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Wednesday, June 8, 2011

Fwd: भाषा,शिक्षा और रोज़गार



---------- Forwarded message ----------
From: भाषा,शिक्षा और रोज़गार <eduployment@gmail.com>
Date: 2011/5/31
Subject: भाषा,शिक्षा और रोज़गार
To: palashbiswaskl@gmail.com


भाषा,शिक्षा और रोज़गार


राजस्थानःऑनलाइन होंगे बोर्ड के दस्तावेज

Posted: 30 May 2011 11:16 AM PDT

यदि किसी व्यक्ति ने वर्ष 1980 में दसवीं या बारहवीं कक्षा पास की थी और उसकी मार्कशीट गुम हो गई हो तो उसे इसके लिए माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अजमेर कार्यालय नहीं जाना पड़ेगा। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड विद्यार्थियों से संबंधित दस्तावेजों का डिजिटलाइजेशन करेगा। यह जानकारी माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष सुभाष गर्ग ने रविवार को सर्किट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान दी।
बोर्ड अध्यक्ष ने कहा कि साढे तीन करोड़ रूपये की लागत से वर्ष 1971 से 2010 तक बोर्ड के विद्यार्थियों से संबंघित प्रमाण-पत्रों को डिजीटलाइजेशन का कार्य किया जाएगा। यह कार्य प्रारंभ कर दिया गया है।

इन दस्तावेजों को बोर्ड की वेबसाइट पर ऑनलाइन कर दिया जाएगा। इसके बाद इच्छुक व्यक्ति अपनी अंकतालिका या प्रमाण पत्र संबंधित जिले में स्थित विद्यार्थी सेवा केन्द्र से प्राप्त कर सकेगा। डा. गर्ग ने बताया कि शैक्षिक उन्नयन की दृष्टि से भी बोर्ड की ओर से व्याख्याताओं और विषय अध्यापकों के लिए रिफ्रेशर कोर्स आयोजित किए जा रहे हैं।
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने की बात पर अध्यक्ष डा. गर्ग ने कहा कि उनके मायने में दसवीं और बाहरवीं कक्षा के परीक्षा परिणाम में ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने का कोई औचित्य नहीं है। जब उचच् शिक्षा की कक्षाओं में मेरिट से प्रवेश दिया जाता है और वह नम्बरों के आधार पर बनती हैं तो फिर ग्रेडिंग का क्या उपयोग रहा(राजस्थान पत्रिका,बीकानेर,30.5.11)।

बिहारःबीएड कॉलेजों पर नकेल कसने के लिए सरकार ने तैयार की गुप्त रणनीति

Posted: 30 May 2011 10:50 AM PDT

बीएड पाठ्यक्रम संचालित करने वाले कॉलेजों में अगले सत्र से प्रबंधन कोटा खत्म हो जाएगा। इसके लिए सरकार ने गुप्त रणनीति बना ली है। छात्रों पर प्रबंधकों के दबाव को रोकने के लिए बैंकों में सीधे फीस जमा करने की व्यवस्था भी इसी साल से लागू हो जाएगी। जो प्रबंधन इस व्यवस्था को मानने से इनकार करेगा उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के साथ ही उसकी मान्यता भी निरस्त कर दी जाएगी।

निजी कालेजों के प्रबंधन द्वारा छात्रों से अधिक फीस वसूली को रोकने के लिए महीने भर से चल रही कवायद में सरकार की बिलकुल नहीं चली। एक तरह से ताकतवर कॉलेजों के सामने सरकार ने आत्मसर्पण ही कर दिया। कालेजों ने काउसिंलिंग के दौरान ८० हजार से एक लाख तीस हजार रुपए तक की फीस रखे जाने की वकालत की थी। उच्च न्यायालय ने भी कुछ कालेजों के लिए ५० हजार रुपए की फीस रखने का सुझाव दिया था। इस आधार पर प्रदेश में बीएड के १०२४ कॉलेजों में तीन तरह की फीस ली जा सकती है । कुछ कॉलेजों में फीस नहीं ब़ढ़ेगी लेकिन काफी कालेजों में ५१ हजार रुपए से लेकर एक लाख रुपए के बीच तीन श्रेणियों में फीस रखे जाने पर विचार चल रहा है। इसके लिए ६२ चार्टर्ड एकाउंटेंट की मदद से औपचारिकताएं पूरी कराई जा रही हैं ।


लेकिन सरकार ने इन विद्यालयों के पर कतरने के लिए भी एक गुप्त योजना तैयार की है। सरकार का मानना है कि जब फीस ब़ढ़ रही है तो प्रबंधन कोटा ही खत्म कर दिया जाए।
बीएड प्रवेश परीक्षा कराने के एवज में आए लाखों रुपए की धनराशि का पूरा ब्योरा न देने के मामले में शासन ने लखनऊ व आगरा विवि की ऑडिट जांच के आदेश दिए गए हैं । आशंका जताई जा रही है कि इस मामले में लाखों का हेर फेर किया गया है।रिपोर्ट मांगे जाने के बाद भी विवि द्वारा रिपोर्ट न देने के एवज में ऑडिट जांच के आदेश दिए गए हैं। गत वर्ष लखनऊ विवि ने राज्य सरकार पर संयुक्त बीएड प्रवेश परीक्षा आयोजित कराई थी। अर्हता नियम, पेपर लीक और काउंसिलिंग कराने तक में विवादों से घिरे रहे विश्वविद्यालय ने इस परीक्षा से करो़ड़ों रूपए की आय की थी। इसमें सामान्य-ओबीसी वर्ग के लिए आठ सौ ヒपए का फार्म तथा एससी-एसटी के लिए चार सौ का फार्म तय किया गया(नई दुनिया,दिल्ली,30.5.11)।

मध्यप्रदेशः८० फीसदी अंक पाने वालों को मिलेंगे ५ हजार रुपए

Posted: 30 May 2011 10:40 AM PDT

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश में इस वर्ष से गांव की बेटी योजना की तरह हायर सेकंडरी परीक्षा में ८० प्रतिशत अंक पाने वाले सभी विद्यार्थियों को भी कॉलेज में प्रवेश लेने पर ५ हजार रूपए की छात्रवृत्ति देने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि नीमच जिले के सिंगोली में इसी शैक्षणिक सत्र से कॉलेज प्रारंभ किया जाएगा।चौहान रविवार को जावद तहसील के ग्राम अठाना में नक्षत्र वाटिका पर स्थापित की गई ६३ फुट ऊंची हनुमान प्रतिमा के अनावरण समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने प्रदेश में शिक्षा का वातावरण निर्मित करने के लिए लागू की गई योजनाओं की चर्चा करते हुए कहा कि कक्षा १ से १२ वीं तक सभी विद्यार्थियों को दो जोड़ गणवेश और पाठ्यपुस्तकें निःशुल्क वितरित की जाएंगी(नई दुनिया,नीमच/जावद,30.5.11)।

राजस्थानःशर्ते पूरी न करने वाली स्कूलों की मान्यता समाप्त होगी

Posted: 30 May 2011 10:30 AM PDT

शर्तो की पालना किए बिना स्कूल खोलने के लिए मान्यता नहीं मिलेगी। वहीं अगर वर्तमान में संचालित स्कूल मान्यता की निर्धारित शर्त पूरी नहीं करते हैं तो उनकी भी मान्यता समाप्त कर दी जाएगी। यह बात राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष ने सुभाष गर्ग ने राजस्थान पत्रिका से विशेष बातचीत में बताई। गर्ग ने बताया कि स्कूल प्रबंधकों को मान्यता के लिए परिपत्र देना होगा जिसमें उन्हें यह घोषणा करनी होगी कि वे निर्धारित सभी शर्ते पूरी करते हैं।
ऑन द स्पॉट मान्यता खत्म
गर्ग ने बताया कि जिस जमीन पर स्कूल खोला जाना है उसकी उपयोगिता व कनवर्जन के बारे में भी स्कूल प्रबंधन को जानकारी उपलब्ध करवानी होगी। वहीं जिस स्कूल में प्रयोगशाला की व्यवस्था नहीं होगी, उसकी जांच के दौरान उसी समय मान्यता समाप्त कर दी जाएगी।
10 वीं और 12 वीं परीक्षा एक ही समय

गर्ग ने बताया कि छात्रों व सरकारी मशीनरी की सुविधा के मद्देनजर आगामी सत्र से दसवीं व बारहवीं की परीक्षा एक ही समय सुबह 8 बजे से 12.15 तक करवाई जाएगी। आगामी 8 जून को होने वाली बैठक में इन सभी फैसलों का अनुमोदन कर दिया जाएगा। वहीं मेरिट में आने वाले छात्रों का दीक्षांत समारोह हर वर्ष आयोजित करने की योजना है।
हर स्कूल जुड़ेगा बोर्ड से
गर्ग ने बताया कि आने वाले समय में प्रदेश के हर स्कूल को बोर्ड से ऑनलाइन जोड़ने की योजना है, ताकि स्कूल व बोर्ड को सूचनाओं के आदान-प्रदान करने में आसानी रहे। वहीं बोर्ड अपने खर्चे पर एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के अनुसार शिक्षकों को अपग्रेड व अपडेट करने के लिए रिफ्रेशर कोर्स करवाए जा रहे हैं(राजस्थान पत्रिका,जोधपुर,30.5.11)।

आरपीएमटीःप्राप्तांकों में नहीं कोई फेरबदल

Posted: 30 May 2011 10:12 AM PDT

एक रात में आरपीएमटी की वरीयता सूची गड़बड़ाने के मामले में राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि विस्तृत परिणाम में अभ्यर्थियों के प्राप्तांकों में कोई फेरबदल नहीं किया गया है। रविवार को विवि अघिकारियों ने प्रेस वार्ता में बताया पिछले वर्षो में भी ऎसा होता आया है कि अभ्यर्थियों की अंतिम वरीयता सूची काउंसलिंग के समय तय की जाती है।
समान अंकों की स्थिति में 12वीं और 10वीं कक्षा के अंकों के आधार पर ये वरीयता तय होती है। परीक्षा संयोजक डॉ. डी. के. गुप्ता ने बताया कि इस बार 12वीं का परिणाम नहीं आने के कारण इस परिणाम में समान अंक वाले अभ्यर्थियों को समान रैंक दे दी गई। इसमें एक वरीयता पर कई अभ्यर्थी थे। अभ्यर्थियों को अपनी रैंक का सही अनुमान नहीं होने के कारण ही विश्वविद्यालय ने दूसरे दिन विस्तृत परिणाम जारी किया(राजस्थान पत्रिका,जयपुर,30.5.11)।

गुम होती भाषा और मूक सरकारें

Posted: 30 May 2011 09:30 AM PDT

कोया, कोरवा, कोंडा, आओ, बाल्टी, विष्णुपुरिया, खरिया, खासी और तमांग। इन शब्दों का मतलब और औचित्य समझने में आप उलझ गए होंगे। मगर ये शब्द ये वास्तव में समृद्ध भारतीय भाषाएं हैं जिनकी जड़ें हमारे देश के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता से जुड़ी हैं। अपने अस्तित्व के लिए जूझती ऐसी 62 भाषाओं में से 20 तो बिल्कुल लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं। अंग्रेजी और दूसरी बड़ी भाषाओं के आतंक में गुम होती जा रही इन भाषाओं के बचने की एक क्षीण सी सही, लेकिन अब उम्मीद जागी है। योजना आयोग भारत भाषा विकास योजना नाम की नई स्कीम पर विचार कर रहा है। तो मानव संसाधन विकास मंत्रालय भी इस पर राज्यों के शिक्षा मंत्रियों के अलावा केंद्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद की प्रस्तावित बैठक में इस पर चर्चा करने जा रहा है। असम, अरुणाचल, जम्मू-कश्मीर, उड़ीसा, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, झारखंड, मेघालय, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और त्रिपुरा जैसे दूसरे राज्यों में प्रचलित लगभग सौ भाषाओं पर संकट है। मूल वजह इन भाषाओं का संविधान की आठवीं अनुसूची से बाहर होना है। खास बात है कि देश के लगभग साढ़े तीन करोड़ लोग इन भाषाओं को पढ़ने-लिखने व बोलने वाले हैं। फिर भी केंद्र व राज्य सरकारें उनके अस्तित्व को लेकर बहुत फिक्रमंद नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने आठवीं अनुसूची के बाहर की इन सौ भाषाओं में से 62 के अस्तित्व को खतरे में माना है। यूनेस्को की सूची के मुताबिक अरुणाचल व असम में लगभग दो लाख लोग आदी भाषा बोलते हैं, फिर भी उसका अस्तित्व खतरे में है। त्रिपुरा व असम में विष्णुपुरिया, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल में भूटिया, उड़ीसा, झारखंड, पश्चिम बंगाल में भूमिजी, कर्नाटक की कूरगी, कोडागू, जम्मू-कश्मीर की बाल्टी, नगालैंड मेंलगभग डेढ़ लाख लोगों में प्रभाव रखने वाली आओ भाषा पर खत्म होने का खतरा है। पश्चिम बंगाल व झारखंड में कोडा व कोरा भाषा का प्रभाव 43 हजार लोगों पर है। महाराष्ट्र व आंध्र प्रदेश के सवा लोगों पर कोलामी भाषा का प्रभाव है। इस तरह यूनेस्को ने कुल 62 भारतीय भाषाओं के समाप्त होने की आशंका जताई(राजकेश्वर सिंह,दैनिक जागरण,दिल्ली,30.5.11)।

स्तरीय शोध से ही विश्वविद्यालयों का स्तरोन्नयन संभव

Posted: 30 May 2011 08:30 AM PDT

केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश ने ठीक ही कहा है कि आइआइटी और आइआइएम उच्चस्तरीय शोध के केंद्र नहीं बन सके हैं। इनके जरिये शायद ही कोई महत्वपूर्ण शोध सामने आया हो। दुनिया भर में शोध और अनुसंधान का काम विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में होता है। लेकिन हमारे विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थान घटिया राजनीति के केंद्र बन गए हैं। आबादी की दृष्टि से चीन के बाद हम दूसरे नंबर पर हैं, लेकिन दुनिया को बताने लायक हमारे पास कोई उपलब्धि नहीं है। सारी की सारी वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियां पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों के कार्यो से भरी पड़ी हैं। उसमें मुश्किल से भी किसी भारतीय का नाम नहीं मिलता है। कांग्रेसी मंत्रियों में इस बात पर बहस शुरू हो गई तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि आजाद भारत में भारतीयों ने कौन-कौन से नए आविष्कार और अनुसंधान किए हैं, जिनकी अंतरराष्ट्रीय जगत में मान्यता है। हालांकि इस दुरावस्था के लिए केंद्र की सभी सरकारें जिम्मेदार रही हैं, क्योंकि अभी तक हम शोध और अनुसंधान की कोई राष्ट्रीय नीति और लक्ष्य तय नहीं कर सके हैं। हमारे विश्वविद्यालयों, आइआइटी, आइआइएम और अन्य संस्थानों में राजनीति और भाई-भतीजावाद इतना हावी है कि वहां कामकाज का कोई माहौल नहीं है, इसीलिए मौलिक खोज व अनुसंधान के मामले में हमारी गिनती दुनिया के बेहद पिछड़े देशों में होती है। हमारे पास आइआइटी जैसे संस्थान हैं, कई स्तरीय अनुसंधान केंद्र हैं और विश्वविद्यालयों में विज्ञान के विभाग भी हैं। लेकिन सीएसआइआर का एक सर्वे बताता है कि हर साल जो करीब तीन हजार अनुसंधान पत्र तैयार होते हैं, उनमें कोई नया आइडिया नहीं होता है। वैज्ञानिकों तथा वैज्ञानिक संस्थाओं की कार्यकुशलता का पैमाना वैज्ञानिक शोध पत्रों का प्रकाशन और पेटेंटों की संख्या है, लेकिन इन दोनों ही क्षेत्रों में गिरावट आई है। भारत में सील किए गए पेटेंटों की संख्या 1989-90 में 1990 से गिरकर 2006-2007 में 1881 रह गई है, जबकि रिसर्च एवं डेवलपमेंट (आरएंडडी) पर खर्च हर वर्ष बढ़ता जा रहा है। पिछले 10 वर्षो में यह 232 प्रतिशत बढ़ गया है। अब विज्ञान मंत्रालय नए अवार्ड ऐसे वैज्ञानिकों के लिए शुरू करेगा, जो अपने देश के अंदर कार्य करना चाहते हैं। प्रधानमंत्री ने जरूरत इस बात की बताई है कि निजी क्षेत्र शोध के मामले में निवेश की लहर पैदा करें। पर जब तक देश के वैज्ञानिक संस्थानों-विश्वविद्यालयों में शोध, आविष्कार का माहौल नहीं पैदा किया जाएगा, तब तक कुछ नहीं होगा। देश के कई वैज्ञानिक संस्थानों और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं पर ऐसे मठाधीशों का कब्जा है, जिनका अकादमिक कार्य इस स्तर का नहीं है कि वे किसी संस्थान के निदेशक बनाए जाएं, लेकिन अपनी पहुंच के बल पर वे वैज्ञानिक अनुसंधान के मुखिया बने हुए हैं। विज्ञान की दुनिया में जोड़-घटाकर यों ही कुछ हासिल नहीं किया जा सकता है। विज्ञान में कुछ करने का मतलब है कि कोई नई खोज या आविष्कार किया जाए। लेकिन जब चुके हुए लोग राजनीतिक तिकड़म और भाई-भतीजावाद से वैज्ञानिक संस्थानों, प्रयोगशालाओं एवं केंद्रों के मुखिया होंगे तो क्या होगा? शायद इन्हीं सब कारणों से वैज्ञानिक समुदाय में कुंठा बढ़ रही है। यह कोई अकारण नहीं है, जिन भारतीय वैज्ञानिकों ने नाम कमाया है, वे विदेशों में बस चुके हैं। लगभग दस लाख भारतीय वैज्ञानिक डॉक्टर और इंजीनियर आज देश से बाहर काम कर रहे हैं। भारत को विश्व बाजार में अलग-थलग नहीं रहना है तो स्पष्ट रूप से हमें देश में विज्ञान और तकनीक के विकास का माहौल बनाना होगा। देश की जरूरत के हिसाब से विज्ञान और तकनीकी अनुसंधान की प्राथमिकताएं तय की जानी चाहिए। विज्ञान और तकनीकी अनुसंधान को अफसरशाही के शिकंजे से मुक्त कराकर देश के निर्माण के लिए समयबद्ध स्पष्ट कार्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए। वास्तव में भारतीय अनुसंधान एवं विकास संस्थान ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में अर्थ-व्यवस्था को नया रूप देने और स्थानीय उद्योग को उन्नत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके लिए सभी पक्षों की मानसिकता में बदलाव लाना होगा। इसके लिए हमारे प्रधानमंत्री, मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को भी अपनी क्षमता और दक्षता के साथ योजनाओं और नीतियों के क्रियान्वयन पर निचले स्तर तक नजर रखनी होगी(निरंकार सिंह,दैनिक जागरण,30.5.11)।

सरलीकरण की ज़िद के बीच हिंदी के शब्द

Posted: 30 May 2011 07:30 AM PDT

हमारे भाषाई मीडिया की अभूतपूर्व तरक्की और हिंदी पट्टी वालों के फेसबुक या ट्विटर सरीखी सोशल मीडिया साइट्स से दिनों-दिन बढ़ते जुड़ाव के बावजूद एक सरल-सी बात लोग भूलते जा रहे हैं। वह यह, कि मनुष्यों की ही तरह शब्दों का भी अपना एक खास जन्मस्थान और इतिहास होता है। आदिकाल से भाषाएं इंसानों के साथ देश-विदेश की यात्रा करती रही हैं। और बाहर से आए शब्द जब नए परिवेश में घुसते हैं, तो यात्रियों की ही तरह उनका भी व्यक्तित्व बदलने लगता है।

असली हिंदुस्तान को आर्यावर्त तक और हिंदी शब्दों की जड़ों को सिर्फ संस्कृत तक सीमित समझने वाले लोग किताब, कुरसी, मेज़, चाय, चीनी, हलुआ, सरीखे शब्द इस्तेमाल करते हुए यह नहीं देख पाते हैं कि यह शब्द चीन, अफगानिस्तान, फारस, यूरोप, और भी न जाने कहां-कहां से परदेसी यात्रियों के साथ आकर हमारी सामान्य बोलचाल में समाते चले गए हैं। कभी वे विदेशी हमलावरों के दस्तों के साथ घुसे, तो कभी फकीरों, सूफी-संतों की मंडलियों के मुख से सीधे कानों और फिर दिलों में उतर गए। कभी विदेशी जहाजों के साथ शब्द बंदरगाहों पर उतरे और कभी कारोबारियों के कारवां के साथ किसी सुदूर सराय में सुनी सुनाई लोक कथाओं की मार्फत जाने कितने देशों तक जाकर दादी-नानियों की धरोहर बने और अमर हो गए।


इस लेखिका को अक्सर (स्वघोषित तौर से) हिंदी की सीमित समझ रखने वाले पाठकों की तरफ से अपने स्तंभ की भाषा में (उनकी राय में) विदेशी और अप्रचलित शब्दों का तनिक कम इस्तेमाल करने की नेक सलाह दी जाती रही है। पर हमारा दृढ़ विचार है कि हिंदी के पाठकों, श्रोताओं के बीच अपनी भाषा के शब्दों, उनके बदलते अर्थ, रस, गुण और उसकी मूल जड़ों की बाबत जानकारी जितनी बढ़ेगी, उतना ही वे जीवन और कला से रस खींच सकेंगे। टीवी पर नक्की सुरों में अनर्गल अटपटी हिंगलिश या किताबी हिंदी बोलते एंकरों और बॉलीवुड सितारों की तरह हम हिंदी का तमाम बहुमूल्य धान ढाई पंसेरी ही बेचते जाने को इतने उतावले क्यों हों?
भाषा के पारखी और साहित्य साधक जानते हैं कि भारतीय भाषाओं में शब्दों का इतिहास कितना असीमित और रसमय है। हमारे वैयाकरणाचार्य और लेखक घुमंतू भाषा में शब्दार्थ के इतिहास की महत्ता खूब समझते रहे हैं। शाकटायन के अनुसार सर्वाणि नामानि आख्यातजानि, यानि हर शब्द के भीतर उसकेजन्म की कहानी छिपी होती है। सुदूर यूरोप में फ्रांसीसी की प्रसिद्ध लेखिका कोलेट ने भी कहा है, कि शब्द का मर्म और इतिहास खोजना हो, तो उसका क्रिया रूप पकड़ो। क्रियापद साफ बता देता है कि यह शब्द महाशय कितने घाटों का पानी पी चुके हैं।

यह हिंदी वालों के आलसीपन का प्रमाण नहीं तो क्या कहा जाएगा कि हाय हिंदी का इतना रोना रोने और विदेशी भाषाओं के बढ़ते प्रचार पर पछाडें खाने के बावजूद हिंदी में शब्दों के सरस इतिहास और भूगोल को जो सामान्य पाठक को सहजता से पहुंचा सकें, ऐसी किताबें बहुत ज्यादा नहीं लिखी गई हैं। बहुत पहले मध्यकालीन हिंदी की जड़ों और कालक्रम में सांस्कृतिक और राजनीतिक कारणों से हिंदी में आए नाना बदलावों पर हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बहुमूल्य लेखन किया था। उसके कई साल बाद स्व. विद्यानिवास मिश्र की एक पुस्तक, हिंदी की शब्द संपदा आई। जिसका कलेवर कमोबेश उत्तर पूर्व में प्रचलित हिंदी शब्दों के आंचलिक मूल के खुलासे तक ही सीमित था। उस पुस्तक की कृपा से लेखिका का जाने कितने मनोमुग्धकारी आंचलिक शब्दों से परिचय हुआ।

मसलन, हवा के ही अलग-अलग प्रकारों के आंचलिक नाम सुन लेंः सुबह की हवा कहलाती है भोरहरिया, तेज आंधी के साथ उमड़े चक्रवात को देहात में बुढ़िया आंधी भी कहते हैं, रेतीली आंधी कहलाती है भभूका, और हर दिलअजीज पूर्व दिशा से बहने वाली पुरवैया हवा जब सूखी चले तो रांड और मेह लाए तो सुहागिन कहलाती है। पश्चिम से आने वाली गरम पछुआ जब अधपकी फसल को सुखाती है, तो झोला कहाती है और वही जब जाड़ों में धीमे-धीमे चले, तो कहा जाता है कि रमकती है।

खैर। यह सुखकारी है कि आज की तारीख में हिंदी में थिसॉरस रच कर एक ठोस राह दिखाने वाले अरविंद कुमार की तरह शब्दों के इतिहास की खोजी परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कुछ और विद्वान भी सक्रिय हैं। ब्लॉगजगत में भाषा के प्रेमियों के बीच अजित वडनेरकर का एक बहुत रसीला ब्लॉग, 'शब्दों का सफर', अर्से से लोकप्रिय रहा है। अजित जी ने आम बोलचाल के शब्दों के रहस्य खोल कर घरेलू मानी जाने वाली भाषा की अंतरराष्ट्रीय रिश्तेदारी और संकरण की जटिल और लंबी प्रक्रिया से भी पाठकों का परिचय कराया है। इसका पुस्तकाकार प्रकाशन देखना सुखद है।

अजित जी की राय है कि शब्द की आत्मा उसके नाना अर्थों में छिपी होती है। और धर्म, इतिहास, समाज तमाम तरह के फिल्टरों से गुजर चुकने के बाद शब्दार्थ हमारे सामने अनेक रूपों में आते हैं। संस्कृत का अंगुष्ठ शब्द लीजिए जिससे हिंदी में अंगूठा बना और फारसी में अंगुश्तरी। फारस रिटर्न यह शब्द जब फिर हमारे अंगने में आया, तो उससे बन गया एक नया हिंदी का शब्द अंगूठी। स्थानीय माहौल और जीवन शैली से जुड़ कर लगातार बदला छत्र शब्द लीजिए। छाते से लेकर इससे बिछौना सरीखे शब्द बन गए हैं। उधर बुद्ध शब्द को, (शायद सनातन धर्मियों ने बौद्धों से अपनी पुरानी कुढ़न के चलते), विरुद्धार्थ रूप में बुद्धू बना कर भोंदूपने का समानार्थक बना डाला।

संस्कृत का परिचूर्णन शब्द हिंदी में परचून बन बैठा, तो पक्व (पके हुए)+ अन्न से पकवान शब्द ने जन्म लिया जिसके साथ पकौड़ी भी चली आई। मिठाइयों की महिषी जलेबी रानी अरब से जलाबिया के रूप में भारतीय पकवान परंपरा में आई। चपटी, चपत और चपाती जैसे शब्द संस्कृत के चर्पटी (हाथों से थपका कर आकार पाने वाली) शब्द से निकले और फारस पहुंच कर यह चपात यानी थप्पड़ का समानार्थक बना। 

ठस्सदिमाग बन बैठे सरल लिखो की जिद पालने वालों को तनिक चपतिया कर याद दिलाया जाना चाहिए कि भाषा विचार से जुड़ती है। विचार शब्द का तो मूल ही चर धातु में है, जिसका मतलब है लगातार चलना। चरति चरतो भगः यूं ही नहीं कहा गया(मृणाल पांडेय,अमर उजाला,28.5.11)।

कैसे विश्वस्तरीय बनें देसी विश्वविद्यालय

Posted: 30 May 2011 06:30 AM PDT

कांग्रेसी हलके में जयराम रमेश की ख्याति एक ऐसे राजनता के तौर पर है, जो अपनी बात खुलकर रखता है। जैतापुर में परमाणु परियोजना लगाए जाने को लेकर लोगों के विरोध का समर्थन हो या फिर मुंबई की आदर्श सोसाइटी को गिराने की मंशा जाहिर करना हो या फिर लवासा के प्रोजेक्ट को लेकर खुला बयान हो, जयराम अपनी बात खुलकर रखते रहे हैं। इसके लिए कई बार कांग्रेसी राजनीति में उनकी तरफ भौंहें तनती रही हैं, कई बार केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य भी उनसे परेशान नजर आते रहे हैं। जयराम रमेश की मुखरता ने एक बार फिर अपना कमाल दिखाया है। उन्होंने यह कहकर नई बहस को ही जन्म दे दिया है कि देश में विश्व स्तरीय छात्र तो हैं, लेकिन विश्वस्तरीय फैकल्टी नहीं है। मजे की बात है कि हमेशा की तरह उनके बयानों से अलग रहने वाली कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर इस बयान से खुद को अलग कर दिया है। विरोध के सुर विपक्षी भारतीय जनता पार्टी से लेकर उदारीकरण के दौर में करोड़ों-लाखों का पैकेज दिलवाते रहे आइआइएम और आइआइटी के प्रोफेसरों की तरफ से भी उठे हैं, लेकिन हैरत की बात यह है कि देश में शिक्षा के बदलाव के लिए कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे संस्थानों के हिमायती मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल जयराम रमेश के समर्थन में उतर आए हैं। कपिल सिब्बल का कहना है कि रमेश की बात इसलिए ठीक है कि अगर सचमुच विश्वस्तरीय फैकल्टी होती तो दुनिया के टॉप 100-150 विश्वविद्यालयों में भारत के भी किसी विश्वविद्यालय और संस्थान का नाम होता। जयराम रमेश के बयान और कपिल सिब्बल के बयानों की तासीर और अहमियत में फर्क है। जयराम रमेश की ख्याति बयानबाज राजनेता की है। हालांकि उनकी संजीदगी पर भी सवाल नहीं उठाए जा सकते, लेकिन कपिल सिब्बल का उनके समर्थन में उतरने का अपना महत्व भी है और उस पर सवाल भी है। अगर सिब्बल को लगता है कि देश में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय नहीं हैं तो सबसे बड़ा सवाल तो यही उठता है कि आखिर इसके लिए वे क्या कर रहे हैं। यह जानते हुए भी कि निजी शैक्षिक संस्थान सिर्फ शिक्षा की दुकानें बनते जा रहे हैं, वे इनके समर्थन में क्यों खड़े हैं। यह सच है कि डीम्ड विश्वविद्यालयों की खेप अर्जुन सिंह ने बढ़ाई। आनन-फानन में उन्हें मान्यता दे दी गई। कुकुरमुत्तों की तरफ खुलते इन विश्वविद्यालयों में शिक्षा का क्या हाल है, दिल्ली की सीमा से सटे फरीदाबाद में स्थित दो डीम्ड विश्वविद्यालयों के छात्रों और अध्यापकों से निष्पक्ष और औचक बातचीत से ही जाना जा सकता है। मानव संसाधन विकास मंत्री बनते ही कपिल सिब्बल ने जिस तरह इन विश्वविद्यालयों पर लगाम लगाने की कोशिशें शुरू की, उससे लगा कि वे देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को सुधारना चाहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह कवायद उनकी सिर्फ हनक बढ़ाने की कवायद ही साबित हुई। डीम्ड विश्वविद्यालयों में छात्रों से वसूली का खेल जारी है। जब राजधानी दिल्ली के नजदीक मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नाक के नीचे स्थित विश्वविद्यालयों का यह हाल है तो देश के दूर-दराज के इलाकों के डीम्ड विश्वविद्यालयों की हालत क्या होगी, इसका अंदाजा लगाना आसान है। रही बात विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों की तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत आज अपनी जीडीपी का करीब चार प्रतिशत शिक्षा पर खर्च कर रहा है। उसका भी सिर्फ दसवां हिस्सा यानी .4 प्रतिशत ही उच्च शिक्षा पर खर्च किया जाता है, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में उच्च शिक्षा पर खर्च जीडीपी के एक से लेकर सवा फीसदी तक है। दूसरी बात यह है कि विकसित देशों में, जहां के विश्वविद्यालय आज के मानकों के मुताबिक, विश्वस्तरीयता के ऊपरी पायदान पर हैं, वहां कम से कम शैक्षिक संस्थान संकीर्ण राजनीति के दायरे से बाहर हैं। वहां के विश्वविद्यालयों में नियुक्ति की योग्यता राजनीतिक प्रतिबद्धता और संपर्क नहीं है, बल्कि ज्ञान है। लेकिन क्या ऐसी स्थिति भारतीय विश्वविद्यालयों में है। बेहतर माने जाने वाले दिल्ली के ही जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में नियुक्ति के लिए एक खास तरह की विचारधारा वाला होना जरूरी है। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय में तो ऐरू-गैरू, नत्थू-खैरू तक राजनीति और तिकड़म के बल पर नियुक्ति पा जाते हैं। विकसित देशों में विश्वविद्यालयों को अकादमिक स्वायत्तता के साथ ही प्रशासनिक स्वायत्तता भी हासिल है। ज्ञान और शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध लोगों की टीम वहां की शिक्षा व्यवस्था को ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए तत्पर रहती है, लेकिन ऐसी सोच रखने वाले यहां अध्यापक कितने हैं। भारतीय शिक्षा व्यवस्था की कमी के लिए माना गया कि यहां अध्यापकों का वेतन विकसित देशों के अध्यापकों की तुलना में कम है। छठे वेतन आयोग ने अध्यापकों की इस कमी को पूरा तो किया है, लेकिन इसके बावजूद अध्यापकों और प्रोफेसरों में अपने काम के प्रति प्रतिबद्धता कम ही नजर आ रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में तो अध्यापकों को खुलेआम राजनीति करते देखा जा सकता है। जब दिल्ली विश्वविद्यालय की यह हालत है तो देश के दूसरे इलाके के विश्वविद्यालयों का अंदाजा लगाया जाना आसान होगा। फिर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश की अब भी करीब 25 फीसदी जनता निरक्षर है। कॉलेज और विश्वविद्यालय जाने वाले युवाओं में से सिर्फ बमुश्किल 14 फीसदी को ही दाखिला मिल पाता है। देश के ज्यादातर विश्वविद्यालय सिर्फ और सिर्फ डिग्रियां बांटने की मशीन बन गए हैं। गुणवत्ता आधारित शिक्षा पर उनका ध्यान नहीं है। उनके लिए अकादमिक कैलेंडर को पूरा करना और परीक्षाएं दिलवाकर डिग्रियां बांट देना ही महत्वपूर्ण काम रह गया है। ऐसे में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों की उम्मीद भी बेमानी ही है। बहरहाल, जिन यूरोपीय या अमेरिकी विश्वविद्यालयों की तुलना में जयराम रमेश ने भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, वे भी दूध के धुले नहीं हैं। दुनिया में अपनी गुणवत्ता आधारित शिक्षा के लिए मशहूर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की कारस्तानी हाल ही में उजागर हुई है। लीबिया पर नाटो और अमेरिकी कार्रवाई शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद यानी 4 मार्च, 2011 को लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के निदेशक सर हावर्ड डेवीज को इस्तीफा देना पड़ा। इसकी वजह रही लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के लीबिया के तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के साथ आर्थिक रिश्तों का खुलासा। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में गद्दाफी के बेटे सैफ-अल-गद्दाफी ने 2003 से 2008 तक पढ़ाई की थी। जहां से उसे पीएचडी की डिग्री मिली। आरोप है कि उसकी थिसिस इंटरनेट से कट-पेस्ट करके तैयार की गई और इसमें उसकी मदद स्कूल के एक डीन ने ही की थी। खुलासा तो यह भी हुआ है कि गद्दाफी से लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स को लाखों पाउंड की धनराशि मिलती रही है। सिर्फ 2003 से 2008 के बीच ही 22 लाख पाउंड के बदले लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ने लीबिया के 400 भावी नेताओं और बड़े अधिकारियों को ट्रेनिंग दी थी। और तो और लीबिया के सॉवरिन वेल्थ फंड के प्रचार के लिए लंदन स्कूल ने 50,000 पाउंड की फीस ली थी। लीबियाई सरकार द्वारा खड़े किए गए गद्दाफी इंटरनेशनल चैरिटी एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन से 15 लाख पाउंड का अनुदान भी मिला था। कुछ ऐसे ही आरोप येल विश्र्वविद्यालय पर लगते रहे हैं। येल विश्वविद्यालयों पर कई विवादास्पद कंपनियों से वित्तीय रिश्ते रखने के आरोप भी लगते रहे हैं। 2009 में केमिस्ट्री के लिए नोबेल पुरस्कार हासिल कर चुके वेंकटरमण रामाकृष्णन ने पिछले ही साल बयान दिया था कि दुनिया के विश्वस्तरीय माने जाने वाले विश्वविद्यालयों ने अपने मूल कैंपस से बाहर जाकर जो कैंपस खोले, उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ पैसा ही बनाना रहा है। भारत की जो बदहाल शिक्षा व्यवस्था है, उसमें कुकुरमुत्तों की तरह उगते संस्थानों का मकसद सिर्फ पैसा बनाना रह गया है, उसमें जयराम के बयान के सिर्फ नकारात्मक पक्ष की चर्चा करने से बेहतर यह होगा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की तरफ सकारात्मक पहल की जाए। हालांकि जानकारों के एक तबके को लगता है कि जयराम का यह बयान दरअसल भारतीय शिक्षा व्यवस्था में कथित विश्वस्तरीय माने जाने वाले संस्थानों के प्रवेश की राह खोलने की पहल है। अगर रमेश का यह बयान इस सोच से भी प्रभावित है तो उसे स्वीकार करना कठिन होगा(उमेश चतुर्वेदी,दैनिक जागरण,30.5.11)।

डीयू का सेंट स्टीफंस कॉलेज

Posted: 30 May 2011 06:10 AM PDT

सेंट स्टीफंस कॉलेज दिल्ली के सबसे पुराने कॉलेजों में से एक है। इसकी स्थापना एक फरवरी 1881 में हुई। पांच छात्र और तीन शिक्षक को मिलाकर चांदनी चौक के किनारी बाजार स्थिति एक छोटे से भवन में शुरू हुआ। 1891 से लेकर 1941 तक कॉलेज कश्मीरी गेट स्थित दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के भवन में चला। उसके बाद कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस स्थित वर्तमान कैंपस में स्थापित किया गया।

खास: कॉलेज में तरह-तरह के छात्र सोसायटी और क्लब बनाए गए हैं। यहां हर विषय के लिए सोसायटी है। सामाजिक कार्य, फिल्म, प्ले, फोटोग्राफी आदि को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर कार्यक्रम का आयोजन होता है।

हस्तियां: सेंट स्टीफंस कॉलेज से पढ़ने वालों छात्रों में देश के राजनेता, उद्योगपति, मीडिया, फिल्म के क्षेत्र में कई बड़े लोगों में अभिनेत्री कोंकणा सेन, संदीप दीक्षित, शशि थरूर, चंदन मित्रा आदि के नाम शामिल हैं।
सुविधाएं: कॉलेज में हॉस्टल की व्यवस्था है। सेंट स्टीफंस का कैफैटेरिया नॉर्थ कैंपस में मशहूर है।
दाखिले की प्रक्रिया: इस कॉलेज में दाखिले की प्रक्रिया डीयू से अलग है। इस साल डीयू के सभी कॉलेजों में दाखिला सीधे कटऑफ के आधार पर मिलेगा, लेकिन यहां दाखिला लेने के लिए फॉर्म भरना होगा। उसके बाद इंटरव्यू के लिए लिस्ट जारी होगी।



कोर्स: बीए ऑनर्स अंग्रेजी, बीए ऑनर्स संस्कृत, बीए ऑनर्स इकोनॉमिक्स, बीए ऑनर्स इतिहास, बीए प्रोग्राम, बीएससी ऑनर्स फिजिक्स, बीएससी ऑनर्स केमेस्ट्री, बीएससी ऑनर्स मैथ्स, बीएससी प्रोग्राम आदि है(हिंदुस्तान,दिल्ली,29.5.11)।

डीयू की छात्राओं के लिए नया हॉस्टल

Posted: 30 May 2011 05:50 AM PDT

नए सत्र में डीयू छात्राओं को दो हॉस्टल तोहफे के तौर पर देने वाला है। दिल्ली विश्वविद्यालय से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर बन रहा यह हॉस्टल लगभग तैयार हैं। माना जा रहा है कि अगले एक महीने तक इन्हें डीयू को सौंप दिया जाएगा। ताकि नए सत्र से छात्राओं को इनका फायदा मिल सके।


तीन मंजिला ये हॉस्टल किंग्सवे कैंप के पास बने हैं। यह राजीव गांधी गर्ल्स हॉस्टल और गर्ल्स हॉस्टल के नाम से जाने जाएंगे। इनमें राजीव गांधी गर्ल्स होस्टल में 800 छात्राओं के रहने की सुविधा होगी। इस हॉस्टल में 400 कमरे होंगे। वहीं गर्ल्स होस्टल में 700 छात्राएं रह सकेंगी। यहां कमरों की संख्या 350 होगी। इन दोनों ही हॉस्टलों को खुला व हवादार बनाया गया है।


यह दोनों हॉस्टल 21520 वर्ग मीटर और 21956 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में बने हैं। इनका ढांचा तैयार करते समय ध्यान रखा गया है कि अगर यहां कभी लाइट जाने जैसी दिक्कतें होती हैं तो छात्राओं को रोशनी व वेंटीलेशन जैसी परेशानियों से जूझना न पड़ें। दोनों होस्टलों की बनावट पर भी डीयू ने विशेष ध्यान दिए हैं(हिंदुस्तान,दिल्ली,29.5.11)।

डीयू का हंसराज कॉलेज

Posted: 30 May 2011 05:30 AM PDT

दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस स्थित हंसराज कॉलेज की अपनी एक अलग पहचान है। देश की गैर-सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में शुमार डीएवी कॉलेज प्रबंधन कमेटी का एक महत्वपूर्ण संस्थान है हंसराज कॉलेज। देश के विभाजन के बाद कमेटी ने भारत में कॉलेज खोलने का निश्चय किया। 26 जुलाई 1948 में महात्मा हंसराज की याद में डीएवी कॉलेज का नाम हंसराज कॉलेज रखा गया। हंसराज कॉलेज का संचालन डीएवी हायर सेकेंड्री स्कूल, चंद्रगुप्त मार्ग, दिल्ली से होने लगा। शुरुआत में कॉलेज में 313 छात्रों को पंजीकरण हुआ। छह साल तक कॉलेज का संचलान डीएवी स्कूल से होता रहा। उसके बाद नॉर्थ कैंपस में 15 एकड़ में कॉलेज बनकर तैयार हुआ। कॉलेज का उद्घाटन 3 अक्टूबर 1954 को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया।

फिल्मी हस्ती: फिल्म अभिनेता शाहरुख खान यहां के छात्र रह चुके हैं।
सुविधाएं: कॉलेज में हाईटेक प्रयोगशाला की व्यवस्था है। छात्रों को योग से जोड़ने के लिए कॉलेज कैंपस में योग सेंटर की स्थापना की गई है। हंसराज का कैंटीन डीयू के सभी कॉलेजों में सबसे ज्यादा आर्कषण का केंद्र है।

कोर्स: बीए वोकेशनल-46, बीए ऑनर्स अंग्रेजी-54, बीए ऑनर्स इकोनॉमिक्स108, बीए ऑनर्स इतिहास-54, बीकॉम ऑनर्स-208, बीएससी ऑनर्स फिजिक्स-69, बीएससी ऑनर्स केमेस्ट्री-69, बीएससी ऑनर्स बॉटनी-62, बीएससी ऑनर्स जूलॉजी-62, बीएससी ऑनर्स मैथ्स-31 प्रमुख हैं।
पिछले साल का कटऑफ
बीए ऑनर्स अंग्रेजी-81.3, बीए ऑनर्स इकोनॉमिक्स-95, बीए ऑनर्स इतिहास-86.5, बीकॉम ऑनर्स-94.5, बीएससी ऑनर्स फिजिक्स-81, बीएससी ऑनर्स केमेस्ट्री-85, बीएससी ऑनर्स बोटनी-75, बीएससी ऑनर्स जुलोजी-82, बीएससी ऑनर्स मैथ्स-91 प्रतिशत है। 
पता-हंसराज कॉलेज, नॉर्थ कैंपस
फोन-27667747,2766745
(हिंदुस्तान,दिल्ली,29.5.11)

राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय में प्रवेश के समय मिल रही है पाठ्य सामग्री

Posted: 30 May 2011 05:10 AM PDT

राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय देश का ऐसा पहला मुक्त विश्र्वविद्यालय है, जो स्पॉट एडमिशन के माध्यम से छात्रों को स्वर्णिम अवसर उपलब्ध करा रहा है। प्रवेश के समय ही पाठ्य सामग्री प्रदान करना मुक्त विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। मुक्त विश्वविद्यालय विकास की ओर अग्रसर है। यह विचार उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्र्वविद्यालय में रविवार को आयोजित स्थलीय प्रवेश प्रशिक्षण कार्यशाला में विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति प्रो.टीआर थापक ने मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए। इससे पूर्व प्रोफेसर थापक ने स्पॉट एडमिशन पुस्तिका एवं बीए फैशन डिजाइनिंग की पाठ्य सामग्री का विमोचन किया। अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो.नागेश्र्वर राव ने कहा कि दूरस्थ शिक्षा के लिए एक अलग दृष्टि होनी चाहिए। इस दौरान प्रो.एसपी गुप्त एवं डॉ.केके शुक्ल ने भी विचार व्यक्त किए। कार्यशाला में डॉ.टीएन दुबे, डॉ .ओमजी गुप्त, डीपीपी दुबे, डॉ.गिरीश कुमार द्विवेदी, डॉ.शिवनरेश मिश्र, डॉ.एस कुमार एवं प्रो.एएन मौर्य शामिल रहे। संचालन डॉ.हरिश्चंद्र जायसवाल एवं धन्यवाद ज्ञापन कुलसचिव डॉ.एके सिंह ने किया(दैनिक जागरण,इलाहाबाद,30.5.11)।

मूल्यांकन पर इलाहाबाद विवि के छात्रों ने उठाए सवाल

Posted: 30 May 2011 04:50 AM PDT

इविवि के बीकॉम तृतीय वर्ष के कई छात्रों ने मूल्यांकन पर सवाल उठाए हैं। इस मुद्दे पर छात्र सोमवार को प्रॉक्टर से मिलेंगे। पत्राचार से बीकॉम करने वाले छात्र सरफराज शाह को 600 में 164 अंक मिले। इसमें लागत लेखांकन में सात और व्यावसायिक पर्यावरण विषय में दो अंक मिले हैं। पत्राचार के ही सचिन शर्मा को 249 अंक मिले, जिसमें व्यावसायिक सांख्यिकी में तीन और लागत लेखांकन में 24, अतुल यादव को 261 अंक मिले, जिसमें व्यावसायिक पर्यावरण में 39 और एक विषय में बैक पेपर एवं कृष्णा जायसवाल को 284 अंक मिले, जिसमें लागत लेखांकन में 40 अंक मिले हैं। इसी प्रकार एडीसी के समर अहमद को 233 नंबर मिले, जिसमें से व्यावसायिक सांख्यिकी में एक और व्यावसायिक पर्यावरण में 24 एवं शिवम सिंह को 284 में से 40 अंक लागत लेखांकन में मिले हैं जबकि एक विषय में बैक पेपर आया है। डुप्लीकेट प्रवेश पत्र का वितरण उप्र राजर्षि टंडन मुक्त विश्र्वविद्यालय के कुलसचिव के अनुसार संयुक्त प्रवेश परीक्षा बीएड-2011 से संबंधित डुप्लीकेटप्रवेशपत्र का वितरण 30, 31 मई एवं एक जून को पूर्वाह्न दस बजे से अपराह्न साढ़े तीन बजे तक छात्र कल्याण भवन, कमला नेहरू रोड सिविल लाइंस से किया जाएगा(दैनिक जागरण,इलाहाबाद,30.5.11)।

उत्तराखंडःचतुर्थ श्रेणी की नौकरियों का खुलेगा रास्ता

Posted: 30 May 2011 04:30 AM PDT

राज्य में कुछ शर्तो के साथ विभिन्न विभागों में खाली पड़े चतुर्थ श्रेणी के पदों पर भी भर्तियों का रास्ता खुल रहा है। इससे कम पढ़े लिखे बेरोजगारों की सरकारी नौकरी की उम्मीद पूरी हो सकेगी। इसका लाभ मृतक आश्रितों के साथ ही संविदा, दैनिक व तदर्थ कर्मचारियों को मिलेगा।

कार्मिक विभाग ने शासन स्तर पर इस संवर्ग की नियुक्तियां के लिए फाइल तैयार कर मंजूरी के लिए वित्त विभाग को भेज दी है। राज्य में चतुर्थ श्रेणी के 20 हजार से अधिक पद खाली हैं। छठे वेतन आयोग ने अपनी सिफारिशों में चतुर्थ श्रेणी के पदों पर पूरी तरह से रोक लगाई हुई है। भविष्य में चतुर्थ श्रेणी के पदों को मृत कैडर घोषित कर दिया गया है।

यानि जैसे-जैसे चतुर्थ श्रेणी के पदों पर कार्यरत कर्मचारी सेवानिवृत्त होंगे, वे पद भी खत्म माने जाएंगे। लेकिन राज्य को यह छूट है कि वह जरूरत के हिसाब से कुछ विभागों में इन पदों पर नियुक्तियां कर सकता है। इनमें स्वास्थ्य, शिक्षा समेत करीब एक दर्जन विभाग हैं। पर ये विभाग भी चतुर्थ श्रेणी के पदों को सीधी भर्ती के बजाय आउटसोर्स से ही भर रहे हैं।

यही नहीं इसकी वजह से विभिन्न विभाग मृतक आश्रित कर्मचारी को नियुक्तियों में भी अड़ंगा लगा रहे हैं। इससे 3 हजार से अधिक मृतक आश्रित नौकरी के इंतजार में हैं। कार्मिक विभाग के सूत्रों ने बताया कि चतुर्थ श्रेणी के जरूरी पदों पर भर्ती की छूट देने की तैयारी चल रही है। इसके लिए वित्त विभाग को फाइल भेज दी गई है। वित्त विभाग की हरी झंडी मिलते ही चतुर्थ श्रेणी के रिक्त पदों पर भर्तियां शुरू हो जाएंगी। इससे यह डैड घोषित कैडर पुनजीर्वित हो जाएगा।


उधर, अपर सचिव कार्मिक एएस ह्यांकी का कहना है कि मृतक आश्रितों की नियुक्तियां पर किसी तरह की रोक नहीं है। मृतक आश्रित को उसकी योग्यता के अनुसार विभाग नियुक्ति दे सकता है। यदि कोई विभाग आनाकानी कर रहा है तो यह गलत है(दर्शन सिंह रावत,हिंदुस्तान,देहरादून,29.5.11)।

बिहारःअब प्लस-टू विद्यालयों में दाखिले की तैयारी

Posted: 30 May 2011 04:10 AM PDT

दसवीं के नतीजे घोषित हो चुके हैं। अब 11वीं में दाखिले को लेकर मारामारी मचने वाली है। सफल विद्यार्थियों की अपेक्षा सीटों की संख्या कम पड़ने से यह स्थिति पैदा होने की संभावना है। वैसे अभी से अभिभावकों में अपने बच्चों को बेहतर शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए तनाव जैसी स्थिति बनने लगी है। मगर बच्चों के दाखिले को लेकर तनाव लेने की जरूरत नहीं है क्



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Palash Biswas
Pl Read:
http://nandigramunited-banga.blogspot.com/

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