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Thursday, October 23, 2014

উন্নয়ন সেকি শুধু টাকার খেলা,যেখানে সভ্যতা সংস্কৃতির আলো নিষিদ্ধ? বাড়ি কি এখন শুধুই বাজার? আমি চাইনা এই মুক্ত বাজার। সেই হিমালয় আর হিমালয় নেই। সেখানেও র্ক্তনদীর প্লাবন। পর্কৃতিতে অকসিজেন নেই। উত্তরাখন্ডের বাঙালিরা অনেকেই এখন কোটিপতি। কিন্তু তাঁরা কতটা বাঙালি আছেন এখনো , জানিনা। পলাশ বিশ্বাস

উন্নয়ন সেকি শুধু টাকার খেলা,যেখানে সভ্যতা সংস্কৃতির আলো নিষিদ্ধ? বাড়ি
কি এখন শুধুই বাজার?
আমি চাইনা এই মুক্ত বাজার।
সেই হিমালয় আর হিমালয় নেই।
সেখানেও র্ক্তনদীর প্লাবন।
পর্কৃতিতে অকসিজেন নেই।
উত্তরাখন্ডের বাঙালিরা অনেকেই এখন কোটিপতি।
কিন্তু তাঁরা কতটা বাঙালি আছেন এখনো , জানিনা।

পলাশ বিশ্বাস


সাত বছর পর উত্তরাখন্ডে বাঙালি উদ্বাস্তু উপনিবেশ দিনেশপুরে ফিরে নিজেকে
আউটসাইডার মনে হচ্ছে।

বাসন্তীপুরে নেজির বাড়ির সামনে দাঁড়িয়ে আমি এবং সবিতা থ,নিজের বাড়িই
চিনতে পারছি না।

কাঁচা মাটির দেওয়ালে গাঁথা গাছ গাছালিতে ভরা বাড়ি আর নেই।
ভাইপো টুটুল পাকাবাড়ি বানিয়েছে দোতলা।

দিনেশপুরে আশেপাশের সব গ্রাম এখন দিনেশপুর শহরের মধ্য়ে।

ছত্রিশ বাঙালি গ্রামের আশে পাশে প্রতিটি উদ্বাস্তু গ্রামের পাশে আরও অনেক
বাঙালি গ্রাম।

পুরাতন উদ্বাস্তু কলোনি এবং একাত্তরের পরে যারা এসেছেন ,তাঁরা সকলেই তরাই
অন্চলে জম জায়গা খুইয়ে পরিবর্তে লাখোলাখ টাকা নিয়ে বাড়ি গাড়ি হাঁকিয়ে
প্রতেকেই মহারাজা।

তাঁরা এখন আমায় চিনতে ও পারছেন না।

বাঙালি গ্রামগুলির বুকে এক এক গজিয়ে উঠছে কল কারখানা,নলেজ ইকোনামির নানা
রং বেরং প্রতিষ্ঠান,শপিং মল,হাসপাতাল,আবাসিক কলোনি,বাজার আরো বাজার।

কাল গিয়েছিলাম রুদ্রপুর ট্রান্জিট ক্য়াম্পে,যেখানে এক একড় জমি বিক্রি
করে এক কোটি টাকা পেয়ে প্রত্যেকটি পরিবারই কোটিপতি।

তাঁদের পুনর্বাসনের লড়াই লড়েছেন বাবা,সঙ্গে যতদিন পেরেছি থেকেছি আমি।

সেই ছোটবেলা থেকে প্রতিটি পরিবারে আমার আনাগোনা।
আমি ছিলাম তাঁদের নয়নের মণি।

আজ তাঁরা আমায় চিনবেন না।

আমি কোন ছার ,যে রবীন্দ্রনাথ, নেতাজি, বন্কিম, শরত,
বিবেকানন্দ,নজরুল,ঈশ্বরচন্দ্র বিদ্যাসাগরের পরিচয়ে পাহাড়ে তরাইয়ে তাঁরা
পরিচিত ছিলেন একদা,সেই তাঁদেরও ভুলেছেন তাঁরা।

তাঁরা ভুলেছেন রবীন্দ্র সঙ্গীত,ভুলেচছেন নজরুল সঙ্গীত,অধিকাংশই বাংলায়
কথা বলতে পারেন না।

তাঁরা ভুলেছেন তাঁদের সংগ্রামের,জমির লড়াইয়ের ইতিহাস,ভুলেছেন পুলিনবাবুকে।

যে মুর্তি তাঁরা পুলিনবাবুর গড়েছিলেন,সেই মুর্তির এখন হাত ভাঙ্গা।
আমার ভাইঝি নিন্নি বলল,দাদুর হাতে ফ্রাক্চার।
সব মুর্তিই গড়া হয় বিসর্জনের জন্য়।
আমাদের আবেদন পুলিনবাবুর মুর্তিখানিও বিসর্জনে যাক।
তাঁকে মুক্তি দিলেই হয়।
এই বাঙালি উপনিবেশে পুলিনবাবূ মরেছেন তেরো বছর আগে,তাঁকে বাঁচিয়ে রাখার
প্রয়োজন নেই যখন এই বাঙালি উপনিবেশে বাঙালিয়ানা বলতে দুর্গোত্সব আর
কালিপুজো ছাড়া কিছুই বেঁচে নেই।
বাঙালি গ্রাম একের পর এক কারখানা হয়ে যাচ্ছে।
আমার গ্রাম এখনো বেঁচে আছে,আগামি বার ফিরব যখন,তখন হয়ত দেখতে পাব আমার
গ্রাম বাসন্তীপুরও আস্ত একটি বাজার বা একটি কারখানা।
এই বাজারে আমার নিঃশ্বাস বন্ধ হয়ে যায়।
আমি চাইনা এই মুক্ত বাজার।
সেই হিমালয় আর হিমালয় নেই।
সেখানেও র্ক্তনদীর প্লাবন।
পর্কৃতিতে অকসিজেন নেই।
উত্তরাখন্ডের বাঙালিরা অনেকেই এখন কোটিপতি।
কিন্তু তাঁরা কতটা বাঙালি আছেন এখনো ,জানিনা।
একজন এমবিবিএস ডাক্তার হচ্ছেনা।
একজন অফিসার হচ্ছে না।
একজন প্রোফেসার হচ্ছে না।
একজন শিল্পী হচ্চে না।
একজন সাহিত্যিক হচ্ছে না।
একজন সাংবাদিক হচ্ছে না।
তবে টাকা হয়েছে প্রচুর।
টাকার গরম হয়েছে প্রচুর।
পরিবর্তে স্বজন হারিয়েছি আমরা।
শহরে কারখানায় আমরা শ্রমজীবী বাঙালি হয়ে রয়েচি।
উন্নয়ন সেকি শুধু টাকার খেলা,যেখানে সভ্যতা সংস্কৃতির আলো নিষিদ্ধ? বাড়ি
কি এখন শুধুই বাজার?

तस्‍लीमा नसरीन : कुछ विचार बिन्‍दु:कात्‍यायनी

तस्‍लीमा नसरीन : कुछ विचार बिन्‍दु
October 23, 2014 at 11:38am
कात्‍यायनी


तस्‍लीमा नसरीन धर्म के विरुद्ध और पुरुष वर्चस्‍ववाद के विरुद्ध लगातार प्रखरता से लिखती रहती हैं, लेकिन गाजा में जियनवादियों द्वारा नरसंहार की विभीषिका हो, या समूचे मध्‍यपूर्व में अमेरिकी साम्राज्‍यवाद की विनाशलीला हो, या फिर साम्राज्‍यवाद-पूँजीवाद के तमाम कुकर्मों और नवउदारवादी नीतियों के परिणामस्‍वरूप पूरी दुनिया में बरपा हो रहा तबाहियों का कहर हो, तस्‍लीमा की आवाज कहीं भी सुनायी नहीं देती।

जो व्‍यक्ति वास्‍तव में अन्‍याय और प्रतिगामिता का विरोधी होगा, वह जीवन के हर क्षेत्र में उनका विरोध करेगा, कुछ चुनिन्‍दा क्षेत्रों में नहीं। तस्‍लीमा में अंधी विद्रोह की आग है, पर सामाजिक विश्‍लेषण की कोई वैज्ञानिक-ऐतिहासिक दृष्टि नहीं है। पुरुष-वर्चस्‍वाद अपने आप में समाजिक संरचना से विच्छिन्‍न कोई स्‍वतंत्र सामाजिक-मनोवैज्ञानिक परिघटना नहीं है। यह वर्ग समाज के उद्भव के ठोस वस्‍तुगत समाजिक-आर्थिक कारणों से पैदा हुआ और अलग-अलग वर्ग समाजों में अपनी प्रकृति बदलता हुआ आज पूँजीवाद के युग में भी अपनी सर्वोन्‍नत सैद्धान्तिकी और नये-पुराने बर्बर और बारीक रूपों में मौजूद है। स्त्रियों की पराधीनता का मूल धर्म में नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक संरचना में मौजूद है। धर्म (अपने नये रूप में) और पूँजीवाद की पण्‍य संस्‍कृति उसे मजबूत और सर्वव्‍याप्‍त बनाने का काम करते हैं। तस्‍लीमा का अराजक विद्रोही नारीवाद स्‍त्री समुदाय की सामाजिक मुक्ति के मार्ग पर विचार करने के बजाय व्‍यक्तिगत रूढि़भंजक विद्रोह की सीमाओं में कैद रह जाता है और कहीं-कहीं यौन मुक्तिवाद के गड्ढे में भी जा गिरता है। स्‍त्री मुक्ति के प्रश्‍न को ऐतिहासिक वर्गीय परिप्रेक्ष्‍य में न देख पाने वाली हर अराजक वर्गीय दृष्टि अन्‍ततोगत्‍वा या तो लैगिक नियतत्‍ववाद का शिकार हो जाती है, या फिर भाषाशास्‍त्रीय नियतत्‍ववाद का, या फिर विशुद्ध व्‍यक्तिगत अराजकतावाद का।

धर्म के प्रश्‍न पर भी यह समझ सबसे पहले जरूरी हो जाता है कि धर्म एक प्राक् पूँजीवादी अधिरचना के रूप में अस्तित्‍व में आने के बाद अपना स्‍वरूप-परिवर्तन करके पूँजीवाद के युग में भी क्‍यों और कैसे एक शक्तिशाली प्रतिगामी शक्ति के रूप में जीवित बचा हुआ है, सामंतवाद पर विजय के बाद पूँजीवाद ने क्‍यों और किसप्रकार चर्च (धर्म) के साथ ''पवित्र गठबंधन'' बना लिया था और आज धर्म किसप्रकार पूँजी की चाकरी बजा रहा है। जैसाकि मार्क्‍सवादी विश्‍लेषण बताता है, मात्र नास्तिकता और वैज्ञानिक दृष्टि के प्रचार से धर्म का उन्‍मूलन सम्‍भव नहीं। जबतक हमारा जीवन माल-उत्‍पादन की अदृश्‍य सत्‍ता के वशीभूत बना रहेगा, तबतक सामाजिक चेतना पर धर्म की दृश्‍य-अदृश्‍य जकड़बंदी भी बनी रहेगी। धर्म-विरोधी प्रचार पूँजीवाद के विनाश की पूरी परियोजना का एक दूरगामी कार्यभार ही हो सकता है।

जो लोग केवल कुछ सामाजिक-सांस्‍कृतिक बुराइयों को या पूँजीवाद-साम्राज्‍यवाद के कुछ दुष्‍परिणामों को हमलों का निशाना बनाते हैं, लेकिन उनके मूल स्रोत या मूल कारण की शिनाख्‍त नहीं कर पाते उन्‍हें विश्‍व पूँजीवाद और देशी पूँजीवाद के 'थिंक टैंक' भी मसीहा और प्रतीक-पुरुष/स्‍त्री बना लेते हैं। ऐसे लोग जाने-अनजाने जनता को मिथ्‍या समाधान सुझाने और मिथ्‍या चेतना देने का ही काम करते हैं और पूँजीवाद की ही सेवा करते हैं। पूँजी की स्‍वतंत्र गति से और पूँजीवादी सत्‍ताओं के आचरण से जो अनियंत्रित असंतुलन,अतिरेकी प्रभाव और अराजकताऍं पैदा होती हैं, उन्‍हें पूँजीवादी व्‍यवस्‍था स्‍वयं नियंत्रित करना चाहती है। आई.एल.ओ. और तमाम अन्‍तरराष्‍ट्रीय राहत संस्‍थाऍं, तमाम एन.जी.ओ. और 'वर्ल्‍ड सोशल फोरम' जैसी संस्‍थाऍं, तमाम विखण्डित आन्‍दोलन, तमाम सुधारवादी लोग और तमाम बुर्जुआ सलाहकार-विचारक यही काम करते हैं। वे इसप्रकार भ्रम पैदा करने वाली धुँआ छोड़ने की मशीन, सेफ्टी वॉल्‍व, स्‍पीड ब्रेकर और जनाक्रोशों के प्रहारों को सोखने वाले कुशन का काम करते हैं। पूँजीवाद को पूँजीवादी आलोचना न सिर्फ स्‍वीकार्य होती है, बल्कि उसकी जरूरत होती है और वह उसका स्‍वागत करता है। डरता है वह साम्‍यवादी आलोचना से, और हर कीमत पर उसे दबा देना चाहता है। जो पूँजीवाद की वास्‍तविक, वैज्ञानिक समाजवादी आलोचना होती है, वह शब्‍दों से भी होती है और भौतिक बल के द्वारा भी।

पूँजी अपनी स्‍वतंत्र आंतरिक गति से असमानता, भुखमरी, बाल श्रम, स्‍त्री दासता के बर्बर एवं बारीक रूपों और पर्यावरण विनाश को जन्‍म देती रहती है। ये चीजें अनियंत्रित होकर पूरे समाज को अराजकता के गर्त में न धकेल दे और स्‍वयं पूँजी-निर्माण की सतत् प्रक्रिया को ही खतरे में न डाल दे, इसके लिए कुछ पैबन्‍दसाजियों की, कुछ सुधार कार्रवाइयों की, कुछ सन्‍तुलनकारी कदमों की जरूरत होती है। एन.जी.ओ. राजनीति यही करती है और इसीलिए सालाना इस मद में दुनिया के पूँजीपति अरबों डालर खर्चते हैं। इसी मकसद से मैगासेसे पुरस्‍कार और नोवेल शान्ति पुरस्‍कार दिये जाते हैं और कैलाश सत्‍यार्थी जैसों को मसीहा बनाया जाता है। एक दूसरी श्रेणी उन अराजकतावादी उग्र विद्रोही और उत्‍तर-मार्क्‍सवादी, अस्मितावादी आदि-आदि टाइप के बुद्धिजीवियों की है, जो बुनियादी अन्‍तरविरोधों की शिनाख्‍त किये बिना सामाजिक-राजनीतिक प्रश्‍नों पर उग्र अकर्मक विमर्श करते हैं, खण्‍ड को समग्र के रूप में या प्रतीतिगत यथार्थ को सारभूत यथार्थ के रूप में प्रस्‍तुत करते हैं, रोग के लक्षणों को ही रोग बताते हैं, या फिर समाज के गैर बुनियादी अन्‍तरविरोधों को मुख्‍य मुद्दा बनाने का काम करते हैं। ये सभी लोग किसी न किसी रूप में मूल लक्ष्‍य को दृष्टिओझल कर देते हैं। विभ्रमग्रस्‍त और दिशाहीन लोग इन्‍हें अपना नायक मान लेते हैं और शासक वर्ग भी इन्‍हें समादृत-पुरस्‍कृत करता है।

पि‍छड़े देशों में व्‍याप्‍त धार्मिक कट्टरपन और स्‍त्री-विराेधी बर्बरता की आलोचना करते हुए तस्‍लीमा नसरीन प्रकारान्‍तर से बुर्जुआ जनवाद का आदर्शीकरण करती हैं और खासकर पश्चिमी बुर्जुआ समाजों का भी आदर्शीकरण करती हैं। उनका तर्कणावाद कुलीन बुर्जुआ तर्कणावाद है और उनका नारीवाद अकर्मक विमर्शी, अराजकतावादी, व्‍यक्तिवादी, अग्निमुखी बुर्जुआ नारीवाद ही है, भले ही यहॉं-वहॉं वह समाजवाद की प्रशंसा करती या मार्क्‍सवाद को उद्धृत करती दीख जाती हों।

Wednesday, October 22, 2014

বিষয়ঃ সংবিধান দিবস সমারোহ

বিষয়ঃ সংবিধান দিবস সমারোহ

প্রিয় সাথী,

মানুষের জন্য, মানুষের দ্বারা মানুষের কল্যাণ সাধন করাই গণতন্ত্রের মূল বাণী। ভারতের সংবিধানের প্রস্তাবনায় এই মহান সংকল্প গ্রহণ করে সংবিধান প্রনেতাগণ ভারতের জনগণকেই গণতন্ত্রের মূলাধার এবং ভারত রাষ্ট্রের সার্বিক উন্নয়নের ভাগীদার হিসেবে মর্যাদা দিয়েছেন এবং দেশ রক্ষার সুমহান দায়িত্ব অর্পণ করেছেন।

 

কিন্তু অত্যন্ত দুঃখের সাথে জানাচ্ছি যে বিগত ৬৫ বছর ধরে দেশে যেসব সরকার প্রতিষ্ঠিত হয়েছে তারা এই দায়িত্ব পালন করতে ব্যর্থ হয়েছে। উপরন্তু তারা অসদুপায়ে  জনাধারকে প্রভাবিত করে রাষ্ট্র ক্ষমতায় আসীন হওয়ার পর জনগণের উপরই খড়গহস্ত হয়ে উঠেছে বারবার। জনগণের পরিবর্তে পুঁজিপতিদের স্বার্থ রক্ষার  কাজেই তারা বেশী মনযোগী হয়ে উঠেছে। ভারতের সংবিধান  রাষ্ট্রের সম্পদগুলির উপর জনগণের যে ভাগীদারী সুনিশ্চিত করেছিল তা খর্ব করে দেশী বা বিদেশী পুঁজিপতিদের হাতে রাষ্ট্রকেই গচ্ছিত করে দিয়েছে এই সরকারগুলি। ফলে ক্ষুধা, দারিদ্রতা,  অনাহারে মৃত্যু, বেকারত্ব, বঞ্চনা প্রভৃতি অমানবিক অসুখগুলি রাষ্ট্রকে জর্জরিত করে তুলেছে। বেড়েছে অসন্তোষ, বিশৃঙ্খলতা, সাম্প্রদায়িক হানাহানি। দুর্বল করে তুলেছে সংবিধানের ভীত। বিপন্ন হয়ে পড়েছে গণতন্ত্র। রাষ্ট্র স্বৈরাচার,  নৈরাজ্যবাদ, ফ্যাসিবাদ ও সন্ত্রাসবাদের দিকে ক্রমান্বয়ে এগিয়ে চলেছে। যা মহান ভারতরাষ্ট্রের সামাজিক, সাংস্কৃতিক ও বৌদ্ধিক পরম্পরার সাথে এক গভীরতর ষড়যন্ত্র।

 

আমাদের সংহতি ও সচেতন প্রয়াসই এই ষড়যন্ত্রের থেকে রাষ্ট্রকে মুক্ত করতে পারে। আসুন আগামী ২৬শে নভেম্বর ২০১৪, ভারতীয় সংবিধানের ৬৫ বছর পূর্তি উপলক্ষ্যে "সংবিধান দিবস সমারোহ" পালন করে আমরা ভারতরাষ্ট্রের সার্বভৌমত্ব ও গণতন্ত্র রক্ষার জন্য লাগাতার সংগ্রামের জন্য শপথ গ্রহণ করি।

এই "সংবিধান দিবস সমারোহ" কে সার্বিক ভাবে সফল করে তোলার জন্য আগামী ৯ই নভেম্বর ২০১৪, সকাল ১০টা থেকে Buddha Dharmankur Sabaha(Bengal Buddhist Association), 1 Buddhist Temple Street. Kolkata- 700 o12  এর সভাকক্ষে একটি প্রস্তুতি সভার আয়োজন করা হয়েছে। একজন সচেতন দেশপ্রেমিক নাগরিক হিসেবে সবান্ধবে এই সভায় উপস্থিত থাকার জন্য আপনাকে সাদর আমন্ত্রণ জানাচ্ছি।

সংগ্রামী অভিনন্দন সহ

তপন মণ্ডল           ঃ ৯৪৩৪০৪০৭২৮

অস্তিসু রূপোয়া ও     ঃ ৮৪২০৮৪৯৫৪২            

শরদিন্দু উদ্দীপন      ঃ ৯৪৩৩৩৪২৪৮৮      

দায়মুক্তি পাচ্ছেন ক্ষমতাসীনেরা :ছাড় পাচ্ছেন না বিরোধী দলের রাজনীতিবিদেরা

দায়মুক্তি পাচ্ছেন ক্ষমতাসীনেরা :ছাড় পাচ্ছেন না বিরোধী দলের রাজনীতিবিদেরা


http://epaper.prothom-alo.com/contents/2014/2014_10_23/content_zoom/x2014_10_23_1_3_b.jpg.pagespeed.ic.cFUwW0qPsH.jpg

দুর্নীতি দমন কমিশন (দুদক) যেন অনেকের জন্য দুর্নীতি থেকে দায়মুক্তির কমিশনে পরিণত হয়েছে। 'অভিযোগের আমলযোগ্য তথ্য-প্রমাণ না পাওয়ার কারণে' দুর্নীতির অভিযোগ থেকে একের পর এক দায়মুক্তি পাচ্ছেন সরকার-সমর্থিত রাজনীতিবিদ, প্রভাবশালী আমলা ও বিত্তশালী ব্যক্তিরা। দায়মুক্তির ঘটনাগুলো বিশ্লেষণ করলে দেখা যায়, অনেক ক্ষেত্রে দৃশ্যমান প্রমাণ থাকলেও দুদকের কর্মকর্তারা কোনো প্রমাণ পাননি। নির্বাচন কমিশনে নিজেদের দেওয়া হলফনামায় আর্থিক অনিয়মের প্রমাণ থাকলেও 'ভুল হয়েছে' অজুহাত গ্রহণ করে দেওয়া হয়েছে দায়মুক্তি। অবশ্য বিরোধী দলের রাজনীতিবিদেরা দায়মুক্তির কোনো সুযোগ পাননি।

চলতি বছরের জানুয়ারি থেকে আগস্ট পর্যন্ত আট মাসে এক হাজার ৫৯৮ জনকে দুর্নীতির অভিযোগ থেকে দায়মুক্তি দিয়েছে দুদক। এ সময়ে ৯০৪টি দুর্নীতির অভিযোগের মধ্যে ৮৭০টিতে কোনো মামলাই হয়নি।

http://www.prothom-alo.com/bangladesh/article/351838/%E0%A6%A6%E0%A6%BE%E0%A6%AF%E0%A6%BC%E0%A6%AE%E0%A7%81%E0%A6%95%E0%A7%8D%E0%A6%A4%E0%A6%BF-%E0%A6%AA%E0%A6%BE%E0%A6%9A%E0%A7%8D%E0%A6%9B%E0%A7%87%E0%A6%A8-%E0%A6%95%E0%A7%8D%E0%A6%B7%E0%A6%AE%E0%A6%A4%E0%A6%BE%E0%A6%B8%E0%A7%80%E0%A6%A8%E0%A7%87%E0%A6%B0%E0%A6%BE

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बिना बेदखल कोई एक इंच जमीन कहीं नहीं है जैसे अनबंधी कोई नदी नहीं है। गिर्दा की पत्नी हीराभाभी के आंसुओं को लेकिन हम थाम नहीं सकते। पलाश विश्वास

बिना बेदखल कोई एक इंच जमीन कहीं नहीं है जैसे अनबंधी कोई नदी नहीं है।

गिर्दा की पत्नी हीराभाभी के आंसुओं को लेकिन हम थाम नहीं सकते।

पलाश विश्वास


कई दिनों बाद आज फिर भाई देवप्रकाश और उनके भांजे पिंटू के सौजन्य से आमलाइन हूं।उधमसिंहनगर जिले के जिला मुख्यालय रुद्रपुर शहर के बगल में पूर्वी बंगाल से आये शरणार्थियों के लिए बसाये गये ट्रांजिड कैंप में बैठा हूं।जो अब सिडकुल के शिकंजे में हैं और यहां का हर शख्स अपनी जमीन खोकर करोड़पति है और शरणार्थी कालोनियां बेशकीमती उपभोक्ता बाजार में तब्दील है।


घर बसंतीपुर से कैंप के बीच हिंदूजा का सबसे बड़ा कारखाना अशोक लेलैंड और सिंगुर प्रकरण के बाद पंतनगर स्थानांतरित टाटा मोटर्स का प्लांट यहां हैं।जहां नैनो लेकिन बनती नहीं है,नैनो मोदी के सानंद से बनती है लेकिन यहं छोटा हाथी निकलता है कारखाने से।


सारी तराई शहरीकरण और औद्योगीकरण की सुनामी में है और जंगल तो खत्म हो ही गया हैं,गन्ने के खेत रास्ते में कहीं मिल नहीं रहे हैं।


एक के बाद एक गांव के लोग लाखों करोड़ों में जमीन बेचकर रईस बनने के चक्कर में भिखारी बनते जा रहे हैं और संस्कृति पूरी तरह हिंग्लिश रैव पार्टी है।


इसके बावजूद बिजली अब नियमित लोड शेडिंग हैं और उत्तराखंड में अविरत बिजली किंवदंती ध्वस्त है तो गांव गांव तक पहुंचने वाली सड़कें खंडहर हैं।


बची खुची खेती में मिट्टी बालू की खदानें हैं।


यही मेरा डिजिटल देश महान है।


यह परिदृश्य तराई में सीमाबद्ध है.ऐसा भी नहीं है।


कल ही नैनीताल होकर आया हूं।


पहाड़ के चप्पे चप्पे में विकाससूत्र की धूम है।अब तो पेड़ों के टूंठ भी कहीं नजर नहीं आते। तराई से लेकर पहड़ा तक नालेज इकोनामी के तहत गांव गांव में कालेज,मेडिकल कालेज,बीएच कालेज,इंजीनियरिंग कालेज,ला कालेज खुल गये हैं।


इंग्लिश कुलीन स्कूल कालेज तो मशरूम है।


कोई नियंत्रण नहीं है।कोई नियमन नही है।

बेलगाम पूंजी,मुनाफाखोरी और कमीशनखोरी का खुल्ला बाजार है।


जो बच्चों का हुजूम बड़ी उम्मीदों के साथ इस शिक्षण संस्थानों से निकल रहा है,उनका आखिरकार होगा क्या,जो किसान बेदखल हो रहे हैं,उनका आखिर होगा क्या,इसका जवाब किसी के पास नहीं है।


दिनेशपुर.ट्रांजिट कैंप से लेकर नैनीताल तक बाजारों में सारे के सारे चेहरे अजनबी हैं।जहां तहां शापिंग माल है।


स्थानीय लोग पक्के मेहनतकश हो गये हैं और व्यापारियों के एक खास तबके को अपना सबकुछ हस्तांतरित करके ऐश कर रहे हैं मौत के इंतजार में।


नैनीताल के लिए काठगोदाम से पहाड़ चढ़ते हुए पहाड़ के रिसते जख्मों से जो खून की धार निकलती रही,उसे अभी दिलोदिमाग से साफ नहीं कर पाया हूं।


अपना नैनीताल भी तेजी से गांतोक नजर आने लगा है।


तल्ली डाट सुनसान है तो कैंट बाजार का कायाकल्प हो गया है।मल्लीबाजार की दुकानें अजनबी हैं तो फ्लैट्स की घेराबंदी है।


तल्ला डांडा और अय़ांर पाटा अब आलीशान हैं और सूखाताल,भीमताल,खुरपाताल तक विकास का कदमताल है और बिना बेदखल कोई एक इंच जमीन कहीं नहीं है जैसे अनबंधी कोई नदी नहीं है।


कल सुबह गिरदा की पत्नी हीराभाभी से तल्ली डाट के बगल में हल्द्वानी रोड पर उनके नये कमरे में सविता और मेरी लंबी बातें होती रहीं।


हीरा भाभी, बोली कम रोयी ज्यादा।उन आंसू की हिस्सेदारी लेकिन हमारी हैं नहीं।


बटरोही से माउंट रोज में उनके घर जाकर हमने पूछा कि गिरदा की कितनी किताबें कोर्स में लगी हैं।बोले ,एक भी नहीं है।लगायेगा कौन,उन्होंने पूछा।


हीराभाभी चाहती हैं कि गिरदा की स्मृति में कोई संग्रहालय बने।


उत्तराखंड सरकार या कुमांयू विश्वविद्यालय चाहे तो यह संभव है।


हीरा भाभी बोलीं कि गिरदा की किताबें और उनका सारा सामान अल्मोड़ें में उनके पुश्तैनी घर में बाथरूम के सामने गली में बक्से में बंद छोड़ आयी हैं क्योंकि केलाखान के पास गिरदा का घर उन्हें छोड़ना पड़ा।


साढ़े बारह सौ का घर छोड़कर अशोक होटल के ठीक सामने जो साढ़े पांच हजार रुपये के किरोये पर उनका एक कमरे का घर है,जहां वे निपट अकेली हैं,उसमें कोई रसोई भी नहीं है तो किताबें वे कहां रखतीं।


मेरे पिता पुलिन बाबू डायरियां लिखा करते थे रोजय़हर छोटी बड़ी जरुरी गैर जरुरी चीजों को लिखा करते थे।हमारा घर झोपड़ियों का झुरमुट था। कोई खाट तक नहीं थी हमारी और हम फर्श पर सोते थे।एक बड़े से लकड़ी के बक्से में सारे जरुरी कागजात ,जमीन का खसरा खतियान से लेकर ढिमरी ब्लाक आंदोलन के पोस्टर,पर्चे और उनकी डायरियां रखी हुई थीं।बाकी पूरे घर में अनाज और पत्र पत्रिकाओं का डेरा और बाकी सांपों का बसेरा था।छप्पर चूंती रहती थीं।


पिताजी की मौत के बाद स्थिर हुआ तो हमें उस काठ के बक्से की सुधि आयी।पता चला कि पद्दो घर से बाहर था और तब दस बारह साल के भतीजे टुटुल ने बाक्स खोलकर दीमक लगे कागजात डायरियों और उसके भीतर की सड़न से घर को बचाने के लिए उस काठ के बक्से को ही फूंक दिया।


पिताजी की इस तरह दो दो बार अंत्येष्टि हो गयी।


हमारी औकात पिताजी के लिए संग्राहालय बनाने की थी नहीं।


दिनेशपर कालेज के सामने जो मूर्ति बनी है,उसे हर साल नये सिरे से सहेजना पड़ता है क्योंकि रात के अंधेरे में हर साल उस मूर्ति को अनजान लोग तोड़ देते हैं।


इस बार भतीजी निन्नी ने छूटते ही कहा कि दादाजी के हाथ में फ्रैक्चर है।


सविता बोली उनकी पूरी देह ही फ्रैक्चर है।


सविता ने फिर जिम्मेदार लोगों से निवेदन भी किया कि कैश कराने के लिए इस मूर्ति पूजा की जरुरत ही क्या है।


सविता ने कहा कि हर मूर्ति गढ़ी जाती ही है विसर्जित होने के लिए।


मुक्तबाजार हुई जा रही तराई में पुलिनबाबू की स्मृति का क्या मोल।


बेहतर हो कि पुलिनबाबू को विसर्जित कर दिया जाये।

उनको इस यातनागृह से मुक्त कर दिया जाये।


हम जो गिरदा की मूरत गढ़ रहे हैं,बेदखल पहाड़ और बेदखल तराई की भावभूमि में उसकी कितनी प्रासंगिकता है,यह बात मेरी समझ में नहीं आती।


राजीव लोचन साह ने कहा भी कि गिरदा ने जनता से लिया और जनता को लौटा दिया।पोथी रचने की उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी।


वे बोले कि गिरदा तो चिरकुट पर लिखने वाला ठैरा।


तो इस हुड़किया लोककवि की ब्रांडिंग करके किसे क्या फायदा होने वाला ठैरा।मुझे आशंका है कि जैसे हम अपने पिता की कोई स्मृति और उनके हिस्से का इतिहास बचा नहीं सकें,उसीतरह हमारे गिरदा को भी घुन और दीमक चाट जाने वाले होंगे।


तुहीन और पिरिम अब दिल्ली में हैं और अनिमित नैकरियों में हैं और भाभी को कुल साढ़े सात हजार रुपये की पेंशन मिलती है।


राजीव,दीपा कांडपाल,शेखर,उमा भाभी निजी तौर पर जितना कुछ कर सकते हैं,कर रहे हैं जो शायद काफी नहीं है।


पवन राकेश का कहना है कि भाभी की आंखों से बहते आंसुओं को हम थाम ही नहीं सकते।


कल दो बजे तक तुहीन को नैनीताल होना था।मुझे घर से पद्दो का जरुरी फोन मिलने की वजह से तुरत फुरत पहाड़ छोड़ आना पड़ा शेखर दा और उमा भाभी से मिले बिना ही।


डीके ,विश्वास,कैप्टेन एल एम साह जैसे अनेक लोगों से बिना मिले।


मैंने हीरा भाभी से कहा कि तुहीन लौटते ही फोन करें और तब हम पता लगायेंगे कि क्या वह किसी अखबार में काम करने को इच्छुक है।होगा तो हम लोग किसी संपादक मालिक मित्र से निवेदन करेंगे कि उसे अखबार का कामकाज सीखा दें।


अभी तक तुहीन का फोन नहीं आया और मैं इंतजार में हूं।


बटरोही और राजीवदाज्यू से संग्रहालय की बात हमने चलायी भी।राजीवदाज्यू ने कहा कि सरकारी नियंत्रण में संग्रहालय का हाल तो महादेवी वर्मा पीठ से मालूम पड़ गया ठैरा,जहां उसे रचने वाले बटरोही को ही खदेड़ दिया गया।


उस दूध के जले बटरोही से भी हमारी माउंट रोज पर उनके मकान में लंबी बातें हुईं और उनसे भी कहा कि संग्रहालय बनाने की पहल आप ही कर सकते हैं।


बटरोही जी कोई जवाब देने की हालत में नहीं थे।


अबकी बार मल्लीताल के सबकुछ बदले माहौल में,इसे यूं समझें की नैनीताल के तीनों सिनेमाहाल विशाल,कैपिटल और अशोक बंद पड़े हैं और नैनीताल में कोई सिनेमाहाल इस वक्त है नहीं।


तो मल्ली बाजार में अपने पुराने शर्मा वैष्णव भोजनालय में करगेती और सुदर्शन लाल शाह सत्तर के दशक के कुछ डीएसबी सूरमाओं से मुलाकात हो गयी और एक दम सत्तर के दशक में लौट गये।


इससे पहले इदरीश मलिक की पत्नी कंवल सेमुलाकात हो गयी जो तराई के ही काशीपुर से हैं तो कोलकाता के भवानीपुर में भी उनकी जड़ें हैं।


इदरीश की गैरहाजिरी में उनसे हुई मुलाकात में वे इतनी अंतरंग हुई कि लगी करने शिकायत कि हम उसके घर क्यों नहीं ठहरे।फिर नैनीताल में हर साल दिखायी जानेवाली राजीव कुमार की फिल्म वसीयत की चर्चा भी हुई जिसमें सारे के सारे नैनीतालवाल देशभर से इकट्ठे हुए थे और संजोग से उस फिल्म की पटकथा,संवाद,इत्यादि मैंने लिखी थी और दो चार शाट मुझपर भी फिल्माये गये थे।


इदरीश अभी फिर मुंबई में है और उसकी दो फिल्में रिलीज होने को हैं,खुशी इस बात की है।


नैनीताल इतना बदल गया है कि फिल्मोत्सव के लिए जगह नहीं मिल पा रही है तो युगमंच के रिहर्सल के लिए भी जगह नहीं है।


फिर भी जहूर आलम की अगुवाई में सत्तर दशक की धारावाहिकता में युगमंच के नये पुराने रंगकर्मी हरिशंकर परसाई के मातादीन को मंच पर उतारने की जुगत में है।


वे रिहर्सल की तैयारी में थे तो उनसे ज्यादा बात नहीं हो पायी।


करीब रात के साढ़े बारह बजे हम मालरोड पर बंगाल होटल पहुंचे जहां मैं करीब पांच साल रुककर पढ़ता था डीएसबी में।एक सा गुरु जी ताराचंद्र त्रिपाठी के घर में था।


धड़कते हुए दिल के साथ गया कि पता नहीं कि किससे मुलाकात होगी और किससे नहीं।

बंगाल होटल का कायाकल्प हो गया है।जिस कमरे में मैं रहता था,वह अब मौचाक रेस्तरां है।वहीं हम पूछताछ कर रहे थे तो सीढ़ियों पर दादा सदानंद गुहा मजुमदार आ खड़े हो गये।


पहले उन्होंने ही हमें कस्टमर समझ लिया पर जब सविता ने कहा पलाश तो फौरन डांटते हुए बोले ,एखाने की कोरछिस ऊपरे जा।


ऊपर जाते ही उनकी बेटी सुमा जो 1973 में साल भर की थी .हमें देखते ही चीख पड़ी,मां देखो के एसेछे,पलाश अंकल और फिर भाई को आवाज लगाने लगी -- ओ सभ्यो ओ सभ्यो


दीदी अपने उसी कमरे में थीं।बड़ी बहू कोलकाता के बेलेघाटा से है।उसकी सास ने कहा कुछ नहीं, वह तुरंत किचन में घुस गयी।फिर दोनों के लिए माछ भात लेकर लौटीं।


सविता बोली,इनसुलिन तो अशोक में छोड़ आयी लेकिन तुम्हारे हाथ का जरुर खाउंगी।


छोटी बहू कुंमाय़ुनी और नैनीताल की है।पूछा तो बोली कि आस सेंट्स में टीचर है जैसे सुमा बिड़ला कालेज में है।


मैंने कहा कि हमारी मैडम मिसेज अनिल बिष्ट भी कभी आल सेंट्स में पढ़ाती थी।



इसपर उसके पति गुड्डु सुखमय ने कहा कि वह तो मैडम के साथ काम करता है।


दस बजे गये ते ।फिर भी मैडम को एसएमएस करके उसने हमारे वहा होने की जानकारी दी।दो मिनट के भीतर मैडम फोन पर थीं और हम घंटा भर बातें करते रहे।


करीब रात के साढ़े ग्यारह बजे अशोक में लौटे।सभ्यो गाड़ी से पहुंचा गया।


हल्द्वानी में हरुआ दाढ़ी है तो आज सुबह अमर उजाला देखा तो हल्द्वानी में संपादक हमारे पुराने बरेली के सहकर्मी सुनील साह हैं।


करगेती,भास्कर,कमलापंत और लोग हैं।लेकिन हल्द्वानी मैं रुक नहीं सका।

भास्कर उप्रेती से नैनीताल पहुंचते ही मुलाकात हो गयी,गनीमत है।


गुरु जी ताराचंद्र त्रिपाठी इस वक्त मुरादाबाद में हैं।उन्हें प्रमाम करने की बड़ी इच्छा थी।


राजीव लोजन साह ने गुरुजी से फोन पर मिलाया और फोन पर ही सविता और मैंने उन्हें प्रणाम कहकर नैनीताल से विदा ली।


সংবিধান দিবস সমারোহ

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Saturday, October 18, 2014

यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र साम्राज्यवादी स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।

यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र साम्राज्यवादी


स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है


मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।


पलाश विश्वास


कल जो रोजनामचा लिखा,वह दरअसल अधूरा रह गया है।हमारे घर में दो छोटे बच्चे भी हैं।निन्नी और पावेल।छोटे बाई पंचानन की बेटी और बेटा।


निन्नी चौथी में पढ़ती है और बेहद समझदार हो गयी है तो पावेल सातवीं में पढ़ते हुए भी बहुत हद तक वैसा ही है,जैसा कि मैं बचपन में हुआ करता था।


मेरे इलाके में लोग मुझे बलदा यानी बड़े भाई और बुरबक एकसाथ एक ही शब्द में कहा करते थे।पावेल मेरी तरह ही साईकिल से अपने स्कूल छह सात किमी दूर जाता है रोज।वह सातवीं में पढ़ता है।


वह मेरी तरह मुख्य सड़क छोड़कर खेतों की मेढ़़ों से रास्ता बनाकर स्कूल जाता है रोज।मैंने पूछा तो बताया कि मुख्य सड़क पर किसी फार्म हाउस के सात सात कुत्ते हैं,उनसे एक बार वह बच निकला है और उनसे बचने के लिए सुरक्षित खेतों के दरम्यान वह अपना रास्ता बनाता है।


मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।

फर्क यह हुआ कि पहले पूरी तराई एक बड़ा सा फार्म हाउस हुआ करता था और बाकी सारे गांव महनतकश बस्तियां।अब तराई और पहाड़ पूंजी का मुकम्मल सामंती उपनिवेश है।


पिछलीबार जब घर आया था,दोनो बहुत छोटे थे और मेरे साथ चिपके रहते थे।खासतौर पर निन्नी।गांव में लोग उसे चिढ़ाते भी थे,ताउ तो चले जायेंगे,फिर क्या करोगी निन्नी।निन्नी जवाब में गुमसुम हो जाती थी।


अबकी बार स्कूल से लौटने के बाद वे कोचिंग में चले जाते हैं।शाम को ही उनसे मुलाकात हो पाती है।पहले दिन तो उसके पिता ने हमारे आने की खुशी में उन्हें छुट्टी दे दी।अगले दिन सविता उन्हें लेकर बाजार चली गयीं।


दोनो बच्चों ने अपनी ताई के साथ खरीददारी में अपनी पसंद के जो कपड़े खरीदे हैं,उन्हें देखकर मैं चकित रह गया।


हमें इतनी तमीज भी नहीं थी।मुझे एक काला कोट मिला था ,उनकी उम्र में जो मेरी संपत्ति थी और मैं उसे हरवक्त चबाता रहता था।


फिर भी पढ़ाई से जब उनकी छुट्टी होती है,उनसे रोज ढेरों बातें होती हैं और रह रहकर अपने बचपन में लौटना होता है।


निन्नी ने वायदा किया है कि खूब पढेगी।


मैंने उससे कहा कि अब इस घर में न कोई बेटी और न कोई बहू रसोई में कैद होगी फिर कभी।निन्नी से मैंने इस सिलसिले में जो भी कहा,बड़ो के मुकाबले ज्यादा गंभीरता से उसने सुना और अपने सकारात्मक जवाब से मुझे हैरान करती रहीं।


बहुत समझदार हो गयी है निन्नी।

बहुत समझदार हो गयी है हमारी बेटिया।

बिटिया जिंदाबाद।

बसंतीपुर गांव से मेरी मां कभी अपने मायके ओड़ीशा वापस नहीं गयीं।न वह बाहर जाना पसंद करती थीं और इसी गांव की माटी में मिल गयीं।


मेरी मां,मेरी ताई,मेरी चाची,मेरी बुआ,मेरी नानी और मेरी दादी के साथ साथ बसंतीपुर की सारी स्त्रियों को उनके कठिन संघर्ष के दिनों में बचपन से मैंने देखा है।


रसोई में सिमटी उनकी रोजमर्रे की जिंदगी और उनके बेइंतहा प्यार के मुकाबले हम उन्हें वापस कुछ भी दे नहीं पाये।


मेरी पत्नी सविता तो मेरी महात्वाकांक्षाओं की बलि हो गयीं।हम कोलकाता नहीं जाते तो उसे अपनी पक्की नौकरी छोड़कर हाउसवाइप भनकर जिंदगी न बितानी होती।हम कोलकाता में उसकी कोई मदद नहीं कर सकें।


खुशी यह है कि निन्नी की मां नौकरी कर रही हैं।


दरअसल मुद्दा यही है कि स्त्री के सशक्तीकरण के बिना न लोकतंत्र बच सकता है और न इस स्वतंत्रता का कोई मतलब है जबकि अपने अपने घरों में हम अपनी बेटियों बहुओं के लिए मुकम्मल कैदगाह रचते रहेंगे।


हमारे घर में और गांव में खेतों,खलिहानों से लेकर घर की व्यवस्था में स्त्रियों की प्रबंधकीय दक्षता का मैं कायल रहा हूं।इस मामले में अधपढ़ हमारी ताई बाकायदा मिसाल है।फिर प्रोफेशनल लाइफ में कामकाजी महिलाओं को मैं दसों हाथों से घर बाहर संभालते हुए रोज जब देखता हूं।


मुझे पक्का यकीन है कि समाज और देश के कायाकल्प के लिए स्त्री भूमिका ही निर्णायक होनी चाहिए।मैं चाहता हूं कि हमारी बहू बेटियां इस चुनौती को मंजूर करें और हम सारे पुरुष इसमें उनका सहयोग करें।


मेरी दूसरी भतीजी,तहेरे भाई की बेटी कृष्णा नई दिल्ली में बीए फाइनल की छात्रा है।इंटर करने के बाद समुद्र विज्ञान की पढ़ाई के लिए वह कोलकाता गय़ी थी और उसके बाद उससे मुलाकात नहीं हुई है।लेकिन तभी मैंने उससे वायदा किया हुआ है कि वह कुछ बनकर दिखायें और जिंदगी में जो भी कुछ करना चाहती है,करें,पूरा परिवार उसके साथ होगा।


हमने तभी साफ कर दिया कि हम उसके विवाह के लिए कोई जल्दबाजी नहीं करेंगे।जब वह पढ़ लिखकर काबिल हो जायेगी,तब जब चाहे तब, जिसे पसंद करेगी,उसके साथ विवाह करने के लिए स्वतंत्र होगी।जाति भाषा धर्म का कोई बंधन आड़े नहीं आयेगा।


जाहिर है कि चौथी में पढ़ने वाली निन्नी से ये बातें मैं कर नहीं सकता।


मुझे खुशी है कि बसंतीपुर की बेटियां ही नहीं,बहुएं भी पढ़ लिख रही हैं और नौकरी भी कर रही हैं और उनके जीवन में वे बाधाएं नहीं हैं,जो बसंतीपुर में मेरे बचपन के दौरान तमाम स्त्रियां पार नहीं कर सकीं।


फिर भी जाति गोत्र का बंधन वैसा ही अटूट है।इसपर भी हमने अपने गांव वालों को साफ साफ बता दिया है कि हमारे परिवार के बच्चों को अपने अपने जीवन साथी चुनने का हम पूरा हक देंगे और इस सिलसिले में बच्चों की मर्जी ही फाइनल है।गांव में हमारे प्राण है और हम हर मामले में गांव के साथ हैं तो गांववालों को भी इस मामले में हमारा साथ देना चाहिए।


मुझे खुशी है कि जाति उन्मूलन के जिस जाति अंबेडकरी एजंडा के तहत मेरे पिता तराई में सामाजिक एकीकरण की बात करते थे,नई पीढ़ी के बच्चे उसी के मुताबिक चल रहे हैं और उनके लिए जाति उतनी बड़ी बाधा नहीं रही,जिसकी वजह से हम अपनी संवेदनाओं को लगाम देने को मजबूर थे।


ताराशंकर बंदोपाध्याय के महाकाव्यीयआख्यानों के मुकाबले उनका छोटा उपन्यास कवि मुझे बेहद प्रिय रहा है।एक डोम के कवित्व के चरमोत्कर्ष की वह संघर्ष गाथा है बंगाल के लोक में सराबोर।


उसमें झुमुर गानेवाली बसंती की मौत निश्चित जानकर कविगानेर आसर पर जो गीत रचा उस डोम कवि ने ,उसका तात्पर्य अब समझ में आ रहा हैःजीवनडा एतो छोटो कैने।


जिंदगी वाकई बेहद छोटी है।डिडिटल देश में डिजिटल सेना बनाने की बात हो रही है।बुलेट ट्रेन बस अब चलने वाली है।


दिनेशपुर में भी पीटरइंग्लैंड,रिबोक,ली ब्रांडों खी धूम है।


अत्याधुनिक जीवन और प्लास्टिक मनी की बहार के साथ साथ हम अत्याधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक विकास के साथ सुपरसोनिक हैं बतौर उपभोक्ता।


उपभोग और भोग के लिए हम अमेरिकियों से कम नहीं हैं।लेकिन अपनी ही बहू बेटियों के मामले में हम बर्बर आदिम पुरुषों से कम हैवान नहीं हैं।


इस विरोधाभास के खिलाफ लड़ने खातिर अब हमारे पास कोई राममोहन राय,ईश्वरचंद्र विद्यासागर,ज्योतिबा फूले या हरिचांद गुरुचांद ठाकुर भी नहीं हैं।


हम जितने आधुनिक होते जा रहे हैं,जितने ब्रांडेड होते जा रहे हैं,जितने पढ़ लिख रहे हैं,दहेज की मांग उतनी अश्लील वीभत्स होती जा रही है।


दहेज खत्म कर दो तो बुनियादी जरुरतों के लिए इतने ज्यादा दुश्कर्म और इतने गहरे पैठे भ्रष्टाचार की गुंजाइश न हो और न कहीं भ्रूण हत्या की नौबत आयें।


स्त्री की योग्यता और उसकी दक्षता का सही इस्तेमाल हो और पुरुष आधिपात्य से बाज आये समाज तो देश को अमेरिका बनाने की नौबत ही न आये और तब अमेरिका को भारत बनने की जरुरत आन पड़ेगी।


विकास जितना तेज हो रहा है,मुक्त बाजार जैसे शिकंजे में ले रहा है कृषि, कारोबार, उत्पादन प्रणाली, आजीविका,प्राकृतिक मानव संसाधन,उतना ही बर्बर और आक्रामक हो रहा है सैन्य राष्ट्र अपनी ही जनता के विरुद्ध।


सैन्य राष्ट्र के मुक्त बाजार में स्त्री उत्पीड़न की सांढ़ संस्कृति के तहत रोजाना बलात्कार, रोजाना उत्पीड़न,रोाजाना अत्याचार,रोजाना हत्या और रोजाना आत्महत्या स्त्री जीवन की कथा व्यथा है।


पुरुषतंत्रक को उनसे तो चौबीस कैरेट की निष्ठा चाहिए लेकिनअपने लिए रासलीला का पूरा बंदोबस्त चहिए।


उनके क्षणभंगुर सतीत्व के दो इंच पर ही टिकी है पृथ्वी बाकी सारे शिवलिंग हैं जिसका हर तरीके से अभिषेक होने ही चाहिए।


इस ग्लोबीकरण से तो बेहतर है दो सौ साल पहले का नवजागरण,जब भारत में पहली बार स्त्रियों को आजाद करने का आंदोलन शुरु हुआ।


स्वतंत्रता संग्राम शुरु हुआ तो स्त्री मु्क्ति आंदोलन ईश्वर चंद्र विद्यासागर राममोहन राय ज्योतिबा फूल और हिचांद गुरुचांद के तिरोधान की तरह खत्म हो गया।


हमने आजादी हासिल कर ली है लेकिन हमारी स्त्रिया अभी घर बाहर गूुलाम है और हम उनकी देह को तो अपने भोग के लिए मुक्त करना चाहते हैं लेकिन उनकी अंतरात्मा की मुक्ति के हम विरुद्ध हैं।


उनके सशक्तीकरण के हम विरुद्ध है।हम किस आजाद लोकतांत्रकिक देश में रह रहे हैं,यह सवाल हमें हर्गिज परेशान नहीं करता।


नये सिरे से नवजागरण के लिए जिंदगी बहुत छोटी पड़ गयी है।शरतचंद्र ने स्त्री मन का जो पाठ दिया,हमने अपने साहित्य और संस्कृति में उसे मुकम्मल देहगाथा में तब्दील कर दिया है जो औपनिवेशिक हीनताबोध के मुताबिक है।


चूंकि हम खुद गुलाम हैं तो हम यौनदासी के अलावा स्त्री का आजाद वजूद के बारे में सोच ही नहीं सकते।


हम उन मित्रों को बेहद करीब से जानते हैं जो जाति गोत्र तंत्र में इतने फंसे हैं,कंडली ज्योतिष के अक्टोपस के शिकंजे में ऐसे हैं,कि जातगोत्र समीकरण से बाहर निकलने की इजाजत अपनी बेटियों को न देकर उनकी जिंदगी नर्क बना रहे हैं दरअसल और हमारी मजबूरी है कि हम उनकी कोई मदद  भी नहीं कर सकते।


स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है।


यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम अब तकनीकी तौर पर हर भाषा में लिखने को समर्थ हैं लेकिन भाषा से भाषांतर हो जाने की हमारी कोई इच्छा नहीं है।


यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम ग्लोबीकरण को अपना रहे हैं लेकिन देश से देशांतर तक हमारी दृष्टि कहीं पहुंचती है नहीं और अपने अपने घर के भीतर कैद हम अंध हैं,दृष्टि अंध।


यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम चांद मंगल तक उपनिवेश गढ़ने को तत्पर हैं और हमारी दसों उंगलियों में ग्रहशाति के यंत्ररत्न हैं,ताबिज है,मंत्र तंत्र हैं।


यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम बात तो करेंगे ज्ञान विज्ञान की लेकिन धर्मग्रंथों के पाठ के संस्कार,मिथकों के तमत्कार और टोटेम के अंधविश्वास को हरगिज हरगिज नही त्याजेंगे।


यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र का।