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Saturday, October 18, 2014

यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र साम्राज्यवादी स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।

यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र साम्राज्यवादी


स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है


मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।


पलाश विश्वास


कल जो रोजनामचा लिखा,वह दरअसल अधूरा रह गया है।हमारे घर में दो छोटे बच्चे भी हैं।निन्नी और पावेल।छोटे बाई पंचानन की बेटी और बेटा।


निन्नी चौथी में पढ़ती है और बेहद समझदार हो गयी है तो पावेल सातवीं में पढ़ते हुए भी बहुत हद तक वैसा ही है,जैसा कि मैं बचपन में हुआ करता था।


मेरे इलाके में लोग मुझे बलदा यानी बड़े भाई और बुरबक एकसाथ एक ही शब्द में कहा करते थे।पावेल मेरी तरह ही साईकिल से अपने स्कूल छह सात किमी दूर जाता है रोज।वह सातवीं में पढ़ता है।


वह मेरी तरह मुख्य सड़क छोड़कर खेतों की मेढ़़ों से रास्ता बनाकर स्कूल जाता है रोज।मैंने पूछा तो बताया कि मुख्य सड़क पर किसी फार्म हाउस के सात सात कुत्ते हैं,उनसे एक बार वह बच निकला है और उनसे बचने के लिए सुरक्षित खेतों के दरम्यान वह अपना रास्ता बनाता है।


मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।

फर्क यह हुआ कि पहले पूरी तराई एक बड़ा सा फार्म हाउस हुआ करता था और बाकी सारे गांव महनतकश बस्तियां।अब तराई और पहाड़ पूंजी का मुकम्मल सामंती उपनिवेश है।


पिछलीबार जब घर आया था,दोनो बहुत छोटे थे और मेरे साथ चिपके रहते थे।खासतौर पर निन्नी।गांव में लोग उसे चिढ़ाते भी थे,ताउ तो चले जायेंगे,फिर क्या करोगी निन्नी।निन्नी जवाब में गुमसुम हो जाती थी।


अबकी बार स्कूल से लौटने के बाद वे कोचिंग में चले जाते हैं।शाम को ही उनसे मुलाकात हो पाती है।पहले दिन तो उसके पिता ने हमारे आने की खुशी में उन्हें छुट्टी दे दी।अगले दिन सविता उन्हें लेकर बाजार चली गयीं।


दोनो बच्चों ने अपनी ताई के साथ खरीददारी में अपनी पसंद के जो कपड़े खरीदे हैं,उन्हें देखकर मैं चकित रह गया।


हमें इतनी तमीज भी नहीं थी।मुझे एक काला कोट मिला था ,उनकी उम्र में जो मेरी संपत्ति थी और मैं उसे हरवक्त चबाता रहता था।


फिर भी पढ़ाई से जब उनकी छुट्टी होती है,उनसे रोज ढेरों बातें होती हैं और रह रहकर अपने बचपन में लौटना होता है।


निन्नी ने वायदा किया है कि खूब पढेगी।


मैंने उससे कहा कि अब इस घर में न कोई बेटी और न कोई बहू रसोई में कैद होगी फिर कभी।निन्नी से मैंने इस सिलसिले में जो भी कहा,बड़ो के मुकाबले ज्यादा गंभीरता से उसने सुना और अपने सकारात्मक जवाब से मुझे हैरान करती रहीं।


बहुत समझदार हो गयी है निन्नी।

बहुत समझदार हो गयी है हमारी बेटिया।

बिटिया जिंदाबाद।

बसंतीपुर गांव से मेरी मां कभी अपने मायके ओड़ीशा वापस नहीं गयीं।न वह बाहर जाना पसंद करती थीं और इसी गांव की माटी में मिल गयीं।


मेरी मां,मेरी ताई,मेरी चाची,मेरी बुआ,मेरी नानी और मेरी दादी के साथ साथ बसंतीपुर की सारी स्त्रियों को उनके कठिन संघर्ष के दिनों में बचपन से मैंने देखा है।


रसोई में सिमटी उनकी रोजमर्रे की जिंदगी और उनके बेइंतहा प्यार के मुकाबले हम उन्हें वापस कुछ भी दे नहीं पाये।


मेरी पत्नी सविता तो मेरी महात्वाकांक्षाओं की बलि हो गयीं।हम कोलकाता नहीं जाते तो उसे अपनी पक्की नौकरी छोड़कर हाउसवाइप भनकर जिंदगी न बितानी होती।हम कोलकाता में उसकी कोई मदद नहीं कर सकें।


खुशी यह है कि निन्नी की मां नौकरी कर रही हैं।


दरअसल मुद्दा यही है कि स्त्री के सशक्तीकरण के बिना न लोकतंत्र बच सकता है और न इस स्वतंत्रता का कोई मतलब है जबकि अपने अपने घरों में हम अपनी बेटियों बहुओं के लिए मुकम्मल कैदगाह रचते रहेंगे।


हमारे घर में और गांव में खेतों,खलिहानों से लेकर घर की व्यवस्था में स्त्रियों की प्रबंधकीय दक्षता का मैं कायल रहा हूं।इस मामले में अधपढ़ हमारी ताई बाकायदा मिसाल है।फिर प्रोफेशनल लाइफ में कामकाजी महिलाओं को मैं दसों हाथों से घर बाहर संभालते हुए रोज जब देखता हूं।


मुझे पक्का यकीन है कि समाज और देश के कायाकल्प के लिए स्त्री भूमिका ही निर्णायक होनी चाहिए।मैं चाहता हूं कि हमारी बहू बेटियां इस चुनौती को मंजूर करें और हम सारे पुरुष इसमें उनका सहयोग करें।


मेरी दूसरी भतीजी,तहेरे भाई की बेटी कृष्णा नई दिल्ली में बीए फाइनल की छात्रा है।इंटर करने के बाद समुद्र विज्ञान की पढ़ाई के लिए वह कोलकाता गय़ी थी और उसके बाद उससे मुलाकात नहीं हुई है।लेकिन तभी मैंने उससे वायदा किया हुआ है कि वह कुछ बनकर दिखायें और जिंदगी में जो भी कुछ करना चाहती है,करें,पूरा परिवार उसके साथ होगा।


हमने तभी साफ कर दिया कि हम उसके विवाह के लिए कोई जल्दबाजी नहीं करेंगे।जब वह पढ़ लिखकर काबिल हो जायेगी,तब जब चाहे तब, जिसे पसंद करेगी,उसके साथ विवाह करने के लिए स्वतंत्र होगी।जाति भाषा धर्म का कोई बंधन आड़े नहीं आयेगा।


जाहिर है कि चौथी में पढ़ने वाली निन्नी से ये बातें मैं कर नहीं सकता।


मुझे खुशी है कि बसंतीपुर की बेटियां ही नहीं,बहुएं भी पढ़ लिख रही हैं और नौकरी भी कर रही हैं और उनके जीवन में वे बाधाएं नहीं हैं,जो बसंतीपुर में मेरे बचपन के दौरान तमाम स्त्रियां पार नहीं कर सकीं।


फिर भी जाति गोत्र का बंधन वैसा ही अटूट है।इसपर भी हमने अपने गांव वालों को साफ साफ बता दिया है कि हमारे परिवार के बच्चों को अपने अपने जीवन साथी चुनने का हम पूरा हक देंगे और इस सिलसिले में बच्चों की मर्जी ही फाइनल है।गांव में हमारे प्राण है और हम हर मामले में गांव के साथ हैं तो गांववालों को भी इस मामले में हमारा साथ देना चाहिए।


मुझे खुशी है कि जाति उन्मूलन के जिस जाति अंबेडकरी एजंडा के तहत मेरे पिता तराई में सामाजिक एकीकरण की बात करते थे,नई पीढ़ी के बच्चे उसी के मुताबिक चल रहे हैं और उनके लिए जाति उतनी बड़ी बाधा नहीं रही,जिसकी वजह से हम अपनी संवेदनाओं को लगाम देने को मजबूर थे।


ताराशंकर बंदोपाध्याय के महाकाव्यीयआख्यानों के मुकाबले उनका छोटा उपन्यास कवि मुझे बेहद प्रिय रहा है।एक डोम के कवित्व के चरमोत्कर्ष की वह संघर्ष गाथा है बंगाल के लोक में सराबोर।


उसमें झुमुर गानेवाली बसंती की मौत निश्चित जानकर कविगानेर आसर पर जो गीत रचा उस डोम कवि ने ,उसका तात्पर्य अब समझ में आ रहा हैःजीवनडा एतो छोटो कैने।


जिंदगी वाकई बेहद छोटी है।डिडिटल देश में डिजिटल सेना बनाने की बात हो रही है।बुलेट ट्रेन बस अब चलने वाली है।


दिनेशपुर में भी पीटरइंग्लैंड,रिबोक,ली ब्रांडों खी धूम है।


अत्याधुनिक जीवन और प्लास्टिक मनी की बहार के साथ साथ हम अत्याधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक विकास के साथ सुपरसोनिक हैं बतौर उपभोक्ता।


उपभोग और भोग के लिए हम अमेरिकियों से कम नहीं हैं।लेकिन अपनी ही बहू बेटियों के मामले में हम बर्बर आदिम पुरुषों से कम हैवान नहीं हैं।


इस विरोधाभास के खिलाफ लड़ने खातिर अब हमारे पास कोई राममोहन राय,ईश्वरचंद्र विद्यासागर,ज्योतिबा फूले या हरिचांद गुरुचांद ठाकुर भी नहीं हैं।


हम जितने आधुनिक होते जा रहे हैं,जितने ब्रांडेड होते जा रहे हैं,जितने पढ़ लिख रहे हैं,दहेज की मांग उतनी अश्लील वीभत्स होती जा रही है।


दहेज खत्म कर दो तो बुनियादी जरुरतों के लिए इतने ज्यादा दुश्कर्म और इतने गहरे पैठे भ्रष्टाचार की गुंजाइश न हो और न कहीं भ्रूण हत्या की नौबत आयें।


स्त्री की योग्यता और उसकी दक्षता का सही इस्तेमाल हो और पुरुष आधिपात्य से बाज आये समाज तो देश को अमेरिका बनाने की नौबत ही न आये और तब अमेरिका को भारत बनने की जरुरत आन पड़ेगी।


विकास जितना तेज हो रहा है,मुक्त बाजार जैसे शिकंजे में ले रहा है कृषि, कारोबार, उत्पादन प्रणाली, आजीविका,प्राकृतिक मानव संसाधन,उतना ही बर्बर और आक्रामक हो रहा है सैन्य राष्ट्र अपनी ही जनता के विरुद्ध।


सैन्य राष्ट्र के मुक्त बाजार में स्त्री उत्पीड़न की सांढ़ संस्कृति के तहत रोजाना बलात्कार, रोजाना उत्पीड़न,रोाजाना अत्याचार,रोजाना हत्या और रोजाना आत्महत्या स्त्री जीवन की कथा व्यथा है।


पुरुषतंत्रक को उनसे तो चौबीस कैरेट की निष्ठा चाहिए लेकिनअपने लिए रासलीला का पूरा बंदोबस्त चहिए।


उनके क्षणभंगुर सतीत्व के दो इंच पर ही टिकी है पृथ्वी बाकी सारे शिवलिंग हैं जिसका हर तरीके से अभिषेक होने ही चाहिए।


इस ग्लोबीकरण से तो बेहतर है दो सौ साल पहले का नवजागरण,जब भारत में पहली बार स्त्रियों को आजाद करने का आंदोलन शुरु हुआ।


स्वतंत्रता संग्राम शुरु हुआ तो स्त्री मु्क्ति आंदोलन ईश्वर चंद्र विद्यासागर राममोहन राय ज्योतिबा फूल और हिचांद गुरुचांद के तिरोधान की तरह खत्म हो गया।


हमने आजादी हासिल कर ली है लेकिन हमारी स्त्रिया अभी घर बाहर गूुलाम है और हम उनकी देह को तो अपने भोग के लिए मुक्त करना चाहते हैं लेकिन उनकी अंतरात्मा की मुक्ति के हम विरुद्ध हैं।


उनके सशक्तीकरण के हम विरुद्ध है।हम किस आजाद लोकतांत्रकिक देश में रह रहे हैं,यह सवाल हमें हर्गिज परेशान नहीं करता।


नये सिरे से नवजागरण के लिए जिंदगी बहुत छोटी पड़ गयी है।शरतचंद्र ने स्त्री मन का जो पाठ दिया,हमने अपने साहित्य और संस्कृति में उसे मुकम्मल देहगाथा में तब्दील कर दिया है जो औपनिवेशिक हीनताबोध के मुताबिक है।


चूंकि हम खुद गुलाम हैं तो हम यौनदासी के अलावा स्त्री का आजाद वजूद के बारे में सोच ही नहीं सकते।


हम उन मित्रों को बेहद करीब से जानते हैं जो जाति गोत्र तंत्र में इतने फंसे हैं,कंडली ज्योतिष के अक्टोपस के शिकंजे में ऐसे हैं,कि जातगोत्र समीकरण से बाहर निकलने की इजाजत अपनी बेटियों को न देकर उनकी जिंदगी नर्क बना रहे हैं दरअसल और हमारी मजबूरी है कि हम उनकी कोई मदद  भी नहीं कर सकते।


स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है।


यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम अब तकनीकी तौर पर हर भाषा में लिखने को समर्थ हैं लेकिन भाषा से भाषांतर हो जाने की हमारी कोई इच्छा नहीं है।


यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम ग्लोबीकरण को अपना रहे हैं लेकिन देश से देशांतर तक हमारी दृष्टि कहीं पहुंचती है नहीं और अपने अपने घर के भीतर कैद हम अंध हैं,दृष्टि अंध।


यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम चांद मंगल तक उपनिवेश गढ़ने को तत्पर हैं और हमारी दसों उंगलियों में ग्रहशाति के यंत्ररत्न हैं,ताबिज है,मंत्र तंत्र हैं।


यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम बात तो करेंगे ज्ञान विज्ञान की लेकिन धर्मग्रंथों के पाठ के संस्कार,मिथकों के तमत्कार और टोटेम के अंधविश्वास को हरगिज हरगिज नही त्याजेंगे।


यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र का।

Friday, October 17, 2014

TALE OF UNHEARD VOICE An observation on MAL community in Saltora: By Saradindu Uddipan

TALE OF UNHEARD VOICE An observation on MAL community in Saltora: By Saradindu Uddipan

 
 
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TALE OF UNHEARD VOICE An observation on MAL community in Saltora: By Saradindu Uddipan

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Saradindu Biswas

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to me, Amalendu



I was appointed to study on the communities those are excluded from modern development and living as inferior in Bankura district, West Bengal, India during 2010. I was come to contact with some indigenous communities have been facing critical problems for survival such as Santhal, Munda, Mahali, Bagdi, Bauri and MAL. This study on "SOCIAL EXCLUSION" was patronized by UNICEF during 2010 and Udayani was the responsible organization appointed me to this challenging project. Basically the broken heart people got hart from the governing class and lost their lands, forests and water bodies. Even they have lost their human values to trust other. They kept them speechless and continued a traumatic a life. I am sharing here such an unheard voice of MAL community in a short form.  

Location:

Udaypur is a village with mixed communities near Biharinath hill at Saltora Block, Bankura, West Bengal, India. It is popularly known as Baddi Para though Mal is the major community living here for a long time. Others communities are Bagdi, Bauri and Bangal(Kayastha). Udaypur is a notified backward village by the West Bengal Government in Tiluri Gram Panchayat.

Mal the most backward community among the Scheduled Caste don't have their cultivable land in this village. 42 households around 210 populations have acquired forest land and made their hamlets with mud and local materials. Most of the roofs of the huts are covered by rotten paddy straw. Some are by tarpaulin. A narrow passage is used as the outlet for both the animal and human.

Livelihood: Mal community is basically agricultural laborers. During the monsoon they get sufficient agricultural work. But most of the months they don't have any work. It steer them towards seasonal migration to other districts. It is reported by the villagers that, they only get 10 days work in a month. Minor forest product is the other source of income for the Mal community. The broomstick, branch of neem tree, collecting of Sal leaves sometimes help the community to their existence of life.

Mother and Child Care: Malnutrition among the children, adolescents and women is an acute hazardous in this village. No ICDS centre is running here by the Government to take care of. There is no Primary Health Center in this village. Pregnant women have no knowledge about National Maternity Benefit Scheme (NMBS) and institutional birth. The mortality rate of the new born baby is quite high.

Child Education: Only one Primary School in the village is responsible for the education and MDM of the poor children. The rate of the dropout is high due to:

a) Most of the boys are in social trauma.

 b) High School is 5 kilometer far from the village.

c) Financial burden is one of the major problems.

d) Cattle rearing and collecting of minor forest product is more important than education for them.

 

Social Trauma: Mal community in Bankura district was untouchable. Even they were identified as criminals by the others. They are still unaccepted by the Kayastha, Baddi and Brahmans. The ignorance and isolation throw them into the social trauma.

Exclusion of Identity and Dignity: But the history referred that, Bankura the part of ancient MALLABHUM governed by the Malla king. From ancient MAGADH to SAMATATA covering the modern states UP, Bihar, Jharkhand, Orissa and Bengal they built a huge nation. The Bagdi community also gets into their identity from Malla origin. Mhamati Gautam Buddha took his last meal in Malla kingdom and achieved MAHAPARINIBBANNA. Unfortunately the community has forgotten their identity and dignity keeping slavery into the four fold system for a long time.

 

নমো ঃ অশ্বমেধের ঘোড়া ঃ শরদিন্দু উদ্দীপন

নমো ঃ অশ্বমেধের ঘোড়া ঃ শরদিন্দু উদ্দীপন


লিখছেনঃ 
তিনি দিগ্বিজয়ের জন্য মনোনীত। যজ্ঞের জন্যউৎসর্গকৃত। ধর্ম যুদ্ধের জন্য নিবেদিত। তিনিঅশ্বমেধের ঘোড়া। তাই তাঁকে সাজানো হয়েছে সযত্নেচন্দন চর্চিত ললাট অগ্নিসম রক্ততিলক শিরে ভাগুয়াধ্বজ তুরিভেরি, দামামার  উন্মত্ত রণহুংকার তুলে তিনিছুটে চলেছেন। তারই হ্রেষারবে শিহরিত হচ্ছে দশদিক হ্যাতিনিই বর্তমান ভারতের মনুবাদী শিবিরের ছুটন্ত ঘোড়াতিনি নরেন্দ্র দামোদর দাস মোদি।

এরকমই একটি ঘোড়ার সন্ধানে ছিল মনুবাদীরা যাকেদিগ্বিজয়ের কাজে ব্যবহার করা যেতে পারে এবংদিগ্বিজয়ের কাজ সমাপ্ত হলে বলি চড়ানো যেতে পারেবলিতেই মোহগ্রস্থ অশ্বের মুক্তি। হোমাগ্নীর পুত রসেভস্মীভূত হওয়াতেই তার  পরম শান্তি ওঁ শান্তিওঁ শান্তি মোদি সেই দাস সংস্কৃতি  পরম্পরার ধারক   বাহক যেদেবপ্রসাদ লাভ করে পরম শান্তি পেতে চায়  

শূদ্র নিধনের প্রতীকী পরিভাষা 
অশ্বমেধ যজ্ঞ ভূদেবতাদের ধর্মঅর্থকাম  মোক্ষ লাভেরসর্বোচ্চ পথ। মূলনিবাসীদের(শূদ্রবিরুদ্ধে কাঙ্ক্ষিত বিজয়লাভের জন্য এক সুনিশ্চিত বার্তা অশ্ব বা ঘোড়াকে দিয়ে এইকাজ পরিচালিত করা হয় এই কারণে যেভূদেবতীয় পরিভাষায়অশ্ব  শূদ্র সমগোত্রীয় ওদের ধর্মীয় ভাবনায় এটাইসম্পৃক্ত হয়ে আছে যেদেব সাম্রাজ্য বিস্তারের জন্য অশ্ব শূদ্রকে বলি প্রদত্ত হতে হয়।  কেননা ওদের বিধাতা জীব সৃষ্টিকালে পুরুষকে বলি দিয়েছিল এবং সেই বলি প্রদত্ত পুরুষেরপায়ের থেকে জন্ম নিয়েছিল শূদ্র  অশ্ব (পুরুষসূক্তঋক বেদ,৯০ শ্লোকঅর্থাৎ অশ্বমেধ হল শূদ্র বা দাস নিধনের প্রতীকীপরিভাষা নরেন্দ্র ভাই দামোদর দাস মোদি একদিকে শূদ্রঅন্যদিকে দাস সুলভ আনুগত্যের জন্য বিশ্বস্ত ঘোড়া। 

রামরাজ্যের রণহুংকারঃ                 
এই অশ্বমেধের ঘোড়া ছুটেছিল খৃষ্টপূর্ব ১৮৭ সাল আগেএকবার। প্রকাশ্যে দিবালোকে যখন পুস্যমিত্র শুঙ্গ সম্রাটঅশোকের প্রপৌত্র ব্রিহদ্রথকে নৃশংস ভাবে হত্যা করল পুস্যমিত্র শুঙ্গের এই অশ্বমেধ যজ্ঞ ছিল ঐতিহাসিক কালের সর্ববৃহৎ শূদ্র নিধন যজ্ঞ। অশ্বমেধের নামেধ্বংস করা হয়েছিল মূলনিবাসী সভ্যতার সমস্ত নিদর্শন। পুস্যমিত্র তার চরিত্রকে অবলম্বন করে লিপিবদ্ধকরেছিল রামায়ন কাহিনী শম্বুকের মতো জ্ঞান তাপসদের হত্যা করে তাদের ধড় থেকে মাথা নামিয়ে দিয়েব্রাহ্মনদের সন্তুষ্ট করেছিল রাজা রাম মোদির ভাষণেও উঠে আসছে  রামরাজ্যের সেই রণহুংকার   

কূর্ম অবতারঃ 
কচ্ছপ তার খোলসের মধ্য থেকে ক্রমশ শুঁড় বাড়তে শুরু করেছে। মৃতদেহ তার প্রধান খাদ্য। ব্রাহ্মণ ভোজনের জন্য শূদ্রের লাশ চাই। সস্তা বহুজনের লাশ। সুলতানি আমল থেকে ইংরেজ কাল পর্যন্ত ওরা মুখ খুলতে পারেনি। ইংরেজদের কাছ থেকে ক্ষমতা হস্তান্তরের পর থেকেই ওরা ক্রমশ দাঁত নখ বার করতে শুরু করেছে। শুরু হয়েছে সস্ত্রের ঝনঝনানি। সস্ত্র পূজা। কিন্তু একটি ঘোড়ার দকার ছিল ওদের। এযাবতকাল ওরা ব্যবহার করছিল ক্ষত্রিয় শক্তি। কিন্তু ক্ষত্রিয়রা ভূসম্পদের ৮০% দখল করে নিলে  ওরা বাণিয়া শক্তি ব্যবহার করে। তুলে আনা হয় মোহনদাস নামক এক বানিয়াকে। প্রয়োজন ফুরিয়ে গেলে মোহনদাস করমচাঁদ গান্ধীকেও তারা হত্যা করতে কুণ্ঠাবোধ করেনি। পাঞ্জাব এবং বাংলার শক্তিকে খর্ব করে তাদের খণ্ডিত করে বিপুল মানুষকে দেশহীন নাগরিকে পরিণত করতেও তারা দ্বিধা করেনি।   

বিনাশায় চ দুষ্কৃতমঃ   
ওদের মোক্ষ লাভের সবথেকে বড় অন্তরায় এখন ভারতীয় সংবিধান এবং তার প্রণেতা বাবাসাহেব ডঃ  বিআর আম্বেদকর। কারণ এই সংবিধান প্রণয়ন করে আম্বেদকর তাদের স্বপ্নের রাম রাজ্যকে আস্তাকুড়ে ফেলে দিয়েছেন। চতুর্বর্ণ ব্যবস্থাকে শুধু ধ্বংস নয় তাকে গর্হিত ও শাস্তি যোগ্য অপরাধ বলে প্রতিপাদিত করে দিয়েছেন। সংবিধানের মধ্যে ভাগিদারী ব্যবস্থা বলবত করে সমস্ত মানুষের সার্বিক উত্থান সম্ভব করে তুলেছেন। এই সংবিধানের কারণেই ক্রমশ রাষ্ট্র ক্ষমতায় উঠে আসছে বহুজন মানুষ। রাষ্ট্র হয়ে উঠছে for the people, by the people, of the people এর। শক্তিশালী বহুজন মানুষের শক্ত অভিঘাতেই উত্তর ভারতে দাঁত বসাতে পারছেনা ভুদেবতারা।   

ধর্মসংস্থাপনার্থায়ঃ 
সুতরাং পুনর্নির্মাণ চাই। সংবিধানকে ধ্বংস করে মনুর শাসন কায়েম করা চাই। জনগণকে পুনরায় বর্ণবাদ বা হিন্দুত্বের খোঁয়াড়ে পোরা চাই। বাবরি ধ্বংস চাই, গোধড়া চাই, সমঝোতা এক্সপ্রেস চাই, গুজরাট মডেল চাই, কাঁসির দখল চাই, বুদ্ধ গয়ার বিলুপ্তি চাই এবং এগুলো নির্দ্বিধায় প্রচার করার জন্য একজন নির্বোধ দাস চাই। একটা ঘোড়া চাই।   

কল্যাণ সিংকে (দাস বংশের আর এক প্রতিনিধি) দিয়ে শুরু হয়েছিল এই রনভেরি। জাঠ রাজ সিং এ খেলার একেবারে অনুপযুক্ত। মুরলী মনোহর যোশির গায়ে এত শক্তি নেই। সুতরাং দাস চাই। ঘোড়া চাই। যে বলি প্রদত্ত হবে জেনেও রামরাজ্য বিস্তারের কাজ করতে পারে।   
নরেন্দ্র দামোদর মোদি সেই দাস সেই অশ্বমেধের ঘোড়া যিনি অবলীলায় এগুলো প্রচার করেতে পারেন।  গুজরাট দাঙ্গায় শত শত মানুষের প্রান নিয়েও গাড়ির চাকায় কুকুর পিষে মরেছে বলে তামাশা করতে পারেন।  ১৯৪৭ সালেরপরে যাঁরা ভারতে এসেছেনতাঁরা বিছানা-বেডিং বেঁধে রাখুন১৬ মে- পরে তাঁদের বাংলাদেশে ফিরে যেতে হবে বলতে পারেন।
 এই মোদির নেতৃত্বে দেশের সম্পদ পুঁজিপতিদের হাতে তুলে দেবার জান্য, নরহত্যার জন্য যদি টাকা লাগে দেবে কর্পোরেট গৌরী সেন। সুতরাং দেশকে মোদির যুগে ঠেলে দাও। গুজরাট মডেল সামনে লাও। সমস্ত মিডিয়াগুলিতে সারাক্ষণ প্রচারিত হোক মোদিবাবুর কীর্তন। আবাল বৃদ্ধ বনিতা নমো নমো গাইতে শুরু করুক। কেননা নমো হলেন একালের অশ্বমেধের ঘোড়া।

Prespective Bangladesh,reference to Muslim terrorবর্ধমানে বোমা বিস্ফোরণ ও বাংলাদেশের জামায়াত

বর্ধমানে বোমা বিস্ফোরণ ও বাংলাদেশের জামায়াত
এবনে গোলাম সামাদ
১৮ অক্টোবর ২০১৪, শনিবার, ৯:৪৬

 
আমি কখনো বর্ধমানে যাইনি। বর্ধমান শহর সম্পর্কে আমার কোনো ব্যক্তিগত ধারণা নেই। তবে ক'দিন ধরে আমাদের দেশের পত্রপত্রিকা পড়ে মনে হলো বর্ধমান শহরের লোক খুবই আতঙ্কিত হয়ে উঠেছেন। কেননা, সেখানে বাংলাদেশ থেকে কিছু জঙ্গি মুসলিম মৌলবাদী গিয়ে একটি দালানবাড়িতে বোমা বানাচ্ছিলেন। বোমা বানানোর সময় সেখানে বোমা বিস্ফোরণ ঘটে। ফলে মারা যান দু'জন বোমা নির্মাণকারী ও আহত হন আরো কয়েকজন। যে দালানবাড়িটিতে বোমা বানানো হচ্ছিল, এর ছবি প্রকাশিত হয়েছে আমাদের দেশের পত্রপত্রিকায়। পত্রিকার ছবি দেখে মনে হলো, বোমা বিস্ফোরণের ফলে বাড়িটির কোনো অংশ ভেঙে যায়নি। আমার মনে তাই প্রশ্ন জাগল, যে বোমা বিস্ফোরিত হয়েছে তা আসলেই বোমা ছিল না পটকা জাতীয় কিছু ছিল, তা নিয়ে। কারণ, প্রকৃত বোমা বিস্ফোরিত হলে দালানটির কিছু-না-কিছু অংশ তিগ্রস্ত হতো। কিন্তু তা হয়নি। তাই বর্ধমান শহরের লোকে ভয়ঙ্করভাবে আতঙ্কিত হওয়ার কিছু ঘটেছে বলে আমার মনে হলো না। যদিও পত্রপত্রিকায় বলা হচ্ছে, বর্ধমান শহরের মানুষ ভয়ঙ্করভাবে আতঙ্কিত হয়ে উঠেছেন। পশ্চিমবঙ্গে নকশালপন্থীরা অনেক শক্তিশালী প্রকৃত বোমা বানাতে জানেন। যার বিস্ফোরণে ভেঙে যেতে পারে দালানকোঠা। ভাঙতে পারে সাঁকো, উড়ে যেতে পারে রেললাইন। পশ্চিম বাংলার মানুষ নকশালদের তৈরি বোমা বানানোর সাথে পরিচিত। তাই এরা জঙ্গি মুসলিম মৌলবাদীদের তৈরি পটকা বিস্ফোরণে আতঙ্কিত হওয়ার কোনো কারণ আছে বলে আমার মনে হচ্ছে না। যদিও আমাদের দেশে পত্রপত্রিকায় বলা হচ্ছে, বর্ধমানে বিরাজ করছে আতঙ্ক। ভারতে ছত্তিশগড় রাজ্যে নকশালপন্থীরা স্থলমাইন ব্যবহার করছে, যা কেবল সেনাবাহিনীর লোকেরাই ব্যবহার করতে পারে। ভারতের নকশালপন্থীরা স্থলমাইন কী করে জোগাড় করতে পারছে, তা হয়ে আছে রহস্যাবৃত। কেউ কেউ এমন মন্তব্য করছেন যে, নকশালপন্থীরা প্রচুর অর্থ দিয়ে সেনাবাহিনীর কাছ থেকে কিনছে স্থলমাইন। কথাটা কতটা সত্য আমরা জানি না। তবে জনশ্র"তি এ বিষয়ে প্রবল। 
আমাদের দেশে পত্রপত্রিকায় ও টেলিভিশনে বাংলাদেশের জামায়াতে ইসলামীকে জড়ানো হচ্ছে বর্ধমানে বোমা বিস্ফোরণের সাথে। কিন্তু বর্ধমান শহরে জামায়াত কর্মীরা কেন বোমা বানাতে যাবেন, সেটা আমার কাছে মোটেও বোধগম্য নয়। জামায়াত কর্মীরা যদি বোমা বানাতে চায়, তবে সেটা তার নিজ দেশে বসেই করতে পারে। পশ্চিমবঙ্গে বোমা বানিয়ে তা বাংলাদেশে নিয়ে আসা সহজসাধ্য নয়। এই বোকামি তারা কখনো করতে যেতে পারে না। বলা হচ্ছে, পশ্চিমবঙ্গের মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় তার তৃণমূল কংগ্রেস দল গড়ার জন্য প্রচুর অর্থ পেয়েছিলেন বাংলাদেশের জামায়াতে ইসলামীর কাছ থেকে। জামায়াতের সাথে তার রয়েছে একটা বিশেষ সম্পর্ক। আর তাই তিনি বাংলাদেশ থেকে যাওয়া বোমা বানানো লোকদের নিজ দেশে দিচ্ছেন প্রশ্রয়। কিন্তু যেখানে সামান্য একজন গরু বিক্রেতা পশ্চিম বাংলা থেকে বাংলাদেশে আসতে বিএসএফের গুলিতে প্রাণ হারাচ্ছেন, সেখানে মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় পশ্চিমবঙ্গে জামায়াতে ইসলামীদের যাওয়া-আসার অবাধ সুযোগ করে দিতে পারেন, সেটা নিয়ে সহজেই প্রশ্ন উঠানো যেতে পারে। তাই মনে হচ্ছে, পত্রপত্রিকায় প্রচারিত খবর হলো খুবই দুরভিসন্ধিমূলক। বাংলাদেশের জামায়াতে ইসলামী দল একটা গোড়া ধর্মান্ধ মৌলবাদী ইসলামপন্থী দল নয়। এ দলের প্রতিষ্ঠাতা গোলাম আযমকে মনোবিদ্যার দৃষ্টিকোণ থেকে একজন কঠোর মনোভাবাপন্ন বা টাফ মাইন্ডেড ব্যক্তি বলা চলে না। বরং বলতে হয়, একজন নমনীয় মনোভাবের বা টেন্ডার মাইন্ডেড ব্যক্তি। তিনি কোনো দিনই চাননি জোর করে মতা দখল করতে। অগ্রসর হতে চেয়েছেন নিয়মতান্ত্রিক পথে। এখনো জামায়াত চাচ্ছে ভোটের মাধ্যমে মতায় যেতে। বোমাবাজি করে মতায় যাওয়া যাবে অথবা উচিত হবে সে কথা ভাবছে না এই দলটি। গোলাম আযমের রাজনৈতিক জীবন আরম্ভ হয় রাষ্ট্রভাষা আন্দোলনের মাধ্যমে। গোলাম আযম ছিলেন ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের ছাত্রসংসদের নির্বাচিত জিএস (জেনারেল সেক্রেটারি)। তিনি জিএস থাকার সময় পাকিস্তানের প্রধানমন্ত্রী লিয়াকত আলী খানকে দিয়েছিলেন উর্দুর সাথে বাংলাকে পাকিস্তানের অন্যতম রাষ্ট্রভাষা করার দাবি সংবলিত স্মারকলিপি। ১৯৪৮ সালে তদানীন্তন পাকিস্তানের প্রধানমন্ত্রী লিয়াকত আলী খান পূর্ব পাকিস্তান সফরে আসেন। সফরে এসে ২৭ নভেম্বর ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ে জিমন্যাসিয়াম মাঠে এক বিরাট ছাত্রসমাবেশে ভাষণ দেন। সেই ঐতিহাসিক ছাত্রসভায় ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের ছাত্রসমাজের প থেকে ঢাকসুর জিএস গোলাম আযম ছাত্রজনতার করতালির মধ্যে উর্দুর সাথে বাংলাকে অন্যতম রাষ্ট্রভাষার দাবি সংবলিত মেমোরেন্ডাম পাঠ করেন এবং তা দেন লিয়াকত আলী খানকে। তার সম্বন্ধে বিখ্যাত কমিউনিস্ট নেতা মোহাম্মদ তোয়াহা এক সাাৎকারে বলেছেন : 'গোলাম আযম সাহেব তখন ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের কেন্দ্রীয় ছাত্র সংসদের জিএস (জেনারেল সেক্রেটারি) ছিলেন। ছাত্র হিসেবে তিনি ছিলেন মেধাবী। স্বভাবগতভাবেই তিনি ছিলেন অমায়িক এবং ভদ্র। ভালো সার্কেলের ছাত্ররা যেমন পরস্পরের প্রতি আকৃষ্ট হয়ে থাকে, তেমনি আমরা সহজাতভাবে একত্রিত হয়ে ভাষা আন্দোলনে কাজ করেছি। আমাদের এ সার্কেলে আরো অনেক সহযোগী ছিলেন। এর পেছনে আর অন্য কোনো কারণ ছিল না।'..... (দ্রষ্টব্য : মহান একুশে সুবর্ণজয়ন্তী গ্রন্থ, পৃষ্ঠা-১৪৩৯। অ্যাডর্ন পাবলিকেশন, ঢাকা। ২০০৮।)
গোলাম আযম ১৯৭১ সালে বলেছিলেন, শেখ মুজিবের হাতে মতা হস্তান্তর করা হোক। যদিও পরে তিনি করেছিলেন পাকবাহিনীর সাথে সহযোগিতা। কারণ তিনি চাননি, ভারতীয় বাহিনী এসে তদানীন্তন পূর্ব পাকিস্তান দখল করুক। তিনি ছিলেন ভারতীয় আধিপত্যবাদের বিরোধী। কিন্তু তিনি কখনোই চাননি পাকবাহিনী নিরস্ত্র জনগণকে হত্যা করুক। তিনি পাক সামরিক জান্তার বাড়াবাড়ির করেছেন সমালোচনা। এখন আমরা জানতে পারছি যে, শেখ মুজিবও চাননি যে সাবেক পাকিস্তান ভেঙে যাক। তিনি চেয়েছিলেন সাবেক পাকিস্তানের রাষ্ট্রিক কাঠামোর মধ্যেই পূর্ব পাকিস্তানের জন্য অধিক স্বায়ত্তশাসন। তিনি আওয়ামী লীগের অন্য নেতাদের মতো ভারতে যেতে চাননি। বন্দী হয়ে চলে গিয়েছিলেন তদানীন্তন পাকিস্তানের পশ্চিমাংশে। অর্থাৎ ১৯৭১ সালে শেখ মুজিবের সাথে গোলাম আযমের ঘোরতর মতভেদ ঘটেছিল, এ রকম সিদ্ধান্ত করা যায় না। গোলাম আযমের নাগরিকত্ব ফিরিয়ে দেয়া হয় উচ্চ আদালতের রায় অনুসারে। উচ্চ আদালতের বিচারকেরা বলেন যে, ১৯৭১-এ গোলাম আযম যা করেছেন, তার জন্য তার নাগরিকত্ব বাতিল করা যেতে পারে না। গোলাম আযম উচ্চ আদালতের রায় বলে হতে পারেন বাংলাদেশের নাগরিক। বাংলাদেশের সর্বোচ্চ আদালত তাকে দেশদ্রোহী ঘোষণা করেননি। জামায়াতে ইসলামী দল একটি চরমপন্থী দল নয়। মুসলিম মূল্যবোধে বিশ্বাসী একটি মধ্যপন্থী দল। এখনো জামায়াত বাংলাদেশে একটি নিষিদ্ধ সংগঠন হিসেবে ঘোষিত হয়নি। কিন্তু তার বিরুদ্ধে ষড়যন্ত্র চলেছে। আর এই ষড়যন্ত্রের অংশ হিসেবে ফলাও করে ছাপা হচ্ছে জামায়াতে ইসলামের সদস্যরা পশ্চিমবঙ্গের বর্ধমানে বোমা বানাচ্ছিল বলে। সম্প্রতি ইউরোপ ও আমেরিকার অনেক নেতা বাংলাদেশের জামায়াতে ইসলামীকে একটি মধ্যপন্থী ইসলামি দল হিসেবে বিবেচনা করছেন। বাংলাদেশের জামায়াত মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের রাজনীতিকদের কাছে পেতে শুরু করেছে বিশেষ বিবেচনা। তারা ভাবছেন, জামায়াত একটি মধ্যপন্থী ইসলামি দল। বাংলাদেশ হলো একটি মুসলিম অধ্যুষিত দেশ এবং ওআইসির সদস্য। বাংলাদেশে মধ্যপন্থী একটি ইসলামি দলের প্রভাব বেড়ে যাওয়া, ইউরোপ ও মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের জন্য হতে পারবে শুভ। কেননা, এর ফলে খ্রিষ্টান বিশ্বের প্রতি মুসলিম বিশ্বের বৈরী মনোভাব যাবে কমে। বাড়বে ইতিবাচক সহযোগিতার মনোভাব।
বাংলাদেশে আওয়ামী লীগ এখন প্রমাণ করতে চাচ্ছে, জামায়াতে ইসলামী হলো একটি গোঁড়া ধর্মান্ধ ইসলামপন্থী দল। তাই আওয়ামী লীগ মতায় না থাকলে জামায়াত মতায় আসবে। আর এর ফলে তিগ্রস্ত হবে ইউরো-মার্কিন জোট। কিন্তু ইউরো-মার্কিন জোটের অনেক নেতাই হতে পারছেন না আওয়ামী লীগের দৃষ্টিভঙ্গির সাথে একমত। বিশেষ করে, মার্কিন যুক্তরাষ্ট্র বাংলাদেশের জামায়াত সম্পর্কে এখন অনেক ভিন্নভাবেই ভাবছে বলেই মনে হয়।
একটি বিষয় বিশেষভাবে লণীয়, তা হলো সাবেক পাকিস্তান আমলে তদানীন্তন পূর্ব পাকিস্তানে দল হিসেবে জামায়াত মোটেও শক্তিশালী ছিল না। সে শক্তি সঞ্চয় করতে পেরেছে ১৯৭১ সালের পরে। তার ভারতীয় আধিপত্যবাদবিরোধী মনোভাবের কারণে। পশ্চিমবঙ্গের অনেক পত্রপত্রিকায় লেখা হচ্ছে, বাংলাদেশে জামায়াত সাহায্য ও সহযোগিতা পাচ্ছে মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের কাছ থেকে। কিন্তু মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় যখন পশ্চিম বাংলার মুখ্যমন্ত্রী ছিলেন না, তখনই জামায়াত হয়ে ওঠে বাংলাদেশের রাজনীতিতে একটি গ্রহণযোগ্য শক্তি। বিএনপির সাথে জোট গঠন করে জামায়াত থেকে দু'জন হতে পারেন মন্ত্রী। এই দু'জন মন্ত্রী চেষ্টা করেননি বাংলাদেশে জঙ্গি ইসলামতন্ত্র প্রতিষ্ঠা করার। উদার গণতন্ত্র মেনেই পরিচালনা করতে চেয়েছেন দেশকে। বর্তমানে এই ইতিহাসটুকুকে টপকে যেতে চাচ্ছেন যেন এ দেশের অনেক সাংবাদিক। কেন তারা এটা করছেন, সেটা আমাদের বোধগম্য নয়। অনেক ভারতীয় পত্রপত্রিকার সাথে মিলছে তাদের সাংবাদিকতার ধারা।
সম্প্রতি পশ্চিম বাংলার মুখ্যমন্ত্রী অভিযোগ তুলেছেন, ভারতের কেন্দ্রীয় সরকার পশ্চিমবঙ্গ সরকারের কাজে হস্তপে করছে। যাতে ফুটে উঠছে ভারতের কেন্দ্রীয় সরকারের স্বৈরাচারী মনোভাব। কিন্তু ভারতের সংবিধান এমন যে, এ রকম হস্তপে কেন্দ্রীয় সরকার করতেই পারে। কেননা, ভারতের সংবিধানে যদিও ভারতকে বলা হয়েছে একটি ইউনিয়ন। কিন্তু ভারত মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের মতো একটি ইউনিয়ন নয়। মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের কেন্দ্রীয় সরকার তার কোনো অঙ্গরাজ্যের ঘরোয়া রাজনীতিতে হস্তপে করতে পারে না। মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রে প্রত্যেকটি অঙ্গরাজ্য নির্বাচিত করে তাদের নিজস্ব গভর্নর। কিন্তু ভারতের বিভিন্ন প্রদেশের গভর্নর বা রাজ্যপাল নিযুক্তি পান কেন্দ্রীয় সরকারের কাছ থেকে। রাজ্যপাল কেন্দ্রীয় সরকারের নির্দেশে যেকোনো সময় প্রাদেশিক সরকারকে ভেঙে দিতে পারেন। এ ছাড়া কেন্দ্রীয় সরকার যেকোনো প্রদেশের সীমানার ঘটাতে পারে রদবদল। যেটা মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের কেন্দ্রীয় সরকার পারে না তার অঙ্গরাজ্যের েেত্র। ভারতকে যদি একটা প্রকৃত ফেডারেশন হতে হয়, তবে তার প্রত্যেকটি প্রদেশকে এক হয়ে করতে হবে আন্দোলন। একা পশ্চিমবঙ্গের পে ভারতকে একটা প্রকৃত ফেডারেশনে পরিণত করা কখনোই সম্ভবপর হতে পারে না। বাংলাদেশ এমন একটি রাষ্ট্র নয়, যে নাকি পারে পশ্চিমবঙ্গকে এ কাজে সহায়তা করতে। বিরাট রাষ্ট্র ভারত। সাবেক পাকিস্তানকে ভেঙে দেয়ার জন্য পূর্ব পাকিস্তানে পাঠিয়েছিল তার সৈন্য। কিন্তু অনুরূপ কিছু করতে পারে না বাংলাদেশ পশ্চিমবঙ্গের জন্য। যদিও পশ্চিমবঙ্গের বাংলা ভাষাভাষী মানুষের জন্য বাংলাদেশের মানুষ অনুভব করে সমমর্মিতা। কিন্তু তবুও ভারতের অনেক পত্রপত্রিকায় এমনভাবে খবর ছাপা হচ্ছে, যা পড়ে মনে হতে পারে বাংলাদেশ চাচ্ছে ভারত থেকে পশ্চিমবঙ্গের বিযুক্তি। জানি না, এ ধরনের প্রচারণার শেষ ফল কী দাঁড়াবে। ভারতের হিন্দুত্ববাদী সরকার পশ্চিমবঙ্গকে ভারতের সাথে যুক্ত রাখার অজুহাত তুলে বাংলাদেশের সাথে একটা সঙ্ঘাত বাধাবে কি না, সেটাও বলা যাচ্ছে না। আমরা গণতন্ত্রে আস্থাশীল। আস্থাশীল সংবাদপত্রের স্বাধীনতায়। কিন্তু দুঃখজনকভাবে আমরা ল করছি যে, আমাদের দেশের অনেক পত্রপত্রিকায় সংবাদ সরবরাহ করা হচ্ছে ভারতের হিন্দুত্ববাদী সরকারেরই অনুকূলে। এ ধরনের সাংবাদিকতা জাতীয় স্বার্থেই বর্জনীয়।
লেখক : প্রবীণ শিক্ষাবিদ ও কলামিস্ট