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Thursday, October 8, 2015

जिन्दगी में ही नहीं फिल्म में भी वे मेरे नायक रहे राजीव कुमार

जिन्दगी में ही नहीं फिल्म में भी वे मेरे नायक रहे

लेखक : नैनीताल समाचार :::: वर्ष :: :

राजीव कुमार

girda-and-yugmanchगिरदा की हजारों यादें हैं। अच्छा है किसी एक पर ही बात करना, वरना लेखक-सम्पादक दोनों चक्कर में पड़ जाएँगे। गिरदा ने मेरी फिल्म में नायक का किरदार किया। भगवती चरण वर्मा की कहानी 'वसीयत' पर बनी फिल्म में गिरदा 'जनार्दन जोशी' था। यह कहानी आज भी यू.पी. बोर्ड के इन्टरमीडिएट कोर्स की किताब 'कथा भारती' में है। कहानी तय होने के बाद सोचा था, दो मुख्य किरदार गिरदा और सखा दाज्यू (विश्वम्भर नाथ साह 'सखा') करेंगे। मगर दोस्तों ने डरा दिया- पहली बार बड़ी फिल्म बना रहे हो, दो-दो नॉन एक्टर्स को लोगे ? प्रोफेशनल एक्टर्स को लो। तो, बस गिरदा से ही कहा। गिरदा तैयार भी हो गए, कहानी भी पढ़ डाली।

जनवरी 2001 में चाँडाल चौकड़ी बनारस पहुँच गई, शूटिंग करने। नैनीताल के कई साथी थे। गिरदा सानन्द थे। शूटिंग की जरूरियात कुछ ऐसी थीं कि गिरदा का काम तकरीबन एक हफ्ते बाद शुरू हुआ। इस एक हफ्ते में गिरदा जरा उद्विग्न-''मुझे करना क्या होगा बब्बा, मुझसे हो तो जायेगा न ?'' ''दाजू, आपको कुछ नहीं करना होगा, जैसे हैं वैसे ही रहना होगा, वैसे ही बोलना होगा।'' शूटिंग शुरू होने के बाद सिर्फ दस मिनट में गिरदा सहज हो गए और बहुत अच्छा काम किया। उनकी पुरअसरार शख्सियत, गहरी, मीठी आवाज, बोलती हुई आँखें। फिल्म में कलकत्ता और बनारस के अभिनेता भी थे। सभी गिरदा के मुरीद और मित्र हो गए। आलोका दी (अलकनन्दा राय, सत्यजीत रे की फिल्म 'कंचनजंघा' की नायिका) ने कहा कि गिरदा और रमेश कृष्ण नागर (बनारस के अभिनेता) को जानना उनके लिए स्मरणीय है। मेरा सहायक आर.एस. मुखोटी, गिरदा से चालीस साल छोटा, उनका परम मित्र बन गया। नैनीताल के जहूर आलम, जितेन्द्र बिष्ट, डी.के. शर्मा, इदरीस मलिक, नीरज साह, मंजूर हुसैन सभी फिल्म में अभिनय कर रहे थे। पुराने नैनीताली पलाश विश्वास पटकथाकार के नाते मौजूद थे। निर्मल पांडे की एक फिल्म 'आँच' की शूटिंग भी उस समय बनारस में ही चल रही थी। वह भी आता रहता था। एक दिन पलाश बोले- ये तो नैनीताल वालों की पिकनिक जैसी हो रही है। ऑरफ्यूस ने एतराज किया- पिकनिक मत बोलिए पलाश दा, मेला कह सकते हैं।

गिरदा का अभिनय अच्छा हुआ, शायद इसलिए भी कि उन्होंने अभिनय करने का कोई विशेष प्रयास नहीं किया। वैसा नाटकीय चरित्र भी नहीं था- बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के रीडर। शूटिंग में एन.एस.डी. यानी 'नैनीताल स्कूल ऑव ड्रामा' तो था ही, कलकत्ता के अभिनेताओं और तकनीशियनों के साथ भी गिरदा हिल-मिल गये। उनकी हर तरह के लोगों के साथ, जल्दी आत्मीयता हो ही जाती थी। तीन हफ्ते का मेला बढि़या जम गया। गिरदा की समझ के कई कायल हो गये। एक दिन कैमरा असिस्टेंट प्रिया सेवानी को मैंने गिरदा से पूछते सुना- गिरदा कर्म करने के बाद फल की आशा करनी चाहिए या नहीं ? गिरदा बोले- ''जरूर करनी चाहिए। फल के लिए इच्छा और पूरा प्रयास करना चाहिए।

एक दिन गंगा के घाटों पर घूमते हमें निराला याद आ गए- ''अभी न होगा मेरा अन्त/अभी-अभी ही तो आया है मेरे मन में मृदुल बसन्त।' जाड़ों के मौसम में अच्छी धूप होने से, बारह-एक बजे तक बनारस के घाट भी खासे गर्म हो जाते हैं। ऐसे में जैकेट पहन के शूटिंग करते हुए शायद मेरी खोपड़ी गर्म हो गई थी और गुस्सा आ रहा था। गिरदा बोले-जैकेट उतार लो। ऐसा ही किया और सब ठीक हो गया। गिरदा को मैंने कभी गुस्से में नहीं देखा।

आधी फिल्म में रीडर जनार्दन जोशी अपने सीनियर गुरु समान, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर आचार्य चूड़ामणि मिश्रा की वसीयत 'रीड' करते हैं पूरे कुनबे के सामने। आचार्य चूड़ामणि आसन्न मृत्यु से पहले जनार्दन जोशी को बुलाकर ये जिम्मेदारी सौंप जाते हैं। गिरदा का काम सरल भी था और जटिल भी। गिरदा तो लोकगायक थे। सौंग एण्ड ड्रामा डिवीजन में भी काम किया तो 'लाइव' परफ़ॉरमेंस। फिल्म की शूटिंग में कैमरा, साउंड और दूसरे अभिनेताओं के साथ एडजस्ट करना, एक ही एक्शन या डायलॉग को बार-बार करना। शायद शुरू में उन्हें तनिक असुविधा महसूस हुई हो। लेकिन इसका कोई संकेत नहीं मिला। हमारा गिरदा बहुत प्रोफेशनल भी था और वर्सेटाइल भी। वसीयत पाठ को सपाट हो जाने से बचाना भी एक चुनौती थी। पाठ करने में आवाज का अहम रोल था। गिरदा तो आवाज के उस्माद थे। आवाज के अलावा क्रिया-कलापों, भंगिमाओं, हाथों और आँखों से भी वे बालते थे। सच ये है कि उन्हें 'डायरेक्ट' करने जैसा कभी कुछ हुआ ही नहीं। जरूरत ही नहीं पड़ी- न उनकी ओर से, न मेरी ओर से। 'पवित्र' जैसी धारणा से वे दूर थे। इस तरह की धारणा ने हमारा सत्यानाश ज्यादा किया है। लेकिन संगीत हो या नाटक या फिल्म या साहित्य या लोकनृत्य, गिरदा के मन में इन सब के लिए गहरा सम्मान था। हल्कापन या कामचलाऊ काम उन्हें सहन नहीं था। कैसे होता ? वे जो भी करते थे गहरे डूब के करते थे।

कामचलाऊ के प्रति उनकी उदासीनता का एक उदाहरण। यह फिल्म 'वसीयत' जब नैनीताल शरदोत्सव-2003 में दिखाई गई तो उसके मुख्यपात्र गीराबल्लभ त्याड़ज्यू, चौथे दिन फिल्म देखने तशरीफ लाए। तब तक उन्हें सकारात्मक समाचार मिल चुका था, और जूते पड़ने का डर नहीं रहा था। अपने काम पर मिलने वाली प्रतिक्रिया को लेकर वे बहुत संवेदनशील थे। दूसरे शायद खुद को सिनेमा के परदे पर देखने का मामला उन्हें असहज बनाने वाला था। वे तो नेपथ्य के गायक थे।

दरअसल गिरदा मेरा मैक्सिम गोर्की और वाल्ट व्हिटमैन था। वह मेरा साम्यवाद का शिक्षक था। वह कहता था कि रिक्शा चलाने वाला भी पूँजीवादी मानसिकता से ग्रस्त है क्योंकि जेब में बीस पैसे रहने पर वह इस चक्कर में रहता है कि बीस पैसे और कैसे मिल जाएँ। व्यवस्था के सर्वव्यापी और सर्वग्रासी प्रभाव को वह इस तरह समझाता था कि जब रोज सुबह तुम रेडियो पर सुनोगे 'सीको घड़ी की टिक टिक टिक, सही वक्त की टिक टिक टिक' तुम्हारे भीतर भी सीको घड़ी की इच्छा जागेगी। गिरदा ने कभी बड़ी बात नहीं की (बड़ा काम जरूर किया), न बड़े नाम लिए। मैंने कभी उनके मुँह से मार्क्स या लेनिन का नाम नहीं सुना। हाँ मोहन उप्रेती और लेनिन पन्त के नाम सुनता रहा। गिरदा ने सैकड़ों को साम्यवाद की व्यावहारिक शिक्षा दी।

जब मुझे निराला पर फिल्म बनाने का अवसर मिला तो गिरदा बोला- वाह, फैज और निराला तो हम घुट्टी बनाकर पी चुके हैं। प्यारे गिरदा तुम्हारी शान में तुम्हारे प्यारे फैज साहब का एक शेर-

''वो जिससे तुम्हारे इज्जत पे भी शमशाद कदों ने रश्क किया''…..


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