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Tuesday, July 10, 2012

Fwd: [New post] संपादकीय : क्या इंटरनेट एक लोकतांत्रिक माध्यम के रूप में बच पाएगा?



---------- Forwarded message ----------
From: Samyantar <donotreply@wordpress.com>
Date: 2012/7/10
Subject: [New post] संपादकीय : क्या इंटरनेट एक लोकतांत्रिक माध्यम के रूप में बच पाएगा?
To: palashbiswaskl@gmail.com


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संपादकीय : क्या इंटरनेट एक लोकतांत्रिक माध्यम के रूप में बच पाएगा?

by पंकज बिष्ट

internet-underseizeइंटरनेट बीसवीं सदी की ऐसी महत्त्वपूर्ण देन के रूप में उभरा है जिसे पश्चिमी दुनिया लोकतंत्र के चरम के रूप में प्रस्तुत करती है। यह गलत भी नहीं है। इंटरनेट की विशेषता इसकी पहुंच और सूचना व अभिव्यक्ति के लोकतंत्रीकरण की क्षमता ही है। इस का जितना व्यापक और संहारक इस्तेमाल विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज ने स्वयं पश्चिमी दुनिया, विशेष कर महाबली संयुक्त राज्य अमेरिका के शासकों के ढोंग और दोहरे चरित्र को उजागर करने के लिए किया, उससे इंटरनेट की सत्ताओं को चुनौती दे सकने की ताकत का अनुमान लगाना आसान हो गया। यह बात और है कि चीन जैसी सत्ताएं इस मिथक को तोडऩे में तब भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही थीं। साथ ही गूगल और याहू जैसी अमेरिकी कंपनियां चीन में घुटने टेक कर सिद्ध कर रही थीं कि व्यापारिक संस्थानों का सबसे बड़ा आदर्श पैसा कमाना होता है। जहां भी उनके लाभ को चोट पहुंचती नजर आएगी, उन्हें समझौता करने में देर नहीं लगेगी।

इसमें शंका भी नहीं है कि इंटरनेट ज्ञान और अभिव्यक्ति की अनिर्बंधित क्षमता का द्योतक है पर सवाल है, और यह छोटा सवाल नहीं है, इसका जैसा इस्तेमाल विकीलीक्स ने किया, क्या वैसा भविष्य में भी हो पायेगा? तो क्या वाकेई, जैसाकि मीडिया गुरू मार्शल मैक्लुहान ने कहा था, माध्यम ही संदेश होता है (मीडियम इज द मैसेज)?

यह छिपा नहीं है कि असांज पर बलात्कार का आरोप किस हद तक गढ़ा हुआ है। मूलत: सच यह है कि असांज को पश्चिमी दुनिया की सत्ता को चुनौती देने की अपनी साहसिकता का दंड भोगना पड़ रहा है और जैसा कि उन्हें डर है, असंभव नहीं कि उन्हें स्वीडन अमेरिका को सौंप दे। लगता है कि पश्चिमी संसार उन्हें ऐसा दंड देना चाहता है जो भविष्य के लिए उदाहरण बने। यह जरूर है कि यह कदम पश्चिमी दुनिया के लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ढकोसले को पूरी तरह ध्वस्त कर देगा पर अक्सर सत्ताएं अपने को बचाने के लिए किसी भी बात की परवाह नहीं करतीं। यह भी तय नजर आने लगा है कि इंटरनेट पर आज जो स्वतंत्रता देखने को मिलती है, उसका भविष्य में भी बने रहना मुश्किल नजर आ रहा है। इसी वर्ष के शुरू में अमेरिका ने पाइरेसी और कॉपीराइट को रोकने के बहाने 'स्टाप ऑन लाइन पाइरेसी एक्ट' और 'प्रिवेंटिंग रीयल ऑनलाइन थ्रैट्स टु इकानामिक क्रिएटिविटि' नाम के ऐसे दो कानून बनाने की कोशिश की थी जो इंटरनेट की स्वतंत्रता के लिए मौत की घंटी साबित होते। इसके विरोध में विकीपीडिया ने उस दिन अपनी वेबसाइटें बंद कर दी थीं।

याद रखना जरूरी है कि आज भी प्रौद्योगिकी का जो स्तर है उसे बड़ी व्यावसायिक कंपनियां ही बनाए रख सकती हैं। व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता इतनी गलाकाट है कि छोटी पूंजी उसके आगे टिक ही नहीं सकती। बड़ी पूंजी की सबसे बड़ी सीमा बड़ा मुनाफा कमाने की होती है। फिर इंटरनेट की अधिकांश कंपनियां अमेरिकी हैं और वहीं स्थित हैं। यानी उन पर अमेरिकी सरकार की नजर बराबर बनी रहती है। विकीलीक्स का गला घोंटने में इन स्थितियों ने निर्णायक भूमिका निभाई है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि जो पश्चिमी दुनिया नेट के निर्मम व्यावसायिक दोहन, साइबर अपराधों और पोर्नोग्राफी जैसी बुराइयों के लिए सहिष्णु नजर आती हैं, इंटरनेट के विचारों के खुले आदान-प्रदान को लेकर दिन ब दिन आक्रामक और हिंसक होती दिखलाई दे रही हैं।

दूसरा, और भी बड़ा खतरा यह है कि विकसित देशों की सरकारों को इंटरनेट पर नियंत्रण करने और अपनी गुप्त सूचनाओं को अभेद्य बनाने में ज्यादा समय नहीं लगनेवाला है। दूसरी ओर यह प्रौद्योगिकी सामान्य जनता की निजी जिंदगी को पूरी तरह राज सत्ताओं के कब्जे में करने की दिशा में बढ़ रही है। आज भी सच यह है कि जो भी व्यक्ति जिस भी तरह इंटरनेट में प्रवेश करता है, उसके बारे में फिर ज्यादा कुछ छिपा नहीं रहता। विशेष कर सोशल नेटवर्कों में तो यह खतरा कई गुना ज्यादा है। तात्पर्य यह कि प्रौद्योगिकी एक ओर सत्ताओं को दिन पर दिन मजबूत कर रही है और दूसरी ओर आम जनता को लगातार कमजोर। इसलिए माध्यम ही संदेश है का सिद्धांत सच है या नहीं है, इस पर विवाद हो सकता है पर यह जरूर सच है कि माध्यम, चाहे जो हो उसका चरित्र अंतत: इस बात से निर्भर होता है कि उसको नियंत्रित कौन कर रहा है।

पर यह कहना गलत होगा कि यह परिघटना सिर्फ पश्चिमी देशों तक सीमित है। देखा जाए तो सारी दुनिया के सत्ताधारियों में इंटरनेट के प्रति असहिष्णुता बढ़ रही है और यह असहिष्णुता चीन या सउदी अरब अथवा और किसी और तानाशाही व्यवस्था वाले देश तक ही सीमित नहीं है। अपने को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलानेवाला भारत इस में भी पीछे नहीं है।

जून के मध्य में इंटरनेट कंपनी गूगल ने अपनी छमाही पारदर्शिता (ट्रांसपेरेंसी) रिपोर्ट में बताया है कि जुलाई से दिसंबर, 2011 के बीच भारत सरकार की ओर से कंपनी को 101 अनुरोध उसकी ऑन लाइन सेवाओं से 255 सामग्रियां (आइटम) निकालने के लिए मिले। अगर सन 2011 के पूरे वर्ष को देखा जाए तो भारत की ओर से, जिनमें न्यायिक आदेश भी शामिल हैं, कुल 169 अनुरोध 615 सामग्रियों को निकालने के लिए मिले थे। कंपनी ने इन में से लगभग 40 प्रतिशत अनुरोधों पर अमल किया।

मामला यहीं तक सीमित नहीं रहा है। भारत की ओर से इस दौरान 2,207 ऐसे अनुरोध किए गए जो 3,427 मामलों में यूजर डाटा के बारे में सूचना मांगने से संबंधित थे। गूगल ने इन में से 66 प्रतिशत पर अमल भी किया। इन अधिकांश अनुरोधों के पीछे राजनीतिक कारण रहे हैं। वैसे भी इतनी बड़ी संख्या में जानकारी हासिल करना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि सरकार कुछ खास लोगों और समुदायों पर नजर रख रही है। ध्यान रखने की बात यह है कि यह आंकड़े सिर्फ एक कंपनी से ही संबंधित हैं। ट्विटर, याहू, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट आदि से किये गए अनुरोधों का हिसाब इसमें शामिल नहीं है। एक साप्ताहिक के अनुसार सरकार ने हाल ही में इंटरनेट प्रोवाइडरों (आईएसपी) को मौखिक आदेश दिए हैं कि वे 150 वेबसाइटों को रोक दें। एक अन्य समाचार के अनुसार भारतीय गुप्तचर एजेंसियां अमेरिकी गुप्तचर एजेंसियों से उन इंटरनेट प्रोटोकॉलों (आईपी) के पते मांग रही हैं जो राहुल गांधी के बारे में निंदास्पद सामग्री फैलाने में लगे हैं। चिंता की बात यह है कि ये मांगें लगातार बढ़ रही हैं।

इंटरनेट को लेकर भारतीय शासक वर्ग की असहिष्णुता का सबसे अच्छा प्रमाण ममता बनर्जी सरकार की कार्यवाही है। सरकार ने एक कार्टून के कारण एक प्राध्यापक अंबिकेश महापात्र को जेल भेज दिया था। इससे पहले कानपुर के कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की वेबसाइट को उन्हें बिना बतलाए इस आरोप में रोक दिया गया कि उनके कार्टून राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करते हैं। जबकि सच यह था कि वे सत्ताधारी नेताओं का मजाक उड़ाते थे।

असल में जैसे-जैसे इंटरनेट की पहुंच और लोकप्रियता बढ़ी है, सत्ताधारियों की बेचैनी भी उसी अनुपात में बढ़ती जा रही है। जबकि सत्य यह है कि हमारे देश में इंटरनेट की पहुंच अभी तक लगभग नगण्य है। लगभग चार प्रतिशत लोगों तक भी नहीं। दूसरा, सभी आईटी उपकरणों और उस की शब्दावली के साथ ही साथ इंटरनेट की सुविधाओं का सिर्फ अंग्रेजी में उपलब्ध होना उसे एक विशिष्ट वर्गीय माध्यम में सीमित कर आम भारतीय जनता से दूर करता

हमारी सरकार यह तो कहती है कि वह इंटरनेट को सेंसर या नियंत्रित नहीं करना चाहती बल्कि उसके लिए नियम बनाना चाहती है, पर इंनफार्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) एक्ट 2000 में पहले ही कई ऐसे नियम हैं जो उन सभी जरूरी बातों का ध्यान रखते हैं जो कि व्यक्ति की निजता, प्रतिष्ठा से लेकर राष्ट्र की सुरक्षा तक के मामलों को अपनी जद में लेते हैं।

पर भारत सरकार जिस तरह से नए अधिनियम के तहत आईटी कानूनों को कड़ा करने का प्रयत्न कर रही है वे इंटरनेट के इस्तेमाल को किसी भी विरोधी राजनीतिक गतिविधि के लिए असंभव बना देंगे। उदाहरण के लिए जो नए नियम बनाए जा रहे हैं उनके तहत इंटरमिडिएरी (बिचौलिए) यानी वे सब जो किसी और के लिए किसी भी तरह की सूचना का संग्रह या वितरण या उसका किसी भी तरह का रिकार्ड रखते हैं, को हर तरह की शिकायत के लिए जिम्मेदार माना जाएगा और उन्हें इन शिकायतों पर 36 घंटे में कार्रवाही करनी होगी। उन्हें इस बात की भी छूट नहीं है कि शिकायत का कोई आधार है या नहीं इस पर भी आपत्ति कर सकें। स्वयं इंटरमिडिएरी कौन होंगे यह भी स्पष्ट नहीं है। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि यह कानून परिभाषित नहीं करता कि इंटरमिडिएरी कौन है? इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर, वैब होस्टिंग प्रोवाइडर, सर्च इंजन, ऑन लाइन पेमेंट साइट्स, साइबर कैफे या स्वयं ब्लॉगर भी? साफ है कि यह कानून अत्यंत भयावह है और कमोबेश इंटरनेट के एक सामाजिक हथियार के रूप में उसकी मौत का फरमान है।

चिंता की बात यह है कि इसको लेकर हमारे समाज में सक्रिय विरोध तो रहा दूर व्यापक चेतना भी नहीं नजर आ रही है। स्थिति ऐसी ही बनी रही तो इंटरनेट के, कम से कम भारत में, सामान्य जनता के हाथ में एक बड़े लोकतांत्रिक हथियार के रूप में आने से पहले ही, सत्ताधारियों के हाथ में दमन और शोषण के एक बड़े हथियार में बदल जाने की पूरी संभावना है।

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