी नहीं हैं? वास्तव में हुआ यह कि किसी विशेष विभाग में कुछ अनुसूचित जाति के अधिकारी उच्च पदों पर ज्यादा पहुंच गए थे और उसी को न्यायालयों के सामने आधार बना कर बहस की गई, यानी अपवाद को सच्चाई मान लिया गया।


पदोन्नति में आरक्षण 1955 से होने के बावजूद अभी तक पहली श्रेणी में ग्यारह फीसद तक ही आरक्षण पहुंच सका है, जबकि होना पंद्रह फीसद चाहिए। अपवाद को छोड़ दिया जाए तो सारे सरकारी विभागों में इन वर्गों के प्रतिनिधित्व की कमी है। देश में किसी शोध ने अभी तक यह नहीं सिद्ध किया कि आरक्षण से प्रशासन पर प्रतिकूल असर पड़ा हो। तमिलनाडु में उनहत्तर फीसद तक   आरक्षण है और वह उत्तर भारत के राज्यों से कई मामलों में आगे है, चाहे कानून-व्यवस्था हो, स्वास्थ्य, शिक्षा, आइटी, उद्योग आदि। नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला उचित नहीं था। न्यायपालिका का मुख्य कार्य यह है कि विधायिका के द्वारा जो भी कानून बनाया जाए, उसकी सही व्याख्या करे, न कि वह खुद कानून तय करने लगे।


मायावती ने राज्यसभा में काफी दमखम दिखाया और कांग्रेस को भी लगा कि इसका श्रेय बसपा ले रही है। यह मुकदमा 2006 से इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में चला और चार जनवरी, 2011 को इस पर फैसला आया। हाईकोर्ट ने बार-बार सरकार से जानना चाहा कि क्या नागराज मामले में दी गई शर्तों को राज्य सरकार पूरा करके पदोन्नति में आरक्षण दे रही है? उचित जवाब न मिलने पर खिलाफ में फैसला आ गया। फिर भी निर्णय के अंतिम पैराग्राफ में यह बात कही गई थी कि राज्य सरकार चाहे तो पदोन्नति में आरक्षण आगे चालू रख सकती है, बशर्ते और जांच-समिति बना कर इन शर्तों को पूरा करे। इस तरह से मायावती सरकार को इस अधिकार को बचाने का दो बार मौका मिला, पर उसने ऐसा न करके मामले को सुप्रीम कोर्ट में भेज दिया। अनुसूचित जाति-जनजाति संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघ की ओर से बहुत प्रयास किए कि सवर्ण वोटों के लालच में मायावती ऐसा न करें, लेकिन उन्हें कहां सुनना था? और अंत में सुप्रीम कोर्ट ने भी लखनऊ हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी। बिहार सरकार ने एक जांच समिति बना कर पदोन्नति में आरक्षण चालू रखा है और उत्तर प्रदेश सरकार भी यह कर सकती थी। अगर ऐसा किया होता तो आज ऐसी स्थिति पैदा ही न होती। समाजवादी पार्टी ने अपने दलित सांसदों को ही लोकसभा में दलित हितों के खिलाफ इस्तेमाल किया।


मुलायम सिंह का मतभेद मायावती से है, न कि दलितों से होना चाहिए। समाजवादी पार्टी ने जिस तरह से संसद में विरोध किया उससे देश में यही संदेश गया कि उसकी दुश्मनी सभी दलितों से है। इस बार छह दिसंबर को उत्तर प्रदेश में छुट्टी नहीं घोषित की गई। इसी दिन आंबेडकर का 1956 में निधन हुआ था। आंबेडकर अब हमारे बीच रहे नहीं, फिर भी मुलायम सिंह उनसे बदला लेने का काम क्यों कर रहे हैं?


भले ही सवर्णों को खुश करने के लिए समाजवादी पार्टी संसद में पदोन्नति में आरक्षण का विरोध करे, लेकिन उसे इनका वोट मिलने वाला नहीं है। जो एकता दलितों और पिछड़ों में बनी थी, उस पर बहुत असर पड़ा है और शायद इसकी भरपाई करना मुश्किल होगा। पिछड़े वर्ग के भी तमाम लोग समाजवादी पार्टी के इस रवैये से दुखी हैं। उनका भी मानना है कि बजाय दलितों के  लिएतरक्की में आरक्षण का विरोध करने के, सपा को पिछड़े वर्ग के लिए भी पदोन्नति में आरक्षण की मांग करनी चाहिए थी। इससे सामाजिक न्याय की लड़ाई भी आगे बढ़ती।


आरक्षण इस देश में बड़ा विवादित मसला है। कुछ लोगों का मानना है कि इससे देश पीछे जा रहा है। ऐसे लोगों को जानना चाहिए कि आजादी के बाद से व्यवस्था के तीनों अंगों पर अधिकतर समय सवर्ण लोग ही काबिज हैं तो क्यों भ्रष्टाचार, गरीबी, पिछड़ापन और कानून-व्यवस्था की समस्या देश में बनी हुई है। अपवाद को छोड़ कर उच्च न्यायपालिका सदा सवर्णों द्वारा काबिज रही, तो क्यों दादा के जमाने के मुकदमों का फैसला नाती के समय में होता है? इस समय देश में बलात्कार के खिलाफ आंदोलन चल रहा है और सभी लोग पुलिस और सरकार को कोस रहे हैं, जबकि न्यायपालिका की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। कहावत है कि देर से न्याय मिलने का मतलब है कि न्याय मिला ही नहीं। अपराधियों का हौसला इसीलिए बुलंद हो जाता है कि न्यायिक प्रक्रिया लंबी ही नहीं, बल्कि बहुत महंगी है।


आरक्षण समस्याओं का समाधान नहीं है, यह हम जानते हैं, लेकिन विकल्प क्या है? निजीकरण और उदारीकरण की वजह से तमाम नए क्षेत्र मान-सम्मान, धन-संपत्ति, खुशहाली और सत्ता के पैदा हुए, लेकिन उनमें अनुसूचित जाति-जनजाति की भागीदारी शून्य रही, चाहे सूचना प्रौद्योगिकी या दूरसंचार हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सेवा क्षेत्र, शेयर बाजार, एफडीआइ आदि। अनुसूचित जाति-जनजाति की भागीदारी केवल आरक्षण की वजह से राजनीति और सरकारी विभागों में है, अगर यह न होता तो अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि आज भी ये गुलाम बने रहते।


आज मुक्त अर्थव्यवस्था में भी सामाजिक न्याय की हवा बह रही है। हाल में ओबामा की जीत एक सामाजिक न्याय की लड़ाई ही है। गोरों का दिल बहुत बड़ा है। उनकी चौहत्तर फीसद आबादी होते हुए भी बारह फीसद की आबादी वाले अश्वेत समुदाय के एर व्यक्ति को उन्होंने राष्ट्रपति बनाया। हम तो कहते आ रहे हैं कि अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग आरक्षण का त्याग करने के लिए तैयार हैं, अगर देश में सभी को समान शिक्षा मिले और जाति-विहीन समाज स्थापित हो जाए। जो लोग आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, उन्हें चाहिए कि इस दिशा में काम करें। इन्हें पहले के आरक्षण का विरोध पहले करना चाहिए। आज भी हिंदू धर्म के चारों धामों पर आरक्षण ब्राह्मण का ही है, लेकिन आरक्षण विरोधी इस पर चुप रहते हैं। जिस दिन इस देश का सवर्ण इस आरक्षण के खिलाफ बोलने लगेगा उसी दिन से बड़ा बदलाव आना शुरू हो जाएगा।

बलात्कार के आरोपी को फिर मिला राष्ट्रपति पुरस्कार

जब आप यह रपट पढ़ रहे होंगे तब तक भारतीय पुलिस सेवा के पदाधिकारी एसआरपी कल्लूरी को वीरता के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा जा चुका होगा। एसआरपी कल्लूरी का करियर दागदार रहा है। जुलाई 2012 में, कल्लूरी ने लिंगाराम कोडोपी को माओवादी हमले के एक मास्टरमाइंड के रूप में आरोपित किया था। पड़ताल के बाद लिंगाराम नोएडा में अध्ययनरत पत्रकारिता का छात्र निकला। साथ ही छत्तीसगढ़ में सेवारत आईपीएस कल्लूरी हवालात में हुए एक बलात्कार के मामले में आरोपित भी हैं। यह मामला छत्तीसगढ़ की आदिवासी महिला लेधा से संबंधित है। मोहल्ला लाइव ऐसे में पुण्य प्रसून वाजपेयी की एक पुरानी रपट प्रकाशित कर रहा है जो प्रथम प्रवक्ता में प्रकाशित हुई थी। इस रपट पर उन्हें प्रिंट का रामनाथ गोयनका अवार्ड मिला था और उसके केंद्र में लेधा थीं।
सरगुजा की लेधा को गर्भवती हालात में पुलिस उठाकर ले गई थी। उसने जेल में ही बच्चे को जन्म दिया। बाद में पुलिस ने लेधा के पति को सरगुजा के बीच गांव में तब गोली गोली मारी जब पुलिस ने उसे लोधा के माध्यम से नौकरी और पैसे का लालच देकर आत्मसमर्पण के लिए रजामंद किया था। इस घटना के तीन महीने बाद एक बार फिर पुलिस लेधा को उठाकर थाने ले गयी और वहां उसके साथ कल्लौरी की मौजूदगी में सामूहिक बलात्कार किया गया जो कई दिनों तक चलता रहा।
यह रिपोर्ट छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की त्रासदी का बखान करती है और वहां राष्ट्रीय संसाधनों की हो रही लूट के बारे में बताती है। यह रिपोर्ट उस बहस को पारदर्शी बनाती है जो नक्सलवाद के मसले को लेकर लगातार छिड़ी हुई है। साथ ही ऐसे में जबकि महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और बराबरी को लेकर चले आंदोलन के बाद देश एक बेहतर भविष्य की ओर बढ़ना चाहता है, सत्ता प्रतिष्ठान का यह पुरस्कार उसके इरादों, वादों और संवेदनशीलता का भी असली चेहरा सामने लाता है: संपादक



हिन्दुस्तान की जमीं का स्याह सच यह भी है

♦ पुण्य प्रसून वाजपेयी

देश के मूल निवासी आदिवासी को अगर भूख के बदले पुलिस की गोली खानी पड़े; आदिवासी महिला को पुलिस-प्रशासन जब चाहे, जिसे चाहे, उठा ले और बलात्कार करे, फिर रहम आए तो जिन्दा छोड़ दे या उसे भी मार दे; और यह सब देखते हुए किसी बच्चे की आंखों में अगर आक्रोश आ जाए तो गोली से छलनी होने के लिए उसे भी तैयार रहना पड़े; फिर भी कोई मामला अदालत की चैखट तक न पहुंचे, थानों में दर्ज न हो – तो क्या यह भरोसा जताया जा सकता है कि हिन्दुस्तान की जमीं पर यह संभव नहीं है? जी! दिल्ली से एक हजार किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाके का सच यही है। लेकिन राज्य की नजर में ये इलाके आतंक पैदा करते हैं, संसदीय राजनीति को ठेंगा दिखाते हुए विकास की गति रोकना चाहते हैं। हिंसक कार्रवाइयों से पुलिस प्रशासन को निशाना बनाते हैं। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर व्यवस्था को खारिज कर विकल्प की बात करते हैं। इस नक्सली हिंसा को आदिवासी मदद करते हैं तो उन्हें राज्य कैसे बर्दाश्त कर सकता है? लेकिन राज्य या नक्सली हिंसा की थ्योरी से हटकर इन इलाकों में पुरखों से रहते आए आदिवासियों को लेकर सरकार या पुलिस प्रशासन का नजरिया आंतरिक सुरक्षा के नाम पर आदिवासियों को नक्सली करार देकर जिस तरह की पहल करता है, वह रोंगटे खड़े कर देता है।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले की पुलिस ने आदिवासी महिला लेधा को सीमा के नाम से गिरफ्तार किया। पुलिस ने आरोप लगाया कि मार्च 2006 में बम विस्फोट के जरिए जिन तीन केंद्रीय सुरक्षा बल के जवानों की मौत हुई उसके पीछे सीमा थी। अप्रैल 2006 में जिस वक्त सीमा को गिरफ्तार किया गया, वह गर्भवती थी। सीमा का पति रमेश नागेशिया माओवादियों से जुड़ा था। कोर्ट ने सीमा को डेढ़ साल की सजा सुनाई। सीमा ने जेल में बच्चे को जन्म दिया, जो काफी कमजोर था। अदालत ने इस दौरान पुलिस के कमजोर सबूत और हालात देखते हुए सीमा को पूरे मामले से बरी कर दिया, यानी मुकदमा ही खत्म कर दिया।

लेधा उर्फ सीमा नक्सली होने के आरोप से मुक्त हो गई। लेकिन पुलिस ने लेधा पर दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वह अपने पति रमेश नागेशिया पर आत्मसमर्पण करने के लिए दबाव बनाए। पुलिस ने नौकरी और पैसा देने का लोभ भी दिया। लेधा ने भी अपने पति को समझाया और कमजोर बेटे का वास्ता दिया कि आत्मसमर्पण करने से जीवन पटरी पर लौट सकता है। आखिरकार रमेश आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार हो गया।

28 मई, 2006 को सरगुजा के सिविलडाह गाव में आत्मसमर्पण की जगह ग्राम पंचायत के सचिव का घर तय हुआ। सरगुजा के एसपी सीआरपी कलौरी लेधा को लेकर सिविलडाह गांव पहुंचे। कुसुमी इलाके से अतिरिक्त फौज भी उनके साथ गई। इंतजार कर रहे रमेश को पुलिस ने पहुंचते ही भरपूर मारा। इतनी देर तक कि बदन नीला-काला पड़ गया। फिर एकाएक लेधा के सामने ही आर्मड् फोर्स के असिस्टेंट प्लाटून कमांडर ने रमेश की कनपटी पर रिवाल्वर लगा कर गोली चला दी। रमेश की मौके पर ही मौत हो गई। गोद में बच्चे को लेकर जमीन पर बैठी लेधा चिल्ला भी नहीं पाई। वह डर से कांपने लगी। लेधा को पुलिस शंकरगढ़ थाने ले गई, जहां उसे डराया-धमकाया गया कि कुछ भी देखा हुआ, किसी से कहा तो उसका हश्र भी नरेश की तरह होगा। लेधा खामोश रही।

लेकिन तीन महीने बाद ही दशहरे के दिन पुलिस लेधा और उसके बूढ़े बाप को गांव के घर से उठाकर थाने ले गई, जहां एसपी कल्लौरी की मौजूदगी में और बाप के ही सामने लेधा को नंगा कर बलात्कार किया गया। फिर अगले दस दिनों तक लेधा को थाने में ही सामूहिक तौर पर हवस का शिकार बनाया जाता रहा। इस पूरे दौर में लेधा के बाप को तो अलग कमरे में रखा गया, मगर लेधा का कमजोर और न बोल सकने वाला बेटा रंजीत रोते हुए सूनी आंखों से बेबस-सा सब कुछ देखता रहा। लेधा बावजूद इन सबके, मरी नहीं। वह जिंदा है और समूचा मामला लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भी जा पहुंची। जनवरी 2007 में बिलासपुर हाईकोर्ट ने मामला दर्ज भी कर लिया। पहली सुनवाई में सरकार की तरफ से कहा गया कि लेधा झूठ बोल रही है।

दूसरी सुनवाई का इंतजार लेधा, उसके मां-बाप और गांववालों को है कि शायद अदालत कोई फैसला उनके हक में यह कहते हुए दे दे कि अब कोई पुलिसवाला किसी गांववाले को नक्सली के नाम पर गोली नहीं मारेगा, इज्जत नहीं लूटेगा। लेधा या गांववालों को सिर्फ इतनी राहत इसलिए चाहिए, क्योंकि इस पूरे इलाके का यह पहला मामला है जो अदालत की चैखट तक पहुंचा है। लेधा जैसी कई आदिवासी महिलाओं की बीते एक साल में लेधा से भी बुरी गत बनाई गई। लेधा तो जिंदा है, कइयों को मार दिया गया। बीते एक साल के दौरान थाने में बलात्कार के बाद हत्या के छह मामले आए। पेद्दाकोरमा गांव की मोडियम सुक्की और कुरसम लक्के, मूकावेल्ली गांव की वेडिंजे मल्ली और वेडिंजे नग्गी, कोटलू गांव की बोग्गाम सोमवारी और एटेपाड गांव की मडकाम सन्नी को पहले हवस का शिकार बनाया फिर मौत दे दी गई। मडकाम सन्नी और वेडिंजे नग्गी तो गर्भवती थीं। ये सभी मामले थाने में दर्ज भी हुए और मिटा भी दिए गए। मगर यह सच इतना सीमित भी नहीं है। महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना किसी एक गांव की नहीं है, बल्कि दर्जन भर ऐसे गांव हैं। कोण्डम गांव की माडवी बुधरी, सोमली और मुन्नी, फूलगट्टी गाँव की कुरसा संतो और कडती मुन्नी, कर्रेबोधली गांव की मोडियम सीमो और बोग्गम संपो, पल्लेवाया गाँव की ओयम बाली, कर्रेमरका गाँव की तल्लम जमली और कडती जयमती, जांगला गांव की कोरसा बुटकी, कमलू जय्यू और कोरसा मुन्नी, कर्रे पोन्दुम गाँव की रुकनी, माडवी कोपे और माडवी पार्वती समेत तेइस महिलाओं के साथ अलग-अलग थाना क्षेत्रों में बलात्कार हुआ। इनमें से दो महिलाएं गर्भवती थीं। दोनों के बच्चे मरे पैदा हुए। नीलम गांव की बोग्गम गूगे तो अब कभी भी मां नहीं बन पाएगी।

सवाल सिर्फ महिलाओं की त्रासदी या आदिवासियों के घर में लड़की-महिला के सुरक्षित होने भर का नहीं है। दरअसल आदिवासी महिला के जरिये तो पुलिस-सुरक्षाकर्मियों को कडक (आतंक होने) का संदेश समूचे इलाके में दिया जाता है। यह काम तेंदूपत्ता जमा कराने वाले ठेकेदार करते हैं। चूंकि तेंदूपत्ता को खुले बाजार में बेचकर ठेकेदार लाखों कमाते हैं, इसलिए वे सुरक्षाकर्मियों के लिए नक्सलियों के बारे में जानकारी देने का सूत्र भी बन जाते हैं। नक्सलियों की पहल की कोई भी सूचना इलाके में तैनात सुरक्षाकर्मियों के लिए भी उपलब्धि मानी जाती है, जिससे वे बड़े अधिकारियों के सामने सक्षम साबित होते हैं और यह पदोन्नति का आधार बनता है। इलाके में तेंदूपत्ता ठेकेदार की खासी अहमियत होती है। एक तरफ आदिवासियों के लिए छह महीने का रोजगार तो दूसरी तरफ पुलिस के लिए खुफियागिरी। ज्यादातर मामलों में जब ठेकेदार को लगता है कि तेंदूपत्ता को जमा करने वाले आदिवासी ज्यादा मजदूरी की मांग कर रहे हैं तो वह किसी भी आदिवासी महिला के संबंध नक्सलियों से होने की बात पुलिस-जवान से खुफिया तौर पर कहता है और अंजाम होता है बलात्कार या हत्या। उसके बाद ठेकेदार की फिर चल निकलती है। तेंदूपत्ता आदिवासियों के शोषण और ठेकेदार-सरकारी कर्मचारियों के लिए मुनाफे का प्रतीक भी है। खासकर जब से अविभाजित मध्यप्रदेश सरकार ने तेंदूपत्ता के राष्ट्रीयकरण और सहकारीकरण का फैसला किया तब से शोषण और बढ़ा। बोनस के नाम पर सरकारी कर्मचारी हर साल, हर जिले में लाखों रुपये डकार लेते हैं। बोनस की रकम कभी आदिवासियों तक नहीं पहुंचती। वहीं मजदूरी का दर्द अलग है। महाराष्ट्र में सत्तर पत्तों वाली तेंदूपत्ता की गड्डी की मजदूरी डेढ़ रुपये मिलती है, वहीं छत्तीसगढ़ में महज 45 पैसे ही प्रति गड्डी दिए जाते हैं। कई गांवों में सिर्फ 25 पैसे प्रति गड्डी ठेकेदार देता है। ऐसे में, कोई आदिवासी अगर विरोध करता है, तो इलाके में तैनात सुरक्षाकर्मियों को उस आदिवासी या उस गांववालों के संपर्क-संबंध नक्सलियों से होने की जानकारी खुफिया तौर पर ठेकेदार पहुंचाता है। उसके बाद हत्या, लूट, बलात्कार का सिलसिला चल पड़ता है।

यह सब आदिवासी बहुल इलाकों में कैसे बदस्तूर जारी है, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि पिछले साल जुलाई से अक्टूबर के दौरान पचास से ज्यादा आदिवासियों को सुरक्षाकर्मियों ने निशाना बनाया। दर्जनों महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना हुई। गांव जलाए गए। मवेशियों को खत्म किया गया। एक लिहाज से समूचे इलाके को उजाड़ बनाने की कोशिश भी की जाती रही है। यानी, एक तरफ ठेकेदार रणनीति के तहत आदिवासियों को जवानों के सामने झोंकता है, तो दूसरी तरफ विकास के गोरखधंधे में जमीन की जरूरत सरकार को महसूस होती है, तो वह भी जमीन से आदिवासियों को बेदखल करने की कार्रवाई इसी तरह कई-कई गांवों में करती है। इसमें एक स्तर पर नक्सलियों से भिडने पहुंचे केन्द्रीय सुरक्षा बल के जवान होते हैं तो दूसरे स्तर पर राज्य की पुलिस। इन इलाकों में जमीन हथियाने के लिए आदिवासियों के हाट बाजार तक को प्रतिबंधित करने से स्थानीय पुलिस-प्रशासन नहीं हिचकते।

जुलाई से अक्टूबर, 2006 के दौरान इसी इलाके में 54 आदिवासी पुलिस की गोली से मारे गए जिनमें सबसे ज्यादा सितंबर में इकतीस मारे गए। इनमें से 16 आदिवासियों का रोजगार गारंटी योजना के तहत नाम पहले भी दर्ज था, अब भी है। इसके अलावा कोतरापाल, मनकेवल, मुंडेर, अलबूर, पोट्टायम, मज्जीमेडरी, पुल्लुम और चिन्नाकोरमा समेत 18 गांव ऐसे हैं जहां के ढाई सौ से ज्यादा आदिवासी लापता हैं। सरकार की अलग-अलग कल्याणकारी योजनाओं में इनमें से 128 आदिवासियों के नाम अब भी दर्ज हैं। पैसा बीते छह महीने से कागज पर इनके घर पहुंच रहा है। हस्ताक्षर भी कागज पर हैं। लेकिन ये आदिवासी हैं कहां? कोई नहीं जानता। पुलिस बंदूक थामे सीधे कहती है कि उनका काम आदिवासियों को तलाशना नहीं, कानून-व्यवस्था बरकरार रखना है।

मगर कानून-व्यवस्था कैसे बरकरार रखी जाती है, इसका नमूना कहीं ज्यादा त्रासद है। 21 जुलाई को पोन्दुम गांव में दो किसानों के घर जलाए गए। पल्लेवाया गांव में लूटपाट और तोडफोड़ की गई। तीन आदिवासी महिलाओं समेत दस लोगों को गिरफ्तार किया गया। 22 जुलाई को पुलिस ने मुंडेर गांव पर कहर बरपाया। मवेशियों को मार दिया गया या सुरक्षाकर्मी पकड़ ले गए। दस घरों में आग लगा दी गई। गांववालों ने गांव छोड़ बगल के गांव फूलगट्टा में शरण ली।

25 जुलाई को फूलगट्टा गांव को निशाना बनाया गया। पचास आदिवासियों को पकड़कर थाने ले जाया गया। 29 जुलाई को कर्रेबोदली गांव निशाना बना। आदिवासियों के साथ मारपीट की गई। पंद्रह आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया। अगस्त के पहले हफ्ते में मजिमेंडरी गांव को निशाना बनाया गया। सुअरबाड़ा और मुर्गाबाड़ा को जला दिया गया। एक दर्जन आदिवासियों को पकड़कर थाने में कई दिनों तक प्रताडि़त किया गया। इसी हफ्ते फरसेगढ़ थाना क्षेत्र के कर्रेमरका गांव के कई आदिवासियों (महिलाओं समेत) को गिरफ्तार कर अभद्र व्यवहार किया गया। 11 अगस्त को कोतरापाल गांव में पुलिस ने फायरिंग की। आत्म बोडी और लेकर बुधराम समेत तीन किसान मारे गए। पुलिस ने तीनों को नक्सली करार दिया और एनकाउंटर में मौत बताई। 12 अगस्त को कत्तूर गांव के दो किसानों को कुटरू बाजार में पुलिस ने पकड़ा। बाद में दोनों के नाम एनकाउंटर में थाने में दर्ज किए गए। 15 अगस्त को जांगला गांव में पांच किसानों के घरों में तेंदूपत्ता ठेकेदार ने आग लगवाई। मामला थाने पहुंचा तो ठेकेदार को थाने ने ही आश्रय दे दिया। यानी मामला दर्ज ही नहीं किया गया। जो दर्ज हुआ उसके मुताबिक नक्सलियों के संबंध जांगला गांव वालों से हैं।

अगस्त के आखिरी हफ्ते में डोलउल, आकवा, जोजेर गाँव को निशाना बनाया गया। ईरिल गांव के सुक्कु किसान की जघन्य हत्या की गई। सिर अगले दिन पेड़ पर टंगा पाया गया। आदिवासी इतने दहशत में आ गए कि कई दिनों तक खेतों में जाना छोड़ दिया। इस घटना की कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई।

25 सितंबर को बीजापुर तहसील के मनकेल गांव में किसान-आदिवासियों के दर्जन भर से ज्यादा घरों में आग लगाई गई। पांच महिला आदिवासी और दो बच्चों को पुलिस थाने ले गई, जिनका अब तक कोई अता-पता नहीं है। सितंबर के आखिरी हफ्ते में ही इन्द्रावती नदी में चार आदिवासियों के शव देखे गए। उन्हें किसने मारा और नदी में कब फेंका गया, इस पर पुलिस कुछ नहीं कहती। गांववालों के मुताबिक हाट-बाजार से जिन आदिवासियों को सुरक्षाकर्मी अपने साथ ले गए उनमें ये चार भी थे।

पांच अक्टूबर को बीजापुर तहसील के मुक्कावेल्ली गांव की दो महिला वेडिंजे नग्गी और वेडिंजे मल्ली पुलिस गोली से मारी गईं। अक्टूबर के पहले हफ्ते में जेगुरगोण्डा के राजिम गांव में पांच महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। इनके साथ पकड़े गए एक किसान की दो दिन बाद मौत हो गई, मगर पुलिस फाइल में कोई मामला दर्ज नहीं हुआ। इसी दौर में पुलिस की गोली के शिकार बच्चों का मामला भी तीन थानों में दर्ज किया गया। मगर मामला नक्सलियों से लोहा लेने के लिए तैनात पुलिसकर्मियों से जुड़ा था, तो दर्ज मामलों को दो घंटे से दो दिन के भीतर मिटाने में थानेदारों ने देरी नहीं की।

दो सितंबर 2006 को नगा पुलिस की गोली से अडियल गांव का 12 साल का कड़ती कुमाल मारा गया। तीन अक्टूबर 2006 को 14 साल के राजू की मौत लोवा गांव में पुलिस की गोली से हुई। पांच अक्टूबर 2006 को तो मुकावेल्ली गांव में डेढ़ साल के बच्चे को पुलिस की गोली लगी। 10 अक्टूबर 2006 को पराल गांव में 14 साल का लड़का बारसा सोनू पुलिस की गोली से मरा। ऐसी बहुतेरी घटनाएं हैं जो थानों तक नहीं पहुंची हैं। इस सच की पारदर्शिता में पुलिस का सच इसी बीते एक साल के दौर में आधुनिकीकरण के नाम पर सामने आ सकता है। मसलन, सात सौ करोड़ रुपये गाडि़यों और हथियारों के नाम पर आए। बारह सौ करोड़ रुपये इस इलाके में सड़क की बेहतरी के लिए आए। थानों की दीवारें मजबूत हों, इसलिए थानों और पुलिस गेस्टहाउसों की इमारतों के निर्माण के लिए सरकार ने डेढ़ सौ करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, जबकि इस पूरे इलाके में हर आदिवासी को दो जून की रोटी मिल जाए, महज इतनी व्यवस्था करने के लिए सरकार का खुद का आंकड़ा है कि सौ करोड़ में हर समस्या का निदान हो सकता है। लेकिन इसमें पुलिस प्रशासन, ग्राम पंचायत और विधायक-सांसदों के बीच पैसों की बंदरबांट न हो, तभी यह संभव है। हां, बीते एक साल में जो एक हजार करोड़ रुपये पुलिस, सड़क, इमारत के नाम पर आए, उनमें से सौ करोड़ रुपये का खर्च भी दिखाने-बताने के लिए इस पूरे इलाके में कुछ नहीं है।

सुरक्षा बंदोबस्त के लिए राज्य पुलिस के अलावा छह राज्यों के सुरक्षा बल यहां तैनात हैं। सरकार की फाइल में यइ इलाका कश्मीर और नगालैंड के बाद सबसे ज्यादा संवेदनशील है। इसलिए इस बंदोबस्त पर ही हर दिन का खर्चा राज्य के आदिवासियों की सालाना कमाई से ज्यादा आता है। नब्बे फीसद आदिवासी गरीबी की रेखा से नीचे हैं। देश के सबसे गरीब आदिवासी होने का तमगा इनके माथे पर लगा है। सबसे महंगी सुरक्षा बंदोबस्त भी इसी इलाके में है। हर दिन का खर्चा सात से नौ करोड़ तक का है।

दरअसल, इतना महंगा सुरक्षा बंदोबस्त और इतने बदहाल आदिवासियों का मतलब सिर्फ इतना भर नहीं है। इसका महत्त्वपूर्ण पहलू छत्तीसगढ़ का सबसे समृद्ध राज्य होना है। देश का नब्बे फीसद टीन अयस्क यहीं पर मौजूद है। देश का 16 फीसद कोयला, 19 फीसद लौह अयस्क और पचास फीसद हीरा यहीं मिलता है। कुल 28 कीमती खनिज यहीं मौजूद हैं। इतना ही नहीं, 46,600 करोड़ क्यूबिक मीटर जल संसाधन का भंडार यहीं है और सबसे सस्ती-सुलभ मानव श्रमशक्ति तो है ही। बीते पांच सालों के दौरान (पहले कांग्रेस और फिर भाजपा) राज्य सरकार की ही पहल पर ऐसी छह रिपोर्टें आईं, जिनमें सीधे तौर पर माना गया कि खनिज संपदा से ही अगर आदिवासियों का जीवन और समूचा बुनियादी ढांचा जोड़ दिया जाए तो तमाम समस्याओं से निपटा जा सकता है। मगर आदिवासियों के लिए न तो खनिज संपदा का कोई मतलब है, न ही जंगल का। जो बुनियादी ढांचा विकास के नाम पर बनाया जा रहा है उसके पीछे रुपया कम, डालर ज्यादा है। सुरक्षा बंदोबस्त का हाल यह है कि यहां तैनात ज्यादातर पुलिसकर्मियों के घर अन्य प्रांतों में हैं, तो वे वहां के अपने परिवारों की सुख-सुविधाओं के लिए भी यहीं से धन उगाही कर लेना चाहते हैं। ऐसे में उनका जुड़ाव यहां से होता ही नहीं।

सामाजिक सरोकार जब एक संस्थान का दूसरे संस्थान या सुरक्षाकर्मियों का आम आदिवासियों से नहीं है और राज्य सरकार अगर अपनी पूंजी से ज्यादा बाहरी पूंजी-उत्पाद पर निर्भर है, तो हर कोई दलाल या सेल्समैन की भूमिका में ही मौजूद है। थाने से लेकर केन्द्रीय बल और कलेक्टर से लेकर विधायक तक सभी अपने-अपने घेरे में धन की उगाही के लिए सेल्समैन बन गए हैं। करोड़ों के वारे-न्यारे कैसे होते हैं, वह भी भुखमरी में डूबे आदिवासियों के इलाके में यह देशी-विदेशी कंपनियों की परियोजनाओं के खाके को देखकर समझा जा सकता है।

अमेरिकी कंपनी टेक्सास पावर जेनरेशन के जरिए राज्य में एक हजार मेगावाट बिजली उत्पाद का संयंत्र खोलने के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए। यानी बीस लाख डालर राज्य में आएंगे। अमेरिका की ही वन इंकार्पोरेट कंपनी ने पचास करोड़ रुपये की दवा फैक्टरी लगाने पर समझौता किया। छत्तीसगढ़ बिजली बोर्ड ने इफको (इंडियन फामर्स को-ऑपरेटिव लिमिटेड) के साथ मिलकर पांच हजार करोड़ की लागत से सरगुजा में एक हजार मेगावाट का बिजली संयंत्र लगाने का समझौता किया। इसमें राज्य का हिस्सा 26 फीसद, तो इफको का 74 फीसद है। बिजली के निजीकरण के सवाल के बीच ऐसे संयंत्र का मतलब है कि भविष्य में यह भी किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को दस हजार करोड़ में बेच दिया जाएगा। टाटा कंपनी विश्व बैंक की मदद से दस हजार करोड़ की लागत से बस्तर में स्टील प्लांट स्थपित करने जा रही है। एस्सार कंपनी के साथ भी सात हजार करोड़ की लागत से स्टील प्लांट लगाने पर सहमति बनी है। एस्सार कंपनी चार हजार करोड़ की लागत से कास्टिक पावर प्लांट की भी स्थापना करेगी। प्रकाश स्पंज आयरन लिमिटेड की रुचि कोयला खदान खोलने में है। उसे कोरबा में जमीन पसंद आई है। इसके अलावा एक दर्जन बहुराष्ट्रीय कंपनियां खनिज संसाधनों से भरपूर जमीन का दोहन कर पचास हजार करोड़ रुपये इस इलाके में लगाना चाहती है। इसमें पहले कागजात तैयार करने में ही सत्ताधारियों की अंटी में पांच सौ करोड़ रुपये पहुंच चुके हैं।

कौडि़यों के मोल में किस तरह का समझौता होता है इसका नजारा बैलाडिला में मिलता है। बैलाडिला खदानों से जो लोहा निकलता है उसे जापान को 160 रुपये प्रति टन (16 पैसे प्रति किलोग्राम) बेचा जाता है। वही लोहा मुंबई के उद्योगों के लिए दूसरी कंपनियों को 450 रुपये प्रति टन और छत्तीसगढ़ के उद्योगपतियों को सोलह सौ रुपये प्रतिटन के हिसाब से बेचा जाता है। जाहिर है नगरनार स्टील प्लांट, टिस्को, एस्सार पाइपलाइन परियोजना (बैलाडिला से जापान को पानी के जरिए लौह-चूर्ण भेजने वाली परियोजना), इन सभी से बस्तर में मौजूद जल संपदा का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा अभी से लगाया जा सकता है। अभी ही किसानों के लिए भरपूर पानी नहीं है। खेती चैपट हो रही है। किसान आत्महत्या को मजबूर है या पेट पालने के लिए शहरों में गगनचुबी इमारतों के निर्माण में बतौर ईंट ढोने वाला मजदूर बन रहा है या ईंट भट्टियों में छत्तीसगढ़वासी के तौर पर अपनी श्रमशक्ति सस्ते में बेचकर जीने को मजबूर है।

इन तमाम पहलुओं का आखिरी सच यह है कि अगर तमाम परियोजनाओं को अमली जामा पहनाया जाएगा तो राज्य की 60 फीसद कृषि योग्य जमीन किसानों के हाथ से निकल जाएगी। यानी स्पेशल इकोनामिक जोन (एसईजेड) के बगैर ही 50 हजार एकड़ भूमि पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा हो जाएगा। करीब दस लाख आदिवासी किसान अपनी जमीन गंवाकर उद्योगों पर निर्भर हो जायेंगे।

सवाल है कि इसी दौर में इन्हीं आदिवासी बहुल इलाके को लेकर केन्द्र सरकार की भी तीन बैठकें हुईं। चूंकि यह इलाका नक्सल प्रभावित है, ऐसे में केन्द्र की बैठक में आंतरिक सुरक्षा के मद्देनजर ऐसी बैठकों को अंजाम दिया गया। नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्री, गृह सचिव और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की गृह मंत्रालय से लेकर प्रधानमंत्री तक के साथ बैठक हुई। तीनों स्तर की बैठकों में इन इलाकों में तैनात जवानों को ज्यादा आधुनिक हथियार और यंत्र मुहैया कराने पर विचार हुआ।

चूंकि नौ राज्यों के सभी नक्सल प्रभावित इलाके पिछड़े-गरीब के खांचे में आते हैं तो आधारभूत संरचना बनाने पर जोर दिया गया। हर राज्य के मुख्यमंत्री ने विकास का सवाल खड़ा कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आवाजाही में आ रही परेशानियों का हवाला दिया और केन्द्र से मदद मांगी। तीनों स्तर की बैठकों में इस बात पर सहमति बनी कि विकास और उद्योगों को स्थापित करने से कोई राज्य समझौता नहीं करेगा। यानी हर हाल में इन इलाकों में सड़कें बिछाई जायेंगी, रोशनी जगमग कर दी जायेगी जिससे पूंजी लगाने वाले आकर्षित होते रहें।

किसी बैठक में लेधा जैसी सैकड़ों आदिवासी महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार का जिक्र नहीं हुआ। किसी स्तर पर यह सवाल किसी ने नहीं उठाया कि आदिवासी बहुल इलाके में गोली खा कौन रहा है? खून किसका बह रहा है? किसी अधिकारी ने यह कहने की जहमत नहीं उठाई कि इतनी बड़ी तादाद में मारे जा रहे आदिवासी चाहते क्या हैं? इतना ही नहीं, हर बैठक में नक्सलियों की संख्या बताकर हर स्तर के अधिकारियों ने यही जानकारी दी कि उनके राज्य में इस आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर काबू पाने के लिए कौन-कौन से तरीके अपनाए जा रहे हैं। हर बैठक में मारे गए नक्सलियों की संख्या का जिक्र जरूर किया गया। छत्तीसगढ़ की सरकार ने भी हर बैठक में उन आंकड़ों का जिक्र किया जिससे पुलिस की 'बहादुरी' को मान्यता दिलाई जा सके। राज्य के सचिव स्तर से लेकर देश के गृहमंत्री तक ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि नक्सलियों को मारने के जो आंकड़े दिए जा रहे हैं उसमें किसी का नाम भी जाना जाए। उम्र भी पूछी जाए। थानों में दर्ज मामले के बारे में भी कोई जानकारी हासिल की जाए। सरकार की किसी बैठक या किसी रिपोर्ट में इसका जिक्र नहीं है कि जो नक्सली बताकर मारे गए और मारे जा रहे हैं, वे आदिवासी हैं।

एक बार भी यह सवाल किसी ने उठाने की जहमत नहीं उठाई कि कहीं नक्सलियों को ठिकाने लगाने के नाम पर फर्जी मुठभेड़ का सिलसिला तो नहीं जारी है? कोई भी नहीं सोच पाया कि जंगल गांव में रहने वाले आदिवासियों से अगर पुलिस को मुठभेड़ करनी पड़ रही है तो अपने जंगलों से वाकिफ आदिवासी ही क्यों मारा जा रहा है? अपने इलाके में वह कहीं ज्यादा सक्षम है। सैकड़ों की तादाद में फर्जी मुठभेड़, आखिर संकेत क्या हैं? जाहिर है, इन सवालों का जवाब देने की न कोई मजबूरी है या ना जरूरत ही है सरकार को। मगर सरकार अगर यह कह कर बचती है कि पुलिसिया आतंक की ऐसी जानकारी उसके पास नहीं आई है और वह बेदाग है, तो संकट महज आदिवासियों को फर्जी मुठभेड़ में मारने या नक्सलियों का हवाला देकर आंतरिक सुरक्षा पुता बनाने का नहीं है, बल्कि संकट उस लोकतंत्र पर है जिसका हवाला देकर सत्ता बेहिचक खौफ पैदा करने से भी नहीं कतराती।
http://mohallalive.com/2013/01/26/gallantry-award-for-sexual-torture/


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